रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें114 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
16. सिजदे करना शीश नवाना
17. जल्लाद तलवार से गर्दन काटने वाला
भावार्थ : हम अपनी निष्ठा के लिए अपना बलिदान करने वाले हैं। हमारा धर्म
सारी दुनिया से अलग है। हमें जिससे प्यार है, हम उसी के पाँव पर शीश नवाते हैं
ताकि उसे हमारी गर्दन पर तलवार चलाने में कठिनाई न हो।
18. असगर यह कवि का उपनाम है
19. हरीम मस्जिद
20. इश्क प्रेम
21. हस्ती व्यक्तित्व
22. जुर्म अन्याय
भावार्थ : रामप्रसाद बिस्मिल किसी और कवि असगर के हवाले से कहते हैं कि
प्रेम के पवित्र स्थल में अपने अस्तित्व का अहं ही अपराध है। यहाँ पाँव रखना हो तो
कंधे पर सिर नहीं होना चाहिए।
भावार्थ : यहाँ मनुष्य कहता है कि हे भगवान जो भी कार्य हुए हैं वह सब आपने
किए हैं। मैंने कुछ भी नहीं किया है। जहाँ भी मैंने कोई कार्य किए हैं उनके सम्पन्न
होने का कारण यह है कि आप ही मेरे हृदय में बसे थे।
23. महसूस करना अनुभव करना
24. बादे हवा
25. फना मौत
26. असरार रहस्य
27. बारे बोझ
28. अलम गम
29. रंगे निशात आनन्द का रंग
30. अंदाज पता चल जाना
31. बेहिसी अन्दर से सुन्न हो जाना
32. वफ़ा निष्ठा
33. सदके न्यौछावर
34. नज़रे ज़फा करना तेरे ज़ुल्म पर मैं अपनी बलि देता हूँ
35. लाजिम आवश्यक
36. फ़िदा लुटा देना