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परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

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Vidya Niwas Mishra Collection, Varanasi. Courtesy. Dayanidhi Mishra ji

पुरोवाक्
श्रीविद्या उपासना के तीन मुख्य आकर ग्रन्थ हैं—परशुरामकल्पसूत्र,
प्रपंचसारतन्त्र और सौन्दर्यलहरी। इनमें प्रपंचसारतन्त्र और सौन्दर्यलहरी आद्य
शंकराचार्य की कृतियाँ हैं। परशुरामकल्पसूत्र इनके पूर्व का है। पूरे आकर ग्रन्थों
का विभाजन श्रीविद्यार्णव नामक ग्रन्थ में किया गया है। पूज्य स्वामी करपात्री
जी ने श्रीविद्यार्णव से ही अपने देश-काल के अनुरूप श्रीविद्यारत्नाकर ग्रन्थ की
रचना की और सम्पादन का भार पूज्य श्री सीताराम कविराज 'जी. को दिया।
श्रीविद्यावरिवस्या इसी का लघु रूप है। परशुरामकल्पसूत्र का महत्त्व केवल
श्रीविद्या का आद्य ग्रन्थ होने के कारण ही नहीं है, इसलिए भी है कि इस
विद्या की गुरु. परम्परा में उनका नाम बहुत ऊपर आता है। एक तरह से वे
श्रीविद्या की उपासना की दो धाराओं को वशिष्ठ द्वारा प्रवर्तित और दुर्वासा द्वारा
प्रवर्तित मिलाकर समग्र धारा के प्रवर्तक माने जाते हैं। जिस रूप में यह ग्रन्थ
है, उसकी प्राचीनता में सन्देह कोई करे भी पर परशुराम के द्वारा प्रवर्तन की
बात सभी श्रीविद्या परम्परा के विद्वानों को मान्य है।
परशुरामकल्पसूत्र का सिद्धान्त त्रैपुर सिद्धान्त कहा जाता है। त्रैपुर सिद्धान्त
का अभिप्राय यह है कि सृष्टि, स्थिति, लय; इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति और
क्रियाशक्ति—इन त्रिपुटियों को समेटने वाली त्रिपुर शक्ति है। इसी की अभिव्यक्ति
वामा, ज्येष्ठा और रौद्री रूपों में होती है। इन्हीं को क्रमशः सृष्टि, स्थिति, संहार
भी कह सकते हैं। यही त्रिपुरा शक्ति अपने शुद्ध परात्पर रूप में महात्रिपुरसुन्दरी
शक्ति है। उसी का विलास यह प्रपंच दिखता है, विलीन हो जाता है।
श्रीविद्या साधना मूलतः सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त महाशक्ति की शिव
के साथ समरसता की ही साधना है। जिस तत्त्व की साधना है, वह तत्त्व
शिवशक्त्यैक्य रूप है। सिद्धान्त स्तर पर यह गूढ़ तादात्म्य की ही साधना है।
द्वैत से अन्तर केवल इतना है कि, द्वैत कल्पित होते हुए भी श्रीविद्या साधना
में अद्वैत प्राप्ति के लिए यह आवश्यक है। उपनिषदों में भी यह संकेत है कि,

( २ )
“एकाकी न रमते तदात्मानं व्याकरोत्” अकेले रमना संभव नहीं है, इसलिए
अपने को विभक्त किया। इसलिए यहाँ माया से उद्वेग नहीं है, न माया का
निरसन है, बल्कि माया का अतिक्रमण है। यह अतिक्रमण मायिक मार्गों में
रहते हुए ही होता है। इसलिए अद्वैत में प्रवेश के लिए संसार का त्याग
आवश्यक नहीं है। संसार का संस्कार आवश्यक है। प्रायः यह शंका की जाती
है कि, कैसे दो प्रकार की बातें आदि शंकर कहते हैं। एक ओर संसार का
तिरस्कार, दूसरी ओर संसार का स्वीकार। एक ओर निष्कल परब्रह्म का ध्यान,
दूसरी ओर कामेश्वर-कामेश्वरी के सम्मेलन का ध्यान। पर ध्यान से देखने पर
इसमें विरोध नहीं है। उपासना के लिए द्वैत की परिकल्पना अपरिहार्य है।
उपासना की समाप्ति में समर्पण में द्वैत का भी समर्पण हो जाता है। जो यह
बोध होता है कि, मैं ब्रह्म हूँ, जो कुछ है, वह सब ब्रह्म ही है और यह अनुभव
करने वाला मैं इस ब्रह्म के साथ ऐक्य का अनुभव करने वाला मैं अपने को
आहुति के रूप में सौंप रहा हूँ अर्थात् जिस सर्वात्म भाव का मुझे दर्शन मिला
है, वह दर्शन भी मेरा अकेला न रहे, वह सबका हो जाए। अर्थात् सर्वभाव
का अनुभव करने वाला भी दूसरों को अनुभव हो। इसलिए अपने को अनुभव
की परम्परा में खपा देता है। यही गूढ़ तत्त्व है।
साधक में अहंकार के क्षरण के लिए यह आवश्यक है कि, वह यह अनुभव
करे कि, हमारे पूर्व गुरुओं ने अपने अनुभव को अपने पूर्ववर्ती गुरुओं के अनुभव
के साथ जोड़कर अपने को उसी अनुभव में विलीन कर दिया है। इसलिए मैं
उस कड़ी में जुड़ता हूँ तो स्वयं भी विलीन होने के लिए। इसका उद्देश्य यह
है कि, साधना का अहंकार किसी भी साधक के मन में न रहे। उसको बराबर
अनुभव हो कि, साधना में निरन्तर परिष्कार करते रहने वाली गुरु परम्परा कारक
रही है। जिस प्रकार श्राद्ध करते समय अपने पूर्व की तीन पीढ़ियों को पिण्ड
देते हैं और इसके द्वारा वंश परम्परा की श्रृंखला को अविच्छिन्न रखते हैं, उसी
प्रकार गुरु, परम गुरु (गुरु के गुरु), परमेष्ठि गुरु (गुरु के गुरु के गुरु) इन तीन
गुरुओं की चरण वन्दना की जाती है ताकि विद्या परम्परा की अविच्छिन्नता साधक
तक आए और साधक से उसके आगे जाए। उसका एक यह भी अभिप्राय होता
है कि, पूर्व अनुभवों के साथ जुड़ने पर अपना अनुभव बड़ा भी हो जाता है
और अहंकार का विसर्जन भी होता है।

