सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

Autobiography of Ram Prasad Bismil

पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

पृष्ठ 128, कुल 128 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 128

116 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
पर इस अनुपम और आदर्श देशप्रेम व बलिदान की भावनाओं को अभिव्यक्त किया
था। ऐसे देशप्रेमी स्वाधीनता सेनानियों के संघर्षों व बलिदानों से ही हमारा प्यारा देश
भारत स्वतंत्र हुआ। भारत के हर नागरिक को अपने हृदय में देशप्रेम व देशसेवा की
भावनाएँ भरनी चाहिए। हम अपने देश की सुरक्षा करके, उसकी एकता को कायम रख
कर और धर्म, सम्प्रदाय या जाति का कोई भेदभाव किए बिना देश की समस्त जनता
की भलाई के लिए कार्य करके ही ऐसा कर सकते हैं।
49. टिप्पणी : शहीद रामप्रसाद बिस्मिल ने अपने प्रिय साथी शहीद अशफाकउल्ला के
कार्यों पर गर्व प्रकट करते हुए देशवासियों से अपील की है कि सभी धर्मों व
संप्रदायों के लोग भेदभाव छोड़ कर और एक होकर देश की स्वतंत्रता के लिए
कार्य करें। वह साईमन कमीशन के विरोध में देश में प्रदर्शित की गई एकता को
आशा भरी निगाहों से देखते हैं और 1927 में मद्रास में होने वाले कांग्रेस के
अधिवेशन से भी आशा रखते हैं।
50. टिप्पणी : रामप्रसाद बिस्मिल के क्रांतिकारी साथियों भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद,
शिव वर्मा आदि ने गुप्त रूप से उन्हें गोरखपुर जेल से भगा ले जाने का प्रयास
किया था परंतु यह प्रयास सफल नहीं हो सका। रामप्रसाद बिस्मिल को जेल में
इस बात की सूचना नहीं मिल पाई थी कि उनके साथी उन्हें जेल से भगा ले
जाने का प्रयास कर रहे हैं।
51. टिप्पणी : शहीद रामप्रसाद बिस्मिल क्रांतिकारी आंदोलन के अपने अनुभवों के
आधार पर देश के नौजवानों को सलाह देते हैं कि वे बम व पिस्तौल से
व्यक्तिगत हत्याएँ करने का मार्ग छोड़ कर पहले जनता को शिक्षित व संगठित करें
और देश की स्वतंत्रता के लिए खुले जन आंदोलनों में शामिल हों। रामप्रसाद
बिस्मिल की तरह रासबिहारी बोस, शचीन्द्र नाथ सान्याल, भगत सिंह तथा अनेक
अन्य क्रांतिकारियों ने जेलों में गहन अध्ययन करके खुले आंदोलन की महत्ता को
स्वीकार किया था। भगतसिंह-युग गुप्त आंदोलन से खुले आंदोलन में संचरण का
युग था। इस अवधि में क्रांतिकारी व्यक्तिगत हत्याओं की रणनीति पूरी तरह छोड़
तो नहीं पाए थे परंतु वे जन आंदोलन; जन संगठन, जन संघर्ष और समाजवाद की
विचारधारा स्वीकार करने की ओर बढ़ रहे थे। ये 'टेरो-सोशलिज्म' (आतंकवाद
समर्थित समाजवाद) की विचारधारा अपनाए हुए थे।