ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त—१२ देवता—अग्नि
सूक्त—१२ देवता—अग्नि
प्राग्नये बृहते यज्ञियाय ऋतस्य वृष्णे असुराय मन्म.
घृतं न यज्ञ आस्ये३ सुपूतं गिरं भरे वृषभाय प्रतीचीम्.. (१)
महान्, यज्ञ के योग्य, जल बरसाने वाले, शक्तिशाली एवं कामना पूर्ण करने वाले अग्नि
के मुख में यज्ञ करते समय जो घृत डाला है, हमारी स्तुतियां अग्नि को उसी के समान प्रसन्न
करें. (१)
ऋतं चिकित्त्व ऋतमिच्चिकिद्ध्युतस्य धारा अनु तृन्धि पूर्वीः.
नाहं यातुं सहसा न द्वयेन ऋतं सपाम्यरुषस्य वृष्णः.. (२)
हे अग्नि! हमारे द्वारा की गई स्तुति जानो, इन्हें स्वीकार करो तथा जल बरसाने के लिए
हमारे अनुकूल बनो. हम बल द्वारा यज्ञकर्म का विध्वंस नहीं करते और न कोई वेद-विरुद्ध
कार्य करते हैं. हम दीप्तिशाली एवं कामवर्षी अग्नि की स्तुति करते हैं. (२)
कया नो अग्न ऋतयन्नृतेन भुवो नवेदा उचथस्य नव्यः.
वेदा मे देव ऋतुपा ऋतूनां नाहं पतिं सनितुरस्य रायः.. (३)
हे अग्नि! तुम जल की वर्षा करते हुए किस शक्ति से हमारे यज्ञकर्म को जान लेते हो?
ऋतुओं की रक्षा करने वाले एवं दीप्तिशाली अग्नि हमें जानें. अग्नि मुझ भक्त के पशु आदि
के स्वामी हैं. इस बात को क्या मैं नहीं जानता? (३)
के ते अग्ने रिपवे बन्धनासः के पायवः सनिषन्त द्युमन्तः.
के धासिमग्ने अनृतस्य पान्ति क आसतो वचसः सन्ति गोपाः.. (४)
शत्रुओं का बंधन करने वाले, लोकरक्षक, दानशील एवं दीप्तिसंपन्न लोग कौन हैं? ये
सब अग्नि के सेवक हैं. असत्य धारण करने वाले का रक्षक एवं दुर्वचनों को आश्रय देने वाला
कौन है? अर्थात् अग्नि का कोई भक्त इस प्रकार का नहीं है. (४)
सखायस्ते विषुणा अग्न एते शिवासः सन्तो अशिवा अभूवन्.
अधूर्षत स्वयमेते वचोभिर्ऋजूयते वृजिनानि ब्रुवन्तः.. (५)
हे अग्नि! तुम्हारे स्तोता सब जगह फैले हुए हैं. ये पहले दुःखी थे, अब सुखी हुए हैं. हम
सरल आचरण करने वालों को जो दुर्वचन कहता था, वह हमारा शत्रु स्वयं नष्ट हो गया. (५)
यस्ते अग्ने नमसा यज्ञमीट ऋतं स पात्यरुषस्य वृष्णः.
तस्य क्षयः पृथुरा साधुरेतु प्रसर्साणस्य नहुषस्य शेषः.. (६)
हे दीप्तिशाली एवं कामवर्षी अग्नि! तुम्हारी स्तुति करने वाला तथा तुम्हारे निमित्त यज्ञ
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करने वाला यजमान विस्तृत घर प्राप्त करता है. तुम्हारा सेवक कामना पूर्ण करने वाला पुत्र
प्राप्त करता है. (६)
सूक्त—१३ देवता—अग्नि
अर्चन्तस्त्वा हवामहेऽर्चन्तः समिधीमहि. अग्ने अर्चन्त ऊतये.. (१)
हे अग्नि! हम तुम्हारी पूजा करते हुए तुम्हें बुलाते हैं एवं तुम्हें प्रज्वलित करते हैं. हम
रक्षा के लिए तुम्हारी पूजा करते हैं. (१)
अग्नेः स्तोमं मनामहे सिध्रमद्य दिविस्पृशः. देवस्य द्रविणस्यवः.. (२)
हम लोग धन की अभिलाषा से दीप्तिशाली एवं आकाश को छूने वाले अग्नि की
पुरुषार्थ सिद्ध करने वाली स्तुति करते हैं. (२)
