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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

हिन्दी निरुक्त ( १३४ ) ५ अ० १ पा० ४ खं०
“विश्वेत्ता विष्णुराभरदुरुक्रमस्त्वेषितः ।
शतं महिषान्क्षीरपाकमोदनं वराहमिन्द्र
एमूषम्” (ऋ० सं० ६, ५, ३०, ४)
‘उरुक्रमः’ बहुत पराक्रम वाले ‘त्वेषितः’ इन्द्र वाक्य से
उत्तेजित ‘इन्द्रः’ ऐश्वर्यवान् ‘विष्णुः’ विष्णुने ‘ता’ (तानि) ‘विश्वा’
(विश्वानि) ‘इत्’ एव उन सबी धनोंको ‘आभरत्’ आहरण
किया किन धनोंको लाया? ‘शतं-महिषान्’ सौ (१००) भैंसोंको,
‘क्षीरपाकम्’ दूधपाक, ‘ओदनम्’ भात ‘ एमूषम् ’ मोह करने
वाले ‘ वराहम् ’ सूकर को ( लाया ) । यह भी निगम है ।
यहां धनोंके लाने के प्रसंगमें ‘वराह’ शब्द प्रसिद्ध वराह
(सूकर) का ही नाम हो सकता है । इस मन्त्र में “त्वेषितः”
पदमें ‘त्वा-इषितः’ ऐसा पद विभाग होकता है, तो भी अर्थ
के अनुरोध से एक पद करके ही निर्वचन किया है ॥
(निरु०-] अङ्गिरसोऽपि वराहा उच्यन्ते ।
“ब्रह्मणस्पति वृषभिर्वराहैः” (ऋ०सं०८, २, १६, १) ।
अर्थः- अङ्गिरस् भी वराह कहे जाते हैं।
“ ‘वृषभिः’ कामनाओं के बरसने वाले ‘वराहैः’ यज्ञ में
बैठने वाले अङ्गिरसों से सहित ‘ब्रह्मणस्पतिः’ इन्द्र”
यद्यपि इस मन्त्र में ‘वराह’ शब्द के अङ्गिरस्-वाचक
होने में कोई लिङ्ग नहीं है, तो भी इस मन्त्र वाले सूक्त में
“विप्रं पदमङ्गिरसो दधानाः०” [ऋ० सं० ८, २, १५, २]
ऋचा में ‘अङ्गिरस्’ पद का उपादान है ॥
(निरु०-) अथापि माध्यमिका देवगणा वराहवः
उच्यन्ते ।

हिन्दी निरुक्त ( १३५ ) ५ अ० १ पा० ५ खं०
“पश्यन्हिरण्यचक्रानयोदंष्ट्रान्विधावतोवराहून्”
(ऋ०सं० १, ६, १४, ५) ॥४॥
अर्थः-और भी मध्यम लोक के देव-गण 'वराहु' कहे
जाते हैं।
“हे मरुत् देवगणों ! गोतम ऋषि तुम्हें 'हिरण्यचक्रान्'
सोने के चक्रवालों, 'अयोदंष्ट्रान्' लोहे के रथ वालों, 'विधा-
वतः' नाना प्रकार दौड़ते हुओं 'वराहू' वराहु नाम वालों
को 'पश्यन्' (स्तौति) स्तुति करता है” ॥ ४ ॥
(खं० ५)
(निघ०-) स्वसराणि ॥२२॥
(निरु०) स्वमराणि अहानि भवन्ति । स्वयं सा-
रीणि । अपिवा स्व-आदित्यो भवति, सः एनानि
सारयति ।
“उस्रा इव स्वसराणि” । (ऋ० सं० १, १, ६, २)
इत्यपि निगमो भवति ।
'स्वसराणि' (२२) यह अनवगत है । 'स्वयंशारीणि' यह अवगम है ।
'अहानि' (दिन) अर्थ कथन है ।
अर्थः-'स्वसर' अहन् (दिन) होते हैं। क्योंकि-वे स्वयम्
(आप) सरण (गमन) करते हैं, या आपसे आप चले जाते हैं ।
अथवा 'स्वर' आदित्य होता है, वह इन को सारण
करता (चलाता) है ।
“उस्रा इव स्वसराणि” अर्थात्-“'इव' जिस प्रकार
'उस्राः' रश्मियें 'स्वसराणि' (अहानि) दिनों के प्रति ( शीघ्र