( ३ )
गुरु पूजा के साथ-साथ ही गणपति पूजा श्रीविद्या का आवश्यक अंग
है। गणपति समष्टि के देवता हैं। समष्टि के साथ जुड़ करके पूजना सम्यक्
पूजा होती है। पाँच तत्त्वों में पृथ्वी तत्त्व के अधिष्ठाता देवता गणपति होते
हैं। इसलिए भी उनकी आराधना की जाती है। उसके साधक का पार्थिव तत्त्व
से सम्बन्ध रहे। इसी पार्थिव तत्त्व को ऊपर उठाना श्रीविद्या का लक्ष्य है।
श्रीविद्या उपासना के चार सोपान हैं— श्रीक्रम, श्यामाक्रम, वाराही-क्रम और
पराक्रम। श्रीक्रम महात्रिपुरसुन्दरी की उपासना है। श्यामा-क्रम मातंगी या श्यामला
की उपासना है। वाराही-क्रम महात्रिपुरसुन्दरी की दंडिनी दण्डनायक/सेनानायक/
सचिव वाराही शक्ति की उपासना है। पराक्रम अव्यक्त महाशक्ति की
उपासना है।
परशुरामकल्पसूत्र में सभी उपासनाओं का प्रतिपादन है। उसके साथ ही
साथ संक्षेप में सिद्धान्त का भी है। सिद्धान्त पक्ष बहुत स्पष्ट है। विश्व ३६
तत्त्वों वाला है। ये ३६ तत्त्व हैं— शुद्धविद्या, सदाशिव या परमशिव, सांख्य
के तत्त्व प्रकृति, अहंकार, बुद्धि, मन, पंचतन्मात्रा, पंचमहाभूत, दस इन्द्रिय=२४
और पुरुष को लेकर पच्चीस। इनके अतिरिक्त पंच कंचुक कला, अविद्या, राग,
काल, नियति और शिव-शक्ति, सदाशिव, ईश्वर, विद्या और जीव। स्वविमर्श
ही पुरुषार्थ है। वर्णात्मक शब्द नित्य है। मन्त्रों में अचिन्त्य अपार शक्ति है।
सर्वसिद्धि सम्प्रदाय के अनुसार साधना से और विश्वास से प्राप्त होती है। विश्वास
ही प्रमाण है। गुरु मन्त्र, देवता और अपने प्राण की एकता के साधन से
आत्मज्ञान होता है। भावना की दृढ़ता से शक्ति की सिद्धि होती है।
साधना के नियमों में कुछ नियम बहुत आवश्यक हैं। किसी भी दर्शन
की निन्दा नहीं करें। किसी की भी अवहेलना न करें। रहस्य केवल अपने शिष्य
को बतलाएँ। विद्या के साथ अर्थात् अपने मन्त्र के साथ निरन्तर जुड़ाव बनाए
रखें। निरन्तर अपने भीतर शिवता है यह अनुभव करते रहें। काम, क्रोध, लोभ,
मोह, मद, मत्सर, हिंसा, स्तेय, लोक-विद्वेष से बचें। संशयरहित होकर एक
गुरु की ही उपासना करें। परिग्रह त्याग करते रहें, निष्काम कर्म करते रहें।
नित्य कर्म करें अनित्य को छोड़ दें। निर्भय रहें। समस्त सिद्धान्तों का निचोड़
देते हुए परशुरामकल्पसूत्र में कहा गया है कि, यह मानकर के आचरण करें
कि, जितने भी पदार्थ ज्ञेय हैं, वे हव्य हैं, इन्द्रियाँ स्वाहा हैं। शक्तियाँ ज्वाला

( ४ )
हैं। अपने भीतर रहने वाले शिव अग्नि हैं। स्वयं ही साधक होता है। यह इस
प्रकार का ज्ञान निरन्तर हो रहा है। इस यज्ञ का फल है विषयरहित चित् तत्त्व
का विमर्श। इस आत्मलाभ से बढ़कर कोई अन्य लाभ नहीं है।
इस सिद्धान्त की पीठिका देने के बाद परशुरामकल्पसूत्र में दीक्षा का क्रम
आया है। दीक्षा लिए बिना कोई इस विद्या का अधिकारी नहीं रहता है। गुरु
दीक्षा देने के पहले शिष्य की परीक्षा लेता है और उसके बाद उसका मुख
बाँध देता है। उसे सिद्धान्त पक्ष पहले सुनाकर समझाता है। इसके बाद परीक्षा
देता है। दीक्षा के बाद ऊपर लिखित पाँचों क्रमों की पूजा का विधान है।
परशुरामकल्पसूत्र में पंच मकार का विधान है पर साथ ही साथ चेतावनी है
कि, यह अप्रकाश्य है। यदि इसको प्रकट किया गया, तो अगति होगी। एक
प्रकार से व्यवहार की दृष्टि से यह चेतावनी निषेध ही है। इसीलिए श्रीमद् आदि
शंकराचार्य द्वारा प्रवर्तित श्रीविद्या उपासना क्रम में पंच मकारों के पाँच अनुकल्पों
से ही काम चलाया जाता है और जिन-जिन तत्त्वों के ये मकार बोधक हैं उनकी
भावना की जाती है। वस्तुतः ये तत्त्व भी किसी न किसी आभ्यन्तर क्रिया के
प्रतीक मात्र हैं।
परशुरामकल्पसूत्र सूत्रात्मक ग्रन्थ है। इसमें बहुत-सी बातें खोलकर नहीं
कही गयी हैं। उस पर कई टीकाएँ उपलब्ध हैं। प्रस्तुत ग्रन्थ की रामेश्वर झा
की टीका जो अनावश्यक रूप से विस्तृत का संक्षेप करके उसके अनुसार और
अंशतः शास्त्र की परंपरा के अनुसार पं. परमहंस मिश्र ने व्याख्या की है।
इस व्याख्या के कारण यह ग्रन्थ बहुत सुगम हो गया है। यह एक प्रकार से
प्रथम समग्र हिन्दी व्याख्या है। मिश्र जी स्वयं न केवल तन्त्रशास्त्र के अध्येता
हैं बल्कि एक नैष्ठिक साधक भी हैं। इसलिए मैंने उन्हें व्याख्या के लिए प्रेरित
किया। वे तन्त्रालोक पर विस्तृत व्याख्या लिख चुके हैं। वे सर्वथा अधिकारी
हैं, इसीलिए मैंने उनसे अनुरोध किया था। उन्होंने बड़ी तत्परता से इस काम
को सम्पन्न किया। इसके लिए वे जिज्ञासु पंडित समाज के बधाई के पात्र हैं।
श्रीविद्या उपासना बाह्य अर्चन नहीं है। बाह्य अर्चन को सोपान बनाकर
आभ्यन्तर अर्चन में प्रवेश पर ही विशेष बल दिया जाता है। श्रीविद्या का तात्पर्य
ही यह है कि, सर्वमय होकर सर्वात्मिका पराशक्ति की अपने भीतर भावना करे
और इस भावना के द्वारा समस्त ब्रह्माण्ड में समरसता का विकिरण करे।

