परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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हैं। अपने भीतर रहने वाले शिव अग्नि हैं। स्वयं ही साधक होता है। यह इस
प्रकार का ज्ञान निरन्तर हो रहा है। इस यज्ञ का फल है विषयरहित चित् तत्त्व
का विमर्श। इस आत्मलाभ से बढ़कर कोई अन्य लाभ नहीं है।
इस सिद्धान्त की पीठिका देने के बाद परशुरामकल्पसूत्र में दीक्षा का क्रम
आया है। दीक्षा लिए बिना कोई इस विद्या का अधिकारी नहीं रहता है। गुरु
दीक्षा देने के पहले शिष्य की परीक्षा लेता है और उसके बाद उसका मुख
बाँध देता है। उसे सिद्धान्त पक्ष पहले सुनाकर समझाता है। इसके बाद परीक्षा
देता है। दीक्षा के बाद ऊपर लिखित पाँचों क्रमों की पूजा का विधान है।
परशुरामकल्पसूत्र में पंच मकार का विधान है पर साथ ही साथ चेतावनी है
कि, यह अप्रकाश्य है। यदि इसको प्रकट किया गया, तो अगति होगी। एक
प्रकार से व्यवहार की दृष्टि से यह चेतावनी निषेध ही है। इसीलिए श्रीमद् आदि
शंकराचार्य द्वारा प्रवर्तित श्रीविद्या उपासना क्रम में पंच मकारों के पाँच अनुकल्पों
से ही काम चलाया जाता है और जिन-जिन तत्त्वों के ये मकार बोधक हैं उनकी
भावना की जाती है। वस्तुतः ये तत्त्व भी किसी न किसी आभ्यन्तर क्रिया के
प्रतीक मात्र हैं।
परशुरामकल्पसूत्र सूत्रात्मक ग्रन्थ है। इसमें बहुत-सी बातें खोलकर नहीं
कही गयी हैं। उस पर कई टीकाएँ उपलब्ध हैं। प्रस्तुत ग्रन्थ की रामेश्वर झा
की टीका जो अनावश्यक रूप से विस्तृत का संक्षेप करके उसके अनुसार और
अंशतः शास्त्र की परंपरा के अनुसार पं. परमहंस मिश्र ने व्याख्या की है।
इस व्याख्या के कारण यह ग्रन्थ बहुत सुगम हो गया है। यह एक प्रकार से
प्रथम समग्र हिन्दी व्याख्या है। मिश्र जी स्वयं न केवल तन्त्रशास्त्र के अध्येता
हैं बल्कि एक नैष्ठिक साधक भी हैं। इसलिए मैंने उन्हें व्याख्या के लिए प्रेरित
किया। वे तन्त्रालोक पर विस्तृत व्याख्या लिख चुके हैं। वे सर्वथा अधिकारी
हैं, इसीलिए मैंने उनसे अनुरोध किया था। उन्होंने बड़ी तत्परता से इस काम
को सम्पन्न किया। इसके लिए वे जिज्ञासु पंडित समाज के बधाई के पात्र हैं।
श्रीविद्या उपासना बाह्य अर्चन नहीं है। बाह्य अर्चन को सोपान बनाकर
आभ्यन्तर अर्चन में प्रवेश पर ही विशेष बल दिया जाता है। श्रीविद्या का तात्पर्य
ही यह है कि, सर्वमय होकर सर्वात्मिका पराशक्ति की अपने भीतर भावना करे
और इस भावना के द्वारा समस्त ब्रह्माण्ड में समरसता का विकिरण करे।