हिन्दी निरुक्त (१३७) ५ अ० १ पा० ६ खं०
अर्को मन्त्रो भवति यद्-अनेन अर्चन्ति ।
अर्कम्-अन्नं भवति, अर्चति भूतानि ।
अर्को वृक्षो भवति संवृतः कटुकिम्ना ॥५ (४) ॥
‘अर्क’ (२४) यह शब्द अनेकार्थ है ।
अर्थ-‘अर्क’ देव होता है । क्योंकि-इसे सब पूजते हैं ।
‘अर्क’ मन्त्र होता है । क्योंकि-इस से अर्चन ( पूजन )
करते हैं ।
‘अर्क’ अन्न होता है । क्योंकि-वह भूतों ( प्राणियों )
को अर्चता ( पूजता ) है ।
‘अर्क’ वृक्ष ( आक ) होता है, क्योंकि-वह कडुवे पन से
व्याप्त होता है ॥ ५ ( ४ ) ॥
( खं० ६ )
[निरु०] “गायन्ति त्वा गायत्रिणोऽर्चन्त्यर्कमर्किणः,
ब्रह्माणस्त्वा शतक्रत उद्वंशमिव येमिरे ॥” ( ऋ०
सं० १, १, १९, १, ) गायन्ति त्वा गायत्रिणः,
प्रार्चन्ति ते अर्कम्-अर्किणो ब्राह्मणाः । त्वा शत-
क्रतो ! उद्येमिरे वंशमिव ।
वंशः, वनशयोभवति। वननात् श्रूयते इतिवा ॥
‘अर्क’ शब्द के देव और मन्त्र अर्थ में निगम—
अर्थ- “गायन्ति त्वा०” अर्थात्-हे भगवन् ! इन्द्र !
‘गायत्रिणः’ ( सामगाः ) साम-गान करने वाले स्तुतियों द्वारा
‘गायन्ति’ गाते हैं । ‘अर्किणः’ ( मन्त्रिणो होतारः ) मन्त्रों
वाले होता लोग ‘अर्कम्’ तुझ अर्चनीय को ‘अर्चन्ति’ प्रार्चन्ति
ऋचाओं द्वारा पूजते हैं । ‘ ब्रह्माणः ’ ( ब्राह्मणाः ) ये सब
१८

हिन्दी निरुक्त ( १३८ ) ५ अ० १ पा० ६ खं०
ब्राह्मण यज्ञ कर्म में 'शतक्रतो' हे इन्द्र ! 'त्वा' तुझे 'वंशम्-इव'
बांस को जैसे 'उद्येमिरे' उठाते हैं। अर्थात् स्तुतियों और
हवियों से तेरी हो महिमा को बढ़ाते हैं। इस प्रकार यहां
'अर्क' शब्द से “अर्कम्” इस पदमें देवअर्थ और “अर्किणः”
पद में मन्त्र अर्थ है।
'अर्क' शब्द का वृक्ष या आक अर्थ प्रसिद्ध ही है, इस से
उस का निगम नहीं दिया ।
[निघ०-] पविः ॥ २५ ॥
[निरु०] 'पविः' (२५) रथनेमिर्भवति । यद्विपुनाति
भूमिम् ।
“उत पव्या रथानामद्रिं भिन्दन्त्योजसा ।”
( ऋ० सं० ४, ३, ९, ४, )
“तं मरुतः क्षुरपविनाव्ययुः” इत्यपिनिगमौ
भवतः ॥
अर्थ-'पवि' ( २५ ) शब्द अनवगत है, और रथ की
नेमि (पूठी या पृथ्वी में टिकने वाली पहिये की धार)
का नाम है। क्योंकि-वह पृथ्वी को पवित्र करती या खोद
देती है।
“हे मरुतो ! 'उत' और 'रथानाम्' रथों की 'पव्या'
पूठी से 'अद्रिम्' (मेघम्) मेघ को तुम 'ओजसा' बल से
'भिन्दन्ति' भेदन कर देते हो । ( पुरुष का व्यत्यय वैदिक
है ) ॥”
“ 'मरुतः' मरुतों ने 'तम्' उस मेघ को 'क्षुरपविना' खुरे

हिन्दी निरुक्त (१३६) ५ अ० १ पा० ६ खं०
के समान पैनी पूठी से 'व्ययुः' भेदन कर दिया।" ये भी
निगम हैं। (यहां रथ और भेदन क्रिया के सम्बन्ध से 'पवि'
शब्द का नेमि (पूठी) अर्थ है)।
(निघ०-) वक्षः ॥२६॥
[निरु०] 'वक्षो' व्याख्यातम् ।
अर्थ-'वक्षः' (२६) इस शब्द का “उपो अदर्शि शु-
न्ध्यवः” (नि० अ० ४ पा० २ खं० ८) मन्त्र पर व्याख्यान
किया जा चुका है ॥
[निघ०-] धन्व ॥२७॥
[निरु०] 'धन्व' अन्तरिक्षम् । धन्वन्ति-अस्मात्
आपः ।
“तिरो॒धन्वा॑तिरोचते” (ऋ० सं० ८,८,४५,२)
इत्यपि निगमो भवति ॥
धन्व (२७) शब्द अनवगत है।
'धन्व' (२७) क्या ? अन्तरिक्ष । क्यों ? इससे जल गिरते
हैं। क्या निगम है ! “तिरो धन्वातिरोचते” अर्थात्-जो
आदित्यरूप अग्नि 'तिरः' अतिविस्तार युक्त 'धन्व' आकाश
देशको 'अति' अतीत्य, लांघ करके 'रोचते' हमारे प्रति प्रकाश
करता है। यह भी निगम है। (यहां आदित्य की स्तुति के
संबन्ध से 'धन्व' अन्तरिक्ष (आकाश) का नाम है) ॥
[निघ०-] सिनम् ॥ २८ ॥
(निरु०-) सिनम्-अन्नं भवति । सिनाति भूतानि ।