(५)
इसीलिए इसके आचार में किसी मत की निन्दा, छोटे से छोटे व्यक्ति या पदार्थ
की अवहेलना विशेष रूप से वर्जित है। विशेष करके स्त्री मात्र को आदर देना
और यह सब इसी का सूचक है कि, श्रीविद्या विरोधों के उपशम का अभ्यास
है और जीवन को स्वीकार बनाने का अभ्यास है। बाह्य पूजा इसलिए आवश्यक
है कि, इसके अभ्यास से बाह्य संसार का दिव्य रूपान्तरण होता रहता है। यह
भावना करना कि, समस्त पदार्थ चिन्मय हैं। वस्तु को वस्तु मात्र नहीं रहने
देती और साधक के मन में जैसा भी संसार है, उसको स्वीकार करते हुए उसको
चिन्मय बनाने के लिए प्रेरित करती है। यह अपने आप में इस विद्या की सबसे
बड़ी विशेषता है। इसके भीतर जैसे-जैसे प्रवेश करते हैं, त्यों त्यों अपार परितोष
का अनुभव होने लगता है। इसके साथ ही साथ विभिन्न प्रकार के यन्त्रों की
रचना से एक आध्यात्मिक राग-बोध होता है। यह राग-बोध अर्चन के क्रम
में अर्चन सामग्री की तैयारी में और अर्चन के अन्त में एकाग्र होकर जल में
और अन्त में इन सबके समर्पण में परिलक्षित होता है। परशुरामकल्पसूत्र
शिवशक्त्यैक्यरूपिणी भगवती ललिता महात्रिपुरसुन्दरी की उपासना का आधार
ग्रन्थ है। मुझे विश्वास है कि, परशुरामकल्पसूत्र की आचार्य पं. परमहंस मिश्र
द्वारा प्रस्तुत व्याख्या विद्या-प्रेमियों के लिए बड़ी उपकारक होगी।
श्रीविद्या के उपासकों से अपेक्षा की जाती है कि, वे अपने आचरण में
सर्वात्म भाव का ही परिचय दें और भगवती की उपासना इस बुद्धि से करें
कि, इस उपासना के फल के सभी साझेदार हों। वे चाहे उपासना करते हों,
न करते हों या उसका विरोध करते हों। पर सभी प्रपंच के अंग में और सब
में उस शक्ति की व्यापकता की अनुभूति हो। इसीलिए उपासना की जाती है।
यह अपने आप में परम सुख है। अपने आप में परामुक्ति है।
अन्त में वरिवस्या, सपर्या, पूजा और अर्चना इन चार शब्दों पर थोड़ा
विचार देना आवश्यक समझता हूँ। वरिवस्या शब्द का प्रयोग तान्त्रिक साधना
में विशेष रूप से हुआ है। वेदों में वरिवस का अर्थ है खुला स्थान, अवकाश,
ऐसा स्थान जो ठीक-ठाक करके किसी के लिए तैयार किया गया हो। उससे
नामधातु बनायेंगे तो उसका अर्थ यह होगा कि, अपने इष्ट के लिए स्थान
बनाना। उनको प्रतिष्ठित करने के लिए उचित आसन् देना। तान्त्रिक पूजा की
विशेषता यही है कि वहाँ पहले पूजा सामग्री के लिए, पूजा पात्र के लिए,

( ६ )
देवता के लिए स्थान बनाना होता है। जड़ता के वितान में कहीं एक चिन्मय
स्थान बनाना। पूजा का अभिप्राय ही यह है कि, चिन्मय पदार्थों से चिन्मयी
की पूजा हो। अपने शरीर के प्रत्येक अवयव को चिन्मय बनाना होता है
क्योंकि शरीर का प्रत्येक अवयव तभी अर्पणीय होता है जब देवी से एकाकार
हो जाए। सपर्या शब्द दूसरा है। यह सत्कार मात्र के लिए प्रयुक्त होता है।
इसकी व्युत्पत्ति तो नहीं मिलती लेकिन मेरे अनुभव से संस्कृत में विरल धातु
है स्पृणाति। उससे स्पर् या सपर निकला हो और उससे यह शब्द बना हो,
सपर्या। अथवा इसका अर्थ भी उच्छ्वसित होना है, उच्छ्वसित करना है।
किसी भी व्यक्ति या इष्ट के सत्कार के लिए उमगना और उस व्यक्ति या इष्ट
देवता का उमंग के वातावरण में आहूत करना सपर्या है। सपर्या का एक अर्थ
तैयारी भी है, जो लोक-भाषा के सपरने अर्थ में आज भी जीवित है। तीसरा
शब्द है पूजा। यह प्रत्यक्ष या कल्पना में ध्यात द्रव्यों का इष्ट देवता के लिए
निवेदन करना है। यह सत्कार का पूरक है। अर्चना इसी अनुभाव्य रूप की
होती है। चाहे श्रीचक्र हो, मूर्ति हो। इसीलिए अर्चा का एक अर्थ विग्रह भी
होता है। इसका अर्थ किसी मूर्ति या किसी यन्त्र पर कुछ चढ़ाना भी होता
है। इतनी बात मैंने केवल सूचना देने के लिए जोड़ी है क्योंकि प्रायः इन शब्दों
के सूक्ष्म भेद की चर्चा नहीं मिलती। परशुरामकल्पसूत्र का यह संस्करण
प्रकाशित हो रहा हैं इससे मुझे बहुत परितोष है और इसलिए मैं पण्डित जी
को हार्दिक साधुवाद देता हूँ।
विद्यानिवास मिश्र

