रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
२०८ असली कोकशास्त्र
जड़ी का सेवन ऊपर लिखे अनुसार करे । इससे वायु दूषित
बन्ध्यात्व मिट जाता है ।
यदि रक्त चिकना और अधिक गिरे और उसका रंग बहुत
लाल न होकर प्याज के रंग का सा हो तथा नाभि के पास पीड़ा
हो तो कफ दूषित आर्त्तव समझना चाहिए । आक की जड़,
मेंहदी, लौंग, नागकेसर, खरेटी की जड़ और गंगेरन की छाल सम
भाग में लेकर बकरी के दुध में घोंटकर पाने से कफ दूषित वन्ध्यात्व
दूर होता है । अथवा आँवला, हड़, बहेड़ा, सोंठ, मिर्च, चीता
इनको सम मात्रा में लेकर बकरी के दूध में पीस छानकर ऋतुकाल
में पीने से भी उक्त दोष समूल नष्ट हो जाता है ।
यदि ऋतुकाल में जोरों से बुखार हो, रक्त काला गिरे, वह
रक्त बहुत गर्म और चिकना हो, काँख, योनि, और कटि में शूल
हो, हड़फूटन रहे, नींद अधिक आवे तो समझो कि सन्निपात दूषित
वन्ध्यात्व है । अरंड ( रेंडी ) की छाल, आम की छाल, निसोथ,
कमलगट्टा, तगर, कूट, मुलहठी, सफेद चन्दन, इनको सम मात्रा
में लेकर बकरी के दूध में पीस-छान कर सात दिन तक सेवन
करे या रजस्राव होने पर्यन्त सेवन करे । बाद योनि-विकार
शुद्ध हो जाने पर आम की जड़, छोटी खटाई की जड़, लक्ष्मणा,
बाँझ ककोड़ी, सफेद फूलवाली विष्णुकान्ता, इनको सम मात्रा में
ले गाय के दूध में पीस छानकर नासिका के दाहिने छिद्र से पीने
पर पुत्र और बाम छिद्र से पीने पर कन्या उत्पन्न हो, वन्ध्यात्व
१४ असली कोकशास्त्र २०६
छूट जाय । यहाँ पर यह बात ध्यान में रहे कि ऊपर जो
औषधियाँ लिखी गयी हैं, उनका सेवन किसी अनुभवी वैद्य से
राय लेकर करना चाहिए । क्योंकि लक्षण पहचानना बड़ा
कठिन काम है ।
—०—
गर्भ स्थिति के लिए आवश्यक बातें
१—स्त्री पुरुष को स्नानादि से स्वच्छ होकर पवित्र और
साफ वस्त्र पहनना चाहिए । स्त्री यदि सफेद वस्त्र न पहन कर
रंगीन पहने तो कोई हर्ज नहीं, पर इतना जरूर हो कि वस्त्र का
रंग हलका और सफेदी लिए हुए हो, जैसे मोतिया रंग । काला
वस्त्र कभी न पहने ।
२—शयन-गृह साफ-सुथरा और सफेदी किया हुआ होना
चाहिये । उस घर में आवश्यक चाजों के सिवा अधिक चीजों का
रहना ठीक नहीं है । बहुधा लोग अपने सोने के कमरे में श्लील
चित्र टाँगा करते हैं; किन्तु यह बहुत बुरा बात है । ऐसे चित्रों
का बहुत ही बुरा असर सन्तान पर पड़ता है । कमरे में ऐसे ही
चित्र हों, जिनके देखने से मानस में विकार उत्पन्न न हो बल्कि
उत्पन्न हुए विकार नष्ट हो जायें और स्वाभाविक ही हृदय में उच्च
भाव पैदा हों ।
३—कमरा उत्तम गन्ध से परिपूर्ण होना चाहिए । यदि कोई
२१० असली कोकशास्त्र
फूल हो तो वह भी सफेद रंग का ही हो जैसे-बेला, चमेली आदि ।
