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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 552, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 552

हिन्दी निरुक्त ( १३४ ) ५ अ० १ पा० ४ खं०
“विश्वेत्ता विष्णुराभरदुरुक्रमस्त्वेषितः ।
शतं महिषान्क्षीरपाकमोदनं वराहमिन्द्र
एमूषम्” (ऋ० सं० ६, ५, ३०, ४)
‘उरुक्रमः’ बहुत पराक्रम वाले ‘त्वेषितः’ इन्द्र वाक्य से
उत्तेजित ‘इन्द्रः’ ऐश्वर्यवान् ‘विष्णुः’ विष्णुने ‘ता’ (तानि) ‘विश्वा’
(विश्वानि) ‘इत्’ एव उन सबी धनोंको ‘आभरत्’ आहरण
किया किन धनोंको लाया? ‘शतं-महिषान्’ सौ (१००) भैंसोंको,
‘क्षीरपाकम्’ दूधपाक, ‘ओदनम्’ भात ‘ एमूषम् ’ मोह करने
वाले ‘ वराहम् ’ सूकर को ( लाया ) । यह भी निगम है ।
यहां धनोंके लाने के प्रसंगमें ‘वराह’ शब्द प्रसिद्ध वराह
(सूकर) का ही नाम हो सकता है । इस मन्त्र में “त्वेषितः”
पदमें ‘त्वा-इषितः’ ऐसा पद विभाग होकता है, तो भी अर्थ
के अनुरोध से एक पद करके ही निर्वचन किया है ॥
(निरु०-] अङ्गिरसोऽपि वराहा उच्यन्ते ।
“ब्रह्मणस्पति वृषभिर्वराहैः” (ऋ०सं०८, २, १६, १) ।
अर्थः- अङ्गिरस् भी वराह कहे जाते हैं।
“ ‘वृषभिः’ कामनाओं के बरसने वाले ‘वराहैः’ यज्ञ में
बैठने वाले अङ्गिरसों से सहित ‘ब्रह्मणस्पतिः’ इन्द्र”
यद्यपि इस मन्त्र में ‘वराह’ शब्द के अङ्गिरस्-वाचक
होने में कोई लिङ्ग नहीं है, तो भी इस मन्त्र वाले सूक्त में
“विप्रं पदमङ्गिरसो दधानाः०” [ऋ० सं० ८, २, १५, २]
ऋचा में ‘अङ्गिरस्’ पद का उपादान है ॥
(निरु०-) अथापि माध्यमिका देवगणा वराहवः
उच्यन्ते ।