श्रीविद्योपासनाविमर्श

समस्त आगमों में श्रीविद्या का प्राधान्य पूर्णरूप से स्वीकृत है। वेदविद्या
में विज्ञ विचक्षण विद्वानों की तो यह मान्यता ही है कि, वेदमाता गायत्री भी
श्रीविद्या की अंश मात्र हैं। गायत्री ब्रह्मविद्यारूपिणी है। श्रीविद्या की पञ्चदशी विद्या
से ब्रह्मविद्या का पूर्णतया प्रतिपादन हो जाता है। श्रीविद्यारत्नाकर में श्री करपात्री
जी महाराज ने पंचदशी और गायत्री मन्त्र की एकता का ही प्रतिपादन किया
है। इससे यह भी सिद्ध हो रहा है कि, श्रीविद्योपासक की गायत्री उपासना भी
श्रीविद्या साधना में साथ-साथ सम्पन्न हो रही है, यह इन दोनों के इस शाश्वत
सम्बन्ध का रहस्य है।
इस दृष्टि से यह भी कहा जा सकता है कि, वेदमाता गायत्री की उपासना
के प्रभाव से आगमोक्त श्रीविद्या में प्रवृत्ति होने के कारण वेद और आगमिक
ज्ञान का एकाधिकरण सम्बन्ध उपासना पर ही आधृत है और दोनों वेद और
आगम को परस्पर एक सूत्र में बाँधने वाली विद्यायें हैं।
यही बात वरिवस्यारहस्य और त्रिपुरातापिन्युपनिषत् से भी प्रमाणित होती
है। वरिवस्यारहस्य में यह स्पष्ट उल्लेख है कि, “व्यवहरति न तु प्रकटं यां
विद्यां वेदपुरुषोऽपि (१।८) इति चतुष्पदा गायत्र्याः आवृत्तित्रयं श्रीविद्याकूट-
त्रयसकृत्पठनतुल्यम्”। श्रीत्रिपुरातापिनी में भी कहा गया है कि, ‘चतुष्पदा गायत्री
मन्त्र को तीन बार लिख देने से श्रीविद्या (पञ्चदशी) के तीनों कूटों का उद्धार
हो जाता है। इसलिये आगम-निगम में परस्पर विरोध की बात सोचना ऐक्य
दृष्टि के नितान्त विरुद्ध है।
मनुष्य मात्र का इस विद्या की उपासना का अधिकार भी इसी उद्देश्य
से दिया गया है कि, इसकी उपासना करने वाला भी ब्राह्मण हो जाये। गन्धर्वतन्त्र
में कहा गया है कि, नारी, शूद्र, व्रात्य आदि भी इसकी उपासना से ब्राह्मण
हो जाते हैं।

( ८ )
'त्रिपुरसुन्दरि विद्महे, कामेश्वरि धीमहि, तन्नः क्लिन्ने प्रचोदयात्' यह
महामन्त्र श्रीविद्या गायत्री मन्त्र है। इसमें श्रीविद्या, कामराज विद्या और गायत्री
का महामिलन शाक्त उल्लास का ही प्रतिपादक है। श्रीविद्या में दीक्षित होने वाला
भी 'ब्रह्माधीते ब्रह्म वेद वा' इस दृष्टि से, घृणा, शङ्का, भय, लज्जा, जुगुप्सा,
कुल, शील और जातिरूप आठ पाशों से मुक्त होकर पाशमुक्त ब्राह्मण ही माना
जाता है। ये सारी बातें गन्धर्व आदि विभिन्न तन्त्रों में प्रतिपादित हैं।
श्रीविद्योपासना का अधिकार दीक्षा के उपरान्त ही प्राप्त होता है। श्रीविद्या
की उपासना के प्रारम्भ में जो दीक्षा दी जाती है, वह एक प्रकार की क्रिया-
दीक्षा ही मानी जाती है। इसके अतिरिक्त प्रातःकालिक नित्य, नैमित्तिक और
काम्य कर्मों का सम्पादन इसमें अनिवार्य रूप से करणीय माना जाता है।
श्रीमद्भास्कराचार्य का यही उपदेश है कि, श्रीविद्या सम्प्रदाय की दीक्षा क्रियादीक्षा
मानी जानी चाहिये। जहाँ तक न्यास का प्रश्न है, कल्पसूत्र में षोढा न्यास को
ही महत्त्व दिया गया है। अन्य न्यास वैकल्पिक माने गये हैं। सभी लघुषोढा,
महाषोढा, शक्तिषोढा आदि षोढा न्यास और पंचवाहादि न्यास पूर्णतया समर्पित
उपासक के लिये हैं, जिसका सारा समय माँ के लिये ही अर्पित है।
क्रियायोग के अन्तर्गत पूरी चक्र-साधना द्वारा प्राणापानवाह को तालुरन्ध्र
से होते हुए ब्रह्मरन्ध्र में समाहित कर परा शक्ति से तादात्म्य स्थापित करना
भी अन्तर्निहित है। इसमें मानसिक सक्रियता का सद्भाव पूर्णतया अपेक्षित है।
यह विशिष्ट योग मानस क्रियायोग का ही उपक्रम है। परशुरामकल्पसूत्र में इसका
महत्त्व प्रतिपादित किया गया है। श्रीविद्योपासक से यह आशा की जाती है कि,
वह अध्यात्म के परम उत्कर्ष का महान् अध्यवसाय सम्पन्न करे, इसके
उत्तरदायित्वपूर्ण समय और चर्या का पालन करते हुए समाज के चरित्र में
पावनतामयी चर्या का चमत्कार भर दे। स्वात्म को शैवसद्भाव समाहित कर दे।
यही उपासना का उद्देश्य है। आन्तर पूजा का महान् महत्त्व है फिर भी
बाह्य पूजा की उपेक्षा नहीं की जा सकती। उपास्य देवता का अर्चन तद्विषयक
परानुराग पर ही निर्भर होता है। एतद्विषय-सम्बन्धिनी क्रिया की प्रेरिका
परमरहस्यरूपा परमाम्बा ही है। उसी की प्रेरणा से आन्तर और बाह्य सभी पुलकित
होता है। आन्तर पुलक में रहस्य साधनामयी आन्तर पूजा और बाह्य पुलक में
बाह्य पूजा का परमानन्द होता है। यह बाह्य उल्लास भी आन्तर रहस्यरूपता का