४—कमरे में न तो बहुत अन्धेरा रहे और न तीक्ष्ण प्रकाश
ही हो; मन्द प्रकाश उत्तम है।
५—स्थान एकान्त और भय-रहित होना जरूरी है। गर्भाधान
करने के समय चारो ओर सन्नाटा छाया हुआ रहे ।
६—इस आनन्द के समय में स्त्री-पुरुष को निर्लज्ज और
निरंकुश नहीं हो जाना चाहिए, किन्तु अधिक लज्जा करना भी
ठीक नहीं। देखिये न, राजा विचित्र वीर्य की स्त्री ने लज्जा के
कारण गर्भाधान के समय आँखों पर पट्टी बाँध ली थी, जिसका
फल यह हुआ कि अन्ध-पुत्र धृतराष्ट्र पैदा हुआ। इस लिए इसका
भी पूरा ध्यान रखना उचित है।
७—मादक वस्तु का सेवन इस दिन कभी न करे। प्यास लगी
रहने या पानी पीकर तुरन्त गर्भाधान करने में प्रवृत्त न होना
चाहिए। भूखे पेट या भरे पेट रहना भी इस समय के लिए ठीक
नहीं। शरीर शिथिल, किसी प्रकार के रोग से पीड़ित या निद्रा-
युक्त होने पर गर्भ स्थित करने की चेष्टा एकदम त्याग देनी चाहिए।
८—सन्तान को जिस विषय में योग्य बनाना हो उसी विषय
का दोनों को चिन्तन करना चाहिए और जिस रूप की सन्तान
उत्पन्न करने की इच्छा हो उसी रूप को हृदय में स्थिर करना
उत्तम है।
—०—
असली कोकशास्त्र २११
प्रदर और प्रमेह
उत्तम और निरोग सन्तान पैदा करने के लिए माता-पिता का
रोग-रहित होना अत्यावश्यक है। इस लिए स्त्री-पुरुष को रोग से
[...] यम से रहने वाले
[...] नहीं होता, उसीका
[...] ाय और रोग का
[...] वाहिए और आगे
[...] । इस प्रकरण में
[...] लोग किया है
[...] दिन जीवन पर
[...] नाशकारी रोग
[...] ही हैं। एक का
[...] रु से ही है।
[...] है और प्रमेह
[...] है।
[...] केवल स्त्रियों
[...] खट्टा, तीक्ष्ण
[...] से, चिन्ता से,
[...] , गर्भपात से,
[...] यह रोग उत्पन्न
(पृष्ठ पर चिपकी पर्ची पर हस्तलिखित पाठ / Handwritten text on the attached slip):
- Facility. (फैसिलीटी) सुगमता
- urgent.
- Present hours of service
- Precisely. - (प्रै सिस-)
२१० असली कोकशास्त्र
फूल हो तो वह भी सफेद रंग का ही हो जैसे-बेला, चमेली आदि।
४—कमरे में न तो बहुत अन्धेरा रहे और न तीक्ष्ण प्रकाश
ही हो; मन्द प्रकाश उत्तम है।
५—स्थान एकान्त और भय-रहित होना जरूरी है। गर्भाधान
करने के समय चारो ओर सन्नाटा छाया हुआ रहे।
६—इस आनन्द के समय में स्त्री-पुरुष को निर्लज्ज और
निरंकुश नहीं हो जाना चाहिए, किन्तु अधिक लज्जा करना भी
ठीक नहीं। देखिये न, राजा विचित्र वीर्य की स्त्री ने लज्जा के
कारण गर्भाधान के समय आँखों पर पट्टी बाँध ली थी, जिसका
फल यह हुआ कि अन्ध-पुत्र धृतराष्ट्र पैदा हुआ। इस लिए इसका
भी पूरा ध्यान रखना उचित है।
७—मादक वस्तु का सेवन इस दिन कभी न करे। प्यास लगी
रहने या पानी पीकर तुरन्त गर्भाधान करने में प्रवृत्त न होना
