रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
११० रसिकप्रिया
शब्दार्थ—पिय = प्रिय, नायक । प्रगटन प्रीति कहूँ = प्रेम को प्रकट
करने के लिए । करौ = किए जाते हैं ।
(१४४) जब चितवै पिय अनत ही, तब चितवै निहसंक ।
जानि बिलोकत आपु त्यों, अलिहि लगावै अंक ।५।
शब्दार्थ—अनत = अन्यत्र । निहसंक = निःशंक, शंकारहित । आपु त्यों
= अपनी ओर । अलिहि=सखी को । अंक=अँकवार छाती ( से ) ।
(१४५) कबहुँ श्रुति-कंडू करै, आरस सों ऐंड़ाइ ।
केसवदास बिलास सों, बार बार जमुहाइ ।६।
शब्दार्थ—श्रुति-कंडू=कान खुजलाना । आरस = आलस्य । ऐंड़ाइ =
देह तोड़ती है । बिलास = भावभंगिमा, आकर्षक चेष्टा । जमुहाइ = जँभाई
लेती है ।
((१४६) झूठहीं हँसि हँसि उठै, कहै सखी सों बात ।
ऐसें मिसहीं मिस प्रिया, पियहि दिखावै गात ।७।
शब्दार्थ—मिस = बहाना । प्रिया = नायिका ।
(१४७) यों हीं पीय पियानि प्रति, प्रगटत अपनी प्रीति ।
सो प्रच्छन्न प्रकास करि, बुधिबल करत समीति ।८।
शब्दार्थ—पीय = नायक । करि = भेद करके । समीति करत = एकत्र
करते हैं ।
श्रीराधिकाजू की प्रच्छन्न चेष्टा, यथा—(कबित्त)
(१४८) चोरि चोरि चित चितवति मुँह मोरि मोरि,
काहैं तें हँसति हियें हरष बढ़ायो है ।
केसौदास की सौं तूँ जँभाति कहा बार बार,
बीरी खाइ मेरी बीर आरस जौ आयो है ।
ऐंड़ सों ऐंड़ाति अति अंचल उड़ात, उर
उघरि उघरि जात गात छबि छायो है ।
फूलि फूलि भेंटति रहति उर भूलि भूलि,
भूलि भूलि कहति कछू तैं आज खायो है ।९।
शब्दार्थ—चोरि चोरि = चुरा चुराकर । ऐंड = गर्व की मुद्रा । उर =
वक्षःस्थल । फूलि फूलि = प्रसन्न हो होकर । उर = हृदय में । भूलि भूलि =
झूम झूमकर ।
५—निहसंक-निरंसक । ७—प्रिया--तिया । ८—यों-त्यों । प्रगटत-- प्रगटै।
करत--कहत । ९—केसौदास-केसोराइ । जो -त्यौं । बीरी०-बिस लाइ मेरी बीर
ओर जोर प्रायो है । उड़ात-उठात । उघरि०-उरज उघरि जात । छायो-पाय ।
११२ रसिकप्रिया
अलंकार—पिहित ।
श्रीकृष्णजू की प्रच्छन्न चेष्टा, यथा—( कबित्त )
(१५०) छोरि छोरि बाँधौ पाग आरस सों आरसी लै,
अनत ही आन भाँति देखत अनैसे हौ ।
तोरि तोरि डारत तिनूका कहौ कौन पर,
कौन के परत पाइ बावरे ज्यौं ऐसे हौ ।
कबहुँ चुटकि देति चटकि खुजावौ कान,
मटकि ऐँडाउ जुरी ज्यौं जँभात तैसे हौ ।
बार बार कौन पर देत मनिमाला मोहि
गावत कछू के कछू आज कान्ह कैसे हौ ।११.
शब्दार्थ—पाग = पगड़ी । आरसी = (आदर्श) दर्पण । अनत = अन्यत्र ।
आन भाँति = दूसरे ढंग से । अनैसे = (अनिष्ट) बेढंगे । तिनूका = तिनका ।
चुटकि = देत = चुटकी बजाते हो । चटकि = जल्दी से । जुरी = ज्वरी, ज्वरग्रस्त ।
जुरी० = ज्वर से पीड़ित व्यक्ति की भाँति जँभाते हो । कौन पर = किसके लिए ।
(१५१) श्रीकृष्णजू की प्रकाश चेष्टा, यथा—( सवैया )
जा लगि लाँच लुगाइनि दै दिन नाच नचावत साँझ पहाऊँ ।
केसव मंत्र करौ बसकारक हारक जंत्र कहाँ लौं गनाऊँ ।
हारि रहे हरि क्योंहूँ मिली न मिलाऊँ जौ ताहि तौ माँगौं सो पाऊँ ।
ठाढ़ी वै जाइ मिलौ मिलिबे कहँ और कछू कनियाँ करि लाऊँ ।१२।
शब्दार्थ—लांच = घूस, रिश्वत । दिन = नित्य, प्रतिदिन । पहाऊँ =
प्रभात, सबेरे । हारक = थका देनेवाले ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति नायक प्रति ) जिसको आपने वश में करने
के लिए नित्य दूतियों को घूस देकर साँझ-सबेरे नाच नचाया (परेशान किया),
फिर आपने अनेक वशीकरण मंत्रों का प्रयोग किया तथा थका देने वाले जंत्रों
का भी प्रयोग किया, मैं कहाँ तक उनकी गिनती करूँ । आप अब हार मान
बैठे, वह किसी प्रकार मिली नहीं । ऐसी नायिका को यदि मैं आपसे ला
मिलाऊँ तो अवश्य ही जो माँगूँ वह मिलेगा (मुझे इसका पूरा विश्वास है) ।
अच्छा जाइए, वे मिलने को खड़ी हैं, क्या उन्हें गोद में लाना पडेगा ?