( ९ )

ही उन्मेषोल्लास है। सारा विश्व ही शैव-शाक्त उल्लास का साक्षात्कार है। सारी
वस्तुराशि शिवमयी है। अतएव वस्तु मात्र में परमशुद्धि का आधान है।
इसी दृष्टि से पूजा द्रव्यों का आकलन किया जाता है।गहन अनुराग से
आरक्त उपासक जिन द्रव्यों का अर्पण करता है, उनके माध्यम से उसकी आस्था
ही अर्पित होती है, उसकी श्रद्धा ही कुसुमावली बनकर खिल जाती है और
माँ के चरणों में चढ़ाई जाती है। वह स्वयं इस शरीर कुसुम का भी अर्पण
करता है। सहस्रदलकमलरूप शिर का अर्पण और कमलरूप आँख के अर्पण
की कथायें भक्तों में प्रसिद्ध हैं।
इसी क्रम में परशुरामकल्पसूत्र में पञ्चमकार पूजा भी स्वीकृत की गयी
है। मद्य को आदिम द्रव्य माना गया है।
श्रीतन्त्रालोक नामक अखिल आगमोपनिषद् रूप शास्त्र में मद्य के विषय
में स्पष्ट उल्लेख है कि,
मद्यस्नाने साधकेन्द्रो मुमुक्षुः केवली भवेत् ।
यतः शिवमयं मद्यं सर्वे मन्त्राः शिवोद्भवाः ।।
शिवशक्त्योर्न भेदोऽस्ति शक्त्युत्थास्तु मरीचयः ।
तासामानन्दजनकं मद्यं शिवमयं ततः ।।
(श्रीतन्त्रालोक, भाग ५, १५।७३-७४)
यही तथ्य श्रीमत्त्रैशिरस् शास्त्र में भी प्रतिपादित है। इसके विषय की
चर्चा भी शास्त्रों में है। जो भी हो द्रव्य-पूजात्मक बाह्य-पूजा का भी श्रीविद्या
साधना में अतिशय महत्त्व स्वीकृत है। किसी तरह परमोपास्या के पदारविन्द
में मकरन्द बनकर समाहित होना ही उपासना होती है। उपासना के अंगभूत
शरीर, वाणी, मन और स्थूल धूप, दीप, नैवेद्यादि द्वारा सम्पन्न क्रियाओं के
माध्यम से उपासक उपास्य की अनुग्राहिका शक्ति से अन्तर्बाह्य व्याप्ति से कृतार्थ
होना चाहता है। यही उपासना का रहस्य है।
श्रीविद्या की उपासना में पञ्चदशी और षोडशी विद्याओं की दीक्षा गुरुदेव
से योग्यता के अनुसार प्राप्त होती है। लोपामुद्रा और कामराज विद्याओं का
ही यह सारा उपक्रम है। इसमें एक क्रम निर्धारित है। इसी क्रम से उपासना

की जानी चाहिये। परशुरामकल्पसूत्र और दत्तात्रेयसंहिता इसके मौलिक ग्रन्थ हैं।
नित्याषोडशिकार्णव, योगिनीहृदय, त्रिपुरारहस्य, त्रिपुरार्णवतन्त्र, श्रीविद्यारत्नाकर
आदि इस विद्या साधना के प्रामाणिक ग्रन्थ हैं। इनके स्वाध्याय से उपासना के
अनन्त रहस्यों का उद्घाटन हो सकता है।
श्रीचक्र में जो पूजा की जाती है, वह कामेश्वर और कामेश्वरी की सह-
पूजा है। एक के बिना एक की पूजा नहीं होती। इसमें शैवागम और शाक्तागम
का एकत्र समन्वय है। इसलिये यह सर्वसुलभ, सर्वग्राह्य और सर्वफलप्रद पूजा
मानी जाती है। इसके मूलमन्त्र में समस्त शैव, रौद्र, भैरव, कालीकुल, त्रिक
आदि मन्त्रों का रहस्य ग्रथित है।
त्रैपुरसिद्धान्त की सारी रहस्यवादिता श्रीविद्योपासना में निहित है। इसमें
उपासकों की भक्ति और श्रद्धा के अनुसार द्वैत, द्वैताद्वैत और अद्वैतमूलक त्रिविध
उपासना विहित है। त्रिक में यही अपरा, परापरा और परा पूजा रूप त्रैविध्य
स्वीकृत है।
पराविद्या और श्रीविद्या का ऐकात्म्य सर्वमान्य है। इस दृष्टि से
त्रिकसिद्धान्त और त्रैपुरसिद्धान्त अद्वैतमूलक श्रेणी में समान स्तर पर पूज्य और
मान्य हैं। श्रीचक्र में सारी विद्याओं की पूजा हो जाती है। यहाँ तक कि,
अधराम्नाय की कुंडलिनी देवता भी श्रीचक्र पूजा में गृहीत होती है।
आज्ञा गुरूणाम्
'आज्ञा गुरूणामविचारणीया' इस सिद्धान्त के अनुसार मैंने पद्मभूषण
प्रो. विद्यानिवास मिश्र के स्नेहपूर्ण आदेश का पालन किया है। उन्होंने कहा
था—यह ग्रन्थ इस समय अनुपलब्ध है। इसका प्रकाशन होना चाहिये। श्रीविद्या-
साधना का प्रतिपादक यह महोपनिषद् श्रीविद्या के उपासकों को मिले, वे इसे
पढें और इस आर्ष परम्परा की प्रामाणिकता का अनुभव करें, यह आवश्यक
है। उन्होंने बडौदा विश्वविद्यालय से प्राप्त की गयी छायाप्रति दी और कहा कि,
सम्पूर्ण लिख जाओ। इसका अर्थ भी साथ में होना चाहिये।
इस तरह मैंने दोहरा कार्य करने की इस उत्तरदायित्वपूर्ण सक्रियता का
संकल्प आज पूरा किया है। सूत्र लिखे गये, उनकी वृत्ति लिखी गयी और उनका
अर्थ भी साथ ही साथ पूरा किया गया। हाँ, वृत्ति लिखने की प्रक्रिया में जहाँ

