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रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

Autobiography of Ram Prasad Bismil

पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

वृहत् संगठन 103
प्रभु की लीला है। सब कार्य उसकी इच्छानुसार ही होते हैं। यह परमपिता
परमात्मा के नियमों का परिणाम है कि किस प्रकार किसको शरीर त्यागना होता
है। मृत्यु के सकल उपक्रम सारे निमित्त मात्र हैं। जब तक कर्म क्षय नहीं होता
आत्मा को जन्म मरण के बंधन में पड़ना ही होता है, यह शास्त्रों का निश्चय है।
यद्यपि यह बात वह परब्रह्म ही जानता है कि किन कर्मों के परिणामस्वरूप
कौन-सा शरीर इस आत्मा को ग्रहण करना होगा किंतु अपने लिए यह मेरा दृढ़
निश्चय है कि मैं उत्तम शरीर धारण कर नवीन शक्तियों सहित अति शीघ्र ही
पुन: भारत में ही किसी निकटवर्ती संबंधी या इष्ट मित्र के गृह में जन्म ग्रहण
करूँगा, क्योंकि मेरा जन्म-जन्मांतर उद्देश्य रहेगा कि मनुष्य मात्र को सभी प्रकृति
पदार्थों पर समानाधिकार प्राप्त हो। कोई किसी पर हुकूमत न करे। सारे संसार में
जनतंत्र की स्थापना हो। वर्तमान समय में भारत की अवस्था (दशा) बड़ी
शोचनीय है। अतएव लगातार कई जन्म इसी देश में ग्रहण करने होंगे और जब
तक कि भारत के नर-नारी पूर्णतया सर्वरूपेण (हर तरह से) स्वतंत्र न हो जाएँ,
परमात्मा से मेरी यह प्रार्थना होगी कि वह मुझे इसी देश में जन्म दें, ताकि
उसकी पवित्र वाणी- "वेद वाणी" का अनुपम घोष मनुष्य मात्र के कानों तक
पहुँचाने में समर्थ हो सकूँ। सम्भव है कि मैं मार्ग-निर्धारण में भूल करूँ, पर इसमें
मेरा विशेष दोष नहीं, क्योंकि मैं भी तो अल्पज्ञ (कम जानकारी रखने वाला)
जीव मात्र हूँ। भूल न करना केवल सर्वज्ञ (सब कुछ जानने वाले ईश्वर) से ही
संभव है। हमें परिस्थितियों के अनुसार ही सब कार्य करने पड़ें और करने होंगे।
परमात्मा अगले जन्म में सुबुद्धि प्रदान करे ताकि मैं जिस मार्ग का अनुसरण करूँ,
वह त्रुटि रहित ही हो।
अब मैं उन बातों का भी उल्लेख कर देना उचित समझता हूँ, जो काकोरी
षड्यंत्र के अभियुक्तों के संबंध में सेशन जज के फैसला सुनाने के बाद घटित
हुईं। 6 अप्रैल सन् 1927 ई. को सेशन जज ने फैसला सुनाया था। 18 जुलाई
सन् 1927 ई. को अवध चीफ़ कोर्ट में अपील हुई। इसमें सज़ाएँ कुछ बढ़ीं और

104 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
एकाध की कमी भी हुई। अपील होने की तारीख से पहले मैंने संयुक्त प्रांत के
गवर्नर की सेवा में एक मेमोरियल (ज्ञापन) भेजा था, जिसमें प्रतिज्ञा की थी कि
अब भविष्य में क्रांतिकारी दल से कोई संबंध न रखूँगा। इस मेमोरियल का जिक्र
मैंने अपनी अंतिम दया-प्रार्थना पत्र में, जो मैंने चीफ कोर्ट के जजों को दिया था,
कर दिया था, किन्तु चीफ कोर्ट के जजों ने मेरी किसी प्रकार की प्रार्थना स्वीकार
न की। मैंने स्वयं ही जेल से अपने मुकदमे की बहस लिखकर भेजी जो छापी
गई। जब यह बहस चीफ कोर्ट के जजों ने सुनी उन्हें बड़ा संदेह हुआ कि बहस
मेरी लिखी हुई न थी। इन तमाम बातों का नतीजा यह निकला कि चीफ कोर्ट
अवध द्वारा मुझे महाभयंकर षड्यंत्रकारी की पदवी दी गई। मेरे पश्चाताप पर
जजों को विश्वास न हुआ और उन्होंने अपनी धारणा को इस प्रकार प्रकट किया
कि यदि यह (रामप्रसाद) छूट गया तो फिर वही कार्य करेगा। बुद्धि की प्रखरता
तथा समझ पर प्रकाश डालते हुए मुझे “निर्दयी हत्यारे” के नाम से विभूषित
किया गया। लेखनी उनके हाथ में थी, जो चाहे सो लिखते, किन्तु ‘काकोरी
षड्यंत्र का चीफ कोर्ट का आद्योपांत फैसला पढ़ने से भली-भाँति विदित होता है
कि मुझे मृत्यु-दंड किस ख्याल से दिया गया। यह निश्चय किया गया कि
रामप्रसाद ने सेशन जज के विरुद्ध अपशब्द कहे हैं, खुफिया विभाग के कार्यकर्त्ताओं
पर लांछन लगाए हैं अर्थात अभियोग के समय जो अन्याय होता था, उसके
विरुद्ध आवाज़ उठाई है, अतएव रामप्रसाद सब से बड़ा गुस्ताख मुलजिम है। अब
माफी चाहे वह किसी रूप में माँगे, नहीं दी जा सकती।
चीफ कोर्ट से अपील खारिज हो जाने के बाद यथानियम प्रांतीय गवर्नर
तथा फिर वाइसराय के पास दया-प्रार्थना की गई। रामप्रसाद “बिस्मिल”, राजेन्द्रनाथ
लाहिड़ी, रोशनसिंह तथा अशफाकउल्ला खाँ के मृत्यु-दंड को बदलकर अन्य दूसरी
सज़ा देने की सिफारिश करते हुए संयुक्त प्रांत की कौंसिल के लगभग सभी
निर्वाचित मेंबरों ने हस्ताक्षर करके निवेदन-पत्र दिया। मेरे पिता ने ढाई सौ रईस,
आनरेरी मजिस्ट्रेट तथा जमींदारों के हस्ताक्षर से एक अलग प्रार्थना-पत्र भेजा किन्तु