चाहिए। भूखे पेट या भारी पेट रहना भी इस समय के लिए ठीक
नहीं है। शरीर शिथिल, किसी प्रकार के रोग से पीड़ित या निद्रा-
युक्त होने पर गर्भ स्थित करने की चेष्टा एकदम त्याग देनी चाहिए।
८—सन्तान को जिस विषय में योग्य बनाना हो उसी विषय
का दोनों को चिन्तन करना चाहिए और जिस रूप की सन्तान
उत्पन्न करने की इच्छा हो उसी रूप को हृदय में स्थिर करना
उत्तम है।
—०—
असली कोकशास्त्र २११
प्रदर और प्रमेह
उत्तम ओर निरोग सन्तान पैदा करने के लिए माता-पिता का
रोग-रहित होना अत्यावश्यक है। इस लिए स्त्री-पुरुष को रोग से
दूर रहने के लिए पूरी चेष्टा करनी चाहिए। संयम से रहने वाले
मनुष्य को रोग नहीं घेरते। जो मनुष्य संयमी नहीं होता, उसीका
रोग पीछा करता है। यदि कभी कोई भूल हो जाय और रोग आ
घेरे तो तुरन्त ही उसके शमन का उपाय करना चाहिए और आगे
के लिए पूर्णरीति से सावधान हो जाना चाहिए। इस प्रकरण में
दो ऐसे रोगों की चर्चा की जायगी, जिन्हें बहुधा लोग छिपाते हैं
और जिसका फल यह होता है कि किसी न किसी दिन जीवन पर
ही आ बनती है। ये दोनों ही महा भयानक और नाशकारी रोग
हैं। उत्तम सन्तानोत्पत्ति के तो ये जानी दुश्मन ही हैं। एक का
नाम प्रदर और दूसरे का नाम प्रमेह है। दो रोग एक से ही हैं।
भेद केवल इतना ही है कि प्रदर रोग स्त्री को होता है और प्रमेह
पुरुष को। पहले प्रदर रोग का वर्णन किया जाता है।
प्रदर रोग निर्बलता से हुआ करता है। यह रोग केवल स्त्रियों
को ही होता है, पुरुषों को नहीं। अति मैथुन से, खट्टा, तीक्ष्ण
चीजों के अधिक सेवन से, दिन में सोने से, अजीर्ण से, चिन्ता से,
शोक से, चोट लगने से, मादक वस्तुओं के सेवन से, गर्भपात से,
गर्भस्राव से तथा अप्राकृतिक भोजन करने से यह रोग उत्पन्न
यहाँ प्रस्तुत हस्तलिखित पृष्ठ (अंग्रेज़ी-हिन्दी शब्दकोश/शब्दावली) का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण है:
... क, रखकर
Reckoned (रेकन्ड) हिसाब, गिनना, आदर करना.
Existing (एग्जिस्टिंग) जान रखना, जीना, होना, रहना.
Regional (री-जन) देश, धरातल, लोक, जिला, खण्ड, मुल्क.
Basic
Liberal (लिवरेल) साफ़ उदार, दाता, सीधा,
Atmospheric (ऐटमोसफेरिक) पवन, बतास, वायुमंडल.
Specified (स्पेसिफाईड) विशेष वर्णन किया
either (आइ-दर) कोई, एक न एक, प्रत्येक.
Effort (एफ-फर्ट) दौड़ धूप उपाय, परिश्रम.
Trace (ट्रेस) रेखा (खांचना), पैर का चिन्ह, पता लगाना.
substitute (सबस्टिच्यूट) एक वस्तु जो दूसरे के तौर रखी जाय
Failing (फेलिंग) भूलत हुए,
Type (टाईप) छापे के अक्षर, चिन्ह, नमूना.
Endeavour (एन-डेवर) उद्योग करना, दौड़ धूप करना, हाथ पाँव-
Abandoned मारना.