( ११ )
मात्र पाण्डित्य प्रदर्शन था, उसका संक्षेप कर एवं जितने से सूत्रार्थ का पूरा
सन्दर्भ स्पष्ट हो जाय उतना अंश ही लिखा गया। इसीलिये इसे मुख्यांश वृत्ति
कह सकते हैं। किसी सूत्र की वृत्ति छोड़ी नहीं गयी है, पूरी की पूरी दी गयी
है। केवल पाठकों की सुविधा के लिये और अनावश्यक विस्तार से बचने के
लिये ऐसा किया गया है। स्वर्ग के वातायन से झाँकते हुए और अदृश्य अनुग्रह
से आत्मसात् करते हुए पण्डित रामेश्वर ने इसके लिये मुझे क्षमा कर दिया
है, यह विश्वास है।
श्रीतन्त्रालोक के नीर-क्षीर-विवेक भाष्य के लेखन के साथ इसे भी पूरा
करता रहा हूँ। इसमें अवश्य ही मैं उतनी दत्तचित्तता नहीं अपना पाया, जितनी
होनी चाहिये थी। कहीं-कहीं कुछ समीक्षा भी प्रसङ्गतः आ गयी है और सूत्रवृत्ति
लेखन के कार्य को पूरा करने में मेरी आन्तरिकता में कभी उद्विग्नता की झलक
भी दीखती थी, पर मैं यह सोचता था कि, "माँ 'पराम्बा' ने इस कार्य में
भी मुझे माध्यम बनाया है। इस आदेश पालन का यही रहस्य है"। तब यह
कार्य मेरे लिये परमकरणीय बन गया।
आज यह महत्त्वपूर्ण कार्य पूरा हुआ। एक श्लोक है—
जगच्चित्रं समालिख्य स्वात्मतूलिकयात्मनि ।
स्वयमेव तदालोक्य प्रीणाति परमेश्वरः ।।
इसके अनुसार परमेश्वर इस कार्य से प्रसन्न हो रहे हैं। परमहंस भी प्रसन्न
है। गुरुजनों का आशीर्वाद है। इस आन्तरिक सोच के सन्दर्भ में मैं यह कृति
पद्मभूषण प्रो. विद्यानिवास मिश्र जी के करकमलों में ही अर्पित कर रहा हूँ।
श्रीविद्या के ये अनन्य उपासक हैं। इनके हाथों में अर्पित यह पुष्प माँ के चरणों
में ही अर्पित हो रहा है, इसका मैं अनुभव कर रहा हूँ।
अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त दार्शनिक प्रो. राममूर्ति शर्मा कुलपति,
सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी को इस नवप्रकाशन के प्रकाशपूर्ण
प्रसङ्ग में स्नेहपूर्ण आशीर्वाद दे रहा हूँ। इनकी रोचिष्णु रोचना से इसकी चारुता
में चमत्कार घटित हो गया है।
आचार्यप्रवर वैयाकरणशिरोमणि डॉ. हरिश्चन्द्र मणि त्रिपाठी, निदेशक,
प्रकाशन-संस्थान, सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी का मैं विशेष

( १२ )
आभारी हूँ। बड़ौदा विश्वविद्यालय, बड़ौदा से प्रकाशित परशुरामकल्पसूत्र की
छायाप्रति इन्हीं की है, जिससे यह सम्पादन-कार्य मैंने किया है। श्रीविद्या के
अनुराग से आरक्त अन्तर्दृष्टि से विशिष्ट, इष्ट-कर्मनिष्ठ, कर्मण्यता के प्रतीक पुरुष
की पुष्टि पुष्कर-विष्टरा त्रिविष्टपवन्दनीया माँ महालक्ष्मी करें, यही प्रार्थना है।
इसी सन्दर्भ में श्री अनूप कुमार नागर, संचालक, श्रीजी कम्प्यूटर
प्रिन्टर्स, नाटी इमली, वाराणसी को मैं अपना विशेष हार्दक्य अर्पित कर रहा
हूँ। आपके विशिष्ट मनोयोगपूर्वक मुद्रण-प्रक्रिया के द्वारा इस महान् ग्रन्थ का
प्रकाशन एक सुखद अनुभव है। मैं इनके उत्कर्ष की कामना करता हूँ।
विदुषामनुचरः
परमहंसमिश्रः
शुद्ध-ज्येष्ठ शुक्लषष्ठी, २०५६ ए. ३६, बादशाहबाग
वाराणसी

श्रीपरशुरामकल्पसूत्रम्
विषयानुक्रमणी
पृष्ठ-संख्या
प्रस्तावना १-२
पुरोवाक् ३-८
श्रीविद्योपासनाविमर्श ९-१४
प्रथमः खण्डः दीक्षाविधिः १-४६
क्रम सं. सूत्राङ्क विषयक्रम
१ १ प्रतिज्ञा १
२ २ पञ्चमुखों से पञ्चाम्नाय प्रवर्त्तन १-३
३ ३ सिद्धान्त सूचना ३
४ ४ सिद्धान्त प्रवर्त्तक सूत्र ३-७
५ ५ शिव और जीव-परिभाषा ७-८
६ ६ पुरुषार्थ परिभाषा ८-९
७ ७ शब्द परिभाषा ९-१०
८ ८ मन्त्रशक्ति १०
९ ९ सर्वसिद्धि के साधन १०-१२
१० १० प्रामाण्य १२-१३
११ ११ अन्तरात्मवित्ति के उपाय १३-१४
१२ १२ आनन्द का स्वरूप, देह में आनन्द का
अवस्थान, पञ्चमकार, इनसे अर्चन का विधान १४-१५
१३ १३ उपासकधर्म-आज्ञासिद्धि १५-१६