बृहत् संगठन 105
श्रीमान सर विलियम मेरिस की सरकार ने एक न सुनी। उसी समय लेजिस्लेटिव
असेंबली तथा कौंसिल ऑफ स्टेट के 78 सदस्यों ने हस्ताक्षर करके वाइसराय के
पास प्रार्थना-पत्र भेजा कि “काकोरी षड्यंत्र के मृत्यु-दंड पाए हुए लोगों को
मृत्यु-दंड की सज़ा बदलकर दूसरी सज़ा कर दी जाए, क्योंकि दौरा जज ने
सिफारिश की है कि यदि ये लोग पश्चाताप करें तो सरकार दंड कम कर दे।
चारों अभियुक्तों ने पश्चाताप प्रकट कर दिया है।” किन्तु वाइसराय महोदय ने भी
एक न सुनी।
इस विषय में माननीय पं. मदनमोहन मालवीय जी ने तथा असेंबली के कुछ
अन्य सदस्यों ने वाइसराय से मिलकर भी प्रयत्न किया था कि मृत्यु-दंड न दिया
जाए। इतना होने पर सबको आशा थी कि वाइसराय महोदय अवश्यमेव मृत्यु-दंड की
आज्ञा रद्द कर देंगे। इसी हालत में चुपचाप विजयादशमी से दो दिन पहले जेलों को
तार भेज दिए गए कि दया नहीं होगी। सबकी फांसी की तारीख मुकर्रर हो गई। जब
मुझे सुपरिंटेंडेंट जेल ने तार सुनाया, तो मैंने भी कह दिया कि आप अपना काम
कीजिए। किंतु सुपरिंटेंडेंट जेल के अधिक कहने पर कि एक तार दया-प्रार्थना का
सम्राट के पास भेज दो, क्योंकि यह उन्होंने एक नियम-सा बना रखा है कि प्रत्येक
फाँसी के कैदी की ओर से जिसकी दया-भिक्षा की अर्जी वाइसराय के यहाँ से खारिज
हो जाती है, वह एक तार सम्राट के नाम से प्रांतीय सरकार के पास अवश्य भेजते
हैं। कोई दूसरा जेल सुपरिंटेंडेंट ऐसा नहीं करता। उपरोक्त तार लिखते समय मेरा
कुछ विचार हुआ कि प्रिवी-कौंसिल (सर्वोच्च न्यायालय) इंग्लैंड में अपील की जाए।
मैंने श्री मोहनलाल सक्सेना वकील लखनऊ को सूचना दी। बाहर किसी को वाइसराय
द्वारा अपील खारिज करने की बात पर विश्वास भी न हुआ। जैसे तैसे करके श्री
मोहनलाल द्वारा प्रिवी-कौंसिल में अपील कराई गई। नतीजा जो पहले से मालूम था।
वहाँ से भी अपील खारिज हुई। यह जानते हुए कि अंग्रेज सरकार कुछ भी न सुनेगी
मैंने सरकार को प्रतिज्ञा-पत्र क्यों लिखा? क्यों अपीलों पर अपीलें तथा दया-प्रार्थनाएँ
कीं? इस प्रकार से प्रश्न उठ सकते हैं।