११—बांधो-बांधै । कहौ-तुम । ऐँडाउ-पोंडाउ, ऐँड़ात । तैसे-वैसे, जैसे ।
के-को । १२—लांच-लोच । पहाऊं-महांऊं । हारक-हारे के । क्यों हूँ-केहूं ।
सो-सु । जाइ-जाहु । कछू-कहा । लाऊं-ल्याऊं ।
पञ्चम एवं षष्ठ प्रभाव: नायिका-भेद (पद्मिनी, चित्रिणी आदि एवं षोडश हाव-भाव)
८ पंचम प्रभाव ११३
अथ स्वयंदूतत्व-लक्षण-(दोहा)
(१५२) जौ क्योंहूँ न मिलै कहूँ, केसव दोऊ ईठ।
तौ तब अपने आप ही, बुधिबल होत बसीठ ।१३।
शब्दार्थ—ईठ = (इष्ट) मित्र। अपने आप ही = स्वयम् ही। बसीठ =
(अवसृष्ट विसृष्ट) दूत।
(१५३) श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न स्वयंदूतत्व, यथा—(सवैया)
दूरि तें देखिबे कौं ह्वै दीन मनाई हुती लिखि ही लिखि चीठी।
देखें मिल्यो मनु हौं हू मिली मिलि खेलिबे हूँ कों मिली मति मीठी।
ऐसे में और चलाइहौ केसव कैसहूँ कान्ह कुमार द्वै ढीठी।
लागै न बार मृनाल के तार ज्यों टूटैगी लाल हमैं तुम्हें ईठी ।१४।
शब्दार्थ—हुती = थी। मीठी = अच्छी। ढीठी = धृष्टता। बार = देर।
ईठी = मित्रता।
भावार्थ—(नायिका की उक्ति नायक प्रति) अत्यंत दीन हो होकर दूर
से ही देख लेने के लिए चिट्ठियां लिख लिखकर आपने मनाया। देखने पर
मन मिल गया। मैं भी आपसे मिली। मिलकर खेलने के लिए मधुर मति
भी मिल गई (खेल खेलने की सुहावनी बुद्धि भी जगी)। ऐसे अवसर पर हे
कान्ह कुमार, यदि धृष्टतापूर्वक और कोई चर्चा चलाएँगे (जाने की बात
करेंगे) तो हे लाल, हमारी आपकी मित्रता टूट जायगी, मृणाल तार की
भाँति उसके टूटने में कुछ भी देर न लगेगी (यह आपने चलने का क्या
झगड़ा छोड़ दिया)।
अलंकार—दृष्टांत।
सूचना—प्रमुद्रित प्रतियों में इसके बाद एक सवैया और मिलता है जो
पू० यां हस्तलिखित प्रति में नहीं है।
पुनः प्रिया को स्वयंदूतत्व, यथा—(सवैया)
छुवौ जनि हाथ सों हाथ किये पल ही पल बाढ़त प्रेमकला।
न जानियै जी मैं कहा बसि जाइ चलै पुनि केसव कौन चला।
भले ही भले निबहै जो भली यह देखिबे ही की हला हू भला।
मिलौ मन तौ मिलिबौई कहूँ मिलिबौ न अलौकिक नंदलला।
श्रीराधिकाजू को प्रकाश स्वयंदूतत्व, यथा—(सवैया)
(१५४) धाई नहीं घर दाई परी जुर, आई खिलाई की आँखि बहाऊँ।
पौरिये आवै रतौंधी इते पर ऊँचो सुनै सु महा दुख पाऊँ।
१३—लक्षण-वर्णन। होत-होइ, करत। १४—मनाई-पठाई। ढीठी—
डीठी। लागै०—ह्वै है न, तो ह्वै है। मृनाल—मुराति, मुरारि।
११४ रसिकप्रिया
कान्ह निबेरहू न्याउ नयो इन आलिन कौ लगि हौं बहराऊँ ।
ए सब मो सँग सोवन आवैं कि मैं इनके सँग सोवन जाऊँ ।१५।
शब्दार्थ—धाई = ( धातृ ) अपना दूध पिलाकर बच्चों को पालनेवाली ।
दाई = परिचारिका । आई = ( आर्या ) अइया । खिलाई = खिलाई हुई,
खाने मात्र पर सेवा करनेवाली । बहाऊँ = आँसू बहानेवाली । पौरियै = द्वार-
पाल को । निबेरहु = निपटा दो ।
भावार्थ—घर में धाय नहीं है । दाई ज्वर में पड़ी है । आई की आँखें
आँसू बहाती रहती हैं ( वह भी देखने में अशक्त है ) द्वारपाल को रतौंधी
आती है ( रात में सूझता ही नहीं ) । ( यही क्यों ) इतने पर भी वह ऊँचा
सुनता है ( बहरा है ), इसलिए बड़ा दुख पा रही हूँ । हे कान्ह, मेरे इस
नए ( विलक्षण ) न्याय का निबटारा करते जाइए । मैं इन सखियों से आखिर
कब तक अपने मन को बहलाती रहूँ । ( दिन में तो किसी प्रकार समय कट
भी जाता है पर रात कैसे कटे ) इसलिए या तो ये सब मेरे साथ सोने के
लिए ( मेरे घर पर ) आया करती हैं या मैं ही इनके यहाँ सोने चली जाया
करती हूँ ( मुझे अकेले बड़ा भय लगता है ) ।
सूचना—'आई' का अर्थ 'आर्या' करके 'बुड्डी' करने के बदले 'आँख
आई' अन्वय भी कर सकते हैं ।
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न स्वयंदूतत्व, यथा—( कबित्त )
(१५५) आपनेहीं भाइ के ए सोहत सरीक से वे,
केसौदास दास ज्यों चलत चित लीने हैं।
आपुहीं अठाउ कै ये लेत नाउँ मेरो वे तौ,
बापुरे मिलाप कै संलाप करि हीने हैं।
राधिकै सुनाइ कै कहत ऐसें घनश्याम,
सुबल को लै लै नाम कामभयभीने हैं।
साथ लै सखानि अब जैबो बन छाड्यो हम,
खेलिबे को संग सखा साखामृग कीने हैं । १६।
शब्दार्थ—ये = गोपसखा । सरीक = साथ । वे = वानर सखा । चित
लीने = चित्त मिलाकर, उनकी मरजी का ध्यान रखकर । अठाउ = शरारत ।
बापुरे = बेचारे । मिलाप = मेल । संलाप = बातचीत । सुबल = ( स्वबल )
अपनी सेना या अपना बल । साखामृग = बंदर ।
१५—जुर-जुरि । आई-आई । कौ-कि । बहाऊं-महाऊँ । पौरिये-पीरि
पै । रतौंधी-रत्योंधु । बहराऊं-समभाऊँ । मैं इनके ०-हौं इनके सब । १६—
आपनेहीं-आपनेई । भाइ के-भाउ को । चित-चित्तु । आपुहीं-आपुए । कै ये-
कै तो । मेरो-मेरे । संलाप-संताप । राधिकै-प्रिया को । भय-रस ।
पंचम प्रभाव ११५
भावार्थ—( सखी का वचन सखी से ) राधिका को सुना सुनाकर काम-
त्रास से भीत घनश्याम श्रीकृष्ण अपनी वानरी सेना को नाम ले लेकर बुलाते
हैं। (उन्होंने गोप सखाओं का साथ छोड़ दिया है, वानर सखाओं का साथ
किया है, वानर हैं शाखामृग, वृक्षों पर ही अपने झुंड के साथ रहते हैं, उन्हें
आवश्यकता पड़ने पर नाम ले लेकर बुलाना पड़ता है ) । श्रीकृष्ण कहते हैं
कि गोप सखा तो अपने भाइयों के संगी हैं, उनके साथ साथ रहते हैं ( मेरे
साथ रहना उन्होंने छोड़ दिया है )। रहे वे वानर सो वे दास की भाँति
चित्त को समझकर ही साथ रहते हैं । प्रायः वृक्षों पर ही डटे रहते हैं । मैं
चाहूँ या बुलाऊँ तो आते हैं अन्यथा नहीं । गोप सखा नटखटपना स्वयम् करते
थे और नाम मेरा लगाते थे । वे वानर बेचारे तो मिलाप और बातचीत
दोनों से रहित हैं । न तो उनका निरंतर साथ रखा जा सकता है और न वे
वार्तालाप करने के योग्य हैं । गोपों के साथ बन जाना मैंने छोड़ दिया है । रहा
यहाँ समय काटने का प्रश्न सों इन्हीं वानरों को सखा बना लिया है इनसे कुछ
समय तक मन बहलाया, फिर ये डाल पर जा लटकते हैं। मैं अकेले रह जाता हूँ।
श्रीकृष्णजू को प्रकाश स्वयंदूतत्व यथा—( सवैया )
(१५६) बन जैयै चलौ, कोऊ ठाली है केसव हौ तुम हैं तौ अरे अरिहौ ।
कछु खेलियै खेलि न आवत आज ही भूल्यो न भूल्यो गरे परिहौ ।
हितु है हिय, है किधौं नाहीं तऊ हितु नाहिं हिये तु ललां जरिहौ ।
हम सों यह बूझियै ऐसी कहौ ब कही हो कही सु कहा करिहौ ।१७।
शब्दार्थ—जैबै = जाना है । ठाली = बैठी ठाली, फालतू, बेकाम ।
अरिहो = अड़ोगे, बरजोरी करोगे । ही = हृदय । हितु = प्रेम ।
भावार्थ—नायक और नायिका का संवाद वर्णित है—
नायक—बन जाना है, चलो ।
नायिका—यहाँ क्या कोई बैठी ठाली है ? ( जो बन को चले ) ।
नायक—तुम तो हो ।
नायिका—हाँ, हूँ तो क्या बरजोरी करोगे ?
