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परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 25, कुल 320 में से

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पृष्ठ 25

( ११ )
मात्र पाण्डित्य प्रदर्शन था, उसका संक्षेप कर एवं जितने से सूत्रार्थ का पूरा
सन्दर्भ स्पष्ट हो जाय उतना अंश ही लिखा गया। इसीलिये इसे मुख्यांश वृत्ति
कह सकते हैं। किसी सूत्र की वृत्ति छोड़ी नहीं गयी है, पूरी की पूरी दी गयी
है। केवल पाठकों की सुविधा के लिये और अनावश्यक विस्तार से बचने के
लिये ऐसा किया गया है। स्वर्ग के वातायन से झाँकते हुए और अदृश्य अनुग्रह
से आत्मसात् करते हुए पण्डित रामेश्वर ने इसके लिये मुझे क्षमा कर दिया
है, यह विश्वास है।
श्रीतन्त्रालोक के नीर-क्षीर-विवेक भाष्य के लेखन के साथ इसे भी पूरा
करता रहा हूँ। इसमें अवश्य ही मैं उतनी दत्तचित्तता नहीं अपना पाया, जितनी
होनी चाहिये थी। कहीं-कहीं कुछ समीक्षा भी प्रसङ्गतः आ गयी है और सूत्रवृत्ति
लेखन के कार्य को पूरा करने में मेरी आन्तरिकता में कभी उद्विग्नता की झलक
भी दीखती थी, पर मैं यह सोचता था कि, "माँ 'पराम्बा' ने इस कार्य में
भी मुझे माध्यम बनाया है। इस आदेश पालन का यही रहस्य है"। तब यह
कार्य मेरे लिये परमकरणीय बन गया।
आज यह महत्त्वपूर्ण कार्य पूरा हुआ। एक श्लोक है—
जगच्चित्रं समालिख्य स्वात्मतूलिकयात्मनि ।
स्वयमेव तदालोक्य प्रीणाति परमेश्वरः ।।
इसके अनुसार परमेश्वर इस कार्य से प्रसन्न हो रहे हैं। परमहंस भी प्रसन्न
है। गुरुजनों का आशीर्वाद है। इस आन्तरिक सोच के सन्दर्भ में मैं यह कृति
पद्मभूषण प्रो. विद्यानिवास मिश्र जी के करकमलों में ही अर्पित कर रहा हूँ।
श्रीविद्या के ये अनन्य उपासक हैं। इनके हाथों में अर्पित यह पुष्प माँ के चरणों
में ही अर्पित हो रहा है, इसका मैं अनुभव कर रहा हूँ।
अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त दार्शनिक प्रो. राममूर्ति शर्मा कुलपति,
सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी को इस नवप्रकाशन के प्रकाशपूर्ण
प्रसङ्ग में स्नेहपूर्ण आशीर्वाद दे रहा हूँ। इनकी रोचिष्णु रोचना से इसकी चारुता
में चमत्कार घटित हो गया है।
आचार्यप्रवर वैयाकरणशिरोमणि डॉ. हरिश्चन्द्र मणि त्रिपाठी, निदेशक,
प्रकाशन-संस्थान, सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी का मैं विशेष