हिन्दी निरुक्त ( १४० ) ५ अ० १पा० ६ खं०
“येन स्मा सिनं भरथःसखिभ्यः” (ऋ०सं०३,४,९,१)
इत्यपि निगमो भवति ॥
‘सिन’ (२८) शब्द अनवगत है । ‘सिनाति’ (बांधता है) यह शब्दयुक्ति
है । ‘अन्न भवति’ (अन्न है) यह अभिधेय (अर्थ) वचन है ।
अर्थ- ‘ सिन ’ अन्न होता है । क्योंकि-वह सब भूतों
( प्राणियों ) को सींता ( बांधता ) है ।
हे इन्द्रावरुणा देवो ! ‘ येन ’ जिस माहाभाग्य ( बड़ी
महिमा ) के कारण ( युवाम् ) तुम दोनों ‘ सखिभ्यः ’ समान
ज्ञान वाले यजमानों के लिये ‘सिनम् ’ ( अन्नम् ) अन्न को
‘भरथः’ पूरते हो ( ‘स्म’ पाद् पूरण है ।) ॥ यह भी निगम है
अन्न को ही प्राय करके यजमान मांगते हैं, इस लिए
यही ‘सिन’ शब्द अन्न का ही वाचक होता है ।
‘धन्व’ और ‘सिन’ इत्यादि कई शब्द अपने २ अर्थ में
नैघण्टुक प्रकरण में भी पढे गए हैं,तो भी यहां (नैगमकाण्ड में)
कोई अनवगत संस्कार होनेके कारण और कोई अनेकार्थ होने
के कारण पढ़ेगए हैं ॥
[निघ०] इत्था ॥२६॥
(निरु०) ‘इत्था’‘अमुथा’-इत्येतेन व्याख्यातम्॥५॥
अर्थः-‘इत्था’ ( २६ ) यह निपात है । इस की व्याख्या
‘अमुथा’ ( ३, १६ ) शब्द के समान है ।
(निघ०-) सचा ॥ ३० ॥
[निरु०-] ‘सचा’ सह-इत्यर्थः ।
“वसुभिः सचा भुवा ” ( ऋ० सं०६, ३, १४, १ )

हिन्दी निरुक्त ( १४१ ) ५ अ० १ पा० ६ खं०
वसुभिः सह भुवौ ॥
'सचा' यह निपात अप्रतीतार्थ (अर्थानवगत) है।
'सचा' सह (साथ) यह अर्थ है।
हे अश्विनौ ! अश्विनों ! 'वसुभिः' वसु देवताओं से
'सचा' भुवा (सहभुवौ) सहित होकर (इस सोम को पीओ,
और हमारे अभिप्रेत अर्थ को सिद्ध करो ।) ॥
[निघ०-] चित् ॥ ३१ ॥
[ निरु०- ] 'चित्' इति अनुदात्तः । पुरस्तादेव
व्याख्यातः ।
अथापि पशुनाम इह भवति उदात्तः ।
“ चिदसि मनासि धीरसि ”
चितास्त्वयि भोगाः । चेतयसे इति वा ॥
अर्थः-'चित्' (३१) यह निपात अनुदात्त-स्वर है।
पहिले (नि० अ० १ पा० २ खं० ३) व्याख्यान किया गया
है। अनेकार्थ है।
और उदात्त (आदि-उदात्त) होकर यहां पर [राज-
ऋयणी गोकी स्तुति में- ] पशु का नाम भी होता है।
हे गौः! ('त्वं') तू 'चित्' भोगसाधनी 'असि' है। 'मनासि'
मान्य है। 'धीः-असि' ध्याई जाती (ध्यान की जाती) है।
'चित्' क्यों ? तुझमें सब भोग संचित हैं। अथवा तू घृत,
दूध आदि के दान से मनुष्यों को चेताती है।
(निघ०-) आ ॥ ३२ ॥
[निरु०-] 'आ' इति आकार उपसर्गः, पुरस्तात्-

हिन्दी निरुक्त ( १४२ ) ५ अ० १ पा० ६-७
एव व्याख्यातः ।
अथापि अध्यर्थे दृश्यते ।
“अभ्र आँ अपः । ” (ऋ० सं० ४,३,२,१) ।
अभ्रे आ अपोऽपोऽभ्रेऽधीति ॥
अर्थः- ‘आ’ ( ३३ ) यह उपसर्ग पहिले ही ( नि०
अ० १ पा० १ खं ५ ) व्याख्यान किया जा चुका है- । ( 'आ'
इति अर्वागर्थे । ) ( “अथापि उपमार्थे दृश्यते” “जार
आ भगम् । ” इत्यादि ।
यही कदाचित् 'अधि' के अर्थ (उपरिभाव या ऐश्वर्य्य)
में होता है । निगम—
“ अभ्र आँ अपः ” जो ही ‘अभ्रे आ अपः’ वाक्य
से कहा गया होता है, वही ‘ अपः अभ्रे अधि’ से । अर्थात्
‘अभ्रे’ मेघ के ‘आ’ ( अधि ) ऊपर ‘अपः’ जलों को ( वित-
नोति ) विस्तार करती है ।
जल मेघ के ऊपर ही रहते हैं, इससे यहां ‘आ’ ‘अधि’के
अर्थ में निश्चित होता है ॥
(निघ०-) द्युम्नम् ॥३३॥
(निरु०-) ‘द्युम्नं’ द्योततेः । यशोवा । अन्नंवा ।
“अस्मे द्युम्नमधिरत्नं च धेहि” [ऋ०सं०५,३,९,३)
अस्मासु द्युम्नं च रत्नं च धेहि ॥ ६ (५) ॥
इति पञ्चमाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥ ५, १ ॥
‘द्युम्न’ (३३) शब्द अनेकार्थ है । ‘द्योतते’ (प्रकाशता है) यह शब्द-प्रतीति
है । “यशो वा” अथवा यश “अन्नंवा” अथवा अन्न यह अर्थ कथन है ।