106 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा.
मेरी समझ में सदैव यही आया कि राजनीति एक शतरंज के खेल के समान
है। शतरंज के खेलने वाले भली-भाँति जानते हैं कि आवश्यकता होने पर किस
प्रकार अपने मोहरे मरवा देने पड़ते हैं। बंगाल आर्डिनेंस के कैदियों के छोड़ने या
उन पर खुली अदालत में मुकदमा चलाने के प्रस्ताव जब असेम्बली में पेश किए
गए, तो सरकार की ओर से बड़े जोरदार शब्दों में कहा गया कि, सरकार के पास
पूरा सबूत है। खुली अदालत में अभियोग चलाने से गवाहों पर आपत्ति आ
सकती है। यदि आर्डिनेंस के कैदी लेखबद्ध प्रतिज्ञा-पत्र दें कि वे भविष्य में
क्रांतिकारी आंदोलन से कोई संबंध न रखेंगे, तो सरकार उन्हें रिहाई देने के विषय
' में विचार कर सकती है। बंगाल में दक्षिणेश्वर तथा शोभा बाजार बम केस
आर्डिनेंस के बाद चले खुफिया विभाग के डिप्टी सुपरिंटेंडेंट के कत्ल का मुकदमा
भी खुली अदालत में हुआ। और भी कुछ हथियारों के मुकदमे खुली अदालत में
चलाए गए, किन्तु कोई एक भी दुर्घटना या हत्या की सूचना पुलिस न दे सकी।
काकोरी षड्यंत्र केस पूरे डेढ़ साल तक खुली अदालतों में चलता रहा। सबूत की
ओर से लगभग तीन सौ गवाह पेश किए गए। कई मुखबिर तथा इकबाली
(पुलिस को सूचना देने वाले और अपना अपराध स्वीकार करने वाले) खुले तौर
से घूमते रहे, पर कहीं कोई दुर्घटना या किसी को धमकी देने की कोई सूचना
पुलिस ने न दी। सरकार की इन बातों की पोल खोलने की गरज से मैंने
लेखबद्ध प्रतिज्ञा सरकार को दी। सरकार के कथनानुसार जिस प्रकार बंगाल
आर्डिनेंस के कैदियों के संबंध में सरकार के पास पूरा सबूत था और सरकार
उनमें से अनेक को भयंकर षड्यंत्रकारी दल का सदस्य तथा हत्याओं का
जिम्मेदार समझती तथा कहती थी, तो इसी प्रकार काकोरी के षड्यंत्रकारियों के
लेखबद्ध-प्रतिज्ञा करने पर कोई गौर क्यों नहीं किया गया? बात यह है कि जबरा
मारे रोने न देय। मुझे तो भली-भाँति मालूम था कि संयुक्त प्रांत में जितने
राजनैतिक अभियोग चलाए जाते हैं, उनके फैसले खुफिया पुलिस की इच्छानुसार
लिखे जाते हैं। बरेली पुलिस कांस्टेबिलों की हत्या के अभियोग में नितांत निर्दोष

वृहत् संगठन 107
नवयुवकों को फँसाया गया और सी. आई. डी. वालों ने अपनी डायरी दिखलाकर
फैसला लिखाया। काकोरी षड्यंत्र में भी अंत में ऐसा ही हुआ। सरकार की सब
चालों को जानते हुए भी मैंने सब कार्य उसकी लंबी-लंबी बातों की पोल खोलने
के लिए ही किए। काकोरी के मृत्युदंड पाए हुओं की दया-प्रार्थना न स्वीकार करने
का कोई विशेष कारण सरकार के पास नहीं। सरकार ने बंगाल आर्डिनेंस के
कैदियों के संबंध में जो कुछ कहा था, सो काकोरी वालों ने किया। मृत्यु-दंड को
रद्द कर देने से देश में किसी प्रकार की शांतिभंग होने अथवा किसी विप्लव हो
जाने की संभावना नहीं थी। विशेषतया जब कि देश भर के सब प्रकार के
हिन्दू-मुसलमान असेंबली के सदस्यों ने इसकी सिफारिश की थी। षड्यंत्रकारियों
की इतनी बड़ी सिफारिश इससे पहले कभी नहीं हुई। किंतु सरकार तो अपना
सारा सीधा रखना चाहती है। उसे अपने बल पर विश्वास है। सर विलियम मेरिस
ने ही स्वयं शाहजहाँपुर तथा इलाहाबाद के हिन्दू-मुस्लिम दंगे के अभियुक्तों के
मृत्यु-दंड रद्द किए हैं, जिनको कि इलाहाबाद हाई कोर्ट से मृत्यु-दंड ही देना उचित
समझा गया था और उन लोगों पर दिन दहाड़े हत्या करने के सीधे सबूत मौजूद
थे। ये सज़ाएँ ऐसे समय माफ की गई थीं, जबकि नित्य नए हिन्दू-मुस्लिम दंगे
बढ़ते ही जाते थे। यदि काकोरी के कैदियों को मृत्यु-दंड माफ करके, दूसरी सज़ा
देने से दूसरों का उत्साह बढ़ता तो क्या इसी प्रकार मजहबी दंगों के संबंध में भी
नहीं हो सकता था? मगर वहाँ तो मामला कुछ और ही है, जो अब भारतवासियों
के नरम से नरम दल के नेताओं के भी शाही कमीशन के मुकर्रर होने तथा उनमें
एक भी भारतवासी के न चुने जाने, पार्लियामेंट में भारत सचिव लार्ड बर्कन हेड
के तथा अन्य मजदूर दल के नेताओं के भाषणों से भली-भाँति समझ में आया है
कि किस प्रकार भारत को गुलामी की जंजीरों में जकड़े रहने की चालें चली जा
रही हैं।
मैं प्राण त्यागते समय निराश नहीं हूँ कि हम लोगों के बलिदान व्यर्थ गए।
मेरा तो विश्वास है कि हम लोगों की छिपी हुई आहों का ही यह नतीजा हुआ

