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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 562, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 562

हिन्दी निरुक्त ( ०१४५ ) ५ अ० २पा० २ खं०
मनुष्यों से “अद्रिभिः” पत्थरों के द्वारा “सुतः” कुटाहुआ
हुआ” ये भी दो निगम होते हैं । इन मन्त्रों में किरणों की
पावनता कही गई है, इससे किरण 'पवित्र' हैं ।
अप् ( जल ) पवित्र कहे जाते हैं । क्योंकि-वे भी पवित्र
करती हैं । “ ‘ शत पवित्राः ’ ( बहूदकाः ) बहुत जलवालीं
‘ स्वधया ’ अन्न के सहित हुई हुईं ‘ मदन्ती ’ मद ( हर्ष )
देतीं हुईं ”
इस मन्त्र में ‘पवित्र’ नाम जलका है ।
अग्नि ‘पवित्र’ कहा जाता है । वायु ‘पवित्र’ कहाजाता
है । सोम ‘पवित्र’ कहा जाता है । सूर्य्य ‘पवित्र’ कहा जाता
है । इन्द्र ‘ पवित्र ’ कहाजाता है । क्योंकि-ये सभी पवित्र
करते हैं ।
“ अग्नि पवित्र है, वह मुझे पवित्र करे । वायु, सोम
सूर्य्य, इन्द्रये पवित्र हैं, वे सब मुझे पवित्र करे ॥ ” यह
भी निगम होता है ॥
‘तोद्’ (३५) यह शब्द अनवगत है । 'तुद ' यह अनवगम है । 'तुद्यते' यह
व्यथन (पीड़ा) अर्थ का वाचक 'तुद' (तु० उ०) धातुका निर्देश है । भूमिक्रा
बिल 'तोद' कहलाता है । क्योंकि—तुन्न (खुदाहुआ) होता है । कोई 'तोद'
कूप (कूए) को कहते हैं ।
‘ तुद् ’ शब्द पीड़ार्थक ‘ तुद् ’ ( तु० उ० ) धातु से
है ॥ १ (६) ॥
( खं० २ )
(निघ०-) स्वञ्चाः ॥ ३६ ॥ शिपिविष्टः
॥ ३७ ॥ विष्णुः ॥ ३८ ॥
१६