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परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 21, कुल 320 में से

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श्रीविद्योपासनाविमर्श

समस्त आगमों में श्रीविद्या का प्राधान्य पूर्णरूप से स्वीकृत है। वेदविद्या
में विज्ञ विचक्षण विद्वानों की तो यह मान्यता ही है कि, वेदमाता गायत्री भी
श्रीविद्या की अंश मात्र हैं। गायत्री ब्रह्मविद्यारूपिणी है। श्रीविद्या की पञ्चदशी विद्या
से ब्रह्मविद्या का पूर्णतया प्रतिपादन हो जाता है। श्रीविद्यारत्नाकर में श्री करपात्री
जी महाराज ने पंचदशी और गायत्री मन्त्र की एकता का ही प्रतिपादन किया
है। इससे यह भी सिद्ध हो रहा है कि, श्रीविद्योपासक की गायत्री उपासना भी
श्रीविद्या साधना में साथ-साथ सम्पन्न हो रही है, यह इन दोनों के इस शाश्वत
सम्बन्ध का रहस्य है।
इस दृष्टि से यह भी कहा जा सकता है कि, वेदमाता गायत्री की उपासना
के प्रभाव से आगमोक्त श्रीविद्या में प्रवृत्ति होने के कारण वेद और आगमिक
ज्ञान का एकाधिकरण सम्बन्ध उपासना पर ही आधृत है और दोनों वेद और
आगम को परस्पर एक सूत्र में बाँधने वाली विद्यायें हैं।
यही बात वरिवस्यारहस्य और त्रिपुरातापिन्युपनिषत् से भी प्रमाणित होती
है। वरिवस्यारहस्य में यह स्पष्ट उल्लेख है कि, “व्यवहरति न तु प्रकटं यां
विद्यां वेदपुरुषोऽपि (१।८) इति चतुष्पदा गायत्र्याः आवृत्तित्रयं श्रीविद्याकूट-
त्रयसकृत्पठनतुल्यम्”। श्रीत्रिपुरातापिनी में भी कहा गया है कि, ‘चतुष्पदा गायत्री
मन्त्र को तीन बार लिख देने से श्रीविद्या (पञ्चदशी) के तीनों कूटों का उद्धार
हो जाता है। इसलिये आगम-निगम में परस्पर विरोध की बात सोचना ऐक्य
दृष्टि के नितान्त विरुद्ध है।
मनुष्य मात्र का इस विद्या की उपासना का अधिकार भी इसी उद्देश्य
से दिया गया है कि, इसकी उपासना करने वाला भी ब्राह्मण हो जाये। गन्धर्वतन्त्र
में कहा गया है कि, नारी, शूद्र, व्रात्य आदि भी इसकी उपासना से ब्राह्मण
हो जाते हैं।