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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

DevanagariAwadhipublished318 पृष्ठ

२६२ पद्मावत ।
कीन्ह मसूरो धनै सो रसोई। जो कछु सब मांसू सो होई ॥
दो० बौरी आय एकारी, लिये सबैकइ छह ।
सब रस लीन्ह रसोई, अब मोकहँ को पूछ ॥
काटी मच्छ मेल दँधि धोई। औ बघार चहुँ बार निचोई ॥
कड़वे तेल कीन्ह बसै वारू। मेथी घृतसों दीन्ह वघारू ॥
युक्त युक्त सब मच्छ उतारे। आंव चीर तेहिमाझँ उतारे ॥
औ परेहें तेहि चटपट राखा। सोरस सुरस पाव जो चाखा ॥
भांति भांति तहँ खांड़ा तरे। अंडा तल तल बीहड़ँ धरे ॥
कहँकहँ परा कपूर बसाई। लौंग मिरच तेहि ऊपर लाई ॥
घीवटांक महि सौध सिरावा। पंखें वघार कीन्ह अरदावो ॥
दो० घृत परेहें रहा तस, हाथ पहुँच लहि बोड़।
बूढ़खाय नौयौवन, सौ मेहरी की ओड़ ॥
भांति भांति सीझी तरकारी। कयो भांति कुम्हड़े के फारी ॥
भइ भूँजी लौका परबती। रैता कीन्ह काटिकै रैती ॥
चूक लायके- रींधे भांटा। अरवी कहँ भलअरहेनें बांटा ॥
तुरइ चचेंड़े ढेढ़स तरे। जीर धुंगार मेल सब धरे ॥
परवर कुँदुरुं भूंजे ठाढ़े। बहुते घिव चुरचुरै के काढ़े ॥
कडुई काढ़ करेला काटे। अदरक मेल तरे के खोटे ॥
रींधे ठाढ़ सेवके फारे। छौंक साग पुनि सौंध उतारे ॥
दो० सीझी सबतरकारी, भा जेवन सब ऊँच।
धौंका रुचै शाह कहँ, केहिपर दृष्टि पहुँच ॥

  • मसूरकी खिचड़ी १ पद्मावत २-३ दही ४ भूनना ५ बीच ६ इससब
    से ७ अलग ८ केसर ६ चिड़िया १० गलाना ११ बहुत घीडाला १२ कह-
    कश १३ तलना १४-१५ खटाई डाल के १६ तय्यार १७ निगाह १८ ॥

पद्मावत । २६३
घृत कराही भीतर परा । भांति भांति सब पाकहिंबरा ॥
एकहि आंदि मिर्च सों पीठी । औ जो दूध खांड़ सो मीठी ॥
भई मुंगौछै³ मिरचहिं परीं । कीन्ह मुंगौरौं औ करपॅरीं ॥
भई मिथौरीं सिरका परा । सोंठ लायके खरसों धरा ॥
मीठ महीव औ जीरा लावा । भीज बरा नैनू जनु खावा ॥
खण्डहि कीन्ह आंब चरपरा । लौंग इलाची सों खण्डबरा ॥
कढ़ी सँवारी और फुलौरी । औ खंडवानी लाय बरोरी¹⁰ ॥
दो० पान कतर छौके रुकौछ, हींग मिर्च औ आंदे ।
एक खण्ड जो खावै, पावै सहंसैं सवाद ॥
तहरी पाक बोनें औ गरी । परी चिरौंजी औ खरहॅरी ॥
औ घृत भूंज के पाका पेठा । भाअमृत करम्ब कर मीठौ ॥
चंबकैं लोहड़ा औटा खोवा । भा हलुवा घिवकरे निचोवा ॥
शिखरन सौंध छनाई काढ़ी । जामा दही दूध सों साढ़ी ॥
और दही के मुरंडाँ बांधे । औ संधानैं बहुभांती सांधे ॥
भइ जो मिठाई कही न जाई । मुख मेलतखन जाय बिलाई ॥
मतलईं झालैं और मरकोरी । माठ पेराकैं और बुंदोरी ॥
दो० फेनी पापर भूंजे, भय अनेक परकारै ।
भइजारेँ भिजियाबर, सीझी सब ज्योनार ॥
जेत प्रकार रसोई बखानी । तब भइ सबपानी सो सानी ॥
पानी मूलैं परेखो²⁴ कोई । पानी बिना स्वाद नहिं होई ॥
अमृतपान यहि अमृतआना । पानी सो घंट रहै पराना ॥
तरहबततरह १-२२ अदरक २-११ किस्मखाने की ३-४-५-६-६-१०
पियाला ७ दही ८ हज़ार १२ नाममेवा १३-१४ शंकर का किवाम बनाके
पकाया १५ लोहे की कराही १६ लाडू १७ अचार १८ किस्म मिठाई १६-
२०-२१ खीर २३ जड़ २४ देखना २५ बदन २६ ॥

२६४ पद्मावत ।
पानी दूध सो पानी घीव । पानि घटे घट रहै न जीव ॥
पानी माँझे समानी ज्योती । पानी उपजैन माणिक मोती ॥
पानीमहँ सब निरमलं कला । पानी जोछुवै होय निरमला ॥
सो पानी मन गर्व न करई । शीश नाय घालें पै धरई ॥
दो० मुहम्मद नीर गंभीर जो, सो तेहि मिलहि समन्द ।
भरै ते भारी होरहे, लूछहिं वाजहिं द्वन्द ॥
सीझ रसोई भयो विहानू । गढ़ देखे गवने सुलतानु ॥
कमल सुहाय शूर सँग लीन्हा । राघव चेतन आगे कीन्हा ॥
ततखन आय बेवान जो पहुँचा । मनसाँ अधिक गगन से ऊँचा ॥
उघरी पँवरैं चला सुलतान् । जानहु चला गगन कहँ भानू ॥
पँवरी सात सात खण्ड वांके । सातों खण्ड गाढ़े दुइनाके ॥
आज पँवर मुख भा निरमरा । जो सुलतान आय पँगधरा ॥
जानु उरेह काट सब काढ़े । चित्रैं मूरतें विनवहिं ठाढ़े ॥
दो० लख लख बैठ पँवरियों, जेहिते नवहिं करोर ।
जेहिं सब पँवर उघारे, ठाढ़ भये कर जोर ॥
खण्ड अड़तीसवां किला वर्णन वादशाह ॥
सातों पँवरी कनक कैं केवारा । सातहुँ पर वाजहिं घरियारा ॥
सातहिं रंग सो सातों पँवरी । तब तहँ चढ़े फिरै नव भँवरी ॥
खंड खंड साज पलँग औ पीढ़ी । जानहु इन्द्रलोककी सीढ़ी ॥
चन्दन वृक्ष सुहाई छाहां । अमृत कुण्ड भरा तेहि माहां ॥
बदन १ चीज २ पैदा होना ३ जवाहऱात ४ पाकसाफ़ ५-६ ग़रूर ७
शिर ८ पानी ६ डोल १० बहादुर ११ नामभाट १२ तुरंत १३ हवादार १४
बहुत १५ आसमान १६-१८ दरवाज़ा १७ सूर्य्य १६ क़दम २० तसवीर २१
दरवान २२ हाथ २३ सोना २४ पेड़ २५ ॥