हिन्दी निरुक्त (१४३) ५ अ० २पा० १ खं०
'द्युम्न' कैसे ? 'द्युत' (स्वा० आ०) धातु से । यह क्या ?
अथवा यश है, (क्यों? 'द्योतते' वह चमकता है ।) अथवा
अन्न है । (क्यों ? 'द्योतते' उसे खाने वाला प्रकाशमान
होता है ।)
“अस्मेद्युम्न०” हे इन्द्र ! 'अस्मे' (अस्मासु) हम में
'द्युम्नम्' यश या अन्न को 'च' और 'रत्नम्' रत्न को 'धेहि'
धारण कर ॥
यहां आशीः (प्रार्थना) के सम्बन्ध से द्युम्न नाम अन्न
या यश का होता है ॥ ६ (५) ॥
इति पञ्चमाध्याये प्रथमः पादः समाप्तः ॥ ५, १ ॥
:द्वितीयः पादः ।
(खं० १)
[निघ०-] पवित्रम् ॥३४॥ तोदः ॥३५॥
(निरु०) पवित्रं पुनातेः । मन्त्रः पवित्रमुच्यते ।
“येन देवाः पवित्रेणात्मानं पुनते सदा ॥” (सा०
सं० उ० आ० ५, २, ८, ५) इत्यपि निगमो भवति ।
रश्मयः पवित्रमुच्यन्ते ।
“गभस्तिपूतः” “गभस्तिपूतो नृभिरद्रिभिःसुतः”
(ऋ० सं० ७, ३, १८, ४) इत्यपि निगमौ भवतः ।
आपः पवित्र मुच्यन्ते ।
“शतपवित्राः स्वधया मदन्तीः ॥” (ऋ०सं० ५,
४, १४, ३) । बहूदकाः ॥

हिन्दी निरुक्त ( १४४ ) ५ अ०२ पा० १ खं०

अग्निः पवित्र मुच्यते । वायुः पवित्र मुच्यते ।
सोमः पवित्रमुच्यते । सूर्य्यः पवित्रमुच्यते । इन्द्रः
पवित्रमुच्यते ।
“अग्निः पवित्रं स मा पुनातु वायुः सोमः सूर्य्य
इन्द्रः पवित्रं ते मा पुनन्तु” इत्यपि निगमो भवति ।
तोदः, तुद्यतेः ॥१ (६) ॥
‘पवित्र’ (३४) अनेकार्थ है । “पुनाते.” यह धातु का निर्देश निर्वचन के
अभिप्राय से है । क्यों कि-वह पवित्र करता है । “मन्त्र पवित्रम्-उच्यते”
(मन्त्र ‘पवित्र’ कहलाता है) इत्यादि अर्थ का कथन है ।
अर्थ-‘पवित्र’ (३४) शब्द ‘पुनाति’ (‘पूञ्’ पवने क्र्या०
प० ) धातु से है । मन्त्र ‘पवित्र’ कहा जाता है ।
“ ‘येन’ जिस ‘पवित्रेण’ पावन मन्त्र से ‘देवाः’ ऋत्विज्
और यजमान ‘सदा’ सदा ‘आत्मानम्’ अपनेको ‘पुनते’ पवित्र
करते हैं” यह भी निगम होता है । इस मन्त्र में ‘देव’ शब्द
स्तुत्यर्थक दिव् (दि० प०) धातु से ऋत्विज् और यजमान का
वाचक है, क्योंकि मुख्य देवता निष्पाप होते हैं, उनका अपने
को पवित्र करना संभव नहीं । “न च वै देवान् पापं
गच्छति” ‘देवताओं को पाप स्पर्श नहीं करता’ यह ब्राह्मण
वाक्य है ।
रश्मिएं (किरणें) पवित्र कहलाती हैं । क्योंकि-वे स्पर्श
से ही पवित्र करती हैं ।
“गभस्तिपूतः” रश्मियों (किरणों) से पवित्र हुआ हुआ ।
“गभस्तिपूतः” किरणों से पवित्र हुआ हुआ “नृभिः”

