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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 564, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 564

हिन्दी निरुक्त ( १४७ ) ५ अ० २ पा० २ खं०
( भ्वा० प० ) धातु से है । ईश्वर ( समर्थ ) भी 'अरि' इसी से
है । जिससे कि अग्नि में अन्य अन्य देवताओं की असंख्य
आहुतियाँ होती जाती हैं, ( किन्तु अग्नि की ग्रहण (दाह)
शक्ति क्षीण नहीं होती) यही देखकर ऋषिने कहा होगा, कि
"तोदस्येव शरणे आ महस्य" अर्थात्-जिस प्रकार किसी
कूपके (शरण) छिद्रके (आ अधि) ऊपर डाले हुए पानी कहीं
भी चले जाते है, उसी प्रकार हे अग्ने ! तुझ में मेरी हुई
असंख्य आहुतियाँ लीन होजाती हैं, इसीसे तू (मह) महान्
है, और इसीसे अन्य देवताओं को छोड़कर तुझे ही आवाहन
करता हूं ।
"स्वञ्चाः" (३६) क्या ? 'सु अञ्चनः' सुन्दर गमन
करने वाला ।
"आजुह्वानः" संमुख भाव से बुलाया जाता हुआ,
"घृतपृष्ठः" जिसकी पीठ पर घृत है, "स्वञ्चाः" शोभन
गमन करने वाला अग्नि ("भानुना सूर्यस्य यतते"
अपनें तेजसे सूर्यके साथ मिलता है ।) ॥ "यह भी निगम है ।
यहां सूर्य के साथ मिलने के कथन से 'स्वञ्चा' शब्द 'स्वञ्चन
इस शब्द प्रतीति के द्वारा गत्यर्थक 'अञ्च' ( भ्वा० प० ) धातु
से है, यह उपपन्न होता है ॥
"शिपिविष्टः" (३७) "विष्णुः" (३८) ये दो विष्णु के ही
नाम हैं । (इनमें 'शिपिविष्ट' शब्द गुह्य (विशेषता) नवगत है
और अत से अनेकार्थ है । 'शिपिविष्ट' (शेप इव निर्वेष्टितः
पुरुषचिन्ह के समान लिपटा हुआ है, यह अर्थ की प्रतीतिहै
इसी शब्दके सम्बन्ध से 'विष्णु' शब्द समाम्नान किया (पढ़ा)
गया है । जैसे "अक्ताः' के सम्बन्ध से "रोचः" "संमोधक्ताः)

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