परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकी जानी चाहिये। परशुरामकल्पसूत्र और दत्तात्रेयसंहिता इसके मौलिक ग्रन्थ हैं।
नित्याषोडशिकार्णव, योगिनीहृदय, त्रिपुरारहस्य, त्रिपुरार्णवतन्त्र, श्रीविद्यारत्नाकर
आदि इस विद्या साधना के प्रामाणिक ग्रन्थ हैं। इनके स्वाध्याय से उपासना के
अनन्त रहस्यों का उद्घाटन हो सकता है।
श्रीचक्र में जो पूजा की जाती है, वह कामेश्वर और कामेश्वरी की सह-
पूजा है। एक के बिना एक की पूजा नहीं होती। इसमें शैवागम और शाक्तागम
का एकत्र समन्वय है। इसलिये यह सर्वसुलभ, सर्वग्राह्य और सर्वफलप्रद पूजा
मानी जाती है। इसके मूलमन्त्र में समस्त शैव, रौद्र, भैरव, कालीकुल, त्रिक
आदि मन्त्रों का रहस्य ग्रथित है।
त्रैपुरसिद्धान्त की सारी रहस्यवादिता श्रीविद्योपासना में निहित है। इसमें
उपासकों की भक्ति और श्रद्धा के अनुसार द्वैत, द्वैताद्वैत और अद्वैतमूलक त्रिविध
उपासना विहित है। त्रिक में यही अपरा, परापरा और परा पूजा रूप त्रैविध्य
स्वीकृत है।
पराविद्या और श्रीविद्या का ऐकात्म्य सर्वमान्य है। इस दृष्टि से
त्रिकसिद्धान्त और त्रैपुरसिद्धान्त अद्वैतमूलक श्रेणी में समान स्तर पर पूज्य और
मान्य हैं। श्रीचक्र में सारी विद्याओं की पूजा हो जाती है। यहाँ तक कि,
अधराम्नाय की कुंडलिनी देवता भी श्रीचक्र पूजा में गृहीत होती है।
आज्ञा गुरूणाम्
'आज्ञा गुरूणामविचारणीया' इस सिद्धान्त के अनुसार मैंने पद्मभूषण
प्रो. विद्यानिवास मिश्र के स्नेहपूर्ण आदेश का पालन किया है। उन्होंने कहा
था—यह ग्रन्थ इस समय अनुपलब्ध है। इसका प्रकाशन होना चाहिये। श्रीविद्या-
साधना का प्रतिपादक यह महोपनिषद् श्रीविद्या के उपासकों को मिले, वे इसे
पढें और इस आर्ष परम्परा की प्रामाणिकता का अनुभव करें, यह आवश्यक
है। उन्होंने बडौदा विश्वविद्यालय से प्राप्त की गयी छायाप्रति दी और कहा कि,
सम्पूर्ण लिख जाओ। इसका अर्थ भी साथ में होना चाहिये।
इस तरह मैंने दोहरा कार्य करने की इस उत्तरदायित्वपूर्ण सक्रियता का
संकल्प आज पूरा किया है। सूत्र लिखे गये, उनकी वृत्ति लिखी गयी और उनका
अर्थ भी साथ ही साथ पूरा किया गया। हाँ, वृत्ति लिखने की प्रक्रिया में जहाँ