हिन्दी निरुक्त ( ०१४५ ) ५ अ० २पा० २ खं०
मनुष्यों से “अद्रिभिः” पत्थरों के द्वारा “सुतः” कुटाहुआ
हुआ” ये भी दो निगम होते हैं । इन मन्त्रों में किरणों की
पावनता कही गई है, इससे किरण 'पवित्र' हैं ।
अप् ( जल ) पवित्र कहे जाते हैं । क्योंकि-वे भी पवित्र
करती हैं । “ ‘ शत पवित्राः ’ ( बहूदकाः ) बहुत जलवालीं
‘ स्वधया ’ अन्न के सहित हुई हुईं ‘ मदन्ती ’ मद ( हर्ष )
देतीं हुईं ”
इस मन्त्र में ‘पवित्र’ नाम जलका है ।
अग्नि ‘पवित्र’ कहा जाता है । वायु ‘पवित्र’ कहाजाता
है । सोम ‘पवित्र’ कहा जाता है । सूर्य्य ‘पवित्र’ कहा जाता
है । इन्द्र ‘ पवित्र ’ कहाजाता है । क्योंकि-ये सभी पवित्र
करते हैं ।
“ अग्नि पवित्र है, वह मुझे पवित्र करे । वायु, सोम
सूर्य्य, इन्द्रये पवित्र हैं, वे सब मुझे पवित्र करे ॥ ” यह
भी निगम होता है ॥
‘तोद्’ (३५) यह शब्द अनवगत है । 'तुद ' यह अनवगम है । 'तुद्यते' यह
व्यथन (पीड़ा) अर्थ का वाचक 'तुद' (तु० उ०) धातुका निर्देश है । भूमिक्रा
बिल 'तोद' कहलाता है । क्योंकि—तुन्न (खुदाहुआ) होता है । कोई 'तोद'
कूप (कूए) को कहते हैं ।
‘ तुद् ’ शब्द पीड़ार्थक ‘ तुद् ’ ( तु० उ० ) धातु से
है ॥ १ (६) ॥
( खं० २ )
(निघ०-) स्वञ्चाः ॥ ३६ ॥ शिपिविष्टः
॥ ३७ ॥ विष्णुः ॥ ३८ ॥
१६

हिन्दी निरुक्त ( १४६ ) ५ अ० २ पा० २ खं०
(निरु०-) “पुरु त्वा दाश्वान्वोचेऽरिरमे तवस्विदा ।
तोदस्येव शरण आमहस्य ॥” (ऋ०सं०२,२,१९,१) ॥
बहुदाश्वांस्त्वामेव अभिह्वयामि ॥
अरिः अमित्रः । ऋच्छतेः । ईश्वरोऽपि अरिः
एतस्मादेव । यदन्यदेवतया अग्नौ आहुतयो हूयन्ते
इत्येतद् दृष्ट्वा एवम् अवक्ष्यत् ॥ “तोदस्येव शरण
आमहस्य” तुदस्येव शरणे ऽधिमहतः ।
स्वञ्चाः सु अञ्चनः ।
“ आजुह्वानो घृतपृष्ठः स्वञ्चाः” । ( ऋ० सं०
४, २, ८, १ ) इत्यपि निगमो भवति ।
शिपिविष्टो विष्णुः, इति विष्णोर्द्वे नामनी
भवतः । कुत्सितार्थीयं पूर्वं भवति, इति-औप-
मन्यवः ॥ २ ( ७ ) ॥
अर्थः-“ 'अग्ने' हे अग्नि देव ! ' पुरु' -'दाश्वान्' बहुत
देने वाला ( अहम् ) मैं 'त्वा ' तुझे ' वोचे ' ( आह्वयामि )
बुलाता हूं । क्योंकि-' स्वित् आ ' बहुत काल तक विचार
पूर्वक 'तोदस्य' ( कूपस्य कूप के ' शरणे ' ( बिले ) बिलके
( अधि ) ऊपर 'इव' जैसे, अपने में अन्य अन्य देवताओं की
आहुतियों के ग्रहणमें 'महस्य' ( महतः ) महान् के 'तव' तेरे
( स्तोमों के उच्चारणमें ) ' अरिः ' (समर्थः) समर्थ हूँ ॥ ”
बहु दाता ( मैं ) तुझे ही बुलाता हूं ।
'अरि' अमित्र ( शत्रु ) होता है । हिंसाार्थक ' ऋच्छ '

हिन्दी निरुक्त ( १४७ ) ५ अ० २ पा० २ खं०
( भ्वा० प० ) धातु से है । ईश्वर ( समर्थ ) भी 'अरि' इसी से
है । जिससे कि अग्नि में अन्य अन्य देवताओं की असंख्य
आहुतियाँ होती जाती हैं, ( किन्तु अग्नि की ग्रहण (दाह)
शक्ति क्षीण नहीं होती) यही देखकर ऋषिने कहा होगा, कि
"तोदस्येव शरणे आ महस्य" अर्थात्-जिस प्रकार किसी
कूपके (शरण) छिद्रके (आ अधि) ऊपर डाले हुए पानी कहीं
भी चले जाते है, उसी प्रकार हे अग्ने ! तुझ में मेरी हुई
असंख्य आहुतियाँ लीन होजाती हैं, इसीसे तू (मह) महान्
है, और इसीसे अन्य देवताओं को छोड़कर तुझे ही आवाहन
करता हूं ।
"स्वञ्चाः" (३६) क्या ? 'सु अञ्चनः' सुन्दर गमन
करने वाला ।
"आजुह्वानः" संमुख भाव से बुलाया जाता हुआ,
"घृतपृष्ठः" जिसकी पीठ पर घृत है, "स्वञ्चाः" शोभन
गमन करने वाला अग्नि ("भानुना सूर्यस्य यतते"
अपनें तेजसे सूर्यके साथ मिलता है ।) ॥ "यह भी निगम है ।
यहां सूर्य के साथ मिलने के कथन से 'स्वञ्चा' शब्द 'स्वञ्चन
इस शब्द प्रतीति के द्वारा गत्यर्थक 'अञ्च' ( भ्वा० प० ) धातु
से है, यह उपपन्न होता है ॥
"शिपिविष्टः" (३७) "विष्णुः" (३८) ये दो विष्णु के ही
नाम हैं । (इनमें 'शिपिविष्ट' शब्द गुह्य (विशेषता) नवगत है
और अत से अनेकार्थ है । 'शिपिविष्ट' (शेप इव निर्वेष्टितः
पुरुषचिन्ह के समान लिपटा हुआ है, यह अर्थ की प्रतीतिहै
इसी शब्दके सम्बन्ध से 'विष्णु' शब्द समाम्नान किया (पढ़ा)
गया है । जैसे "अक्ताः' के सम्बन्ध से "रोचः" "संमोधक्ताः)