Acceptable (एक्सेप्टेबिल) स्वीकार योग्य, भला, मनभावना, अच्छा
Mature (मै-च्यूर) पका, तैयार.
attached table (ऐ-टैच्ड) जोड़ा, मिलाया, कुर्क किया, नत्थी कीया, ठीक
Associated (एस-सो-शि-ऐटेड) मिलाया, रोश्त, संगत, साथी (अपनाया)
He may also state :- साथ कहना
Alternative ओलटरनेटिव) दो में से एक पसंद करना, चाहे जौन सा,
(indicating) (इन्डीकेटिंग) बताना. विकल्प
Regards (री-गार्ड) आदर करना, मुलाहिजा करना, ख्याल करना, सम्बन्ध
guarantee (गारंटी) जिम्मेवार. (कृपा करना, मियाद रखना
specifically. (स्पे-सि-फि-के-ली) ब्योरा, विशेष वर्णन.
desires - डिजाइर / चाहता है, इच्छा
Extension - एक्स्टेन्शन - फैलाव.
Applicable - (एप्पली
Provided - (प्रोवाईडेड) बशर्ते कि, इस प्रतिज्ञा / तजवीज़ किया यदि
Limited - (लिमिटेड) सीमा, रोकता, किनारा, घेरा,
Terminate - (टरमीनेट) समाप्त करना,
Definitely. (डेफिनेटली) निश्चय.
Enables. (एन-ए-बिल) शक्त बनाना, समर्थ करना.
unless.
confident. (कानफीडेन्ट) निःसन्देह, विश्वास पात्र.
interruption
additional (ऐ-डिश-अन-ऐल) अधिक, फालतू,
Facility. (फैसिलीटी) सुगमता, तेजी, होशियारी.
urgent.
Present hours of service are 14-30 to 18--30 (I.S.T)
Precisely. - (प्रीसिस-ली) हूबहू, ठीक रीति से
असली कोकशास्त्र २११
प्रदर और प्रमेह
उत्तम और निरोग सन्तान पैदा करने के लिए माता-पिता का
रोग-रहित होना अत्यावश्यक है। इस लिए स्त्री-पुरुष को रोग से
दूर रहने के लिए पूरी चेष्टा करनी चाहिए। संयम से रहने वाले
मनुष्य को रोग नहीं घेरते। जो मनुष्य संयमी नहीं होता, उसीका
रोग पीछा करता है। यदि कभी कोई भूल हो जाय और रोग आ
घेरे तो तुरन्त ही उसके शमन का उपाय करना चाहिए और आगे
के लिए पूर्णरीति से सावधान हो जाना चाहिए। इस प्रकरण में
दो ऐसे रोगों की चर्चा की जायगी, जिन्हें बहुधा लोग छिपाते हैं
और जिसका फल यह होता है कि किसी न किसी दिन जीवन पर
ही आ बनती है। ये दोनों ही महा भयानक और नाशकारी रोग
हैं। उत्तम सन्तानोत्पत्ति के तो ये जानी दुश्मन ही हैं। एक का
नाम प्रदर और दूसरे का नाम प्रमेह है। दो रोग एक से ही हैं।
भेद केवल इतना ही है कि प्रदर रोग स्त्री को होता है और प्रमेह
पुरुष को। पहले प्रदर रोग का वर्णन किया जाता है।
प्रदर रोग निर्बलता से हुआ करता है। यह रोग केवल स्त्रियों
को ही होता है, पुरुषों को नहीं। अति मैथुन से, खट्टा, तीक्ष्ण
चीजों के अधिक सेवन से, दिन में सोने से, अजीर्ण से, चिन्ता से,
शोक से, चोट लगने से, मादक वस्तुओं के सेवन से, गर्भपात से,
गर्भस्राव से तथा अप्राकृतिक भोजन करने से यह रोग उत्पन्न
२१२ असली कोकशास्त्र
होता है। इस रोग के ये लक्षण हैं,—प्रसवद्वार से पानी निकले,