पद्मावत । २६५
फरे खजीजाँ दाड़िमें दाखौँ। जो वहं पंथै जाय सो चांखा ॥
कनकैकै छत्र सिंहासन साजा। पैठत पँवरें मिला लै राजा ॥
चढ़ाशाह चढ़ चितौर देखा। सब संसार पाँयँतर लेखा ॥
दो० देखा शाह गगनैं गढ़, इन्द्रलोक के साज।
कहीराज फिरताकर, स्वर्ग करें जो राज ॥
चढ़ गढ़ ऊपर सङ्गत देखी। इन्द्रपुरी सो जान बिशेखी ॥
ताल तलावा सरवरें भरे। औअम्बरोंउँ चहुँदिशिफरे ॥
कुवां बावरी भांतिहि भांती। मढ़मएडप तहँतहँ बहुँपांती ॥
रॉयैं राग घरघर सुख चाऊ। कनकैमँदिरनगकीन्हजड़ाऊ॥
निशिनँ दिनबाजहिंमन्दिरतूरैं। रहसकूद सब लोग सेंदूरैं ॥
रतनैं पदारथ नग जो बखाने। घूरन महँ देखे अहिरानें ॥
मँदिर मँदिर फुलवारी बारी। बारबोरै तहँ चित्रैं सँवारी ॥
दो० पांसासोरैंकुँवरसबखेलांहिं, श्रवनैंहींगीतउनाहिं।
चैन चाउ तस देखा, जनु गढ़ छेका नाहिं ॥
देखत शाह कीन्ह तहँ फेरा। जहाँ मंदिर पद्मावत केरा ॥
आसपास सरवरं चहुँ पासा। मँदिरमाँझेजनुलागअकासा॥
कनकैकै सँवार नगहिंसबजरा। गगनैंचन्द जनु नखतहिंभरा॥
सरवरैं चहुँदिशि पुरइनफूली। देखा बौंरि रहा मन भूली ॥
कुँवरिलाख दुइवार अँगौरे। दुहुँदिशि पँवरैं ठाढ़ करैंज़ोरे ॥
शारदूलैं दुहुँ दिशि गढ़काढें। कलकँजँहि जानहुँ रिसठाढ़े ॥
जानवन्त लिये चित्रैं कटाऊ। वहँतकपँवैरै सोलागजड़ाऊ ॥
नाममेवा १ अनार २ अंगूर ३ राह ४ सोना ५-१२-२२ दरवाज़ा ६-
१६-२५-२७-३२ आसमान ७-८-२३ तालाब ९-२०-२४ बगीचा १०
अमीरउमरा ११ रात १३ नामवाज़ा १४ जवाहिरात १५ तसवीर १७-३१
चौसर १८ मकान १६ चीज २१ पेशवाई २६ हाथ२८लाल शेर २६ डकारना ३०॥

२६६ पद्मावत ।
दो० शाह मंदिर अस देखा, जनु कैलास अनूपे ।
जाकर अस धौराहरं, सो रानी केहिरूप ॥
नांघत पौंवेरै गये खण्ड साता । सतयें भूमि बिम्बावन राताँ ॥
आंगन शाह ठाढ़भा आय । मंदिर छांह अति शीतल पाय ॥
चहूँ पास फुलवारी बारी । माझँ सिंहासन धरा सँवारी ॥
जनु वसन्त फूला सब सोने । हँसाहिं फूल विकसहिं फर लोने ॥
जहां जो ठांव दृष्टिमहँ आवा । दर्पण भाव दरश दिखरावा ॥
तहां पौंट राखा सुलतानी । बैठ शाह मन जहां सो रानी ॥
कमल सुभाय सूरै सों हँसा । सूरका मन चांदें पहँ बसा ॥
दो० सोपै जानै नयन रस, हिरदयँ प्रेम अँगूर ।
चन्द जो बसै चकोरचित, नयन हि आव न सूरै ॥
रानी धौराहरै उपराहीं । करहिं दृष्टि नहिं करहिं तराहीं ॥
सखी सरेखी १७ साथहिं बैठी । तपै सूर शशि आव न दीठी २० ॥
राजा सेव करै करें जोरे । आज शाह घर आवा मोरे ॥
नट नाटक पतुरनि औ बाजा । आय अखाड़ सबै महँ साजा ॥
प्रेमक लुब्धै बहिर औ अन्धा । नाच कूद जानहु सब धन्धा ॥
जानहु काठ नचावै कोई । जोजें नाच न परगटै होई ॥
परगट कहि राजा सों बाता । गुँसै प्रेम पद्मावत राताँ ॥
दो० गीत नाद जस धन्धा, दहकै विरह की आंच ।
मन की डोर लागत हँ ठाईं, जहां सो गँहि पुनि २ खांच ॥
बेमिसाल १ महल २-१५-१८ दरवाज़ा ३ ज़मीन ४ लाल ५-२५ ठंडा ६
बीचोबीच ७ खिलना ८ खूबसूरत ६ तख़्त १० सूर्य ११-१४-१८ तथा पद्मा-
वत १२ दिल १३ निगाह १६-२० होशियार १७ चांद १६ हाथ २१ भरा-
हुआ २२ ज़ाहिर २३ छिपा २४ जलना २६ पकड़ना २७ रस्सी २८ ॥