हिन्दी निरुक्त ( १४८ ) ५ अ० २ पा० ३ खं०
इन दोनों में जो पूर्व ( पहिला ) नाम ( शिपिविष्ट ) है, वह
निन्दित अर्थ का वाचक है,–यह उपमन्यु का पुत्र आचार्य
मानता है ॥ २ ( ७ ) ॥
( खं० ३ )
“किमित्ते विष्णो परिचक्ष्यं भूत् प्रयदवक्षे शि-
पिविष्टो अस्मि । मा वर्पो अस्मदपगूह एतद्यदन्य-
रूपः समिथे बभूथ ॥” (ऋ० सं० ५, ६, २५, ६)
किंते विष्णो अप्रख्यातमेतद् भवति अप्रख्या-
पनीयम्, यन्नः प्रब्रूषे शेप इव निर्वेष्टितोऽस्मि इति ।
अप्रतिपन्नरश्मिः अपिवा प्रशंसा नामैव अभिप्रेतं
स्यात् किंते विष्णो प्रख्यातमेतद् भवति प्रख्या-
पनीयं, यदुत प्रब्रूषे शिपिविष्टोऽस्मि-इति प्रतिपन्न-
रश्मिः । शिपयोऽत्र रश्मयः उच्यन्ते, तैः आंवि-
ष्टो भवति ।
“मा वर्पो अस्मदपगूह एतत्”
वर्ण इति रूप नाम वृणोति-इति सतः । यद्-
न्यरूपः समिथे संग्रामे भवसि संयतरश्मिः । तस्यो-
त्तरा भूयसे निर्वचनाय ॥ ३ ( ८ ) ॥
‘शिपिविष्ट’ शब्द का निन्दा अर्थ मे उदाहरण—
“किमित्ते०” तेरा क्या रूप है ? इस प्रश्नके उत्तर मे ‘मै शिपिविष्ट (पुरुष
चिन्ह के समान) हू ऐसा कहे जाने पर यह मन्त्र आरम्भ होता है ।
‘विष्णो’ हे विष्णुदेव ! ‘किम्’ क्या ‘इत्’ (एतत्एव) यही

हिन्दी निरुक्त ( १४६ ) ५ अ० २ पा० ३ खं०
'ते' तेरा 'परिचक्ष्यम्। (प्रख्यापनीयम्) बताने योग्य (रूप) भूत्
(भवति) है, (किन्तु और नहीं ?) 'यत्' जिस से 'प्र-ववक्षे'
कहता है—'शिपिविष्टः अस्मि' शिपिविष्ट हूं । (क्यों कि-
उदयकाल में जब तक कि-किरणों नहीं फूटती हैं, तब तक सूर्य
शेप या पुरुष के चिन्ह के समान होता है । इसी से वह अप्र-
ख्यात या अप्रख्यापनीय या न बताने योग्य है।) इसी से
हम कहते हैं—'मा' मत 'वर्षः' यह रूप (दिखाओ ) अपितु
'अस्मत्' हमारे आगे से 'एतत्' यह रूप 'अपगूह' छिपाओ ।
और 'यत्' जो या जैसा कि-तू 'समिये' (संग्रामे ) संग्राम में
'अन्यरूपः' दूसरे प्रकार के रूप वाला अर्थात्-रश्मिजाल युक्त
( प्रदीप्तरूप ) 'बभूथ' होता है, वह रूप दिखा ।
निरुक्तार्थः-हे विष्णो ! क्या तेरा यह अप्रख्यात या
अप्रख्यापनीय (नहीं प्रकट करने योग्य ) ही रूप है, जो तू
हमारे सामने कहता है-शेप (लिङ्ग) के समान लिपटा हुआ
हूं, यह-अप्रतिपन्नरश्मि (किरणों को नहीं प्राप्त हुआ हुआ)
अथवा प्रशंसा का नाम ही समझा जा सकता है-हे विष्णो !
क्या तेरा यही प्रख्यात या प्रख्यापनीय ( बताने योग्य ) रूप
है, जो तू कहता है-मैं शिपिविष्ट (प्रतिपन्नरश्मि) या बाल
किरणों वाला हूं । इस पक्ष में 'शिपि' नाम से किरणें कही
जाती हैं, उनसे आविष्ट या प्रवेश किया हुआ है ।
“मत यह रूप दिखाओ, किन्तु हमसे यह छिपाओ ।”

  • 'वर्षः' यह रूप का नाम 'वृणोति' (ढकलेता है) (वृञ्
    स्वा० उ०) कर्त्तृवाच्य धातु का है। जो अन्य रूपवाला तू
  • यहां 'वर्षः' शब्द का निर्वचन 'रूप' के पर्याय होने से
    किया गया ।

