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परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 23, कुल 320 में से

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ही उन्मेषोल्लास है। सारा विश्व ही शैव-शाक्त उल्लास का साक्षात्कार है। सारी
वस्तुराशि शिवमयी है। अतएव वस्तु मात्र में परमशुद्धि का आधान है।
इसी दृष्टि से पूजा द्रव्यों का आकलन किया जाता है।गहन अनुराग से
आरक्त उपासक जिन द्रव्यों का अर्पण करता है, उनके माध्यम से उसकी आस्था
ही अर्पित होती है, उसकी श्रद्धा ही कुसुमावली बनकर खिल जाती है और
माँ के चरणों में चढ़ाई जाती है। वह स्वयं इस शरीर कुसुम का भी अर्पण
करता है। सहस्रदलकमलरूप शिर का अर्पण और कमलरूप आँख के अर्पण
की कथायें भक्तों में प्रसिद्ध हैं।
इसी क्रम में परशुरामकल्पसूत्र में पञ्चमकार पूजा भी स्वीकृत की गयी
है। मद्य को आदिम द्रव्य माना गया है।
श्रीतन्त्रालोक नामक अखिल आगमोपनिषद् रूप शास्त्र में मद्य के विषय
में स्पष्ट उल्लेख है कि,
मद्यस्नाने साधकेन्द्रो मुमुक्षुः केवली भवेत् ।
यतः शिवमयं मद्यं सर्वे मन्त्राः शिवोद्भवाः ।।
शिवशक्त्योर्न भेदोऽस्ति शक्त्युत्थास्तु मरीचयः ।
तासामानन्दजनकं मद्यं शिवमयं ततः ।।
(श्रीतन्त्रालोक, भाग ५, १५।७३-७४)
यही तथ्य श्रीमत्त्रैशिरस् शास्त्र में भी प्रतिपादित है। इसके विषय की
चर्चा भी शास्त्रों में है। जो भी हो द्रव्य-पूजात्मक बाह्य-पूजा का भी श्रीविद्या
साधना में अतिशय महत्त्व स्वीकृत है। किसी तरह परमोपास्या के पदारविन्द
में मकरन्द बनकर समाहित होना ही उपासना होती है। उपासना के अंगभूत
शरीर, वाणी, मन और स्थूल धूप, दीप, नैवेद्यादि द्वारा सम्पन्न क्रियाओं के
माध्यम से उपासक उपास्य की अनुग्राहिका शक्ति से अन्तर्बाह्य व्याप्ति से कृतार्थ
होना चाहता है। यही उपासना का रहस्य है।
श्रीविद्या की उपासना में पञ्चदशी और षोडशी विद्याओं की दीक्षा गुरुदेव
से योग्यता के अनुसार प्राप्त होती है। लोपामुद्रा और कामराज विद्याओं का
ही यह सारा उपक्रम है। इसमें एक क्रम निर्धारित है। इसी क्रम से उपासना