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108 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा

कि लार्ड बर्कन हेड के दिमाग में परमात्मा ने एक विचार उपस्थित किया कि
हिन्दुस्तान के हिन्दू-मुस्लिम झगड़ों का लाभ उठाओ और भारत की जंजीरें और
कस दो। गए थे रोजा छोड़ने नमाज गले पड़ गई। भारत के प्रत्येक विख्यात
राजनैतिक दल ने और हिंदुओं के तो लगभग सभी तथा मुसलमानों के भी
अधिकतर नेताओं ने एक स्वर होकर रायल कमीशन (साइमन कमीशन) की
नियुक्ति तथा उसके सदस्यों के विरुद्ध घोर विरोध किया है, और कांग्रेस के मद्रास
में होने वाले अधिवेशन में सब राजनैतिक दल के नेता तथा हिन्दू-मुसलमान एक
होने जा रहे हैं। वाइसराय ने जब हम काकोरी के मृत्यु-दंड वालों की दया-प्रार्थना
अस्वीकार की थी, उसी समय मैंने श्री मोहनलाल जी को पत्र लिखा था कि
हिन्दुस्तानी नेताओं को तथा हिन्दू-मुसलमानों को अगली कांग्रेस (अधिवेशन) पर
एकत्रित हो हम लोगों की याद मनानी चाहिए। सरकार ने अशफाकउल्ला को
रामप्रसाद का दाहिना हाथ करार दिया। अशफाकउल्ला कट्टर मुसलमान होकर
पक्के आर्यसमाजी रामप्रसाद का क्रांतिकारी दल के संबंध में यदि दाहिना हाथ बन
सकते हैं, तब क्या भारत की स्वतंत्रता के नाम पर हिन्दू-मुसलमान अपने निजी
छोटे-छोटे फायदों का ख्याल न करके आपस में एक नहीं हो सकते?⁻⁴⁹
परमात्मा ने मेरी पुकार सुन ली और मेरी इच्छा पूरी होती दिखाई देती है।
मैं तो अपना कार्य कर चुका। मैंने मुसलमानों में से एक नवयुवक निकालकर
भारतवासियों को दिखला दिया, जो सब परीक्षाओं में पूर्णतया उत्तीर्ण हुआ। अब
किसी को यह कहने का साहस न होना चाहिए कि मुसलमानों पर विश्वास न
करना चाहिए। पहला तजुर्बा था, जो पूरी तौर से कामयाब हुआ। अब देशवासियों
से यही प्रार्थना है कि यदि वे हम लोगों के फाँसी पर चढ़ने से जरा भी दुखित
हुए हों, तो उन्हें यही शिक्षा लेनी चाहिए कि हिन्दू-मुसलमान तथा सब राजनैतिक
दल एक होकर कांग्रेस को अपना प्रतिनिधि मानें। जो कांग्रेस तय करें, उसे सब
पूरी तौर से मानें और उस पर अमल करें। ऐसा करने के बाद वह दिन बहुत
दूर न होगा जबकि अंग्रेजी सरकार को भारतवासियों की माँग के सामने सिर