नायक—(नहीं) कुछ खेल खेलें ।
नायिका—खेलना तो आता ही नहीं ।
नायक—(अब तक आता था) क्या आज ही खेलना भूल गया है ।
नायिका—( मान लीजिए कि ) नहीं भूला है ( आता ही है तो क्या )
गले पड़ेंगे ( बरबस खेल खेलेंगे ) ।
१७—जैयै-जैबै, कौं जू । हैं-हौं, ही । अरी--अरे । खेलियै-खेलन ।
भूल्यो ०--भूलो न भूलौ । हिय है--हिय में । तु--तौ । ब--जो । सु--ब ।
११६ रसिकप्रिया
नायक—( तुम्हारी तो बात ही समझ में नहीं आती, तो भी यह बत-
लायो कि ) तुम्हारे हृदय में ( मेरे लिए ) प्रेम तो है न ?
नायिका—क्या जाने है या नहीं ।
नायक—इतने पर भी प्रेम नहीं है ।
नायिका—( मान लीजिए नहीं है ) तो क्या आप झगड़ा करेंगे ?
नायक—मुझसे अब ऐसा व्यवहार और ऐसी बातें कह रही हो ?
नायिका—जो मैंने कहा सो कहा । आप क्या कर लेंगे ?
सूचना—'नायिका के टेढ़े उत्तर सखियों को दिखाने के लिए हैं, वह
नायक को बतला रही है कि मेरी इच्छा विहार की है ।' ऐसा अर्थ सरदार ने
अपनी टीका में किया है। इसलिए 'अरिहौँ' का अन्य अर्थ 'सकोगे', 'गरे
परिहौँ' का अर्थ 'भेंटोगे', 'लरिहौँ' का 'विहार करोगे' आदि किया है।
अलंकार—गूढ़ोक्ति ।
अन्यच्च, यथा—( कबित्त )
(१५७) केसौदास घर घर नाचत फिरत गोप,
एक परे छकि ते मरेई गुनियत है ।
बारुनी के बस बलदाऊ भए सखा सब,
संग लै को जैये दुख सीस धुनियत है ।
मोहिं तौ गए ही बनै दीह दीपमाला पाइ,
गाइन संवारिबे को चित्त चुनियत है ।
जौ न बसौं लोलिनैनि लेरुवा मरहिं सब,
खरिक खरेई आज सूने सुनियत हैं। १८।
शब्दार्थ—छकि = नशे में चूर । बारुनी = मदिरा, शराब । दीहु
दीपमाला = बड़ी दीवाली । सँवारिबे कौं = एकत्र करने के लिए । चुनियत
है = चाहता है । लेरुवा = बछड़े । खरिक = गोशाला ।
भावार्थ—जितने गोप हैं घरघर नाचते फिरते हैं, वे नशा पी पीकर
ऐसे बेहोश हो गए हैं कि उन्हें मरा ही समझना चाहिए । बलदेव तथा सभी
सखा शराब के वश में हैं ( वे सब उसी के नशे में चूर हैं ) । अब मैं साथ में
लेकर जाऊँ भी तो किसे, इसी दुख से सिर पीट रहा हूँ । मेरे जाने से ही
बनेगा, बड़ी दीवाली 'श्रा गई । गायों को एकत्र करना ही उचित है । चंचल
नयनी, यदि मैं गोशाला में आकर नहीं बसता तो बछड़े सबके सब मर जाएँगे
क्योंकि गायों के भी न रहने से गोशाला में अत्यंत सन्नाटा है ।
————————————————————————————————
१८—एक—ऐसे । परे—रहे । भए—कीन्हें । लै को—लै कै, को लै । जैये—
जाउँ । दुख—काहि, देखे । गए हीँ—गहेई । दीह—देह । संवारिबे—सिगारिबे ।
बसौँ—मिलै, मेलौं । मरहिं०—मरेही प्यासे । खरिक—खरक, दखिक ।
पंचम प्रभाव ११७
सूचना—( १ ) 'दीह दीपमाला' से बड़ी दीपावली । छोटी दीवाली
'डिठवन' ( देवोत्थानी हरिप्रबोधनी ) को होती है । 'सूने सुनियत' से सन्नाटा
और एकांत सूचित करना चाहता है । (२) हस्तलिखित पूर्ण प्रति में वह छंद
नहीं है ।
( दोहा )
(१५८) ऊढ़ा पुनि यहि भाँति करि, बहु बिधि हितनि जनाइ ।
आपुन ही तें लाज तजि, पियहि मिलै अकुलाइ ॥१६॥
यथा—(कवित्त)
(१५६) पंथ न थकत पल मनोरथ-रथनि के,
केसौदास जगमग जैसैं गाए गीत मैं ।
पवन बिचार चक्र चक्रमन चित चढ़ि,
भूतल अकास भ्रमै घाम जल सीत मैं ।
कौ लौं राखौं थिर बपु बापी कूप सर सम,
हरि बिनु कीने बहु बासर बतीत मैं ।
ज्ञान-गिरि फोरि तोरि लाज-तरु जाइ मिलौं,
आपु ही तें आपगा ज्यौं आपुनिधि प्रीतमैं ॥२०॥
शब्दार्थ—जैसें गाए गीत मैं = जैसे वे रथ गीतों में गाए गए हैं (अर्थात्
अत्यंत तीव्र ) । पवन = वायु, श्वास । चक्र = पहिया । चक्रमन=चंक्रमण,
घूमना, चलना । वपु = शरीर । बापी = बावड़ी । सर = तालाब । आपगा =
नदी । आपुनिधि = समुद्र । प्रीतमैं = प्रिय को ।
शब्दार्थ—( नायिका की उक्ति ) मनोरथ के रथ का मार्ग क्षण भर
भी रुकता नहीं है । वह उसी प्रकार गतिशील रहता है, जगमगाता मार्ग पर
चलता है, जैसा गीतों में गाया गया है । श्वास और विचार इस रथ के चक्र
(पहिये) हैं । इस रथ पर चढ़कर घूमने के लिए निकलता है चित्त । वह इस
पर बैठा भूतल से आकाश तक धूप, वर्षा और जाड़े में घूमता ही रहता है ।
शरीररूपी जल को बावड़ी, कुएँ और तालाब के जल की भाँति कब तक
स्थिर रखूँ । हरि के वियोग में बहुत दिन मैंने बिताए अब तो ज्ञान के पर्वत
को तोड़ कर ( मार्ग निकालकर ) और लज्जा रूपी वृक्ष को तोड़कर स्वयम्
ही यह देहरूपी नदी प्रियतम समुद्र से जा मिले ( यह इच्छा होती है ) ।
अलंकार—रूपक ।
अन्यच्च, यथा—(सवैया)
(१६०) जाति भई सँग जाति लै कीरति, केसव है कुल सों हित खूट्यो ।
गर्व गयो गुन जोबन रूप को पुन्य सु तौ फल ही पल फूट्यो ।
१६—हितनि-हित-नेह । पियहि-पतिहि । २०—थकत-थकित । रथनि के -
रथन के, रथ नाके । चक्रमन-चक्रमान । फोरि-कोरि ।
११८ रसिकप्रिया
कान्ह-तिहारियै आन कियें कहौं लाज सों नीको ह्वै नातोई टूट्यो ।
छाँड्यो सबै हम हेरि तुम्हें तुम पै तनकौ कपटौ नहिं छूट्यो ।२१।
शब्दार्थ—जाति भई = नष्ट हो गई । खूट्यो = कम हो गया , पुन्य =
