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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

हिन्दी निरुक्त ( ११९ ) ५ अध्याय

शब्द अर्थ
क्रोशः । कुष्णातेः । विकुषितो भवति ।
नृपाणम् । नरपाणम् । कूपकर्मणा संग्राममुपमिमीते
क्रोकुवा जिह्वा । कोकूयमाना वर्णान् नुदति इति
वा । कोकूयतेर्वा स्यात् शब्दकर्मणः ।
जिह्वा जोहुवा ।
तालु तरतेः । तीर्णतमम्-अङ्गम् । ललतेर्वा
स्याद् लम्बकर्मणो विपरीतात् । यथा
तलम् । लता-इति अविपर्ययः ।
सिन्धुः (६ खं०) स्रवणात् ।
नियुत्वान् (१० खं०) अश्ववान् । नियुतोऽस्याश्वाः ।
नियुतः नियमनाद् वा । नियोजनाद् वा ।
━─━─━─━─━─━─━─━─━─━─━

अथ पञ्चमाध्यायः ५.
प्रथमः पादः
खं० १
( अथ चतुरशीतिः ( ८४ ) पदानि )
[निघ०-] सस्निम् ॥ १ ॥
'सस्निम्' यह-पद अर्थानवगत है। क्योंकि-इसमें अर्थकी प्रतीति
नहीं होती । 'सस्नि' पद का प्रत्यंच वृत्ति शब्द 'सस्नात' है और इसका वा-
च्यार्थ मेघ होता है ।
[ निरु०- ] ॐ "सस्निमविन्दच्चरणेनदीनाम्"
[ऋ० सं० ८, ७, २७, ६] 'सस्निं' संस्नातं मेघम् ॥१॥
(इन्द्रः) इन्द्रने 'नदीनाम्' जलों के 'चरणे' विचरने के
स्थान (अन्तरिक्ष) में 'सस्निम्' संस्नात या जलोंसे सब ओर से
लिपटे हुये (धोये हुये) मेघ को 'अविन्दत्' पाया ।
'सस्नि' क्या? संस्नात धोया हुआ या लिपटा हुआ ।
वह क्या ? मेघ ।
व्याख्या ।
मन्त्र में 'सस्निम्' पदसे मेघ का ग्रहण किया गयाँ उस
का यह अभिप्राय है, कि-इन्द्र ने आकाश देश में 'सस्नि' को
पाया, तो वहां मेघ के अतिरिक्त इन्द्र किस वस्तु को पाता ?
सुतराम् 'सस्नि' पदं मेघ का ही बोधक हो सकता है। इसी
रीति से मन्त्रों में अनिर्णीत पदार्थों का अनुमान कर लिया
जाता है ॥ १ ॥

हिन्दी निरुक्त (११६) ५ अ० १ पा० खं० १

[निघ०] वाहिष्ठः ॥२॥ दूतः ॥३॥
इन दोनों में प्रथम गुणानवगत (विशेषणानवगत) और दूसरा स-
स्कारानवगत है।
[निरु०] “वाहिष्ठो वां हवानां स्तोमो दूतो हुव-
न्नरा !” [ऋ० सं० ६, २, २९, १]
वोढृतमो हानानां स्तोमो दूतो हुवन्नरौ ।
नरा मनुष्याः । नृत्यन्ति कर्मसु ।
दूतो जवतेर्वा द्रवतेर्वा वारयतेर्वा ।
(“दूतो देवानामासि मर्त्यानाम्” इत्यपि निग-
मो भवति) ॥
‘नरा’ (हेनरौ) हे नरों ! अश्विनों ! ‘हवानाम्’ (हाना-
नाम्) आह्वान करने वालों में ‘वाहिष्ठः’ (वोढृतमः) अति आ-
वाहन करने वाले ‘दूतः’ दूत समान ‘स्तोमः’ (इस) स्तोम
(मन्त्र समूह) ने ‘वाम्’ तुम दोनों को ‘हुवत्’ (आह्वयत्)
बुलाया ।
‘नर’ मनुष्य (भी) कहे जाते हैं । क्यों ? ‘नृत्यन्ति कर्म-
सु’ वे कर्मों में नाचते हैं ।
‘दूत’ गति अर्थ में ‘जु’ (भ्वा०प०) धातु से है । अथवा
गति अर्थ में ‘द्रु’ (भ्वा० प०) धातु से है । अथवा ‘वारि’
(वृञ्-णिच्) (चु०उ०) धातु से है ।
(“दूतो देवाना०”) (‘तू देवताओं और मनुष्यों
का दूत है’ यह भी निगम है ।) ॥