वृहत् संगठन 109

झुकाना पड़े, और यदि ऐसा करेंगे तब तो स्वराज्य कुछ दूर नहीं। क्योंकि फिर तो
भारतवासियों को काम करने का पूरा मौका मिल जाएगा। हिन्दू-मुस्लिम एकता ही
हम लोगों की यादगार तथा अंतिम इच्छा है, चाहे वह कितनी कठिनाई से क्यों
न प्राप्त हो। जो मैं कह रहा हूँ वही श्री अशफाकउल्ला खाँ वारसी का भी मत
है, क्योंकि अपील के समय हम दोनों लखनऊ जेल में फाँसी की कोठरियों में
आमने-सामने कई दिन तक रहे थे। आपस में हर तरह की बातें हुई थीं।
गिरफ्तारी के बाद से हम लोगों की सज़ा बढ़ने तक श्री अशफाकउल्ला खाँ की
बड़ी भारी उत्कट इच्छा यही थी कि वह एक बार मुझसे मिल लेते, जो परमात्मा
ने पूरी कर दी।
श्री अशफाकउल्ला खाँ तो अंग्रेजी सरकार से दया-प्रार्थना करने पर राजी ही
न थे। उनका तो अटल विश्वास यही था कि खुदाबंद करीम के अलावा किसी
दूसरे से दया प्रार्थना न करनी चाहिए, परन्तु मेरे विशेष आग्रह से ही उन्होंने
सरकार से दया-प्रार्थना की थी। इसका दोषी मैं ही हूँ, जो मैंने अपने प्रेम के
पवित्र अधिकारों का उपयोग करके श्री अशफाकउल्ला खाँ को उनके दृढ़ निश्चय
से विचलित किया। मैंने एक पत्र द्वारा अपनी भूल स्वीकार करते हुए भ्रातृ-द्वितीया
के अवसर पर गोरखपुर जेल से भी अशफाक को पत्र लिखकर क्षमा-प्रार्थना की
थी। परमात्मा जाने कि वह पत्र उनके हाथों तक पहुँचा भी या नहीं। खैर!
परमात्मा की ऐसी ही इच्छा थी कि हम लोगों को फाँसी दी जाए, भारतवासियों
के जले हुए दिलों पर नमक पड़े, वे बिलबिला उठें और हमारी आत्माएँ उनके
कार्य को देखकर दुखी हों। जब हम नवीन शरीर धारण करके देश-सेवा में योग
देने को उद्यत हों, उस समय तक भारत की राजनैतिक स्थिति पूर्णतया सुधरी हुई
हो। जनसाधारण का अधिक भाग सुशिक्षित हो जाए। ग्रामीण लोग भी अपने
कर्त्तव्य समझने लग जाएँ।
प्रिवी कौंसिल में अपील भिजवाकर मैंने जो व्यर्थ का अपव्यय करवाया,
उसका भी एक विशेष अर्थ था। सब अपीलों का तात्पर्य यह था कि मृत्यु-दंड

110 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
उपयुक्त नहीं। क्योंकि न जाने किसकी गोली से आदमी मारा गया। अगर डकैती
डालने की जिम्मेदारी के ख्याल से मृत्यु-दंड दिया गया तो चीफ कोर्ट के फैसले
के अनुसार भी मैं ही डकैतियों का जिम्मेदार तथा नेता था, और प्रांत का नेता
भी मैं ही था। अतएव मृत्यु-दंड तो केवल मुझे ही मिलना चाहिए था। अन्य तीन
को फाँसी नहीं देनी चाहिए थी। इसके अतिरिक्त दूसरी सज़ाएँ सब स्वीकार
होतीं। पर ऐसा क्यों होने लगा? मैं विलायती न्यायालय की भी परीक्षा करके
स्वदेशवासियों के लिए उदाहरण छोड़ना चाहता था कि यदि कोई राजनैतिक
अभियोग चले तो वे कभी भूलकर के भी किसी अंग्रेजी अदालत का विश्वास न
करें। तबियत आए तो जोरदार बयान दें। अन्यथा मेरी तो यही राय है कि
अंग्रेजी अदालत के सामने न तो कभी कोई बयान दें और न कोई सफाई पेश
करें। काकोरी षड्यंत्र के अभियोग से शिक्षा प्राप्त कर लें। इस अभियोग में सब
प्रकार के उदाहरण मौजूद हैं। प्रिवी-कौंसिल में अपील दाखिल कराने का एक
विशेष अर्थ यह भी था कि मैं कुछ समय तक फाँसी की तारीख टलवा कर यह
परीक्षा करना चाहता था कि नवयुवकों में कितना दम है और देशवासी कितनी
सहायता दे सकते हैं। इसमें मुझे बड़ी निराशापूर्ण असफलता हुई। अंत में मैंने
निश्चय किया था कि यदि हो सके, तो जेल से निकल भागूँ। ऐसा हो जाने से
सरकार को अन्य तीनों फाँसी वालों की सज़ा माफ कर देनी पड़ेगी और यदि न
करते तो मैं करा लेता। मैंने जेल से भागने के अनेक प्रयत्न किए, किन्तु बाहर
से कोई सहायता न मिल सकी। यही तो हृदय पर आघात लगता है कि जिस
देश में मैंने इतना बड़ा क्रांतिकारी आंदोलन तथा षड्यंत्रकारी दल खड़ा किया था,
वहाँ से मुझे प्राण-रक्षा के लिए एक रिवाल्वर तक न मिल सका। एक नवयुवक
भी सहायता को न आ सका।-⁵⁰ अंत में फाँसी पा रहा हूँ। फाँसी पाने का मुझे
कोई भी शौक नहीं, क्योंकि मैं इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि परमात्मा को यही
मंजूर था। मगर मैं नवयुवकों से फिर भी नम्र निवेदन करता हूँ कि जब तक
भारतवासियों की अधिक संख्या सुशिक्षित न हो जाए, जब तक उन्हें कर्तव्य