पुन्य का घड़ा । आन = शपथ । नीके ह्वै = भली भाँति । हेरि = देखकर ।
भावार्थ—(नायिका की उक्ति) मेरी कीर्ति (आपके प्रेम के कारण)
गई (नष्ट हो गई) और अपने साथ ही मेरी जाति भी लेती गई (जात-बिरा-
दरी से भी पृथक् कर दी गई, अपकीर्ति हुई सो तो हुई ही) । कुल (कुटुंब)
से प्रेम कम हो गया, क्षीण हो गया । गुण, सौंदर्य और यौवन का भी गर्व
चला गया (मैंने इनका तो गर्व भी नहीं किया) । क्षणक्षण पुण्य का घड़ा
भी फूटता ही गया अर्थात् सुख नहीं रहा । हे कान्ह, आपकी शपथ करके
कहती हूँ कि लज्जा से तो बना बनाया नाता ही टूट गया (मैंने लज्जा भी
छोड़ी) । क्या कहूँ, तुम्हें देखकर (तुम पर मुग्ध होकर) मैंने तो सब कुछ
छोड़ दिया, पर तुमसे कुछ भी छोड़ा नहीं गया, यहाँ तक कि थोड़ा सा भी
कपट तुमने नहीं छोड़ा (आप अब भी अन्य स्त्रियों के यहाँ जाते हैं और
मुझसे कपट करके) ।
(दोहा)
(१६१) अधिक अनूढ़ा लाज तें, पिय पै जाइ न आप ।
क्योंहूँ करि सखियै कहै, ताके उर की ताप ।२२।
शब्दार्थ—आप = स्वयम् । क्योंहूँ करि = किसी प्रकार । सखियै = सखी
ही । ताप = गरमी, संताप ।
यथा—(सवैया)
(१६२) जानै को केसव कौने कह्यो कब कान्ह हमारे हिंडोरनि भूलै ।
पान न खाइ, न पान्यो पियै तब तें भरि लोचन लेत समूलै ।
जाहु नहीं चलि बेगि बलाइ ल्यौं लेहु सकेलि कहा यह भूलै ।
जानत हौ वह काम-कली कुँ भिलाई गएँ बहुरयौ फिरि फूलै ?२३।
भावार्थ—(सखी-वचन नायक से) हे कान्ह, न जाने कब किसने उससे
कह दिया है कि कान्ह हमारे भूले पर भूलते हैं । (तभी से) न वह पान
खाती है न पानी पीती है। वह लोचनों को समूल (जड़ से, भली भाँति आँसू
से) भर लेती है। मैं आपकी बला लेती हूँ आप शीघ्र ही उसके पास चले
क्यों नहीं जाते ? उसके निकट जाने में देर करना आपकी भूल है, ऐसा करके
२१—सों-मों । खूट्यो-फूट्यो, झुट्यो । गुन-पुनि । पुन्य०-सो तो सबै ।
फुट्यो-खूट्यो। निहारियै-तिहारि ही । कहौं--कहूँ । नीको-नीके, नीक । ह्वै-ही ।
२२—क्यों हूँ०-कैहूँ करि । उर-तन । २३—पान्यो-पानी । लोचन०—
अखियो लेति । लेउ-लैहो ।
पंचम प्रभाव ११६
आप क्या बटोर लेंगे ? (आपके न जाने) मेरी समझ में यदि कहीं वह काम-
देव की कली कुँम्हला गई तो फिर क्या फूलेगी ? ( कदापि नहीं ) ।
अथ प्रथम-मिलनस्थान-वर्णन—( दोहा )
(१६३) जनी सहेली धाइ घर, सूने घर निसि चार ।
अति भय उत्सव व्याधि मिस न्यौते सु बन-बिहार ।२४।
शब्दार्थ—जनी = दासी । चार = चलना, घूमना । निसि०=रात में
भ्रमण । ब्याधि = रोग ।
( दोहा )
(१६४) इन ठौरनि ही होत है, प्रथम मिलन संसार ।
केसव राजा रंक को, रचि राखे करतार ।२५।
जनी के घर को मिलन, यथा—( कबित्त )
(१६५) बेषु कै कुमारिका को ब्रज की कुमारिकानि,
माँझ साँझ केसौदास त्रास पग पेलिकै ।
काम की लता सी चपला सी प्रेम पासी सी है,
राधिका के बुद्धिबल कंठ भुज मेलिकै ।
दौरि दौरि दुरि दुरि पूरि पूरि अभिलाष,
भाँति भाँति के अनूप-रूप बहु केलि कै ।
जनी के अजिर आज रजनो में सजनी री,
साँची करी स्याम चोरमिहचनी खेलिकै ।२६।
शब्दार्थ—त्रास पग पेलिकै = भय को पैरों से दबाकर, निर्भय होकर ।
चपला = बिजली । प्रेमपासी सी=प्रेम के फंदे की भाँति । मेलिकै = डाल
कर । दुरि दुरि=छिप छिपकर । बहु केलि कै = अनेक क्रीड़ा करके । जनी =
दासी । अजिर = आंगन । चोरमिहचनी खेलिकै = आँखमिचौली खेलकर ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति सखी प्रति ) हे सखी, आज कृष्ण ने स्वयम्
कुमारी का वेश बनाया और संध्या-समय निर्भय होकर ब्रज कुमारियों में जा
मिले । उन्होंने बुद्धि के कौशल द्वारा काम की लता, बिजली एवम् प्रेमपाश
स्वरूप सुंदरी राधिका के गलबाँही डाल दी । आँखमिचौली खेल के बहाने
दौड़ दौड़कर छिप छिपकर और इस प्रकार अभिलाषों की पूति करते हुए
उन्होंने लाखों प्रकार की अद्वितीय कामक्रीड़ा की। (चोर बने हुए) श्रीकृष्णजी
ने, दासी के आंगन में आज रात्रि को ( इस रीति से ) आँखमिचौली के
२४—सूने घर-घरनि संचार । सु बन-बिपिन । २५-इन०-इनहीं
ठौरनि । राखे-राखो । २६—चपला सो०-चल प्रेमपास सी अमल । भाँति
भाँति०-लाख भाँति । करी-कीन्ही ।
१२० रसिकप्रिया
खेल को खेल ( आरोपित या असत् व्यापार ) नहीं रहने दिया, वास्तविक
कर दिया ।
अलंकार—द्वितीय पर्यायोक्ति, उपमा ।
सहेली के घर को मिलन, यथा—( कवित्त )
(१६६) नैनिन के तारनि में राखौ प्यारे पूतरी कै,
मुरली ज्यों लाइ राखौ दसन-बसन में ।
राखौ भुजबीच बनमाली बनमाला करि
चंदन ज्यों चतुर चढ़ाइ राखौ तन में ।
केसौराइ कलकंठ राखौ बलि कठुला कै,
करम करम क्योंहूँ आनी है भवन में ।
चंपक-कली ज्यों कान्ह सूँघि सूँघि देवता ज्यों,
लेहु मेरे लाल, इन्हें मेलि राखौ मन में ।२७।
शब्दार्थ—तारनि = तारों में । पूतरी = आँख की पुतली । ज्यों=तरह ।
लाइ = लाकर । लाइ राखौ = ला रखो, लगा रखो । दसन-बसन = दाँत का
वस्त्र, अधर, ओठ । बनमाली = श्रीकृष्ण । बनमाला = घुटनों तक या