पद्मावत । २६७
गोरो बादल राजा पाहां। रावतैं दोऊ दोउ जनुबाहां ॥
आय श्रवणैं राजाके लागी। मूँसि न जाहिंपुरुषजो जागी ॥
बांचा पुरुषै तुर्क हम बूझा। परगटं मेरैं गुप्त छलं सूझा ॥
तुव नहिं करो तुर्क सो मेरूं। छलपै करहिं अंतके फेरू ॥
बेरी कठिनं कुटिलजसंकांटा। सोम कोपरहि जांरहि आटा ॥
शंभु कोटैं जो पाय अंगोटी। मीठी खांड़ जेंवाये रोटी ॥
हम सों ओछे कै पावा बातू। सूले गये सँग रहे न पातू ॥
दो० यहिसोकृष्ण बलराजजस, कीन्हचहै घरबांध।
हम विचार अस आवहिं, मेरहिं दीजे न कांध॥
सुन राजा यहि बात न भाई। जहां मेर तहं नहिं असमाई ॥
मन्दहि भल जो करे भलसोई। अन्तहि भलाभली कर होई ॥
शत्रुँ जो विष दय चाहै मारा। दीजे नोन जान बिष सारा ॥
विष दीन्हें विषघर होय खाय। लोन देखहों लोन बिलाय ॥
मारै खड़ैंग खड़ग कर लिये। मारै लोन नाय शिर दिये ॥
कँवरों विषजो पण्डवनै दीन्हा। अन्तहिदांव पण्डवन लीन्हा॥
जो छल करै वही छलबाजाँ। जैसे सिंहँ मँजूषा साजा ॥
दो० राजैं लोन सुनाव्रा, लाग दोहों जस लोन ।
आयकुहाय मंदिर कहँ, सिंह जान औगोन ॥
नाममन्त्री १ सरदार २ कान ३ चोरी होजाना ४ क़ौल बादशाह ५ जा-
हिर ६ मेल ७-१०-१७ छिपा ८ दग़ा ६ सख्त ११ दुश्मन १२-१८ क़िला १३
घेरना १४ तथा बादशाहको बे मुरव्वत पाया १५ जड़ १६ तलवार १६
दुर्योधन २० राजा युधिष्ठिर आदिक २१ पहुँचना २२ एक ब्राह्मण ने शेर
को जो पिंजरे में बन्दथा निकाल लिया शेर ने उसको खाने चाहा उसने
कहा कि भलाई के बदले बदी न करना चाहिये जब तकरार होनेलगी
तब एक गीदड़ ने आके पंचायत की और कहा कि हम सूरत असली देखें
तब फैसला करेंगे जब शेर पिंजरे में चलागया ब्राह्मणने खिड़की बन्द कर
ली गीदड़ ने कहा कि ऐ ब्राह्मण अब घरजाउ यही फैसला है २३ ॥

३६८ पद्मावत ।
राजा की सोरहसै दासी। तिन महँ चुन काढी चौरासी ॥
बरणे बरण सारी पहिराई। निकस मँदिर ते सेवा आई ॥
जनु निसरीं सब बीरबहूटी। रायँसुनी पिंजर हुत छूटी ॥
सबै प्रथम यौबन सोहैं। नयन बानै औ सारँगै भौंहैं ॥
मारहिं धनुर्ष केर शिर श्रोहीं। वनघंटवाट धनुषजित श्रोहीं ॥
कामैकटाक्ष हनहिं चितहरणी। एक एकते आगर बर्रणी ॥
जानहुँ इन्द्रलोक ते काढी। पांतहि पांत भई सब ठाढी ॥
दो० शाह पूँछ राघव पहँ, सबते कही बैनाहिं ।
तुइजोपद्मिनी बरैणी, कहुसोकौनइनमाहिं ॥
दीरघआये भूमिपति११ भारी। इनमें नाहिं पद्मिनी नारी ॥
यहि फुलवारसोबहुकी दासी। कहँ केतकी भँवर सँग बासी ॥
वह सो पदार्थै ये सब मोती। कहँ वह दीप पतँग जहँज्योती ॥
ये सब तरैंई सेव कराहीं। कहँवहशैशिशिदेखतछिपजाहीं ॥
जबलगसूरैकीदृष्टि १७ अकाशु। तवलगशैशिनहिंकरैप्रकार्शू ॥
सुनके शाह दृष्टि२० तर नावा। हम पाहुन यहिमँदिरपरावा ॥
पाहुन ऊपर हेरै२१ नाहीँ। हना राहु अर्जुन परछाहीं ॥
दो० तपौ बीज जस धरती, सूख बिरह के घाम ।
कबसोदृष्टि२२ करबरसहि, तनतरवैर२३होयजाम॥
सेव करें दासी चहुँ पासा। अप्सरैं जानु इन्द्र कैलासा ॥
कोउ परात कोउ लोटा लाई। शाह सभा सब हाथ धोवाई ॥
कोई आगे पनवार बिछावहिं। कोई जेवन लै लै आवहिं ॥
रंगबरंग १ नाम जानवर २ नौजवान ३ तीर ४ कमान ५-६ तिरछी
निगाह ७ ज्यादा ८ बयान करना ६-१० बड़ीउमर ११ ज़मीनका मां-
लिक १२ जवाहिरात १३ छोटेनखत १४ चांद १५-१८ सूर्य १६ निगाह १७
रोशनी १६ नज़र २०-२२ देखना २१ पेड़ २३ इन्द्रलोककी परी २४ ॥