बृहत् संगठन 111
अकर्त्तव्य का ज्ञान न हो जाए, तब तक वे भूलकर भी किसी प्रकार के क्रांतिकारी
षड्यंत्रों में भाग न लें। यदि देश सेवा की इच्छा हो तो खुले आंदोलनों द्वारा
यथाशक्ति कार्य करें, अन्यथा उनका बलिदान उपयोगी न होगा। दूसरे प्रकार से
इससे अधिक देशसेवा हो सकती है, जो ज़्यादा उपयोगी सिद्ध होगी। परिस्थिति
अनुकूल न होने से ऐसे आंदोलनों में परिश्रम प्रायः व्यर्थ जाता है। जिनकी भलाई
के लिए करो, वही बुरे-बुरे नाम धरते हैं और अंत में मन-ही-मन कुढ़-कुढ़ कर
प्राण त्यागने पड़ते हैं।⁵¹
देशवासियों से यही अंतिम विनय है कि जो कुछ करें, सब मिलकर करें
और सब देश की भलाई के लिए करें। इसी से सबका भला होगा।
मरते "बिस्मिल" "रोशन" "लहरी" "अशफाक" अत्याचार से।
होंगे पैदा सैकड़ों इनके रुधिर की धार से।।

शब्दार्थ एवं टिप्पणियाँ

  1. तोमरधार : मध्य प्रदेश के मुरैना ज़िला में चंबल नदी के किनारे स्थित एक बड़े
    भूभाग को तोमरधार कहा जाता है। इसी क्षेत्र में चंबल नदी के किनारे बरवाई
    और रूअर नामक दो गाँव हैं। मुरैना ज़िला स्वाधीनता से पूर्व ग्वालियर की देशी
    रियासत में था। महिला डाकू पुतली बाई बरवाई गाँव की ही थी।
  2. बीहड़ : चंबल नदी ने अपने दोनों किनारों की हजारों हेक्टेयर भूमि को काट कर
    ऊँचे-नीचे टीलों और गहरी घाटियों में बदल दिया है। इस क्षेत्र को कठिन मार्ग
    वाला क्षेत्र अर्थात बीहड़ कहते हैं। इनमें आना-जाना कठिन है। ठाकुर मलखान
    सिंह, पुतली बाई, फूलनदेवी आदि डाकू इन्हीं बीहड़ों में छिपे रहते थे।
  3. अंग्रेजी राज्य : स्वतंत्रता से पूर्व भारत पर अंग्रेजों का राज्य था। भारत के जिन
    क्षेत्रों पर अंग्रेजों का पूरा कब्जा था उन्हें अंग्रेजी राज्य का क्षेत्र कहते थे। देश के
    शेष भागों में ग्वालियर, इंदौर, जयपुर आदि राजाओं की रियासतें थीं। इनको
    रियासत कहते थे।
  4. शूद्र जाति : यहाँ शहीद रामप्रसाद बिस्मिल ने जाति प्रथा का विरोध किया है। वह
    मनुष्यों के बीच जाति के नाम पर कोई भेदभाव नहीं करते थे और सबको समान
    मानते थे।
  5. मेजिनी : मेजिनी इटली के राष्ट्रीय क्रांतिकारी नेता थे। उन्होंने अपने देश में
    स्वतंत्रता व जनतंत्र के लिए आंदोलन किया था। भारत व अन्य देशों के
    क्रांतिकारियों पर मेजिनी के विचारों का बहुत प्रभाव पड़ा था।
  6. भाई परमानन्द : भाई परमानन्द भारत के प्रमुख राष्ट्रीय नेता थे। उनका भारत में
    तथा भारत से बाहर यूरोप, अमरीका व कनाडा में काम कर रहे भारतीय
    क्रांतिकारियों से संबंध था। लाहौर षड्यंत्र केस में भाई परमानन्द को फाँसी की
    सजा दी गई थी परन्तु बाद में वह कारावास की सजा में बदल दी गई थी।
  7. देशवासियों से निवेदन : (अ) देशवासियों से निवेदन शीर्षक पर्चा सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी
    नेता व विचारक शचीन्द्रनाथ सान्याल ने लिखा था। शचीन्द्रनाथ ने एक अन्य पर्चा