( १४ )
१४ १४ दर्शननिन्दा का निषेध १६-१७
१५ १५ शास्त्रविरुद्ध गुरुवचन भी अमान्य १७
१६ १६ सत्यनिष्ठ शिष्य को रहस्यकथन का निर्देश १७-१८
१७ १७ उपास्य विद्या का नित्य अनुसन्धान आवश्यक १८-१९
१८ १८ सतत शिवता का समावेश आवश्यक १९-२०
१९ १९ क्रोध, काम आदि लोकविरुद्ध आचरण
का निषेध २०-२१
२० २० एक गुरु की उपासना का निर्देश २१-२२
२१ २१ निष्परिग्रहता धर्म २३
२२ २२ फलाकांक्षारहित कर्म करने का निर्देश २३-२४
२३ २३ नित्यकर्म लोप अनुचित २४
२४ २४ पञ्चमकार के अभाव में भी क्रम का
पालन अनिवार्य २४-२५
२५ २५ सर्वत्र निर्भयता का उपदेश २५
२६ २६ सारभूतधर्म-वेद्य ही हव्य, इन्द्रियाँ स्रुक्
शक्ति ज्वाला, स्वात्मा ही शिव, स्वयं होता २५-२६
२७ २७ निर्विषय चिद्विमर्श ही फल २६-२७
२८ २८ आत्मलाभ सर्वोत्कृष्ट फल, इससे
बढ़कर कुछ नहीं २७
२९ २९ शास्त्रशैली २७-२८
३० ३० स्वशास्त्र प्रशंसा (गुप्त विद्या) २८-२९
३१ ३१ दीक्षा अनिवार्यतः आवश्यक २९-३०
३२ ३२ तीन प्रकार की दीक्षाएँ ३०-३१
३३ ३३ दीक्षा क्रमिक रूप से सभी या एक ही
आवश्यक वैमत्य का उल्लेख ३१
३४ ३४ गुरुद्वारा दीक्षा की प्रक्रिया ३२-३४
३५ ३५ शाम्भवी दीक्षा ३४-३५

( १५ )
३६ ३६ शाक्ती दीक्षा ३५-३७
३७ ३७ मान्त्री दीक्षा ३७-३९
३८ ३८ मातृका यन्त्र ३९-४१
३९ ३९ मान्त्री दीक्षा का उपसंहार ४१-४२
४० ४० गुरुकर्तृक शेष कर्म का निर्देश ४२-४३
४१ ४१ गुरुपादुका मन्त्र ४३-४४
४२ ४२ आचारानुशासन सन्दर्भ में शिष्य के प्रति
कर्त्तव्य का निर्देश ४४
४३ ४३ शिष्य का कर्त्तव्य ४५-४६
द्वितीयः खण्डः महागणपति-क्रमः ४७-६५
४४ १ गणपति उपासना पद्धति का परामर्श ४७-४८
४५ २ श्रीगणपति उपासना प्रकार ४८-५१
४६ ३ देवतर्पण का उपदेश ५१-५३
४७ ४ पूजाविधि ५३-५५
४८ ५ अर्घ्यस्थापन विधि ५५-५७
४९ ६ करणीय कार्य ५७-५८
५० ७ पीठनियमपूर्वक यन्त्रोद्धार ५८-६०
५१ ८ प्रधान एवं सह मिथुन देवतर्पण ६०-६२
५२ ९ गणपति उपतर्पण और जप आदि ६२-६३
५३ १० गणपति के स्वात्मविलापन के सन्दर्भ में
हवन आदि का विधान ६३-६५
तृतीयः खण्डः श्रीक्रमः श्रीललिताधिकारः ६६-९७
५४ १ शक्ति चक्रैक नायिका श्रीललिता का क्रमारम्भ ६६-६८
५५ २ ब्राह्ममुहूर्त्त में जागकर परमशिवरूप
गुरुदेव का स्मरण ६८-६९

( १६ )
५६ ३ मूलाधार से ब्रह्मरन्ध्र पर्यन्त स्वात्मसंविद्
भगवती का ध्यान और कादि या हादि
विद्या का दश बार आवर्त्तन ६९-७०
५७ ४ स्नान विधि और मार्त्तण्डभैरव सूर्य को
अर्घ्य का विधान ७०-७१
५८ ५ श्रीचक्र भावन, त्रिपुरसुन्दरी गायत्री से उसे भी
अर्घ्य देकर १०८ बार जप, मौन का निर्देश ७१-७२
५९ ६ यागमन्दिर प्रवेश, आसन ग्रहण ७२
६० ७ त्रितारी का उच्चारण कर पुष्पाञ्जलि ७२-७३
६१ ८ सभी मन्त्रों के आदि में त्रितारी प्रयोग का
निर्देश एवं त्रितारी का कथन ७३-७४
६२ ९ श्रीचक्र का स्वरूप, चक्र रचना के साधक द्रव्य ७४-७६
६३ १० चक्र में मन्दिराद्यर्चन क्रम ७६-७८
६४ ११ गन्धपुष्पाक्षतादि स्थान, दीपदान, मूल से
चक्र की अर्च्चा का निर्देश ७८-७९
६५ १२ बीजों के प्रयोगपूर्वक प्राणायाम से शोषण,
दहन और आप्लावन का विधान ७९
६६ १३ तीन प्राणायाम का निर्देश ७९
६७ १४ देव्यहंभावयुक्त वज्रकवचप्रयोग ८०
६८ १५ सर्वप्रथम करशुद्धिन्यास का निर्देश ८०-८१
६९ १६ आत्मरक्षा न्यास ८१
७० १७ चतुरासन न्यास की दिव्यविधि ८३
७१ १८ श्रीचक्रादि आसन के तीन मन्त्र ८२-८३
७२ १९ बालाषडङ्गन्यास, दक्षिणामूर्ति-संहितां का प्रमाण ८३-८४
७३ २० वशिन्यादियोगिनी न्यास ८४-८६
७४ २१ मूलमन्त्र न्यास ८६

