निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 559, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १४२ ) ५ अ० १ पा० ६-७
एव व्याख्यातः ।
अथापि अध्यर्थे दृश्यते ।
“अभ्र आँ अपः । ” (ऋ० सं० ४,३,२,१) ।
अभ्रे आ अपोऽपोऽभ्रेऽधीति ॥
अर्थः- ‘आ’ ( ३३ ) यह उपसर्ग पहिले ही ( नि०
अ० १ पा० १ खं ५ ) व्याख्यान किया जा चुका है- । ( 'आ'
इति अर्वागर्थे । ) ( “अथापि उपमार्थे दृश्यते” “जार
आ भगम् । ” इत्यादि ।
यही कदाचित् 'अधि' के अर्थ (उपरिभाव या ऐश्वर्य्य)
में होता है । निगम—
“ अभ्र आँ अपः ” जो ही ‘अभ्रे आ अपः’ वाक्य
से कहा गया होता है, वही ‘ अपः अभ्रे अधि’ से । अर्थात्
‘अभ्रे’ मेघ के ‘आ’ ( अधि ) ऊपर ‘अपः’ जलों को ( वित-
नोति ) विस्तार करती है ।
जल मेघ के ऊपर ही रहते हैं, इससे यहां ‘आ’ ‘अधि’के
अर्थ में निश्चित होता है ॥
(निघ०-) द्युम्नम् ॥३३॥
(निरु०-) ‘द्युम्नं’ द्योततेः । यशोवा । अन्नंवा ।
“अस्मे द्युम्नमधिरत्नं च धेहि” [ऋ०सं०५,३,९,३)
अस्मासु द्युम्नं च रत्नं च धेहि ॥ ६ (५) ॥
इति पञ्चमाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥ ५, १ ॥
‘द्युम्न’ (३३) शब्द अनेकार्थ है । ‘द्योतते’ (प्रकाशता है) यह शब्द-प्रतीति
है । “यशो वा” अथवा यश “अन्नंवा” अथवा अन्न यह अर्थ कथन है ।