पद्मावत। २६६
कोई माड़ें जाहिं धरि जूरी। कोई भात परोसहिं पूरी ॥
कोई लै लै आवहिं थारा। कोई परसहिं बावन परकारा ॥
पहिर जो चीरैं परोसहिं आवहिं। दूसरी और बरनै देखरावहिं ॥
वरण वरण पहिरहिं हर फेरा। आव झुंड जस अफसरै केरा ॥
दो० पुनि संधानै बहु आनी, परसहिं बूकाहिं बूक।
करै सँवार गुंसाई, जहां परी कछु चूक ॥
जानहु नखत करहिं सब सेवा। बिन शशि सूरहिं भावन जेवा ॥
बहु परकारै फिरहिं हर फेरें। हेरौं बहुत न पावा हेरें ॥
परी अमूझ सबै तरकारी। लोनी बिनु लोन सब खारी ॥
मण्डछूवहिं आवहिं गड़कांटी। जहां कमल तहँ हाथ न आँटी ॥
मन लाग्यो तेहि कमल की दंडी। भावै नहिं एको कनैहंडी ॥
सो जेवन नहिं जाकर भूखा। तेहि बिन लाग जानु सब रूखा ॥
अनभावत चाखी बैरागी। पञ्चामृत जानहु बिष लागा ॥
दो० बैठ सिंहासन गूँजै, सिंह चरै नहिं घास।
जबलग मिरगैन पावै, भोजन करै उपास ॥
पान लिये दासी चहुँ ओरा। अमृतैं दानी भरे कचूरौ ॥
पानी देहिं कपूरक बासा। सो नहिं पिये दरश कर प्यासा ॥
दरशन पान देयँ तौ जीऊँ। बिन रसना नयनहिं सो पीऊँ ॥
पपिहा बूँद सेवातिह अघा। कौन काज जो बरसै मघा ॥
पुनि लोटा कोंपरं लै आई। कै निराश अब हाथ धुवाई ॥
हाथ जो धोवैं विरहेंको रोरा। सँवरि सँवरि मन हाथ मरोरा ॥
रोटी १ कपड़ा २ रंग ३ परी ४ अचार ५ राजा ६ चांद ७ सूर्य्य ८
बहुत तरह ६ देखना १० तथा पद्मावंत ११ पहुँचना १२ तरकारी १३ बे
चाहना १४ शेर १५ हिरन १६ शरबत १७ कटोरा १८ जबान १६ सिल-
फ़ची आफ्ताया २० सताया २१ ॥

विधि¹मिलावजासोमनलाग। जोरहिं तोर प्रेम कर तागा ॥
दो० हाथ धोय जब बैठो, लीन्ह ऊब के श्वास ।
सँवरा सोई गुसांई, देय निराशहिं आस ॥
भइज्योनार फिरा खँडवॉनी । फिराअ्ररगजाँ कंकहि वानी ॥
नग अमोल सो थारहिं भरे । राजैं सेर्व आन के धरे ॥
बिन्ती कीन्ह घालगयैं पागा । येजगसूर सीवें गुहिलागा ॥
औगुन अश कांप यहिजीऊ । जहां भानु तहँ रहा न सीऊँ ॥
चारहुँ खण्ड भानु अस तपा।जेहिकी दृष्टि¹⁴ रैयनिमसि¹⁵ छिपा॥
औभानुँहिंअस निरमलैकला। दरश जो पावै सो निरमला ॥
कमल भानु देखै पै हँसा । औ भांतेहिं चाहै परकसा ॥
दो० रतैनैश्यामतहँरैंयनिमसिं¹⁷, येरवि²⁰ तिमिरं²¹ सँहार ।
कर सो दृष्टि²⁴ औ कृपा, दिवसैं देह उजियार ॥
सुनबिन्ती²⁶ बेहसाँसुलतानू । सहसैंहि किरणदिपै जसभानूँ ॥
ऐ राजा तुइँ सांच जुड़ावा । भइसो दृष्टिअवसीवैं जुड़ावा ॥
भानु की सेवा जो कर जीव । तेहिमसिकहां कहांतेहिसीवैं ॥
खाउ देश आपन कर सेवा । और देउँ मांडो तोहिं देवा ॥
लीकपषानैं पुरुषैं कर बोला । ध्रुवै सुमेरुँ ऊपर नांहिं डोला ॥
फेर बसावैं दीन्ह नग सूरू । लाभदेखायलीन्हचहिमूरू ॥
हँस हँस बोले टेके कांधा । प्रीतिभुलाय चहै छल बांधा ॥
दो० माया बोल बहुत कर, शाह पान हँस दीन्ह ।
ईश्वर १-२ नाउम्मेद ३ शरवंत ४ अतर ५ नज़र ६ अर्ज़ ७ गर्दन ८
सूर्य ९-११-१३-१७-२२-२६-३१ जाड़ा १०-१२-३०-३२ निगाह १४
रात १५-२० सियाही १६-२१ पाकसाफ़ १८ राजा १६ अंधियारा नाश-
कर२३ अच्छी नज़र २४ दिन २५ अर्ज़ २६ हँसा २७ हज़ार २८ पत्थर ३३
मर्द ३४ नाम नखत ३५ पहाड़ ३६ लालच ३७ जड़ ३८ ॥

पद्मावत । २७१
पहिले रतनैं हाथ कै, चहौं पदारथ लीन्ह ॥
माया मोह विबश भा राजा । शाह खेल शतरंज करसाजा ॥
राजाहै जबलग शिर घामू । हमतुमघड़िकै करहिंबिश्रामू ॥
दर्पन शाह भीतै तहँ लावा । देखों जोह झरोखें आवा ॥
खेलहिं दोऊ शाह औ राजा । शाहक रुख दर्पनरहि साजा ॥
प्रेमक लुब्ध पियादे पाउँ । चलै सौंहिं ताके कहँठाउँ ॥
घोड़ा दै फरजी बँद लावा । जेहिं मुहरा रुखचहै सोपावा ॥
राजा पील देइ शह मांगा । शहँ दै चाहि मैरथ स्वांगा ॥
दो० पीलहि पील देखावा, भयो दुहूँ चौदांत ।
राजा चहै बुर्द भा, शाह चहै शहमात ॥
सूरै देख वै तेरैं दासी । जहँ शशि तहां जाय परकौसी ॥
सुना जो हम देहली सुलतान् । देखों आज तपै जस भानू ॥
ऊंच छत्र ताकर जगमाहां । जग जोहांह सब वहकीछाहां ॥
बैठि सिंहासन गर्वहि गूंजा । एक छत्र चारहुँ खंड धूंजा ॥
निरखि न जायसौंहि वहपाहीं। सबैनवै कै दृष्टि तराहीं ॥
मन माथे वह रूप न दूजा । सबरूपवन्त करहिं वह पूजा ॥
हमअस कसा कसौटी आरसें । तुहूँ देख कस कंचनें पारस ॥
दो० वादशाह देहली कर, कित चितौर महँ आव ।
देख लेहु पद्मावत, जें न रहैं पछताव ॥
विकसै जो कुमुदै कह शशि ठाऊं। विकसा कमल सुनत रबि नाऊं
तथा राजा १ तथा पद्मावत २ एक घड़ी ३ आराम ४ दीवार ५ भरा-
हुआ ६ सामने ७-१८ जगह ८ शाह देके बाज़ी जीतना चाहा ६
मुक़ाबिल १० सूर्य ११-१५-२५ नखत १२ चांद तथा पद्मावत १३-२४ रो-
शनी १४ गरूर १६ देखना १७ निगाह १६ आईना २० सोना २१ खिलना २२
कोकाबेली २३ ॥