अग्निर्जुषत नो गिरो होता यो मानुषेष्वा. स यक्षद्दैव्यं जनम्.. (३)
मनुष्यों के बीच स्थित रहकर देवों को बुलाने वाले अग्नि हमारी स्तुतियां स्वीकार करें
एवं देवयज्ञ संबंधी सामग्री का वहन करें. (३)
त्वमग्ने सप्रथा असि जुष्टो होता वरेण्यः. त्वया यज्ञं वि तन्वते.. (४)
हे सदा प्रसन्न होता, लोगों द्वारा वरण करने योग्य एवं पुष्ट अग्नि! यजमान तुम्हारी
सहायता से यज्ञ का विस्तार करते हैं. (४)
त्वामग्ने वाजसातमं विप्रा वर्धन्ति सुष्टुतम्. स नो रास्व सुवीर्यम्.. (५)
हे श्रेष्ठ अन्नदाता एवं भली प्रकार स्तुत अग्नि! बुद्धिमान् होता तुम्हें बढ़ाते हैं. तुम हमें
उत्तम बल दो. (५)
अग्ने नेमिरराँ इव देवाँस्त्वं परिभूरसि. आ राधश्चित्रमृञ्जसे.. (६)
हे अग्नि! पहिए की नेमि जिस प्रकार अरों को अपने में स्थित करती है, उसी प्रकार तुम
देवों को पराजित करते हो. तुम स्तोताओं को भली प्रकार धन दो. (६)
सूक्त—१४ देवता—अग्नि
अग्निं स्तोमेन बोधय समिधानो अमर्त्यम्. हव्या देवेषु नो दधत्.. (१)
हे यजमान! अमर-अग्नि को स्तुतियों द्वारा प्रबुद्ध करो. वे प्रज्वलित होकर हमारा हव्य
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देवों के पास ले जाएंगे. (१)
तमध्वरेष्वीळते देवं मर्ता अमर्त्यम्. यजिष्ठं मानुषे जने.. (२)
मनुष्य यज्ञों में उस दीप्तिसंपन्न, मरणरहित एवं मानव प्रजाओं में अतिशय यज्ञपात्र
अग्नि की स्तुति करते हैं. (२)
तं हि शश्वन्त ईळते सुचा देवं घृतश्चुता. अग्निं हव्याय वोळ्हवे.. (३)
बहुत से स्तोता घी से पूर्ण सुच लेकर देवों के समीप वहन करने के निमित्त यज्ञशाला में
अग्नि देव की स्तुति करते हैं. (३)
अग्निर्जातो अरोचत घ्नन्दस्यूञ्ज्योतिषा तमः. अविन्दद्गा अपः स्वः.. (४)
अरणियों के मंथन से प्रादुर्भूत अग्नि अपने तेज से यज्ञ विनाशकारी दस्युजनों एवं
अंधकार को समाप्त करते हुए प्रकाशित होते हैं. गाएं, जल एवं सूर्य अग्नि से ही प्रकट हुए हैं.
(४)
अग्निमीळेन्यं कविं घृतपृष्ठं सपर्यत. वेतु मे शृणवद्धवम्.. (५)
हे मनुष्यो! स्तुति योग्य, क्रांतदर्शी एवं घृत के कारण दीप्त शिखा वाले अग्नि की पूजा
करो. अग्नि हमारे इस आह्वान को सुनते हुए आवें. (५)
अग्निं घृतेन वावृधुः स्तोमेभिर्विश्वचर्षणिम्. स्वाधीभिर्वचस्युभिः.. (६)
ऋत्विजों ने घी एवं स्तुतियों द्वारा शोभन ध्यान वाले तथा स्तुतियों की कामना करने
वाले देवों के साथ विश्वदर्शक अग्नि को घी की सहायता से बढ़ाया. (६)
सूक्त—१५ देवता—अग्नि
प्र वेधसे कवये वेद्याय गिरं भरे यशसे पूर्व्याय.
घृतप्रसत्तो असुरः सुशेवो रायो धर्ता धरुणो वस्वो अग्निः.. (१)
हम विधाता, क्रांतदर्शी, स्तुति के योग्य, यशस्वी, मुख्य, घृत रूप हवि द्वारा प्रसन्न होने
वाले, बलशाली, शोभन सुखयुक्त, धन के पोषक, हव्यवाहक एवं निवासस्थान देने वाले
अग्नि के लिए स्तुतियां निर्मित करते हैं. (१)
ऋतेन ऋतं धरुणं धारयन्त यज्ञस्य शाके परमे व्योमन्.