हिन्दी निरुक्त ( १५० ) ५ अ० २पा० ४ खं०
संग्राम में संयतरश्मि ( किरणों के जालों से युक्त ) होता है ।
उसके ( प्रशंसा पक्षमें ) बहुत अधिक निर्वचन के लिये अगली
ऋचा है ॥ ३ (८) ॥
( खं० ४ )
[निघ०-] आघृणिः॥३६॥ पृथुज्रयाः ॥४०॥
(निरु०) “प्रतत्ते अद्य शिपिविष्ट नामार्यः शंसामि
वयुनानि विद्वान् । तन्त्वा गृणामि तवसमत्व्या
न्क्षयन्तमस्य रजसः पराके ॥” (ऋ० सं० ५,
६, २५, ५)
तत्ते अद्य शिपिविष्ट ! नामार्यः प्रशंसामि, अ-
र्योऽहमस्मि-ईश्वरः स्तोमानाम् । अर्य त्वमसि-इति
वा । तं त्वा स्तौमि तवसम्-अतव्यान् । तवस-
इति महतो नामधेयम् । उदितो भवति । निवस-
न्तम्-अस्य रजसः पराके पराक्रान्ते ॥
‘आघृणिः’ आगतहृणिः ।
“आघृणे संसचावहै ।” (ऋ०सं०४,८,२१,१)
आगतहृणे संसेवावहै ।
‘पृथुज्रयाः’ पृथुजवः ।
“पृथुज्रया अमिनादायुर्दस्योः”(ऋ०सं०३,३,१३,२]
प्रामापयदायुर्दस्योः ॥ ४ ( ९ ) ॥
अर्थः-‘शिपिविष्ट’ ( हे विष्णो ! ) हे विष्णुदेव ! ‘अद्य’

हिन्दी निरुक्त (१५१) ५ अ० २ पा० ४ खं०
आज (मैं) 'ते' तेरे 'नाम' नामको 'प्रशंसामि' प्रशंसा करता
हूं, अर्थात् मैं उसे प्रशंसा योग्य अर्थ वाला ही समझता हूं,
जिसे और लोग बुरे अर्थवाला समझते हैं । ( क्योंकि- ) 'वयु-
नानि' तुम्हारे विषय के विज्ञानों को 'विद्वान्' जानने वाला
हूं । और 'अर्यः' (अहमस्मि) मैं अर्य हूं-(ईश्वरः स्तोमानाम्)
अर्थात् मैं स्तुतियों के गाने में समर्थ हूं—तुम्हारे गुणों का
जानकार हूं, इससे मैं प्रशंसा करता हूं । अथवा 'अर्यः' (त्वम्-
असि) तू मेरे ऊपर अनुग्रह करने के लिये समर्थ है, इससे
प्रशंसा करता हूं । [ यहां मन्त्र में 'तत् ते नाम' 'वह तेरा
नाम' ऐसी उक्ति नाम को प्रसिद्ध प्रशंसा योग्य होने की
सूचना के लिये है । ] 'तम्' उस सर्वगुणसम्पन्न ईश्वर 'तवसम्'
(महान्तम्) बड़े 'अस्य' इस 'रजसः' अन्तरिक्ष लोक के 'पराके'
(पराक्रान्ते) दूरसे दूर स्थान में 'क्षयन्तम्' (निवसन्तम्) निवास
करते हुये 'त्वा' तुझको 'अतव्यान्' लघु (छाटा सा) मैं 'गृणा-
मि' स्तुति करता हूं ।
इस मन्त्र में 'शिपिविष्ट' नाम से विष्णु का संबोधन
करके उसके नाम की प्रशंसा की है, किन्तु प्रशंसनीय नाम को
न बताकर उसे ' तत् ' परोक्ष वाचक पदके द्वारा देवता को
स्मरण कराता है, स्यात् वह शिपिविष्ट ही हो । ऐसी प्रशंसासे
देवता अधिक संतुष्ट होतेहैं । क्योंकि—“ परोक्षप्रियाइवहि
देवाः ” ‘देवता परोक्ष-प्रिय जैसे होते हैं’ यह श्रुति है।
निरुक्तार्थः-हे शिपिविष्ट ! आज उस तेरे नाम की मैं
अर्य प्रशंसा करता हूं । मैं अर्य नाम ईश्वर या स्तोमों के
उच्चारण में समर्थ हूं । अथवा तू स्तोमों ( मन्त्रों ) का अर्य
नाम ईश्वर ( स्वामी ) है । उस तुझ महान् को मैं छोटा सा

हिन्दी निरुक्त ( १५२ ) ५ अ० २ पा० ५ खं०
स्तुति करता हूं । 'तवस' यह महत् ( बड़े ) का नाम है । क्यों
कि वह उदित ( प्रकाशित ) होता है । इस रजस् (अन्तरिक्ष)
लोक के पराके या पराक्रान्त ( दूर से बहुत दूर के ) स्थान
में निवास करते हुए को ॥ १ ॥
'आघृणि' (३६) क्या ? आगतहृणि । वह क्या ? जिस
में 'हृणि' प्रकाश या क्रोध आया हुआ हो ।
'आघृणे' (हे आगतहृणे) हे प्रकाश युक्त ! या क्रोध युक्त
( आवाम् )हम दोनों ' संसचावहै ' ( संसेवावहै ) आपस में
सेवाकरें ॥२॥
'पृथुज्रयाः' (४०) क्या ? पृथुजव । वह क्या ? बड़े वेग
वाला ।
'पृथुज्रयाः' बड़े वेग वाले ने 'दस्योः' शत्रु या मेघ के
' आयुः ' आयु को ' अमिनात् ' ( प्रामापयत् )। मिन लिया
(मांप लिया ) या नष्ट किया ॥ ३ ॥ ४ ॥ ( ६ ) ॥
(खं० ५)
(निघ०) अथर्युम् ॥४१॥
(निरू०) “अग्निंनरो दीधितिभिरण्योर्हस्तच्युती
जनयन्त प्रशस्तम् । दूरेदृशं गृहपतिमथर्युम् ॥”
( ऋ० सं० ५, १, २३, १ )
दीधितयः अंगुलयोभवन्ति । धीयन्ते कर्मसु ।
अरणी प्रत्युतः एने । अग्निः समरणात्, जायते ।
इतिवा । हस्तच्युती हस्तप्रच्युत्या । जनयन्त प्रशस्तं
दूरे दर्शनं गृहपति मतनवन्तम् ॥ ५ ॥