२७२ पद्मावत।
भइनिशि¹ शशिधौराहर² चढ़ी। सोरहकिरनजैसिविधि³ गढ़ी॥
बेहँस झरोखें आय सँरेखी। निरखै शाह दर्पनमहँ देखी॥
होतहि दरश परसँ भा लूना। धरती स्वर्ग भयो सब सूना॥
रुख मांगत रुखँ तासों भयो। भा शहमात खेल मिटगयो॥
राजा भेद न जानै झाँपी। भाबिएनारि पवनविनकाँपा॥
राघव कहा किलाग सपोंरी। लै पौढ़ावहिं सेज सँवारी॥
दो० रैनि बीतगइ भोरभा, उठा सूरे तब जाग।
जो देखै शँशि नाहीं, रही कराँ चितलाग॥
भोजन प्रेम सो जानिजोजेवां। सँवरहिंरुचिवासरस केवों॥
दरश देखायजायशँशि छिपी। उठा भानुँ जस योगी तपी॥
राघव चेत शाह पहँ गयो। सूर्य देख कमल विप भयो॥
छत्रपती मन कहां सो पहुँचा। छत्र तुम्हार जगत पर ऊँचा॥
पोटै तुम्हार देवतन पीठी। स्वँगपतालरयनिदिनदीठी²⁰॥
छोहते²¹ पलैं हहिं उघटे रूखा। कोहते²² महिसायँरसंबसूखा॥
सकलैं जगत तुम नावै माथा। सबकर जियन तुम्हारेहाथा॥
दो० दिनननयनलावहुतुम, रयनि भावनहिं जाग।
अबनिचिन्तअससोयं, कहँ विलम्ब असलाग॥
देख एक कौतुकँ हौं रहा। रहअन्तरपैटें पैनहिं अहा॥
सरवैरै एक देख मन सोई। रहापानि अब पानि न होई॥
स्वँग आय धरती महँ छावा। रहा धरति पै धरत न आवा॥
रात १-११ महल २ ईश्वर ३ होशियार ४ देखना ५ पारसपत्थर ६
मुँह ७ छिपा ८ नाम भाट ६ चुर्रीहवा १० सूर्य तथा बादशाह १२-१७
चांद तथा पद्मावत १३-१६ ध्यान १४ कमल १५ तख्त १८ आसमान १६-
२६ निगाह २० मेहरवानी २१ हराहोना २२ गुस्सा २३ तालाब २४-२८
सब २५ तमाशा २६ परदा २७॥

पद्मावत। २७३
तिन्हमहँपुनिइकमन्दिरऊँचा। करने१ अह्रापै करनहिंपहुँचा ॥
तेहि मण्डप मूरत मन देखी। बिनतनबिनजिवजायबिशेखी॥
पूरणचन्द्र२ होय जनु तपी। पारसरूप दरश दै छिपी ॥
अबजहँ चतुर्दशी जिव तहां। भान अमावस पावै कहां ॥
दो० विकसों कमलस्वर्ग निशिं, जनहुँलौंकगाबीज ।
यहू राहुभा मानहिं, राघव मनहिं पतीजै ॥
अति विचित्र देखों सो ठाढ़ी। चितकी चित्र लीन्ह जिव काढ़ी ॥
सिंहलङ्क कुम्भस्थल जोरू। आंकुश नाग महावत मोरू ॥
तेहि ऊपर भा कमल विकासू। फिर अलिलिन्हहुवै परसबासू ॥
दोहुँ खंजनै विच बैठो सुवा। दुइजका चन्द धनुष लै उवा ॥
मिर्ग१४ दिखाय गवन फिरगया। शँशिभा नाग सूर्य्य भा दिया ॥
सुठ ऊँचे देखत वह उचका । दृष्टि पहुँचकर पहुँच न सका ॥
पहुँची भयो दृष्टि गत भई। गहि२० नसका देखत वह गई ॥
दो० राघव हेरंत जो गयो, अच्छत हिये समाध ।
वैहँ तन राघव बाघभा, सके न कै अपराध ॥
राघव सुनत शीशें भुइँ धरा । युग युग राज भानेंकी किरा ॥
वही किरन वह रूप विशेखी। निश्चय तुम पद्मावत देखी ॥
केहरलङ्क कुम्भस्थल हिया। ग्रीवै मयूर अलंक रवि दिया ॥
कमल बदन श्रौ वाससमीं । खंजन नयन नासिका कीरू ॥
हाथ १ चौदहीं रातका चांद २-३ खिलना ४-११ आसमान ५ रात ६
सूर्य ७-२४-२६ सुरझाना ८ चीता की कमर ९-२५ हाथी १०-२६ मँवरा १२
फूल १३ ममोला १४-३१ हिरन १५ चांद १६ निगाह १७ हाथ १८ देखते
ही चाहा कि आप को पहुँचाऊँ १९ पकड़ना २० देखना २१ तदबीर काम
न आई शेरकी तरह गुस्सा किया २२ शिर २३ गर्दन २७ बाल २८
हवा ३० नाक तोता की ३२ ॥