( यह पानी कई तरह का होता है ) स्त्री के शरीर में पीड़ा रहे,
हड्फूटन हो और हर वक्त सुस्ती बनी रहे तो समझना चाहिए कि
प्रदर रोग है। प्रसव द्वार से निकलने वाला यह पानी झागदार
लसोड़ और चिकना होता है। यदि इसका रंग सफेद, पीला अथवा
नीला हो ! तो जानना चाहिए कि रोग साध्य है, किन्तु यदि रुधिर
बराबर निकले, किसी तरह भी न रुके, प्यास अधिक लगे, हमेशा
दाह बनी रहे, ज्वर हो, शरीर भी क्रमशः क्षीण होता जाय तो
असाध्य समझना चाहिए। इसका नाम भी असाध्य प्रदर है ।
यह रोग कई तरह का होता है—जैसे वात प्रदर, पित्त प्रदर,
कफ प्रदर, सन्निपात प्रदर, रक्त प्रदर और असाध्य प्रदर । यदि
शुष्क कर निकले और वह फेनयुक्त हो, उसके निकलने में हलकी
सी वेदना हो तथा मांस के पानी के समान हो तो वात प्रदर सम-
झना चाहिए। रक्त पीले रंग का, नीला, सफेद या लाली लिए हुए
गर्म तथा अधिक मात्रा में निकले, शरीर में दाह भी हो तो पित्त
प्रदर समझो। गांद की तरह लसदार रुधिर निकले और उसका
रंग पीला अथवा गुलाबी रंग का हो तो कफप्रदर जानो । शहद के
समान, घी के समान, मुर्दे की सी गन्धयुक्त रुधिर निकलना सन्नि-
पात प्रदर यानी त्रिदोषयुक्त प्रदर का लक्षण है । रक्त और पित्त
के विकार से उत्पन्न होने वाले को रक्त प्रदर कहते हैं। शरीर का
कृष होना, मूर्छा आना, भ्रम होना, आँखों के सामने अँधेरा छा
असली कोकशास्त्र २१३
जाना, देह का टूटना, शरीर में जलन होना, प्यास अधिक लगना,
मन्दाग्नि होना, अजीर्ण होना इसके चिह्न हैं ।
इसके लिए बहुत सी औषधियाँ वैद्यक ग्रन्थों में लिखी गई हैं,
फिर भी प्रसंगानुसार यहाँ कुछ औषधियों का लिख देना आवश्यक
जान पड़ता है ।
वात प्रदर के लिए यत्न—मुलहठी, जीरा, कमलगट्टा, काला
नमक, छः छः माशे लेकर काढ़ा बना ले, बाद ऊपर से शहद मिला
कर पी ले। इसके सेवन से वात प्रदर दूर हो जाता है ।
पित्त प्रदर के लिए यत्न—छः छः माशे मुलहठी और मिश्री
को चावल के पानी में पीसकर सबेरे ही पी लिया करे ।
सब तरह के प्रदर रोग की औषधि—सुपारी के फूल, पिस्ते के
फूल, मँजीठ, सिरयाली के बीज, ढाक वृक्ष की गोंद, इन सबको
चार चार माशे लेकर बूक डाले और उसे फाँक कर ऊपर से थोड़ा
सा पानी पी ले। इसके सेवन से सफेद, पीला, स्याह, दुर्गन्धयुक्त
सब तरह के प्रदर रोग जड़ से नष्ट हो जाते हैं । अथवा, १ तोला
फालसा वृक्ष की छाल, रात को पानी में भिगो दे । बर्तन मिट्टी का
और कोरा होना जरूरी है । सबेरे उस पानी में मिलाकर उपरोक्त
दवा को पी जाय । इस दवा को पन्द्रह दिन तक करे । या कसेला,
माजूफल, पुरानी सुपारी, धाय के फूल, गोंद और लोध, इन सबको
पाव पाव भर तथा मँजीठ ३ तोला मोचरस ३ तोला, मेदा लकड़ी
३ तोला, सोंठ ३ तोला, सबको कूट-छानकर सेर भर घी में भिगो
२१४ असली कोकशास्त्र