पैरों तक लंबी माला । चतुर = हे चतुर । कलकंठ = सुंदर कंठवाली, मधुर
वाणी बोलनेवाली । कठुला = गले का हार । करम करम = क्रम क्रम से
धीरे धीरे सिखा-पढ़ाकर । आनी है भवन में = इन्हें घर तक ले आई हूँ ।
क्योंहूँ = किसी प्रकार । देवता = देवी । लाल = श्रीकृष्णलाल । मेलि राखौ =
धारण कर लो ।
अलंकार—उपमा ।
धाइ के घर का मिलन, यथा—( कवित्त )
(१६७) हँसत खेलत खेल मंद भई चंददुति,
कहत कहानी और बूझत पहेली-जाल ।
केसौदास नींदबस अपने अपने घर,
हरैं हरैं उठि गए बालिका सकल बाल ।
घोरि उठे गगन सघन घन चहूँ दिसि,
उठि चले कान्ह धाइ बोलि उठी तिहि काल ।
आधी रात्रि अधिक अँध्यारे माँझ जैहौ कहाँ,
राधिका की आधी सेज सोइ रहौ प्यारे लाल ।२८।
२७—केसौराइ-केसोदास । कलकंठ०--गल मेलि राखो कलकंठी कंठा कल
कठुला कै । बलि-करि, कुल । क्योंहूँ--केहूँ । सूँघि०-सोंधी सूंधी, सोंधी सूची ।
ज्यों-सी । २८-खेलत०-खेलत माँझ । घोर-अरु । बस-सिसु । घर--घरै,। गए--
गई । बालिका-ग्वालिका । अँध्यारे-अँधेरी । सोइ-पौढ़ि । प्यारे लाल-नंदलाल ।
पंचम प्रभाव १२१
शब्दार्थ—बूझत पहेली-जाल = पहेलियाँ बूझते हुए । घोरि उठे = गर्जन
करने लगे ।
भावार्थ—(सखी की उक्ति सखी से) हँसते और खेल खेलते तथा कहानी
कहते एवम् पहेलियों को बूझते चंद्रमा की ज्योति मंद पड़ गई (चंद्रमा
डूबने लगा)। नींद लग जाने के कारण सब गोपियाँ और गोप भी धीरे धीरे
अपने अपने घर चले गए । उधर आकाश में चारों ओर घने बादल गरजने
लगे । अतः श्रीकृष्ण भी उठकर चलने लगे । उस अवसर पर धाय बोली
'कि आप आधी रात को ऐसे अंधकार में कहाँ जाएँगे ? प्यारे लाल, आप
राधिका की आधी शैय्या में लेट जाइए न ।
सूने घर को मिलन, यथा—( कबित्त )
(१६८) देखत ही चित्र सूनी चित्रसाला बाला आज,
रूप की सी माला राधा रूपकु सुहाए री ।
नूपुर के सुरनि के अनुरूप तानें लेति
पगतल ताल देति अति मन भाए री ।
ऐसे में दिखाई दीनी औचक कुँवर कान्ह,
जैसे भए गात तैसे जात न बताए री ।
केसौदास कहे परै अलज सलज से न
जलज से लोचन जलद से द्वै आए री २६।
शब्दार्थ—ही=थी । बाला = नायिका ( राधिका ) । रूप = छवि ।
रूपकु = सात मात्राओं का एक ताल विशेष । नूपुर=पायजेब । अनुरूप=
अनुकूल । औचक=अचानक । अलज=लज्जारहित ( एकांत की निर्भयता के
के कारण) । सलज=लज्जा से युक्त ।
भावार्थ—(सखी की उक्ति सखी से ) आज वह बाला (राधा ) सूनी
चित्रशाला में चित्र देख रही थी । (चित्र देखते देखते) उस छवि की माला
राधिका को रूपक ताल ( देने का मन हुआ और वह ताल) देने लगी ।
नूपुर की ध्वनि के ही अनुकूल वह आलाप भी लेती थी और पदतल से
अत्यंत मनभाए ताल भी दे रही थी। इसी समय अचानक श्रीकृष्ण के द्वारा
वह देख ली गई । (और उसने उनके द्वारा अपना देखा जाना जान लिया)
उस समय उसके शरीर की जैसी दशा हुई वह बतलाई नहीं जा सकती । उस
समय के उसके नेत्र न तो अलज्ज ही कहे जा सकते हैं न सलज्ज ही (अपने
आप नाचते समय नेत्रों में लज्जा का भाव नहीं था, पर श्रीकृष्ण के द्वारा इस
स्थिति के देख लिए जाने से उनमें लज्जा का संचार हुआ। अभी न तो
पहले की स्थिति समाप्त ही हुई है और न श्रीकृष्ण के मिलन के कारण उत्पन्न
२६—राधा...-लजु । भए--हैं ए । से न--ऐसे ।
१२२ रसिकप्रिया
प्रभाव ही पूरा पड़ सका, दोनो स्थितियों की संधि दिख रही है । अतः कहना
पड़ता है कि उनके जो नेत्र जलज की भाँति खिले थे उनमें बादलों का सा
घिराव हो गया (नेत्रों में आनंदश्रु आ गए) ।
निशि चार को मिलन, यथा—(सवैया)
(१६६) एक समै सब देखन गोकुल गोपी-गोपाल-समूह सिधायो ।
राति है आइ चले घर कों दसहूँ दिसि मेह महा मढ़ि आयो ।
दूसरो बोल ही तें समुझै कहि केसव यों छिति में तम छायो ।
ऐसे में स्याम सुजान बियोग बिदा कै दियो सु कियो मनभायो ।३०।
शब्दार्थ—मेह = मेघ, बादल । मढ़ि आयो = छा गया । दूसरो०-ऐसा
घना अंधकार था कि कोई दिखाई नहीं पड़ता था, बोलने से ही किसी का
ज्ञान होता था । छिति = क्षिति, पृथ्वी । वियोग = वियोग की वेदना ।
कियो० = यथेच्छ और यथेष्ट गोपियों के साथ कामक्रीड़ा कीं ।
अति भय को मिलन, यथा—(कबित्त)
(१७०) जानि आगि लागी बृषभान के निकट भौन,
दौरि ब्रजबासी चढ़े चहूँ दिसि धाइकै ।
जहाँ तहाँ सोर भारी भीर नर-नारिन की
सब ही की छूट गईं लाज हाइ भाइ कै ।
ऐसे में कुँवर कान्ह सारौ सुक बाहिर कै,
राधिका जगाई और जुवती जगाइकै ।
लोचन बिसाल चारु चिबुक कपोल चूमि,
चंपे की सी माला लाल लीनी उर लाइकै ।३१।
शब्दार्थ—जानि = पता पाकर । बृषभान = वृषभानु, राधिका के पिता ।
भौन = भवन । चढ़े = जा पहुँचे । चहुँ दिसि = चारों ओर से । हाइ भाइ =
हावभाव (सुख की स्थिति) । कै = के साथ । सारो = सारिका, मैना ।
चिबुक = ठोड़ी ।
उत्सव को मिलन, यथा—(कबित्त)
(१७१) बल की बरस गाँठि ताकी राति जागिवे कौं,
आई ब्रजसुंदरी सँवारि तन सोनो सो ।
केसौदास भीर भई नंदजू के मंदिरनि,
अध मध ऊरध बच्यो न कांऊ कोनो सो ।
३०—सिधायो-'सिधाए' आदि । बोल०-बोलतहीं । ३१—जानि-जानी,