दिवो धर्मन्धरुणे सेदुषो नॄञ्जातैरजाताँ अभि ये ननक्षुः.. (२)
जो यजमान ऋत्विजों की सहायता से स्वर्ण को धारण करने वाले, यज्ञशाला में बैठे हुए
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एवं नेता देवों को प्राप्त करते हैं, वे यजमान यज्ञ के धारक व सत्यस्वरूप अग्नि को उत्तर
वेदीरूपी उत्तम स्थान पर धारण करते हैं. (२)
अंहोयुवस्तन्वस्तन्वते वि वयो महद्दुष्टरं पूर्व्याय.
स संवतो नवजातस्तुतुर्यात्सिंहं न क्रुद्धमभितः परि ष्ठुः.. (३)
मुख्य अग्नि के लिए राक्षसों द्वारा दुष्प्राप्य हव्य देने वाले यजमान अपने शरीरों को
पापरहित बनाते हैं. नवजात अग्नि क्रुद्ध सिंह के समान एकत्रित शत्रुओं को दूर भगावें. सर्वत्र
वर्तमान शत्रु मुझसे दूर हों. (३)
मातेव यद्भरसे पप्रथानो जनञ्जनं धायसे चक्षसे च.
वयोवयो जरसे यद्दधानः परि त्मना विषुरूपो जिगासि.. (४)
सर्वत्र प्रसिद्ध अग्नि सभी मनुष्यों को माता के समान धारण करते हैं. सब लोग धारण
एवं दर्शन के निमित्त अग्नि की प्रार्थना करते हैं. धार्यमाण होते समय अग्नि सब अन्नों को
पका देते हैं एवं नाना रूप होकर स्वयं सब प्राणियों के समीप जाते हैं. (४)
वाजो नु ते शवसस्पात्वन्तमुरुं दोग्धं धरुणं देव रायः.
पदं न तायुर्गुहा दधानो महो राये वितयन्नत्रिमुस्पः.. (५)
हे दीप्तिशाली अग्नि! महान् अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाले एवं धन को धारण करने
वाले हव्यरूपी अन्न तुम्हारी संपूर्ण शक्ति की रक्षा करें. चोर जिस प्रकार गुफा में छिपाकर धन
की रक्षा करता है, उसी प्रकार तुम महान् धन प्राप्त करने के लिए मार्ग प्रकाशित करते हुए
अत्रि मुनि को प्रसन्न करो. (५)
सूक्त—१६ देवता—अग्नि
बृहद्द्यो हि भानवेऽर्चा देवायाग्नये.
यं मित्रं न प्रशस्तिभिर्मर्तासो दधिरे पुरः.. (१)
यज्ञ में दीप्तिशाली अग्नि के लिए हव्यरूप बृहत् अन्न दिया जाता है. इसलिए तुम भी
द्योतमान अग्नि की अर्चना करो. इन अग्नि को मनुष्यों ने मित्र के समान अग्रभाग में स्थापित
किया एवं स्तुतियां कीं. (१)
स हि द्युभिर्जनानां होता दक्षस्य बाह्वोः.
वि हव्यमग्निरानुषग्भगो न वारमृण्वति.. (२)
जो अग्नि देवों के समीप हव्य पहुंचाते हैं, जो भुजाओं के बल से युक्त हैं, वे मनुष्यों के
लिए देवों को बुलाते हैं एवं सूर्य के समान उत्तम धन लोगों को देते हैं. (२)
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अस्य स्तोमे मघोनः सख्ये वृद्धशोचिषः.
विश्वा यस्मिन्तुविष्वणि समर्यै शुष्ममादधुः.. (३)
हम मित्रता पाने के लिए धन के स्वामी एवं विस्तृत तेज वाले अग्नि की स्तुति करते हैं.
बहुशब्दकारी एवं धन के स्वामी अग्नि में ऋत्विज् एवं हव्य स्तोत्रों द्वारा शक्ति का आघात
करते हैं. (३)
अधा ह्यग्न एषां सुवीर्यस्य मंहना. तमिद्यह्वं न रोदसी परि श्रवो बभूवतुः.. (४)
हे अग्नि! हम यजमानों को तुम ऐसा बल दो, जिसका वरण सब करना चाहते हैं. धरती
और आकाश ने महान् सूर्य के समान श्रवण करने योग्य अग्नि को ग्रहण किया था. (४)
नू न एहि वार्यमग्ने गृणान आ भर.
ये वयं ये च सूरयः स्वस्ति धामहे सचौतैधि पृत्सु नो वृधे.. (५)
हे अग्नि! तुम स्तुति सुनकर हमारे यज्ञ में शीघ्र आओ एवं हमें उत्तम धन प्रदान करो.