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शब्दार्थ एवं टिप्पणियाँ 113

‘रेवोल्यूशनरी” तथा बंदी जीवन, विचार-विनिमय, समाज व संस्कृति आदि पुस्तकें
भी लिखी थीं। ये पर्चे तथा पुस्तकें भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन तथा क्रांतिकारियों
की विचारधारा पर बहुत अच्छा प्रकाश डालती हैं। शचीन्द्रनाथ सान्याल को
काकोरी षड्यंत्र केस में आजीवन कारावास की सजा मिली थी। इस केस में
रामप्रसाद बिस्मिल को फाँसी की सजा दी गई थी। “देशवासियों से निवेदन” पर्चा
ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण है। इसमें लिखा गया था : “क्रांतिकारी
आंदोलन आतंकवाद नहीं है, क्योंकि भारत में किसी भी क्रांतिकारी का यह
विश्वास नहीं है कि केवल आतंकवाद से ही स्वाधीनता प्राप्त हो सकती है।
यदि सरकारी अत्याचारों के विरुद्ध इक्का-दुक्का व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल का
प्रयोग करते हैं तो उसका अर्थ यह नहीं हुआ कि क्रांतिकारी निरे आतंकवाद
की लड़ाई लड़ना चाहते हैं।”
(ब) गेंदालाल दीक्षित प्रमुख क्रांतिकारी नेता थे। उन्होंने “मातृवेदी” और “शिवाजी
समिति” नामक क्रांतिकारी संगठन बनाए थे। रामप्रसाद बिस्मिल इन संगठनों के
सदस्य थे। दीक्षितजी व बिस्मिल मैनपुरी षड्यंत्र केस के अभियुक्तों में थे।
8. श्राद्ध : क्रांतिकारी आपसी पत्रव्यवहार में सांकेतिक शब्दों का प्रयोग करते थे, ताकि
पुलिस को उनके कार्यों का पता न चल जाए। यहाँ श्राद्ध शब्द का प्रयोग बैठक
के लिए किया गया है। दल में क्रांतिकारियों का नाम भी बदल दिया जाता था।
यहाँ रामप्रसाद बिस्मिल ने पत्र पर अपने गुप्त नाम रुद्र से हस्ताक्षर किए थे।
उर्दू शब्द हिन्दी में अर्थ
9. तुर्बत कब्र
10. माशूक प्रेमिका
11. एहसान उपकार
भावार्थ : यदि प्रेमिका मेरी कब्र पर फूल चढ़ाने आये तो फूल के बोझ से कब्र
दब सी जाती है। फिर भी उसका यह उपकार भी बहुत है।
12. बेवफा निष्ठाहीन
13. शहीदाने-शहीदों की इसका अर्थ है जैसे किसी मुर्गे की गर्दन
पर छुरी चला दी जाए।
14. वफ़ा निष्ठा
15. दीनो ईमां धर्म

114 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
16. सिजदे करना शीश नवाना
17. जल्लाद तलवार से गर्दन काटने वाला
भावार्थ : हम अपनी निष्ठा के लिए अपना बलिदान करने वाले हैं। हमारा धर्म
सारी दुनिया से अलग है। हमें जिससे प्यार है, हम उसी के पाँव पर शीश नवाते हैं
ताकि उसे हमारी गर्दन पर तलवार चलाने में कठिनाई न हो।
18. असगर यह कवि का उपनाम है
19. हरीम मस्जिद
20. इश्क प्रेम
21. हस्ती व्यक्तित्व
22. जुर्म अन्याय
भावार्थ : रामप्रसाद बिस्मिल किसी और कवि असगर के हवाले से कहते हैं कि
प्रेम के पवित्र स्थल में अपने अस्तित्व का अहं ही अपराध है। यहाँ पाँव रखना हो तो
कंधे पर सिर नहीं होना चाहिए।
भावार्थ : यहाँ मनुष्य कहता है कि हे भगवान जो भी कार्य हुए हैं वह सब आपने
किए हैं। मैंने कुछ भी नहीं किया है। जहाँ भी मैंने कोई कार्य किए हैं उनके सम्पन्न
होने का कारण यह है कि आप ही मेरे हृदय में बसे थे।
23. महसूस करना अनुभव करना
24. बादे हवा
25. फना मौत
26. असरार रहस्य
27. बारे बोझ
28. अलम गम
29. रंगे निशात आनन्द का रंग
30. अंदाज पता चल जाना
31. बेहिसी अन्दर से सुन्न हो जाना
32. वफ़ा निष्ठा
33. सदके न्यौछावर
34. नज़रे ज़फा करना तेरे ज़ुल्म पर मैं अपनी बलि देता हूँ
35. लाजिम आवश्यक
36. फ़िदा लुटा देना

Uploaded By Rajesh Tanti.