दे। बाद दो सेर मिश्री की चासनी में इनके छटाँक छटाँक के लड्डू
बना डाले। प्रतिदिन सबेरे एक लड्डू खाने से सब तरह के प्रदर
रोग दूर होते हैं।
रक्त प्रदर के लिए यत्न—आम की गुठली का चूर्ण करके घी,
चीनी और मैदा के साथ इसे पका कर हलुआ बनाकर खिलाना
हितकर है। या कुकरौंधा नामक बूटी को जड़-सहित कुचल कर
एक तोला स्वरस निकाल लो, बाद उसमें शहद मिलाकर सुबह
शाम सेवन करो। इससे भी रक्तप्रदर जल्द शान्त हो जाता है।
यह तो हुआ प्रदर रोग का परिचय। अब प्रमेह की व्याख्या
देखिये। हम पहले ही कह आये हैं कि यह रोग पुरुषों को हुआ
करता है। यह भी प्रदर रोग की तरह निर्बलता के कारण ही
उत्पन्न होता है। यह रोग बड़ा ही भयंकर है। इसके उत्पन्न होते
ही यदि चिकित्सा नहीं की जाय तो यह जड़ पकड़ लेता है और
कुछ ही दिनों में मधुमेह के रूप में परिवर्त्तित होकर असाध्य हो
जाता है। फिर तो यह जीवन का अन्त किये बिना विश्राम ही नहीं
लेता। इस लिए प्रमेह की दवा करने में आलस्य करना जीवन से
हाथ धोना है।
मिहनत न करने से, हस्त-मैथुन करने से, गुदा मैथुन करने से,
अप्राकृतिक मैथुन करने से, अधिक स्त्री-प्रसंग करने से, दिन-रात
खूब सोने से, मादक वस्तुओं के सेवन करने से तथा मांस खाने से
यह संहारकारी भयंकर रोग पैदा होता है।
असली कोकशास्त्र २१५
प्रमेह के लक्षण
यह रोग जब होने वाला होता है, तब पहले दाँतों में मैल
अधिक जमने लगती है। कण्ठ जीभ और तालू में भारीपन मालूम
होने लगता है, हाथ पैर में जलन शुरू हो जाती है, मुँह में मिठास
होती है, प्यास अधिक लगती है, बाल आपस में चिपक जाते हैं,
तथा समूचे शरीर में चिकनाहट आ जाती है। आयुर्वेद के ग्रन्थों
में यह रोग २० तरह का बतलाया गया है। कफज १० पित्तज ६
और वातज ४ प्रकार का होता है।
कफज प्रमेह
इक्षु प्रमेह—पेशाब गन्ने के रस की तरह मीठा होता है। यह
याद रहे कि हर प्रमेह में पेशाब के आगे पीछे या पेशाब में मिल-
कर वीर्य गिरता है। किसी किसी प्रमेह में तो उसका गिरना प्रतीत
होता है और किसी किसी में बिलकुल दिखलायी नहीं पड़ता।
सान्द्र प्रमेह—यदि रात को पेशाब किसी बर्तन में रख दिया
जाय और सबेरे वह बिलकुल गाढ़ा हो जाय तो समझना चाहिए
कि सान्द्र प्रमेह है।
उदक प्रमेह—पेशाब एकदम सफेद, शीतल, गन्धहीन, थोड़ा
और चिकना होता है।
शुक्र प्रमेह—पेशाब वीर्य के समान होता है।
२१६ असली कोकशास्त्र
सुरा प्रमेह—पेशाब ऊपर से शराब की तरह साफ और नीचे
गाढ़ा होता है ।
पिष्ट प्रमेह—पिसे हुए चावल के पानी के समान और अधिक
पेशाब होता है । मूत्र-त्याग करते समय रोमाञ्च हो आता है ।
शीत प्रमेह—पेशाब मीठा और अधिक होता है तथा ठण्ढक
बहुत रहती है ।
सिकता प्रमेह—पेशाब में बालू के समान कड़े कण गिरते हैं ।