देखी । बृषभान०-वृषभानु जू के मंदिरनि । भारी-मई । हाइ भाइ-हाइ हाइ ।
सारौ-सारी । की सी-कैसी ।
पंचम प्रभाव १२३
गावति बजावति नचति नाना रूप करि,
जहाँ तहाँ उमँगत आनँद को ओनो सो।
साँवरे की सूनी सेज सोवत ही राधिकाजू,
सोए आनि साँवरेऊ मानि मन गोनो सो। ३२।
शब्दार्थ—बल = बलराम । राति जागिबे को = रतजगा करने के लिए ।
सोनो सो = सोने सा, पीत वर्ण । मंदिरनि = घरों में । अध = नीचे का खंड ।
मध = मध्य का खंड । ऊरध = ( ऊर्ध्व ) ऊपर का खंड । कोनो सो = कोना
तक, थोड़ी जगह भी । गावति बजावति० = स्त्रियाँ गाती बजाती अनेक प्रकार
से नृत्य करती थीं । ओनो = तालाब में से पानी निकलने का मार्ग, निकास ।
उमँगत० = आनंद का प्रवाह सा बह रहा था । साँवरे = श्रीकृष्ण । मानि
मन० = गौना सा मानकर, जैसे गौने में पति पत्नी के पास सो रहता है।
अलंकार—उपमा, उत्प्रेक्षा ।
व्याधि मिस को मिलन, यथा—( सवैया )
(१७२) सोधि निदाननि दान दिये उपचार बिचार किये न धिरानी ।
बेद के सासन ब्याधि-बिनासन होमहुतासनहू न सिरानी।
केसव बेगि चलो बलि बोलति दीन भई बृषभानु की रानी।
आए हौ मेटि मरू करिकै बहुरथौ उनके वह पीर पिरानी। ३३।
शब्दार्थ—निदान = आदिकरण । सोधि निदाननि = व्याधि के निदानों
का शोध कर, व्याधि के मूल कारण का पता लगाकर । दान दए = दान दिए
(धर्मेण हन्यते व्याधिः ) । उपचार = चिकित्सा । बिचार = व्यवस्था ।
उपचार-विचार = औषधोपचार की व्यवस्था । न धिरानी = कम नहीं पड़ी,
धीमी नहीं हुई । सासन = (सं० शासन ) आज्ञा । ब्याधि = रोग । हुतासन
= अग्नि । सिरानी = ठंडी पड़ी, दूर हुई । दीन भई = दुःखित हुई । मरू
करिकै = कठिनाई से ।
भावार्थ—( सखी-वचन नायक से ) व्याधि के कारणों की शोध कर
(ग्रहों की शांति के लिए ) दान दिए गए । चिकित्सा की व्यवस्था की गई ।
पर पीड़ा धीमी नहीं पड़ी । व्याधि को नष्ट करने के लिए वेद (शास्त्र ) की
आज्ञा के अनुकूल अग्नि में होम भी किया गया, पर वह न हटी। बृषभानु की
पत्नी अत्यंत कातर हो रही हैं, उन्होंने आपको बुलवाया है, कृपा करके शीघ्र
ही चलिए । बड़ी मुश्किल से आप जिस पीड़ा को (एक बार पहले ) दूर कर
आए थे, वही पीड़ा उनको फिर होने लगी है।
अलंकार—पर्यायोक्ति ।
३२—अध-आधो। अध०-मांध अध। कोऊ-काहू, कहूँ । ३३—न
धिरानी-नँदरानी । सिरानी-हिरानी । बेगि- क्यों हूँ । हौ-हे ।
१२४ रसिकप्रिया
न्योते के मिस को मिलन, यथा—( कबित्त )
(१७३) न्यौति कै बुलाई हुती बेटी वृषभानुजू की,
जेंबे कौं जसोदा रानी आनी हैं सिँगारिकै।
भोजन कै, भवन बिलोकिबे कौं पान खात,
ऊपर अकेली गई आनँद बिचारिकै।
देखत देखत हरि भावते कौं भागी देखि,
दौरि गही ब्यालु ऐसी बेनी डर डारिकै।
भेंटी भरि अंक मनभायो करि छाड्यो मुहुँ,
केसरि सों माँडि लई बेसरि उतारिकै।३४।
शब्दार्थ—जेंबे कौं = भोजन करने के लिए। पान खात = पान खाती
हुई। आनँद बिचारिकै = हर्षपूर्वक, —खुशी मन से। माँडि = मंडन करके,
मलकर, लगाकर। बेसरि = नाक में पहनने की छोटी नथ।
भावार्थ—(सखी की उक्ति सखी प्रति) हे सखी, यशोदा रानी ने वृषभानु
की बेटी को भोजन करने के लिए न्यौता देकर बुलाया था, उसका श्रृंगार
करके यशोदा जी (खाने के लिए उसे भोजनालय में) ले गईं—भोजन करके
वह पान खाती हुई घर देखने के लिए प्रसन्न मन से ऊपर अकेली ही चली
गई। प्रिय श्रीकृष्ण को देखते देखते ही (देखकर तुरंत ही) भागी। उन्होंने
(उसे भागते) देख दौड़ते हुए भय त्याग कर उसकी नागिन सी चोटी पकड़
ही तो ली। फिर गोद में भरकर आलिंगन करके उसके साथ मनमानी करके
(दंत-क्षत को छिपाने के लिए) बेसर उतारकर (हटाकर) मुंह में केसर
मलकर तब छोड़ा।
सूचना—बेसर इसलिए उतारी कि केसर मलने में गहना हाथ में न लगे।
(१७४) वन-विहार के मिस को मिलन, यथा—( कबित्त )
देहि री कान्हि गई कहि दैन पसारहु ओलि भरौ पुनि फेटौ।
छाड़ौ नहीं मग, छाड़ौं जौ या पै छुड़ावौ बिलोकनि लाजलपेटी।
बात सँभारि कहौ सुनिहै कोऊ जानत हौ यह कौन की बेटी ?।
जानत हैं वृषभानु की है पर तोहि न जानत कौन की चेटी।३५।
शब्दार्थ—ओलि = झोली, अंचल या दुपट्टे को फैलाकर उसे वस्तु
रखने की झोली के रूप में बना लेने को झोली कहते हैं। फेटौ = फेंट
(कमर की)। या पैं = इससे। लाजलपेटी = लाज से युक्त। चेटी = दासी।
भावार्थ—(नायक के साथ नायिका की दासी का संवाद, दासी अपनी
स्वामिनी की ओर से बोल रही है)।
――――――――――――――――――――――――――――――――
३४—जेंबे-जेंइवे। हैं-ही। लई-लीनो, लोन्हो। ३५—बन-सु बन।
देहि री-दै दधि। जौ०-जु पाए। छुड़ावौ-छुड़ावै। कौन०-को महरेटी।
नायक—कल (दधिदान) देने को कह गई थी, अरी दे।
दासी—झोली फैलाओ (वह भर जाय तो), फिर फेंट भी भर लेना।
क्या आप मार्ग न छोड़ेंगे।
नायक—मैं मार्ग छोड़ने को इस शर्त पर प्रस्तुत हूँ कि तू इस (नायिका
राधिका) की लाजभरी चितवन छुड़ा दे।
दासी—बात सँभाल के कहिए अगर कोई सुन ले तो ! क्या जानते नहीं
कि यह किसकी बेटी है ?