२७४ पद्मावत ।
भौंहधनुषशशि दुइज ललाटू । सब शनिन ऊपर वह पाटू ॥
सोई मिरगं देखाय जो गयो । वेनी नाग दिया चितभयो ॥
दरपण महँ देखी परछाईं । सोमूरति भीतर जिव नाहीं ॥
दो० सबै श्रृंगार बनी धनि, अब सोलीमाँत कीज ।
अलकँजोलटकीअधरंपर, सोगहि केसरलीज ॥
खण्ड उन्तालीसवां क़ैद होना राजा
रतनसेन का ॥
मीते भा मांगा वेग बेवानू । चला सूरै सँवरा अस्थानू ॥
चलंत पंथै राखा जो पाऊं । कहांरहेथिरें चलत बैठाऊं ॥
पथिकै कहँ कहवां ससताई । पंथै चलै तब पंथ सेराई ॥
छल कीजे दल जहां न आंटों । लीजे फूल टारके कांटा ॥
बहुत मया सुन राजा फूला । चला साथ पहुँचावे भूला ॥
शाह हेत राजा सों बांधा । वात हिलाय लीन्ह गहि कांधा ॥
घिव मँधु सान दीन्ह रससोई । जो मुँह मीठ पेट विष होई ॥
दो० अमिय बचन औ माया, को न मुयो रस भीज ।
शत्रु मरै अमृत जो, तेहि विष काहे दीज ॥
चांद घरहि जो सूरज आवा । होयसो अलोपं अमावसपावा ॥
पूछहिंन खंतेँ मलीनसोमोती । सोरहकला न एकोज्योती ॥
चांद गहन आगाहिं जनावा । राज भूलगहिशाहचलावा ॥
पहिले पँवरै नांघ सो आई । ठाढ़े भये राज पहिराई ॥
चांद १ माथा २ तख्त ३ हिरन ४ चोटी ५ पद्मावत ६-२७ अक़िल ७
ज़ुल्फ़ ८ होंठ ६ पकड़ना १० दोस्त ११ सवारी १२ बादशाह १३ मकान १४
राह १५-१६ क़ायम १६ मुसाफ़िर १७-१८ पहुँचना २० पकड़ना २१ श-
हद २२ मीठीवात २३ दुश्मन २४ छिपजाना २५ तथा सखी २६ ख़बर २८
दरवाज़ा २६ ॥

पद्मावत । २७५
सौ तुषार तीस गज पावा । दुन्दुभिऔचौ घोड़ीदेवावा ॥
दूजे पँवर दिया असवारा । तीजे पँवर नग दीन्ह अपारा ॥
चौथे पँवरदै द्रव्य करोरी । पाँचयें दुइ हीरा की जोरी ॥
दो० छठयें पँवर माड़ो दियो, सतयें दीन्ह चँदेर ।
सात पँवर नांघत नृपति, लेगयों बांध गरेर ॥
यहिजग बहुत नदीजलजोड़ा। कौन पारभा कौन न बूड़ा ॥
कौन अन्धभा आग न देखा। कौन भयो डीठार सरेखां ॥
व्याध भई राजा कहँ माया। तजकैलास परी भुइँ पायाँ ॥
जेहिकारण गढ़कीन्ह अँगूठी। कित छोड़े जो आवै सूठी ॥
शत्रुहि कोउ पाव जो बांधे। छोड़ आपकहँ करै वियोंधे ॥
चारा मेल धरा जस माछू। जलसे विकसमरै जसकाँछू ॥
शत्रुहि नांग पेटारी मूँदा । बांधामिरगै पैगनहिं खूँदा ॥
दो० राजा धरा आनके, तन पहिरावा लोह ।
ऐसो लोह सोपहिरे, चेतैं श्यामकी ओह ॥
पांयन गाढ़ी बेड़ी परी। सांकर ग्रीवैं हाथ हथकड़ी ॥
औ घर बांध मँजूषा मेला। ऐसो शत्रु जनु होयदुहेलाँ ॥
सुनि चितौरमहँ पड़ा बखानौँ। देश देश चारहुँदिशजाना ॥
आजनरायण फिर जग बूँदौँ। आजसोसिंहँ मँजूषौ मूँदा ॥
आज खँसे रावण दशमाथा। आजकान्हेँ कालीफएनाथा॥
आजहिं प्राणकंस कर ढीला। आजमीनैं शंखासुरै लीला ॥
घोड़ा १ हाथी २ डंका ३ बग्धी ४ राजा ५ होशियार ६ जिसलिये ७
घेरना ८ दुश्मन ६-१२ दुख १० कछुवा ११ पैरबँधा हिरन नहीं भागता १३
ग़फ़लतका फल उठाये १४ गर्दन १५ पिंजरा १६-२१ दुखी १७ बयान १८
सख़्ती १६ शेर २० गिरना २२ श्रीकृष्णजी २३ मछली २४ नामदैत्य २५ ॥

२७६ पद्मावत ।
आज परे पाण्डवेँ बँद माहां। आज दुशासनँ उतरी वाहां॥
दो० आज धरा बलराजा, मेला बांध पतार।
आज सूरे दिनअथवा, भाचितौरअँधियार॥
देव सुलेमाँ के बँद परा। जहँलग देव सबहिंसतह्रा॥
शाहलीन्ह गहिकीन्ह पयानाँ। जोजहँशत्रुसोतहांबिलाना॥
खुरासानँ औ डरा हरेवै। कांपा बिदुर्र धरा यस देव॥
बंध उदयगिरि १० धौलौगिरी। कांपी सृष्टि दुहाई फिरी॥
उवा सूर भइ सामहि करा। पालाफूट पानि होय ढरा॥
डँडवी दांड दीन्ह जहँ ताई। आय दण्डवत कीन्ह सवाई॥
द्वंददांडे सब स्वर्गहि गई। भूमि जो डोली इस्स्थिर्र भई॥
दो० वादशाह देहली महँ, आय बैठ सुख पोंटँ।
जेहिंजेहिंशीशँउठावा, धरती धरी ललाटँ॥
हबँशी बन्दवान जिवबधौ। तेहि सौंपा राजा अगदहौँ॥
पीनि पवन कहँ आश करेई। सो जियवधिकैंसांसवहुदेई॥
मांगत पान आग लै धावा। मुँगरी एक आन शिरलाव॥
पानी पवन तुइँ पियासोपिया। अबको आन देय पनिया॥
तब चितौर जिय रहा न तोरे। वादशाह हैं शिर पर मोरे॥
जोहि हँकारेही२४ उठ चलना। सोकितकरोहय कैंरमलना॥
करै सो मीत गाढ़ बँद जहां। पान फूल पहुँचावै तहां॥
दो० जलँ अंजलमहँ सोवा, समुद्र न सँवराजाग।
राजा युधिष्ठिर १ नाम बहादुर २ सूर्य ३ नामबादशाह ४ कूच ५
दुश्मन ६ नाममुल्क ७ से ११ तक। दुनिया १२ आवाज़मुनादी १३ आस-
मान १४ ज़मीन १५ क़ायम १६ तख़्त १७ शिर १८ माथा १९ हबशी
दरोगा क़ैदखाना २० जल्लाद २१ जलाहुवा २२ जानमारनेवाले २३ बो-
लाना २४ हाथ २५ पानीमहँ पियासा २६ ॥