हिन्दी निरुक्त (११७) ५ अ० १ पा० १ खं०
[निघ०-] वावशानः ॥४॥
[ निरु०- ] वावशानो वष्टे र्वा । वाश्यते र्वा ।
'वावशान' (४) शब्द 'वश' कान्तौ (अ० प०) धातु से
है। (क्योंकि-वह कान्ति (इच्छा) वाला है।) अथवा
शब्दार्थक 'वाश' (दि०प०) धातुसे है। (क्योंकि-वह शब्द
करता है।)
[ निरु०- ] “सप्त स्वसॄरारुषी र्वावशानः”
[ ऋ०सं० ७,५,३३,५] इत्यपि निगमो भवति ॥
'वावशानः' कामना करते हुये अथवा शब्द करते हुये
अग्निने 'सप्त' सात (७) 'स्वसॄः' भगिनियों जैसी अथवा
साथ सर्पण (गमन) करने वाली 'आरुषीः दीप्त (प्रज्वलित)
अपनी ज्वाला (जिह्वा) ओंको ('उज्जभार' ऊपर को उठाया)
यह भी निगम है।
'उज्जभार' (उठाया) क्रियाके सम्बन्ध से 'वावशान'
शब्द कामना अर्थ में या शब्द अर्थ में निश्चित होता है।
क्योंकि-जो उठाता है, वह कामना से ही अथवा शब्द करके
ही उठाता है ॥
[निघ०-] वार्यम् ॥५॥
(निरु०-) वार्यं वृणोतेः । अथापि वरतरम् ।
'वार्य' शब्द 'वृञ्' वरणे (स्वा०उ०) धातुसे है। (क्यों
कि-वह वरने (स्वीकार करने) योग्य होता है।) और
कदाचित् बहुत श्रेष्ठ भी 'वार्य' कहा जाता है। [निगम- ]
(निरु०-) “तद्वार्थं वृणीमहेवरिष्ठं गोपयत्यम्”
(ऋ० सं० ६, २, २३, २)

हिन्दी निरुक्त (११८) ५ अ० १ पा० १ खंड
हम 'तत्' उस 'वार्यम्' वरने योग्य धनको 'वृणीमहे'
मांगते हैं, जो 'वरिष्ठम्' बहुत श्रेष्ठ और 'गोपायतव्यम्' रक्षा
करने योग्य है ।
(निरु०-) तद् वार्यं वृणीमहे वरिष्ठं गोपायि-
तव्यं गोपायितारो यूयं स्थ, युष्मभ्यमिति वा ॥
उस वरणीय धनको हम मांगते हैं, हे स्तोताओ ! जो
अतिश्रेष्ठ और गोपनीय (रक्षणीय) या तुम जिसके रक्षक
हो, अथवा तुम्हारे लिये जो हो ॥
रक्षा के सम्बन्ध से 'वार्य' शब्द धन का विशेषण है,
यह अवगम होता है ॥ ४ ॥
[निघ०-] अन्धः ॥ ६ ॥
[निरु०-] 'अन्धः' इति अन्ननाम । आध्यानीयं
भवति "आमत्रेभिः सिञ्चतामद्यमन्धः" ॥ (ऋ०
सं० २,६,१३,१) आसिञ्चत अमत्रैर्मदनीयम् अन्धः।
अर्थ-'अन्धस्' यह अन्न का नाम है । क्यों? आध्यानीय
है, या वह सब का प्रार्थनीय है । 'आध्यानीय' यह शब्द-
समाधि है ।
निगम निरुक्तार्थ-हे अध्वर्युओ ! तुम 'आमत्रेभिः'
(अमत्रैः) (सोमचमसैः) सोमचमस पात्रों से 'मद्यम्' (मदनीयम्)
मद देने वाले 'अन्धः' सोमरूप अन्न को 'आसिञ्चत' अग्नि में
सींचो ॥
(निरु०-) अमत्रं पात्रम् । अमा अस्मिन् अदन्ति ।
अमा पुनः अनिर्मितं भवति । पात्रं पानात् ।