नायक—जानता हूँ, यह वृषभानु की बेटी है, पर तुझे नहीं जानता कि
तू किसकी दासी है। (तू क्यों दाल-भात में मूसरचंद हो रही है)।
जलविहार को मिलन, यथा—(सवैया)
(१७५) हरि राधिका मानसरोवर के तट ठाढ़े री हाथ सों हाथ छियें ।
पिय के सिर पाग प्रिया मुकताहल छाजत माल दुहूँनि हियें।
कटि केसव काछनी सेत कछै सबही तन, चंदन चित्र कियै
निकसे छिति छीरसमुद्र ही तें सँग श्रीपति मानहु श्रीय लियें। ३६।
शब्दार्थ—मानसरोवर = तालाब। छियें = (बुंदेली) छुए, पकड़े हुए।
पाग = पगड़ी। मुकताहल = मुक्ताफल, मोती। पिय के० = प्रिय के सिर पर
पगड़ी है और प्रिया के सिर पर मोती। छाजत = शोभित है। माल० =
दोनों के गले में (पुष्प) मालाएँ पड़ी हैं। छीरसमुद्र = क्षीरसागर। कटि =
कमर। काछनी = कछनी, एक प्रकार की जाँघिया। सेत = श्वेत, उज्ज्वल।
कछै = पहने हुए। छिति = क्षिति, पृथ्वी। श्रीपति = विष्णु। श्रीय =
लक्ष्मी (को)।
अलंकार—उत्प्रेक्षा।
अन्यच्च, यथा—(सवैया)
(१७६) रितु ग्रीषम के प्रतिवासर केसव खेलत हैं जमुना जल में ।
इत गोपसुता वहि पार गोपाल बिराजत गोपनि के दल में ।
अति बूड़त हैं गति मीनन की मिलि जाइ उठैं अपने थल में ।
इहि भाँति मनोरथ पूरि दुवौ जन दूरि रहें छबि सों छल में।३७।
शब्दार्थ—प्रतिवासर = प्रतिदिन। इत = इस ओर। गति मीनन की =
मछलियों की भाँति। मिलि० = पानी के भीतर मिलने के बाद फिर अपने
ही स्थान में जाकर निकलते हैं (जल के भीतर से ऊपर उभरते हैं)। दुवौ
जन = दोनो व्यक्ति, नायक नायिका। छबि सों = सुंदरता से, सफाई से।
छल में = छलपूर्वक लोगों की आंख बचाकर ।
३६—छियें-दिये। मुकताहल-मुक्ताघर, मुक्ताछर। छाजत-राजति।
कछै-कसी, कसे, लसी। चित्र-खोरि। श्रीय-ओहि।
१२६ रसिकप्रिया
(दोहा)
(१७७) इहिं बिधि राधारमन के, बरने मिलन बिसेसि ।
केसवदास निवास बहु, बुधिबल लीजहु लेखि ।३८।
शब्दार्थ - निवास = स्थान, मिलने के स्थान ।
(१७८) और जु तरुनी तीसरी क्यों बरनौ यहि ठौर ।
रस में बिरस न बरनियै कहत रसिक सिरमौर ।३६।
शब्दार्थ - तीसरी तरुनी = तीसरी नायिका (गणिका, सामान्या) ।
(१७६) ये सब जितनी नायिका बरनी मतिअनुसार ।
केसवदास बखानियहु बुधिबल अष्ट प्रकार ।४०।
सूचना - 'सरदार' की टीका में यह दोहा नहीं है।
(१८०) प्रथम मिलन थल मैं कहे, अपनी मतिअनुसार ।
हावभाव-वर्णन करौं, सुनि अब बहुत प्रकार ।४१।
शब्दार्थ - अपनी ० = अपनी उद्भावना से।
इति श्रीमन्महाराजकुमारइंद्रजीतविरचितायां रसिकप्रियायां श्रीराधाकृष्ण-
चेष्टादर्शनमिलनस्थान वर्णनं नाम पंचमः प्रभावः ।५।
षष्ठ प्रभाव
अथ भाव-लक्षण-(दोहा)
(१८१) आनन लोचन बचन मग प्रगटत मन की बात ।
ताही सों सब कहत हैं, भाव कबिन के तात ।१।
शब्दार्थ- मग = (मार्ग) द्वारा । तात = प्रिय ।
भावार्थ-मुख (चेहरा), नेत्र और वचन के द्वारा मन की बात का
प्रकट होना 'भाव' कहलाता है।
(१८२) भाव सु पंच प्रकार के, सुनि विभाव अनुभाव ।
थाई, सात्विक कहत हैं व्यभिचारी कबिराव ।२।
शब्दार्थ - थाई = स्थायी ।
अथ विभाव-वर्णन-(दोहा)
(१८३) जिनतें जगत अनेक रस, प्रगट होत अनयास ।
तिनसों बिमति बिभाव कहि, बरनत केसवदास ।३।
३७-गोपनि ०-गुवालनि के गन में । ३८- निवास-बिलास । इति श्री-
राधाकृष्ण-नायक नायिका ।
१-प्रगटत-प्रगटति । २- पंच ०-पांच प्रकार को । सुनि-सुनु । थाई०-
अस्थाई सात्विक क= हैं। ३-जगत-जगुति । बिमति-कहत । कहि-कबि ।
षष्ठ प्रभाव १२७
शब्दार्थ—अनयास = अनायास, स्वतः । तिनसों=तिनको उन्हें । बिमति
= विशेष मतिमान् , अधिक बुद्धिमान् ।
अथ विभाव नामभेद-वर्णन—( दोहा )
(१८४) सब बिभाव द्वै भाँति के केसवदास बखानि ।
आलंबन इक दूसरो उद्दीपन मन आनि ।४।
(१८५) जिन्हें अतन अवलंबई ते आलंबन जानि ।
जिनतें दीपति होति है, ते उद्दीप बखानि ।५।
शब्दार्थ—अतन = अशरीरी, रस-भाव । दीपति = दीप्ति । उद्दीप =
उद्दीपन ।
अथ आलंबन-स्थान-वर्णन—( छप्पय )
(१८६) दंपति जोबन रूप जाति लच्छनजुत सखिजन ।
कोकिल कलित बसंत फूल फल दल अलि उपबन ।
जलचर जलजुत अमल कमल कमला कमलाकर ।
चातक मोर सु सन्द तड़ित धनु अंबुद अंबर ।
सुभ सेज दीप सौगंध गृह पान गान परिधान मनि ।
नव नृत्य भेद बीनादि रव आलंबन केसव बरनि ।६।
शब्दार्थ—दल = पत्तो । कमला = लक्ष्मी, शोभा । कमलाकर = सरो-
वर । तड़ित = बिजली । धनु = इंद्रधनुष। अंबुद = बादल । अंबर = आकाश।
परिधान = पहनावा । रव = शब्द ।
अथ उद्दीपन-वर्णन—( दोहा )
(१८७) अवलोकन आलाप परिरंभन नख-रद-दान ।
चुंबनादि उद्दीप हैं, मर्दन परस प्रबान ।७।
शब्दार्थ—आलाप = बोलना । परिरंभन = आलिंगन । नख-रद-दान =
नख-दान ( नखक्षत ) और रद-दान ( दंतक्षत ) । परस = स्पर्श । प्रवान =
प्रमाण ( माने जाते हैं ) ।
अथ अनुभाव-वर्णन—( दोहा )
(१८८) आलंबन उद्दीप के जो अनुकरन बखान ।
ते कहिये अनुभाव सब दंपति प्रीति-विधान ।८।
४—सब-सो । के-को ।केसवदास-केसवराइ । बखानि-बखान, बखानु ।
आनि-आन, आनु, मान, मानु । ५—जिन्हें०-जिनही रसु । अवलंबई-अवलंब
है। जानि-जान, जानु । दीपति०-दीपतु होत । बखानि-बखान, बखानु ।
६—कमला-मधुकर, मारुत । धनु-धन । पान०-पानखान । रव-सब ।
७—है-ए । प्रवान-प्रमान । ८—जो-जे । कहिये-कहिजै ।
१२८ रसिकप्रिया
शब्दार्थ - अनुकरण = पीछे आनेवाले । प्रीति-विधान = प्रेम के विधान में
अथ स्थायी भाव-वर्णन - (दोहा)
(१८६) रति हांसी अरु सोक पुनि क्रोध उछाह सुजान ।
भय निंदा बिसमय सदा थाई भाव प्रमान ।६।
शब्दार्थ- रति = प्रेम । हांसी = हास । उछाह = उत्साह । निंदा =
अर्थात् जुगुप्सा (घृणा) । विस्मय = आश्चर्य ।
अथ सात्त्विक-भाव-वर्णन - ( दोहा )
(१६०) स्तंभ स्वेद रोमांच सुरभंग कंप बैबन्य ।
आँसू प्रलय बखानिये आठौ नाम अनन्य ।१०।