शीशी में रखने से ये कण मालूम होते हैं ।
शनैर्मेह—पेशाब थोड़ा और रुक रुक कर उतरता है ।
लार प्रमेह—मुख की लार के समान चिकना पेशाब उतरता है ।
पित्तज प्रमेह
मांञ्जिष्ठ प्रमेह—पेशाब का रंग मजीठ के काढ़े के समान और
दुर्गन्धयुक्त होता है ।
रक्त प्रमेह—पेशाब खून के समान लाल, खारा और दुर्गन्ध-
युक्त होता है ।
हरिद्र प्रमेह—पेशाब करते समय जलन होती है और उसका
रंग हल्दी की तरह पीला होता है ।
नील प्रमेह—नीले रंग का पेशाब होता है ।
क्षार प्रमेह—खारे जल के समान वर्ण, रस, स्पर्श और गन्ध
का पेशाब होता है ।
काल प्रमेह—काले रंग का पेशाब होता है ।
असली कोकशास्त्र
चित्र नं० ७
शंखिनी स्त्री
कामशास्त्र
[पहला भाग]
असली कोकशास्त्र २१७
वातज प्रमेह
वसा प्रमेह—चर्बी के समान पेशाब होता है ।
मज्जा प्रमेह—मज्जा मिला हुआ पेशाब होता है ।
क्षौद्र प्रमेह—शहद के रंग का, मीठा, रूखा और कषैला
पेशाब होता है । यह पेशाब जहाँ गिरता है, वहाँ चींटियाँ और
मक्खियाँ आ जाती हैं ।
हस्ति प्रमेह—रुक रुक कर तारदार और हाथी के मद जैसा
पेशाब होता है । कभी कभी पेशाब रुक भी जाता है ।
──:०:──
प्रमेह नष्ट के उपाय
१—छः माशे महुआ वृक्ष की छाल को ४ दाने काली मिर्च
के साथ पानी में पीस छानकर पीने से सब प्रकार के प्रमेह नष्ट
होते हैं ।
२—आँवला, हड़, और बहेड़े का चूर्ण १ तोला, शहद मिला-
कर चाटने से पुराना प्रमेह नष्ट हो जाता है ।
३—शुद्ध लौह-भस्म, शहद के साथ चाटने से प्रमेह जाता
रहता है । मात्रा बलाबल देखकर निर्धारित करनी चाहिए ।
४—शुद्ध वङ्ग-भस्म दो रत्ती जाड़े के दिनों में तो किसी
साधारण गर्म चीज के साथ या केले के साथ और गर्मी के दिनों में
२१८ असली कोकशास्त्र
कुम्हड़े के मुरब्बे के साथ सेवन करने से सब तरह के प्रमेह नष्ट
हो जाते हैं ।
प्रदर या प्रमेह के रोगी को लाल मिर्च, खट्टी मीठी तथा
कड़वी चीजें बादी और गरिष्ट वस्तुएँ भूलकर भी न खानी चाहिएँ ।
मैथुन करना भी एकदम छोड़ देना उचित है । दवा का सेवन करते
समय पूर्णरीति से ब्रह्मचारी बन जाना उचित है । तभी यह रोग
दूर हो सकते हैं, अन्यथा दवा का सेवन करना व्यर्थ हो जाता है ।
सौ दवाओं से बढ़कर एक परहेज से रहना है ।
-:०:-
बल वीर्य बर्द्धकमहौषधि
इस प्रकरण में कुछ ऐसी औषधियाँ लिखी जायँगी, जिनसे
शरीर में काफी बल-वीर्य की वृद्धि हो सकती है । किन्तु ये दवायें
सिर्फ उन्हीं लोगों के लिए हैं, जो दुराचार करके अधिक वीर्य क्षीण
कर चुके हैं । यों तो ये औषधियाँ सबके लिए लाभदायक हैं, पर
संयमी और हृष्ट पुरुष को इनके करने की आवश्यकता ही क्या
है ? संयमी पुरुष को तो जी-जान से बस एक ही दवा का सेवन
करना चाहिए, बस वही संयम । संयम से बढ़कर दूसरी दवा
संसार में कोई भी नहीं है ।