पद्मावत । २७७
अबधरकाढ़ामच्छज्यों, पानी मांगत आग॥
पुनिचल दुइजने पूछन धाये। वै शठ दग्धै आय देखराये॥
तुइँ मेरिपुरी न कबहुं देखी। हाड़ जो बिथरे देखन लेखी॥
जानी नहिं कि होब अस मुहूँ। खोजे खोज न पावब कहूं॥
अब हम उतरें देहुरे देवा। कौने गर्व न मानी सेवा॥
तुइँ अस बहुत गाड़खन मूंदी। बहुर न निकसबारेहोयखूंदी॥
जो जस हँसै सो तैसे रोवा। खेलै हँसै अभी भुइँ सोवा॥
जस अपने मुहँ काढ़ धुवां। चाहेसि परा नरक के कुवां॥
दो० जरेसि मरेसि अब बांधा, तैसो लाग तोहिदोष।
अबहुं मांग पद्मिनी, जो चाहेसिभा मोर्ष॥
पूँछहिं बहुत न बोला राजा। लीन्हेसि जियेमीर्च मनसाजा॥
खनं गड़वा चरनहिं लै राखा। नितउठ दग्धैं होयनौलाखा॥
ठाँवै सो सांकर औ अँधियारा। दूसर करवट लेइ न पारा॥
पीछे सांप आय तहँ मेली। बांका आन छुवावहिं हेली॥
धरहिं सँदौसी छूटै नारी। रात दिवसै दुखपहुँचै भारी॥
जो दुखकठिन न सहै पहारू। सोअँगवाँ मानुषशिरभारू॥
जो शिर परै आय सो सहै। कछु न बिसाय काहसों कहै॥
दो० दुख जारै दुख भूजै, दुख खोवै सब लाज।
काजैहि चाह अधिकदुख, दुखीजानजेहिबाज॥
पद्मावत बिन कंत दुहेली। बिनजलकमलसूखजसंबेली॥
गाढ़ी प्रीति सो मोसों लाई। देहिलीजायनिचितहोयछाई॥
आदमी १ आग २ यमपुरी ३ जंघाच ४ गहूर ५ फेर ६ पाप ७ छूटना
क़ैदसे ८ मौत ६ तंगपिंजरा में क़ैद किया १० जलाना ११ जगह १२
डांग १३ संसी १४ दिन १५ भारी १६ उठाना १७ दुखकों चह जाने जिस
पर पड़े १८ दुखी १६॥

२७८ पद्मावत ।
कोउ न बहुरा पुनि हर देशू । केहि पूछहुँ को कहै सँदेशू ॥
जो कोइ जाय तहां कर होई । जो आवे कुछ जान न सोई ॥
अगम पंथे पिय तहां सिधावा । जोरे गयो सो बहुर न आवां ॥
कुवांदार जल जैसो बिलोवा । डोल भरा नयनहिं वन रोवा ॥
लेजुरि भई नांहिं बिन तोहीं । कुवां परीधर काढेसिमोही ॥
दो० नयन डोल भर ढारै, हिये न आग बुझाय ।
घड़ी घड़ी जियावै, घड़ी घड़ी जिव जाय ॥
नीर गँभीरं कहां हो पिया । तुम बिन फाटै सरवर हियाँ ॥
गयो हेराय बिरह के हाथा । चलत सरोवर लीन्हेन साथा ॥
चरत जो पंखे केलि कर नीरा । नोर कठिन कोउ आवन तीरा ॥
कमल सूख पखुरी बेहिरानी । गलगल कै मिल लौर हेरानी ॥
बिरह रेत कंचन तन लावा । चून चून कै खेह मिलावा ॥
कनकैकै जो कनकनै है बेहिरोई । पिय पै छार समेटो आई ॥
बिरह पवन यहि छार शरीरू । छारहि आन मिलावहु नीरू ॥
दो० अबहुँ जियाविहु के मया, बिथुरी छार समेट ।
नइकायौ अवतरै नव, दर्श तुम्हारे भेट ॥
नयन सीप मोती तस आशू । तंतैं ततपरहिं करत न नाशू ॥
पदक पदारथ पद्मिन नारी । पिय बिन भइ कौड़ी बेरेबारी ॥
सँग ले गयो रतन सब ज्योती । कंचन क्या कांच भइ पोती ॥
बूड़त हों दुख दग्धे गँभीरी । तुम बिन कंत लाव को तीरी ॥
मुश्किल राह १ लौट २ पद्मावत ३ रस्सी ४ खाविन्द ५ छाती ६-६
पानी गहिरा ७ तालाब ८-१० जानवर परिन्द ११ अलग १२-१६ धूर १३-
१६-२० मिलना १४-१५ सोना १७-२७ रेज़ारेज़ा १८ पानी २१ बदन २२
पैदा होना २३ गर्म २४ लाल जवाहर २५ मोल २६ आगमारी २८
किनारा २६ ॥