शब्दार्थ-सुरभंग = स्वरभंग । बैबन्य = वैवर्ण्य । अनन्य = जो किसी
दूसरे का (नाम) न हो ।
अथ व्यभिचारी भाव-वर्णन - ( दोहा )
(१६१) भाव जु सबही रसन में उपजत केसवराय ।
बिना नियम तिन सों कहैं व्यभिचारी कबिराय ।११।
शब्दार्थ - बिना नियम० = जो किसी नियम के बिना सभी रसों में प्रकट
हों । तिनसों = तिनको, उन्हें ।
अथ व्यभिचारी-नाम-वर्णन - ( दोहा )
(१६२) निर्वेद ग्लानि संका तथा, आलस दैन्य रु मोह ।
स्मृति धृति ब्रीड़ा चपलता श्रम मद चिंता कोह ।१२।
शब्दार्थ-कोह = ( क्रोध ) रोष, अमर्ष ।
(१६३) गर्ब हर्ष आवेग पुनि, निंद्रा नींद-बिबाद ।
जड़ता उत्कंठा सहित, स्वप्न प्रबोध बिषाद ।१३।
शब्दार्थ-नींद-बिबाद - नींद का विवाद, नींद की कथा अर्थात् निद्रा ।
प्रबोध=विबोध, जागरण ।
(१६४) अपस्मार मति उग्रता, त्रास तर्क औ ब्याधि ।
उन्माद मरन अवहित्थ है, व्यभिचारी जुत आधि ।१४।
शब्दार्थ-अपस्मार = मिरगी । तर्क = वितर्क । ब्याधि = शारीरिक कष्ट ।
आधि = मानसिक कष्ट ।
सूचना- 'विवाद' का अर्थ स्वतंत्र करने से तर्क में पुनरुक्ति हो जाती है ।
६-हाँसी-सुहास । सु-हि । सदा-सहित । प्रमान-बखानु । १०-बैबन्य
-बैदनं । आँसू०-अश्रु प्रलाप । बखानिये-बखानिजै । अनन्य-सुबनं, न अन्य ।
११- कहैं-कहत । १४-त्रास-आस । औ-अति । उन्माद०-अवहित्य भय
आदि दै । अवहित्य-भय आदि दै । है०-तातें होइ ।
६ षष्ठ प्रभाव १२६
'आधि' मानसिक कष्ट अलग कोई व्यभिचारी नहीं, उसे व्याधि के साथ ही
समझना चाहिए या संगति बैठाने के लिए उसे ( 'जुत आधि' को ) 'अवहित्य'
का विशेषण मान लेना चाहिए ।
अथ हाव-लक्षण—( दोहा )
(१६५) प्रेम राधिका कृस्न को, है तातें सिंगार ।
ताके भावप्रभाव तें, उपजत हावबिचार ।१५।
शब्दार्थ—भाव = स्थिति । ताके० = उस शृंगार की स्थिति के कारण ।
विचार = अर्थात् बात, रूप ।
(१६६) हेला लीला ललित मद, बिभ्रम बिहृत बिलास ।
किलकिंचित बिच्छित्ति अरु, कहि बिब्बोक प्रकास ।१६।
(१६७) मोट्टाइत सुनि कुट्टमित, बोधकादि बहु हाव ।
अपने अपने बुद्धिबल, बरनत कबि कबिराव ।१७।
अथ हेला हाव-लक्षण—( दोहा )
(१६८) पूरन प्रेम-प्रताप तें, भूलत लाज-समाज ।
सो हेला तिहिं हरत हिय, राधा श्रीब्रजराज ।१८।
भावार्थ—अत्यंत प्रेम होने के कारण जहां लज्जा न रह जाय । जिसके
कारण देखनेवाले का हृदय वशीभूत हो जाए वही हेला है ।
अथ श्रीराधिकाजू को हेला हाव-यथा—( सवैया )
(१६६) अवलोकनि अंकुस ऐंचि अनूपम भ्रू-जुगपास भलें गल मेली ।
मृदुहास सुबास उठाइ मिली बहै जोन्ह की जामिनी माँझ अकेली।
अधरासव प्याइ किये बस केसवरांय करी रसरीति नवेली ।
बन में बृषभानुसुता सुखहीं हरि कों हरि लै गई हेलहीं हेली ।१६।
शब्दार्थ—ऐंचि = खींचकर । पास = (पाश) फंदा । सुबास = सुगंध ।
जोन्ह की जामिनी = चाँदनी रात । अधरासव = अधरों का आसव (शराब) ।
सुखहीं = सरलता के साथ । हरि कों हरि = कृष्ण को हरण करके । हेलहीं =
खेल ही खेल में । हेली = हे अली, हे सखी ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति सखी से ) चाँदनी रात में अकेली उस
वृषभानु की पुत्री राधिका ने श्रीकृष्ण को चितवन रूपी अंकुश से खींच लिया ।
अद्वितीय दो भौंह रूपी पाश भली भाँति उनके गले में डाल दिए और मृदु
हास तथा सुगंध ( रूपी सहचरों ) द्वारा उन्हें उठवा मँगाया और फिर अधरों
का आसव पिलाकर ( बेहोश हो जाने पर ) अपने वश में कर लिया । इस
१६-बिहृत-बिहित । बिच्छित्ति-बिक्षिस ।' १७-बोधकादि-बोधादिक ।
अपने०-अपनो अपनी । १८-तिहिं-जिहिं । १६-वह-बहु । अधरा०-
अधरारस । रस-रति ।
१३० रसिकप्रिया
प्रकार की नई रसपद्धति द्वारा वह वन में सरलतापूर्वक उन्हें हरण करके खेल
ही खेल में ले गई ।
सूचना—इस छंद में डाकुओं की क्रियाओं का साम्य राधिका की
चेष्टाओं से स्थापित किया गया है। 'हेलहीं हेली" में 'हेला' नाम भी रख
दिया गया है ।
अलंकार—रूपक ।
श्रीकृष्णजू को हेला हाव, यथा—( सवैया )
(२००) बेनु सुनाइ बुलाइ लई बन भौन बुलाइ कै भाँति भली को ।
फूलि गयो मन फूल्यो बिलोकत केसव कानन रासथली को ।
अधरारस प्याइ कियो परिरंभन चुंबन कै सुख कामकली को ।
हेलहिं श्रीहरि नागर आजु हर्यो मन श्रीवृषभानुलली को ।२०।
शब्दार्थ—बेनु = ( वेणु ) वंशी । भाँति भली को = भली भाँति से ।
फूल्यो = फूला हुआ (देखकर) । परिरंभन = आलिंगन । कामकली = काम
की कलिका ( नायिका ) । हेलहिं = खेल में ही । नागर = चतुर ।
अथ लीला हाव-लक्षण—( दोहा )
(२०१) करत जहाँ लीलानि को प्रीतम प्रिया बनाय ।
उपजत लीला हाव तहँ, बरनत केसवराय ।२१।
शब्दार्थ—लीला = रूप-परिवर्तन, प्रिय प्रेमिका बने प्रेमिका प्रिय ।
श्रीराधिकाजू को लीला हाव, यथा—( सवैया )
(२०२) पायन को परिबो अपमान अनेक सों केसव मान मनैबो ।
मीठो तमोर खवाइबो खैबो बिसेषि चहूँ दिसि चौकि चितैबो ।
चीर कुचीलनि ऊपर पौढ़िबो पातन के खरके भजि ऐबो ।
आँखिन मूदिकै सीखति राधिका कुंजन तें प्रतिकुंजन जैबो ।२२।
शब्दार्थ—अपमान० = अनेक अपमान सहकर । मीठो = मधुर । तमोर =
तांबूल, पान । चीर कुचीलनि = मैले वस्त्रों ( पर ) पात = पत्ता । खरके =
खड़कने पर । ऐबो = आना । प्रतिकुंजन = अन्य कुंजों में ।
भावार्थ—( सखी उक्ति सखी प्रति ) हे सखी, ( राधिका श्रीकृष्ण
का रूप धारण करके ) श्रीकृष्ण के पैरों पड़ना, अनेक अपमान सहकर मान
२०—बेनु-बैन । बन-भव, वह । फूलि-भूलि । फूल्यो-भूल्यो । रस-
मधु । अधरा०-रूप महामधु पान कराय कियो परिरंभन कामकली को,
चुंबन रंभन कामकली को । मन-तब । २१—लीलानि-ललितानि । २२—
अनेक०-अनेक सों मान छोड़ाइ मनैबो । मीठो-सीठो, सीखो । चीर-चील ।
पातन०-पानन के खरके भजि जैबो । भजि-भगि ।