शब्दार्थ एवं टिप्पणियाँ 115
भावार्थ अब मैं मृत्यु के झोंके अनुभव करने लगा हूँ। यानि मुझ पर जीवन का
रहस्य खुलने लगा है। मैंने भरपूर गम भी देखा है और भरपूर खुशी भी। जो मैं अन्दर
से सुन्न होकर रह गया हूँ यह कोई अकारण घटना नहीं है। निष्ठा को दिल की बलि
चढ़ा दे और जीवन को प्रेमिका के अत्याचारों की भेंट चढ़ा दे क्योंकि प्यार में यह
आवश्यक है कि प्रेमी के पास जो कुछ भी है उसे वह लुटा दे।
37. बहरे समुद्र
38. फना मृत्यु
39. रब ईश्वर
40. बिस्मिल यह कवि का उपनाम है
41. जौहरे शमशीर तलवार की वीरता
42. क़ातिल हत्यारा
43. दाग़े नाकामी असफलता का चिह्न
भावार्थ : हे ईश्वर बिस्मिल की लाश को मृत्यु के सागर में जल्दी बहा दे क्योंकि
मेरी प्रेमिका की तलवार की वीरता मेरी लहू की प्यासी है। ऐ मेरी असफलता के दाग
मेरे दिल को सोच समझ कर फूंकना क्योंकि यह बुरी तरह उजड़ चुका है, फिर भी
इसमें अनेक इच्छायें सांस ले रही हैं। यहाँ प्रेमिका का प्रयोग देश की स्वतंत्रता के लिए
किया गया है।
हिन्दी शब्द अर्थ
44. सहस्रों हजारों
45. निज अपने
46. ईश ईश्वर
47. शत सौ
48. देशोपकारक देश की भलाई के लिए
भावार्थ : यदि देश की भलाई के लिए मुझे हजारों बार मरना पड़े तब भी मैं मृत्यु.
के इस कष्ट पर कभी ध्यान न दूँ। हे ईश्वर मेरा अपने देश भारत में ही जन्म
बार-बार हो और मैं हर बार अपने देश की भलाई के लिए ही अपने प्राण दूँ।
टिप्पणी : शहीद रामप्रसाद बिस्मिल की भगवान से यह प्रार्थना सिद्ध करती है कि
वह महान देशप्रेमी थे। वह देश की स्वतंत्रता व भलाई के लिए एक बार नहीं हजारों
बार जन्म लेना और हजारों बार मरना चाहते थे। रामप्रसाद बिस्मिल की तरह मदन
लाल धींगरा आदि अनेक भारतीय क्रांतिकारियों ने जेलों, अदालतों या फाँसी के तख्तों

116 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
पर इस अनुपम और आदर्श देशप्रेम व बलिदान की भावनाओं को अभिव्यक्त किया
था। ऐसे देशप्रेमी स्वाधीनता सेनानियों के संघर्षों व बलिदानों से ही हमारा प्यारा देश
भारत स्वतंत्र हुआ। भारत के हर नागरिक को अपने हृदय में देशप्रेम व देशसेवा की
भावनाएँ भरनी चाहिए। हम अपने देश की सुरक्षा करके, उसकी एकता को कायम रख
कर और धर्म, सम्प्रदाय या जाति का कोई भेदभाव किए बिना देश की समस्त जनता
की भलाई के लिए कार्य करके ही ऐसा कर सकते हैं।
49. टिप्पणी : शहीद रामप्रसाद बिस्मिल ने अपने प्रिय साथी शहीद अशफाकउल्ला के
कार्यों पर गर्व प्रकट करते हुए देशवासियों से अपील की है कि सभी धर्मों व
संप्रदायों के लोग भेदभाव छोड़ कर और एक होकर देश की स्वतंत्रता के लिए
कार्य करें। वह साईमन कमीशन के विरोध में देश में प्रदर्शित की गई एकता को
आशा भरी निगाहों से देखते हैं और 1927 में मद्रास में होने वाले कांग्रेस के
अधिवेशन से भी आशा रखते हैं।
50. टिप्पणी : रामप्रसाद बिस्मिल के क्रांतिकारी साथियों भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद,
शिव वर्मा आदि ने गुप्त रूप से उन्हें गोरखपुर जेल से भगा ले जाने का प्रयास
किया था परंतु यह प्रयास सफल नहीं हो सका। रामप्रसाद बिस्मिल को जेल में
इस बात की सूचना नहीं मिल पाई थी कि उनके साथी उन्हें जेल से भगा ले
जाने का प्रयास कर रहे हैं।
51. टिप्पणी : शहीद रामप्रसाद बिस्मिल क्रांतिकारी आंदोलन के अपने अनुभवों के
आधार पर देश के नौजवानों को सलाह देते हैं कि वे बम व पिस्तौल से
व्यक्तिगत हत्याएँ करने का मार्ग छोड़ कर पहले जनता को शिक्षित व संगठित करें
और देश की स्वतंत्रता के लिए खुले जन आंदोलनों में शामिल हों। रामप्रसाद
बिस्मिल की तरह रासबिहारी बोस, शचीन्द्र नाथ सान्याल, भगत सिंह तथा अनेक
अन्य क्रांतिकारियों ने जेलों में गहन अध्ययन करके खुले आंदोलन की महत्ता को
स्वीकार किया था। भगतसिंह-युग गुप्त आंदोलन से खुले आंदोलन में संचरण का
युग था। इस अवधि में क्रांतिकारी व्यक्तिगत हत्याओं की रणनीति पूरी तरह छोड़
तो नहीं पाए थे परंतु वे जन आंदोलन; जन संगठन, जन संघर्ष और समाजवाद की
विचारधारा स्वीकार करने की ओर बढ़ रहे थे। ये 'टेरो-सोशलिज्म' (आतंकवाद
समर्थित समाजवाद) की विचारधारा अपनाए हुए थे।