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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

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पृष्ठ 267

२६६ पद्मावत ।
दो० शाह मंदिर अस देखा, जनु कैलास अनूपे ।
जाकर अस धौराहरं, सो रानी केहिरूप ॥
नांघत पौंवेरै गये खण्ड साता । सतयें भूमि बिम्बावन राताँ ॥
आंगन शाह ठाढ़भा आय । मंदिर छांह अति शीतल पाय ॥
चहूँ पास फुलवारी बारी । माझँ सिंहासन धरा सँवारी ॥
जनु वसन्त फूला सब सोने । हँसाहिं फूल विकसहिं फर लोने ॥
जहां जो ठांव दृष्टिमहँ आवा । दर्पण भाव दरश दिखरावा ॥
तहां पौंट राखा सुलतानी । बैठ शाह मन जहां सो रानी ॥
कमल सुभाय सूरै सों हँसा । सूरका मन चांदें पहँ बसा ॥
दो० सोपै जानै नयन रस, हिरदयँ प्रेम अँगूर ।
चन्द जो बसै चकोरचित, नयन हि आव न सूरै ॥
रानी धौराहरै उपराहीं । करहिं दृष्टि नहिं करहिं तराहीं ॥
सखी सरेखी १७ साथहिं बैठी । तपै सूर शशि आव न दीठी २० ॥
राजा सेव करै करें जोरे । आज शाह घर आवा मोरे ॥
नट नाटक पतुरनि औ बाजा । आय अखाड़ सबै महँ साजा ॥
प्रेमक लुब्धै बहिर औ अन्धा । नाच कूद जानहु सब धन्धा ॥
जानहु काठ नचावै कोई । जोजें नाच न परगटै होई ॥
परगट कहि राजा सों बाता । गुँसै प्रेम पद्मावत राताँ ॥
दो० गीत नाद जस धन्धा, दहकै विरह की आंच ।
मन की डोर लागत हँ ठाईं, जहां सो गँहि पुनि २ खांच ॥
बेमिसाल १ महल २-१५-१८ दरवाज़ा ३ ज़मीन ४ लाल ५-२५ ठंडा ६
बीचोबीच ७ खिलना ८ खूबसूरत ६ तख़्त १० सूर्य ११-१४-१८ तथा पद्मा-
वत १२ दिल १३ निगाह १६-२० होशियार १७ चांद १६ हाथ २१ भरा-
हुआ २२ ज़ाहिर २३ छिपा २४ जलना २६ पकड़ना २७ रस्सी २८ ॥