सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 557, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 557

हिन्दी निरुक्त ( १४० ) ५ अ० १पा० ६ खं०
“येन स्मा सिनं भरथःसखिभ्यः” (ऋ०सं०३,४,९,१)
इत्यपि निगमो भवति ॥
‘सिन’ (२८) शब्द अनवगत है । ‘सिनाति’ (बांधता है) यह शब्दयुक्ति
है । ‘अन्न भवति’ (अन्न है) यह अभिधेय (अर्थ) वचन है ।
अर्थ- ‘ सिन ’ अन्न होता है । क्योंकि-वह सब भूतों
( प्राणियों ) को सींता ( बांधता ) है ।
हे इन्द्रावरुणा देवो ! ‘ येन ’ जिस माहाभाग्य ( बड़ी
महिमा ) के कारण ( युवाम् ) तुम दोनों ‘ सखिभ्यः ’ समान
ज्ञान वाले यजमानों के लिये ‘सिनम् ’ ( अन्नम् ) अन्न को
‘भरथः’ पूरते हो ( ‘स्म’ पाद् पूरण है ।) ॥ यह भी निगम है
अन्न को ही प्राय करके यजमान मांगते हैं, इस लिए
यही ‘सिन’ शब्द अन्न का ही वाचक होता है ।
‘धन्व’ और ‘सिन’ इत्यादि कई शब्द अपने २ अर्थ में
नैघण्टुक प्रकरण में भी पढे गए हैं,तो भी यहां (नैगमकाण्ड में)
कोई अनवगत संस्कार होनेके कारण और कोई अनेकार्थ होने
के कारण पढ़ेगए हैं ॥
[निघ०] इत्था ॥२६॥
(निरु०) ‘इत्था’‘अमुथा’-इत्येतेन व्याख्यातम्॥५॥
अर्थः-‘इत्था’ ( २६ ) यह निपात है । इस की व्याख्या
‘अमुथा’ ( ३, १६ ) शब्द के समान है ।
(निघ०-) सचा ॥ ३० ॥
[निरु०-] ‘सचा’ सह-इत्यर्थः ।
“वसुभिः सचा भुवा ” ( ऋ० सं०६, ३, १४, १ )