हिये³ विरह होय चढ़ापहारू। जल यौवन सहसकैन भारू॥
जलमहँ आगिनसोजानि विछूता। पांहन जरहिं होहिं सब चूना ॥
कौने यतन कंत तुम पाऊँ। आज आगहौं जरत बुझाऊँ॥
दो० कौन खण्ड हौं हेरों³, कहां वन्धु हौं नांहिं।
हेरे कतहूँ न पाऊँ, बसै तु हिरदय मांह ॥
नागमती पियपिय रत लागी। निशिदिन तपै मच्छ ज्यों आगी
भँवर भुजंग कहां हो पिया। हम ठेगाँ तुम कानन किया॥
भूल न जाहि कमल के पाहां। बांधत बिलंब न लागैनौहां ॥
कहां सो सूर पास हौं जाऊँ। वींधा भँवर छोर के लाऊँ ॥
कहां जाऊँ को कहै संदेशा। जाऊँ सो तहँ योगिन के भेशा॥
फार पटोरे सो पहिरौं कंथों। जो मोहिं कोउ देखावै पंथों॥
वह पंथे पलकन जाऊँ बुहारी। शीश चरण के चलौं सिधारी ॥
दो० को गुरु अगवा होय सखि, मोहि लावै पंथ मांह ।
तन मन धन बल बल करों, जो रे मिलावै नांहैं॥
कै कै कारण रोवै बाला। जनु टूटहिं मोतिन के माला ॥
रोवत भई न श्वास सँभारा। नयन चुवहिं जनु उरती धारा ॥
जाकर रतन परे पर हाथा। सो अनाथ किमि जीवै नाथा॥
पांचौं रतन वह रतनहि लागी। बेगैं आव पिय रतन सभागी ॥
रही न ज्योति नयन भये खीनी। श्रवण न सुनैं बैनैं तुम लीनी॥
रसनौं रस नहिं एको भावा। नासिकैं और वास नहिं आवा॥
तचत चतुम बिन अंगैं मोहि लागी। पांचौं²⁴ दग्धै विरह अब जागी॥
छाती १ पत्थर २ देखना ३ कैद ४ खाविन्द ५-८-१५ रात ६
दुश्मनी ७ सूर्य ६ सारी १० गुदड़ी ११ राह १२-१३ शिर १४ ताक़त
देखने, सुनने, सूंघने, बोलने, छूने की १६-२४ जल्द १७ रोशनी कम १८
कान १६ आवाज़ २० ज़बान २१ नाक २२ वदन २३ आग २५ ॥

२८० . पद्मावत ।
दो० बिरह सो जार भस्मकै, चहै उड़ावा खेहं ।
आय सो धन पियमिलवे, करलेवे नई नेह ॥
पियबिन व्याकुल व्यापी नागाँ । बिरहा तपनश्याम भये कागा ॥
पवन पानि कहँ शीतल पीउ । जेहि देखे पलुहै तनजीउ ॥
कहँ सो बास मलयौगिरि नाहाँ । जेहि कल परत देत गलवाहा ॥
पद्मिनि ठगनी भइ कित साधा । जेहिते रतन परा पर हाथा ॥
होय बसंत आवहु पियकेसर । देखै फिर फूलै नागेसरं ॥
तुमबिन नाँह रहे हियँ तचा । अब नहिं बिरह गडुरपै बचा ॥
अब अँधियार परामंसि लागी । तुमबिन कौन बुझावै आगि ॥
दो० नयनश्रवणं रसरसनौ, सबै खीनं भये नाँहँ ।
कौन सो दिन जेहि भेंटके, आय करै सुखछाँह ॥
कुंभलनीरेँ राय देवपालू । राजा केर शत्रुँ हियेंशालू ॥
उनपै सुनी कि राजा बांधा । पाछल बैरसँवर छल सांधा ॥
शत्रु शालैँ तब न्योरे सोय । जो घर आव शत्रुँकी जोय ॥
दूती एक बृद्ध तेहि ठाँऊँ । ब्राह्मण जाति कुमोदन नाऊँ ॥
वह हँकौरं के बीरा दीन्हा । तोरे बल मैं बलजिव कीन्हा ॥
तुइँ कुमदनी कमल के नेरे । स्वर्ग जो चाँद बसै तोहि हेरे ॥
चितोर महँ जो पद्मिन रानी । करवलछल सो दै मुहिं आनी ॥
दो० रूप जगत मनमोहन, जेहि पद्मावत नाऊँ ।
कोटि द्रव्य तुहिं देहों, आन करेसि इकठाउँ ॥
कुमदिन कहा देखहों सोहों । मानुष कहा देवता मोहों ॥
. धूर १ रानी नागमती २-६ हरा होना ३ चन्दन ४ खाविन्द ५-७-१३
दिल ८ सियाही ६ कान १० ज़बान ११ कमज़ोर १२ नाममुल्क १४
दुश्मन १५-१८ दिल दुख देनेवाला १६ दुश्मन दुख देनेवालेने चाहा किं
जैसे बनपड़े १७ जगह १८ बुलाया २० आसमान २१ नज़र २२ ॥

पद्मावत। २८१
जस कामरू चमारिन लोना । कौनहिं छल पढ़त कै टोना ॥
विषहर नाचहिं पढ़तें मारी । औथर मूंदे घाल पेटारी ॥
बृक्षै चलैं पढ़तें के बोला । नदी उलटवहि परबत डोला ॥
पढ़त हरि पण्डित मतिघेरी । और को अन्धगूं ग औबहिरी ॥
पढ़त ऐसे देवतहिं लागा । मानुष का पढ़त सों भागा ॥
पढ़त कै हठ काढत पानी । कहां जाय पद्मावत रानी ॥
दो० दूती बहुत पैंचे कै बोली पढ़त बोल ।
जाकर सत सुमेरु है, लागे जगत न डोल ॥
दूती बहुत पकावन सांधी । मोतिन लड्डू खरोरा बांधी ॥
माठ पेराकें पेठे पापर । पहिर बूझ दूती के कापर ॥
लै पूरी भरडाल अनूती । चितौर चली पैंचैं कै दूती ॥
वृद्ध बैस जो बांधे पाऊं । कहां सो यौवन कित बोसाऊं ॥
तन बूढ़ा मन बूढ़ न होई । बल न रहा लालच जें होई ॥
कहां सो रूप जगंत सबरातौ । कहां सो गर्व हस्ति जसमाता ॥
कहां सो तीर्ष नयन तनठाढ़ा । सबै मार यौवन पुनि काढ़ा ॥
दो० मुहम्मद वृद्ध जो नइचलै, काह चलै भुंइ टोइ ।
यौवन रतन हेरान है, संकै धरती महँ होय ॥
आय कुमोदनि चितौर चढ़ी । जोहन मोहन पढ़त पढ़ी ॥
पूछ लीह रनवास बरोठा । पैठ पँवरै भीतर बहु कोठा ॥
जहँ पद्मावत शशि उजियारी । लै दूती पकेवान उतारी ॥
हाथ पसार धाय के भेंटी । चीन्ही नहिं राजा की बेटी ॥
सांप १ मन्त्र २-४ पेड़ ३ क़ौलमज़बूत ५-८ ईमान, ६ मोतीचूरके ल-
डुआ ७ खरीदार ६ दुनिया १० लाल ११ शहर १२ हाथी १३ कट ली १४
शायद १५ बहुत तरह के मन्त्र १६ दरवाज़ा १७ चांद १८ ॥