( १७ )
७५ २२ पात्रस्थापन विधि ८७-८८
७६ २३ सामान्य, विशेष अर्घ्य ८८
७७ २४ द्वादशकलात्मक सूर्य और षोडशकलात्मक
चन्द्र की कलाओं को अर्घ्य प्रदान करने का
निर्देश और अर्घ्य मन्त्र ८८-८९
७८ २५ अकथ त्रिकोण में ४८ वर्णों का प्रयोग, मध्य
में वाक्, काम और शक्ति बीजों का प्रयोग ८९-९१
७९ २६ चौरानबे मन्त्रों के प्रयोग से द्रव्य संस्कार ९१-९२
८० २७ अखण्डादि पाँच मन्त्रों के वैकल्पिक
प्रयोग का निर्देश ९२-९३
८१ २८ अनुष्टुप् विद्या ९३-९५
८२ २९ अमृतेशी मन्त्र ९५
८३ ३० वाग्वादिनी विद्या सहित पाँच मन्त्रों से
अर्घ्यशोधन ९५-९६
८४ ३१ अर्घ्यपात्रस्थ बिन्दुओं से कुण्डलिनी-
ज्वाला में होम ९६-९७
८५ ३२ अर्घ्य शोधनविधि की पूर्णता का निर्देश ९७
चतुर्थः खण्डः ललिताक्रमः ९८-११२
८६ १ हृदयचक्र में उपस्थित सुषुम्णा के भेदन में
दक्ष आद्या संविद् को श्वास के माध्यम से
कुसुमाञ्जलि में आनयन की सुगम प्रक्रिया ९८-१००
८७ २ माया, लक्ष्मी और पराबीजों का उच्चारण कर
अमृतचैतन्यमूर्ति देवी का प्रकल्पना १००-१०१
८८ ३ सहस्रार में कारणानन्दविग्रहा माँ ललिता
बैन्दवचक्राधीश्वरी का समन्त्रक आवाहन १०१
८९ ४ त्रितारीपूर्व उपचार मन्त्रों से ६४ उपचारों
का प्रयोग १०१-१०२

( १८ )
९० ५ ६४ उपचारों का प्रकल्पन १०२-१०५
९१ ६ नव मुद्रायें १०५-१०६
९२ ७ मूल से त्रिधा सन्तर्पण १०६
९३ ८ देवी का षडङ्ग पूजन १०६-१०७
९४ ९ नित्यापूजन १०७-१११
९५ १० ओघत्रयपूजन १११-११२
पञ्चमः खण्डः ललितानवावरणपूजाक्रमः ११३-१३३
९६ १ प्रथमावरण व्यष्टि-पूजा ११३-११५
९७ २ समष्टिपूजा ११५-११६
९८ ३ करशुद्धि मन्त्र, त्रिपुराचक्रेश्वरी का परामर्श
संक्षोभिणी मुद्रा-प्रदर्शन ११६-११७
९९ ४ द्वितीयावरण-पूजा ११७-११८
१०० ५ तृतीयावरण-पूजा ११८-११९
१०१ ६ चतुर्थावरण-पूजा ११९-१२०
१०२ ७ पञ्चमावरण-पूजा १२०-१२१
१०३ ८ षष्ठावरण-पूजा १२१-१२२
१०४ ९ सप्तमावरण-पूजा १२२-१२३
१०५ १० आयुध-पूजा १२३
१०६ ११ अष्टमावरण-पूजा १२३-१२४
१०७ १२ कामेश्वरी आदि शक्तियों की मूलदेवी
से अभिन्नता १२४-१२५
१०८ १३ अतिरहस्य योगिनियों का चक्रावस्थान,
त्रिपुराम्बा का भावन और पराबीजमुद्राकृति १२५-१२६
१०९ १४ नवमावरण-पूजा १२६
११० १५ नवावरणपूजोपरान्त धूप-दीपादि समर्पण १२७-१२८
१११ १६ कामकलाध्यान १२८

( १९ )
११२ १७ सौभाग्यहृदय रूप पराबीज का विमर्श १२८-१२९
११३ १८ बलिप्रकार १२९
११४ १९ बलिदान मन्त्र १३०
११५ २० प्रदक्षिणादि १३०-१३१
११६ २१ शक्तिपूजा, मपञ्चक से सन्तर्पण १३१
११७ २२ चिदग्नि में हविःशेष का होम १३२
११८ २३ देवीविसर्जन, खेचरी प्रयोग और देवी का
स्वात्मसंयोजन १३२-१३३
षष्ठः खण्डः: श्यामाक्रमः १३४-१६५
११९ १ श्यामोपास्ति-विधि, परशिवेश्वरी साम्राज्ञी की
सचिवरूपा शक्ति १३४-१३५
१२० २ श्यामोपास्तिशङ्कासमाधानकारक दृष्टान्त १३५-१३६
१२१ ३ उपास्ति-विधि १३६
१२२ ४ मन्त्रभस्म-जलस्नान, वस्त्रपरिधान १३७
१२३ ५ सन्ध्या विधान १३७
१२४ ६ यागगृह प्रवेश और पूजन क्रम १३७-१३८.
१२५ ७ प्राणायाम प्रकार १३८
१२६ ८ अस्त्रमन्त्रप्रयोग और व्यापक-विधि १३७
१२७ ९ वायु, अग्नि, वरुण और धरा बीजों के प्रयोग
से देहदाहपूर्वक शिवचैतन्य का समुत्पादन १३८-१४०
१२८ १० प्राणायाम से तेजमय शरीर का प्रकल्पन् १४०
१२९ ११ षडङ्गबालासहित मातृका का मूलाधार, हृदय
और मुख में रतिप्रीतिमनोभव सहित विन्यास १४०-१४१
१३० १२ मूलविद्या का १७ भाग, उनका निर्धारित
अङ्गों में न्यास १४१-१४३
१३१ १३ पंचम न्यास १४३