१—जिस मनुष्य का धातु कम हो गया हो । उसे इस दवा
का सेवन करना चाहिए—धाय के फूल, बड़ी हड़, बहेड़ा और
असली कोकशास्त्र २१६
आँवला। इन चारों चीजों को बराबर बराबर लेकर ईख के रस में
भावना दे। बाद धूप में सुखा कर उसी के बराबर मिश्री मिला
शहद में रात को चाटे और ऊपर से शुद्ध शुद्ध दूध पी ले। इससे
बल-वीर्य की वृद्धि होती है।
२—कौंच वृक्ष की जड़ दूध में पीसकर प्रति दिन सबेरे पीने
से भी पुरुष का शरीर बलवान हो जाता है और खूब वीर्य पैदा
हो जाता है।
३—कौंच वृक्ष की जड़, सफेद तिल, असगन्ध, विदारी कन्द,
सांठी चावल, इनको बराबर बराबर लेकर कूट डाले। बाद कपड़े
से छानकर प्रति दिन ६ माशे चूर्ण खाकर ऊपर से गरम दूध में
घी डालकर पी ले। इसका एक महीने तक सेवन करने से शरीर
में विचित्र परिवर्त्तन हो जाता है। हमेशा सेवन करे तो और
भी अच्छा हो।
४—सूखे आँवले का चूर्ण ईख के रस में भिगोकर छाया में
सुखा ले। इस प्रकार सात बार रस में भिगोकर सुखा ले। बाद
उसके बराबर शहद और मिश्री मिलाकर पका डाले और उसका
प्रति दिन सेवन करे। यह दवा स्त्री और पुरुष दोनों के लिए एक
समान गुणकारी है।
५—शतावरी तेल बनाने की रीति—हरी शतावर को कूट कर
२ सेर रस निकाल लेना चाहिए। बाद उसमें एक सेर तिल का
तेल और ४ सेर गोदुग्ध डालकर मन्दाग्नि से धीरे धीरे पकावे
२२० असली कोकशास्त्र
इन दवाइयों को एक एक तोला लेकर कल्क बनाकर उसमें पकते
समय ही डाल देना चाहिए । सौंफ, देवदारु, बालछड़, छालछरीला,
बच, लाल चन्दन, तगर, कूट, इलायची, अंशुमती, खरेटी, रासना,
असगन्ध, वायविडंग, स्याह मिच, पीलपर्णी, दालचीनी, पत्रज,
रेडी की जड़ का छिलका, सेंधा नमक और सोंठ । थोड़ी देर के
बाद अदरख का अर्क डाल देना चाहिए । जब पक जावे, तब उसे
उतार ले और स्वच्छ पात्र में छानकर रख दे । फिर इस तेल का
मर्दन करे । यह तेल इतने रोगों पर जादूकी तरह असर करता है—
जो कुबड़े हों, बौने हों, पंगुल हों, महावात रोग से भग्न हों
या विसर्प रोग से पिडित हों, उनके लिए यह तेल बड़ा लाभ-
दायक है । शरीर के संकुचित हो जाने में, सन्निपात में गठिया में,
हृदय शूल में, यह तेल तत्क्षण गुण दिखलाता है । गले के भीतर
होने वाले सब रोगों का यह तेल नाश करता है । वीर्य-हीनता,
नपुंसकता, चित्तभ्रम, इन्द्रिय निर्बलता, बुद्धिहीनता, मन्दाग्नि को
यह फौरन दूर कर देता है । वन्ध्यात्व को भी यह दूर करने में
समर्थ है । प्रमेह रोग, अंडवृद्धि रोग, पिल्ली रोग, समलवाय, मृगी,
कुष्ठ, दाह, ज्वर आदि रोगों को भी यह तेल नष्ट कर देता है ।
इस तेल को एक महीने तक पीने से वृद्ध मनुष्य भी यौवनत्व
प्राप्त कर सकता है । इस तेल को सूँघने, पीने और मालिश करने
में नित्य बर्त्तना चाहिये । यह शतावरी तेल स्त्री और पुरुष दोनों
के लिए लाभदायक है ।