हिन्दी निरुक्त ( १५३ ) ५ अ० २ पा० ६ खं०
‘अथर्युर्’ (७१) क्या ? अतनवान् । वह क्या ? निरन्तर गमन वाला ।
अर्थः—‘नराः’ (मनुष्याः) मनुष्यों ने ‘दीधितिभिः’ अङ्गुलि-
यों से (योक्त्रम् उत्तरारणिं च परिगृह्य) योक्त्र (रस्सी) और
ऊपर की अरणि को पकड़ कर ‘हस्तच्युती’ हाथों से
बिलोते हुए ‘अरण्योः’ अरणियों से ‘प्रशस्तम्’ श्रेष्ठ ‘दूरेदृशम्’
दुर्लभ दर्शन ‘गृहपतिम्’ गार्हपत्य नाम ‘अथर्युम्’ गमनवान्
‘अग्निम्’ अग्नि को ‘जनयन्त’ उत्पन्न किया ।
इस प्रकार ‘अथर्यु’ शब्द ‘अत’ गत्यर्थक (भ्वा० प०)
धातु से है। क्योंकि-इस से इसकी शब्द समाधि है और
अग्नि का अधिकार है।
‘दीधिति’ अङ्गुलिएँ होती हैं। क्योंकि-ये कर्मों
में धारण की जाती हैं। ‘अरणी’ क्यों ? इनके प्रति अग्नि
अरण (गमन) करता है। अथवा इनके ‘समरण’ (समागम) से
अग्नि उत्पन्न होता है। ‘हस्तच्युती’ अर्थात् हाथों के चला-
ने से। प्रशस्त (श्रेष्ठ) को उत्पन्न किया। दूर में दिखाई देने
वाले गृहपति गृह के स्वामी अतनवान् (गमनवान्) को ॥५॥
(खंड ६)
[निघ०-] काणुका ॥ ४२ ॥
(निरु०-) “एकया प्रतिधा पिबत्साकं सरांसि त्रिंशतम्
इन्द्रः सोमस्य काणुका ।” (ऋ०सं० ६, ५, २९, ४)
एकेन प्रतिधानेन अपिबत् साकं सह-इत्यर्थः ।
इन्द्रः सोमस्य काणुका, कान्तकानि इति वा ।
क्रान्तकानि इति वा । कृतकानि इतिवा ॥
इन्द्रः सोमस्य कान्त इतिवा । कणे घातइतिवा
२०

हिन्दी निरुक्त (१५४) ५ अ० २ पा० ६ सं०

कणेहतः । कान्तिहतः ।
तत्रएतद् याज्ञिका वेदयन्ते-त्रिंशत् उक्थपा-
त्राणि माध्यन्दिने सवने एकदेवतानि, तानि
एतस्मिन् काले एकेन प्रतिधानेन पिबन्ति, तानि
अत्र सरांसि उच्यन्ते ।
त्रिंशत् अपरपक्षस्य अहोरात्राः, त्रिंशत् पूर्व-
पक्षस्य,-इति नैरुक्ताः । तद्या एता श्चान्द्रमस्यः
आगामिन्यः आपोभवन्ति, रश्मयः ता अपरपक्षे
पिबन्ति । तथापि निगमो भवति । -
“यमक्षितिमक्षितयः पिबन्ति” इति । तं पूर्व-
पक्षे आप्याययन्ति तथापि निगमो भवति । -
“यथादेवा अंशुमाप्याययन्ति” इति ॥ ६ ॥
'काणुका' (४२) यह अनवगत और अनेकार्थ है । "कान्तकानि" "क्रान्तका-
नि" "कृतकानि' इत्यादि शब्दसमाधिए है ।
अर्थ-'इन्द्रः' इन्द्रने 'एकया' ( एकेन ) एक 'प्रतिधा '
( प्रतिधानेन ) चित्तके एक ही टिकाव से 'त्रिंशत्'तीस (३०)
'सोमस्य' सोम के 'सरांसि' सर या तडाग 'साकम्' ( सह ) एक
साथ ' अपिबत् ' पानकिये । कैसे सर ? ' काणुका ' ( कान्त-
कानि ) प्यारे अथवा ( क्रान्तकानि ) सोम से ऊपर तक भरे
हुये अथवा ( कृतकानि ) ऋत्विजों द्वारा संस्कार किये हुए ॥
अथवा 'काणुका' पद इन्द्रका ही विशेषण है, किन्तु सरों का
नहीं । कैसे ?