हम यजमान एवं स्तोता मिलकर तुम्हारी स्तुति करते हैं. तुम युद्धों में हमें विजयी बनाओ. (५)
सूक्त—१७ देवता—अग्नि
आ यज्ञैर्देव मर्त्य इत्था तव्यां समूतये. अग्निं कृते स्वध्वरे पूरुरीळीतावसे.. (१)
हे देव! ऋत्विज् लोग अपने तेजों से बढ़े हुए अग्नि को तृप्त करने के लिए स्तोत्रों द्वारा
बुलाते हैं. वे शोभन यज्ञों में अग्नि को रक्षा के निमित्त बुलाते हैं. (१)
अस्य हि स्वयशस्तर आसा विधर्मन्मन्यसे.
तं नाकं चित्रशोचिषं मन्द्रं परो मनीषया.. (२)
हे परम यशस्वी स्तोता! तुम अपनी उत्तमबुद्धि द्वारा शब्दों में अग्नि की स्तुति करते हो.
अग्नि दुःखरहित, विचित्र तेज वाले, स्तुति योग्य एवं सर्वश्रेष्ठ हैं. (२)
अस्य वासा उ अर्चिषा य आयुक्त तुजा गिरा.
दिवो न यस्य रेतसा बृहच्छोचन्त्यर्चयः.. (३)
जो अग्नि जगत्-रक्षण-समर्थ, स्तुति से युक्त एवं आदित्य के समान दीप्तिशाली हैं, जिन
अग्नि की प्रभा से सारा जगत् व्याप्त है एवं जिनकी विशाल दीप्तियां प्रकाशित होती हैं, उन्हीं
अग्नि की प्रभा से आदित्य प्रकाश वाला बनता है. (३)
अस्य क्रत्वा विचेतसो दस्मस्य वसु रथ आ.
अधा विश्वासु हव्योऽग्निर्विक्षु प्र शस्यते.. (४)
शोभन मति वाले ऋत्विज् इस दर्शनीय अग्नि के यज्ञ से धन और रथ प्राप्त करते हैं.
यज्ञ के निमित्त बुलाए गए अग्नि प्रज्वलित होने के बाद ही सब प्रजाओं में प्रकाशित होते हैं.
(४)
नू न इद्धि वार्यमासा सचन्त सूरयः.
ऊर्जो नपादभिष्टये पाहि शग्धि स्वस्तय उतैधि पृत्सु नो वृधे.. (५)
हे अग्नि! हमें शीघ्र वह धन प्रदान करो. जिसे स्तुति करने वाले तुमसे स्तुति द्वारा पाते
हैं. हे बल के पुत्र अग्नि! हम अभिलाषकों को अन्न दो एवं आपत्तियों से हमारी रक्षा करो. हम
तुमसे धन की याचना करते हैं. संग्राम में हमारी समृद्धि के लिए तुम कारण बनो. (५)
सूक्त—१८ देवता—अग्नि
प्रातरग्निः पुरुप्रियो विशः स्तवेतातिथिः.
विश्वानि यो अमर्त्यो हव्या मर्तेषु रण्यति.. (१)
बहुत से लोगों के प्यारे अग्नि यजमान को धन देने वाले एवं अतिथि हैं. प्रातःकाल स्तुत
एवं मरणरहित अग्नि यजमानों के अधिकार में रहने वाले सभी हव्यों की कामना करते हैं.
(१)
द्विताय मृक्तवाहसे स्वस्य दक्षस्य मंहना.
इन्दुं स धत्त आनुषक्स्तोता चित्ते अमर्त्य.. (२)
हे अग्नि! शुद्ध हवि-वहन करने वाले द्वित (अत्रि के पुत्र) के लिए तुम अपनी शक्ति दान
करो. हे मरणरहित अग्नि! वे सर्वदा तुम्हारे लिए सोम धारण करते हैं एवं तुम्हारी स्तुति करते
हैं. (२)
तं वो दीर्घायुशोचिषं गिरा हुवे मघोनाम्.
अरिष्टो येषां रथो व्यश्वदावन्नीयते.. (३)
हे अश्वदाता एवं दूरगामी-दीप्तियों वाले अग्नि! हम धनिकों के कल्याण के निमित्त
स्तुतियों द्वारा तुम्हारा आह्वान करते हैं. उनका रथ युद्ध में शत्रुओं द्वारा हिंसित न होकर आगे
बढ़े. (३)
चित्रा वा येषु दीधितिरासन्नुक्था पान्ति ये.
स्तीर्णं बर्हिः स्वण्रि श्रवांसि दधिरे परि.. (४)
जिन ऋत्विजों द्वारा यज्ञ संबंधी विविध कर्म किए जाते हैं. जो अपने मुख से उच्चारण
करके स्तुतियों की रक्षा करते हैं, उन ऋत्विजों द्वारा यज्ञ में बिछे हुए कुशों पर अन्न रखे जाते
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