रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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झुकाना पड़े, और यदि ऐसा करेंगे तब तो स्वराज्य कुछ दूर नहीं। क्योंकि फिर तो
भारतवासियों को काम करने का पूरा मौका मिल जाएगा। हिन्दू-मुस्लिम एकता ही
हम लोगों की यादगार तथा अंतिम इच्छा है, चाहे वह कितनी कठिनाई से क्यों
न प्राप्त हो। जो मैं कह रहा हूँ वही श्री अशफाकउल्ला खाँ वारसी का भी मत
है, क्योंकि अपील के समय हम दोनों लखनऊ जेल में फाँसी की कोठरियों में
आमने-सामने कई दिन तक रहे थे। आपस में हर तरह की बातें हुई थीं।
गिरफ्तारी के बाद से हम लोगों की सज़ा बढ़ने तक श्री अशफाकउल्ला खाँ की
बड़ी भारी उत्कट इच्छा यही थी कि वह एक बार मुझसे मिल लेते, जो परमात्मा
ने पूरी कर दी।
श्री अशफाकउल्ला खाँ तो अंग्रेजी सरकार से दया-प्रार्थना करने पर राजी ही
न थे। उनका तो अटल विश्वास यही था कि खुदाबंद करीम के अलावा किसी
दूसरे से दया प्रार्थना न करनी चाहिए, परन्तु मेरे विशेष आग्रह से ही उन्होंने
सरकार से दया-प्रार्थना की थी। इसका दोषी मैं ही हूँ, जो मैंने अपने प्रेम के
पवित्र अधिकारों का उपयोग करके श्री अशफाकउल्ला खाँ को उनके दृढ़ निश्चय
से विचलित किया। मैंने एक पत्र द्वारा अपनी भूल स्वीकार करते हुए भ्रातृ-द्वितीया
के अवसर पर गोरखपुर जेल से भी अशफाक को पत्र लिखकर क्षमा-प्रार्थना की
थी। परमात्मा जाने कि वह पत्र उनके हाथों तक पहुँचा भी या नहीं। खैर!
परमात्मा की ऐसी ही इच्छा थी कि हम लोगों को फाँसी दी जाए, भारतवासियों
के जले हुए दिलों पर नमक पड़े, वे बिलबिला उठें और हमारी आत्माएँ उनके
कार्य को देखकर दुखी हों। जब हम नवीन शरीर धारण करके देश-सेवा में योग
देने को उद्यत हों, उस समय तक भारत की राजनैतिक स्थिति पूर्णतया सुधरी हुई
हो। जनसाधारण का अधिक भाग सुशिक्षित हो जाए। ग्रामीण लोग भी अपने
कर्त्तव्य समझने लग जाएँ।
प्रिवी कौंसिल में अपील भिजवाकर मैंने जो व्यर्थ का अपव्यय करवाया,
उसका भी एक विशेष अर्थ था। सब अपीलों का तात्पर्य यह था कि मृत्यु-दंड