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परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 22, कुल 320 में से

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पृष्ठ 22

( ८ )
'त्रिपुरसुन्दरि विद्महे, कामेश्वरि धीमहि, तन्नः क्लिन्ने प्रचोदयात्' यह
महामन्त्र श्रीविद्या गायत्री मन्त्र है। इसमें श्रीविद्या, कामराज विद्या और गायत्री
का महामिलन शाक्त उल्लास का ही प्रतिपादक है। श्रीविद्या में दीक्षित होने वाला
भी 'ब्रह्माधीते ब्रह्म वेद वा' इस दृष्टि से, घृणा, शङ्का, भय, लज्जा, जुगुप्सा,
कुल, शील और जातिरूप आठ पाशों से मुक्त होकर पाशमुक्त ब्राह्मण ही माना
जाता है। ये सारी बातें गन्धर्व आदि विभिन्न तन्त्रों में प्रतिपादित हैं।
श्रीविद्योपासना का अधिकार दीक्षा के उपरान्त ही प्राप्त होता है। श्रीविद्या
की उपासना के प्रारम्भ में जो दीक्षा दी जाती है, वह एक प्रकार की क्रिया-
दीक्षा ही मानी जाती है। इसके अतिरिक्त प्रातःकालिक नित्य, नैमित्तिक और
काम्य कर्मों का सम्पादन इसमें अनिवार्य रूप से करणीय माना जाता है।
श्रीमद्भास्कराचार्य का यही उपदेश है कि, श्रीविद्या सम्प्रदाय की दीक्षा क्रियादीक्षा
मानी जानी चाहिये। जहाँ तक न्यास का प्रश्न है, कल्पसूत्र में षोढा न्यास को
ही महत्त्व दिया गया है। अन्य न्यास वैकल्पिक माने गये हैं। सभी लघुषोढा,
महाषोढा, शक्तिषोढा आदि षोढा न्यास और पंचवाहादि न्यास पूर्णतया समर्पित
उपासक के लिये हैं, जिसका सारा समय माँ के लिये ही अर्पित है।
क्रियायोग के अन्तर्गत पूरी चक्र-साधना द्वारा प्राणापानवाह को तालुरन्ध्र
से होते हुए ब्रह्मरन्ध्र में समाहित कर परा शक्ति से तादात्म्य स्थापित करना
भी अन्तर्निहित है। इसमें मानसिक सक्रियता का सद्भाव पूर्णतया अपेक्षित है।
यह विशिष्ट योग मानस क्रियायोग का ही उपक्रम है। परशुरामकल्पसूत्र में इसका
महत्त्व प्रतिपादित किया गया है। श्रीविद्योपासक से यह आशा की जाती है कि,
वह अध्यात्म के परम उत्कर्ष का महान् अध्यवसाय सम्पन्न करे, इसके
उत्तरदायित्वपूर्ण समय और चर्या का पालन करते हुए समाज के चरित्र में
पावनतामयी चर्या का चमत्कार भर दे। स्वात्म को शैवसद्भाव समाहित कर दे।
यही उपासना का उद्देश्य है। आन्तर पूजा का महान् महत्त्व है फिर भी
बाह्य पूजा की उपेक्षा नहीं की जा सकती। उपास्य देवता का अर्चन तद्विषयक
परानुराग पर ही निर्भर होता है। एतद्विषय-सम्बन्धिनी क्रिया की प्रेरिका
परमरहस्यरूपा परमाम्बा ही है। उसी की प्रेरणा से आन्तर और बाह्य सभी पुलकित
होता है। आन्तर पुलक में रहस्य साधनामयी आन्तर पूजा और बाह्य पुलक में
बाह्य पूजा का परमानन्द होता है। यह बाह्य उल्लास भी आन्तर रहस्यरूपता का