हिन्दी निरुक्त ' (११६) ५ अ० १ पा० २ खं०
तमअपि अन्धः उच्यते। नास्मिन् ध्यानं भवति
न दर्शनमन्धतम इत्याभिभाषन्ते ।
अयमपि इतरः अन्धः एतस्मादेव ।
“पश्यदक्षण्वान्न विचेतदन्धः” (ऋ० सं २,
३, १७, १)। इत्यपिनिगमो भवति ॥ १ ॥
अर्थ- 'अमत्र' पात्र होता है। क्योंकि- इसमें 'अमा'
अपरिमित खाया जाता है। 'अमा' नाम अनिर्मित (जिसका
मान नहीं) का है। 'पात्र' क्यों ? पान से। क्योंकि-उससे
पान (पीना) होता है।
'तमस्' (अन्धकार) भी 'अन्धस्' कहाजाता है। क्यों
कि-इसमें ध्यान (उज्ज्ञान) नहीं होता। क्योंकि-उसमें नेत्रकी
दृष्टि रुकजाती है। लौकिक लोग भी 'दर्शन नहीं होता,
अन्धन्तम है, ऐसा कहते हैं।
यह भी दूसरा अन्ध (मनुष्य) इसी से है। क्योंकि-वह
भी देखता नहीं है।
“'अक्षण्वान्' नेत्रवाला या दर्शनवान् या विज्ञानवान्
पुरुष 'पश्यत्' देखता है, या नित्य ही जानता है। किन्तु
'अन्धः' दर्शनरहित या वेद, उपनिषद्, आदि सत् शास्त्रों
को नहीं जानने वाला 'न' नहीं 'विचेतत्' (विजानाति)
जानता है।” यह भी निगम है॥
यहां 'अक्षण्वान् देखता है, और अन्ध नहीं देखता,-इस
वाक्य सम्बन्धसे 'अन्धः' शब्द अन्धे को ही कहता है; यह
युक्ति है॥ (सं० २)
(निघ०-) असश्चन्ती ॥ ७ ॥

(निरु०-) “असश्चन्ती भूरिधारे पयस्वती ।”
(ऋ० सं ५, १, १४, २) ।
असज्यमाने इतिवा । अव्युदस्यन्त्यौ-इतिवा ।
बहुधारे उदकवत्यौ ॥
'असश्चन्ती' (७) पद अनवगत है । “असज्यमाने” अथवा “अव्यु-
दस्यन्त्यौ” यह अर्थ की प्रतीति है ।
'असश्चन्ती' (असज्यमाने) आपस में नहीं मिलती हुई,
या (अव्युदस्यन्त्यौ) एक को एक नहीं छोड़ती हुई, 'भूरिधारे'
(बहुधारे) बहुत भरने वाली 'पयस्वती' (उदकवत्यौ) जल
वालीं (द्यावा पृथिवी हैं ।) ।
इस मन्त्र में 'भूरिधारे' इत्यादि पदों के साथ समान
विभक्ति वाला होने से 'असश्चन्ती' पद द्यावा पृथिवी (द्य-
लोक-भूलोक) का विशेषण है, यह सिद्ध होता है ॥
(निघ०-) वनुष्यति ॥ ८ ॥
(निरु०-) वनुष्यतिर्हन्तिकर्मा अनवगतसंस्का-
रो भवति ।
“वनुष्याम वनुष्यतः” इत्यपि निगमो भवति ।
“दीर्घप्रयज्युमति यो वनुष्यति वयं जयेम पृत-
नासु दूढ्यः ।”
दीर्घप्रततयज्ञम्-अभिजिघांसतियो, वयं तं
जयेम पृतनासु 'दूढ्यं' दुर्धियं पापधियम् ।
पापः पाता अपेयानाम् । पापत्यमानः अवाङ्

हिन्दी निरुक्त ( १२१ ) ५ अ० १ पा० २ खं०
एव पतति इतिवा । पापत्यते वा स्यात् ।
अर्थः—'वनुष्यति' (८) यह पद 'हन्ति' के (हिंसा) अर्थ
में रहता हुआ अनवगत संस्कार है।
“हम 'वनुष्यतः' अपने को मारते हुओं को 'वनुयाम'
मारते हैं।” यह भी निगम है।
'यः' जो 'दीर्घप्रयज्युम्' (दीर्घप्रततयज्ञम्) लम्बे (बहुत
कालतक) फैले हुए यज्ञ को 'अतिवनुष्यति' (अभिजिघांसति)
आभिमुख्य से नष्ट करता है, 'वयम्' हम (तम्) उस 'दूढ्यः' (दू-
ढ्यं दुर्धियं पापधियम्) दूढ्य या दुष्टधी (बुद्धि) वाले या पाप-
बुद्धि वाले को 'पृतनासु' संग्रामों में 'जयेम' जीतें।
'पाप' क्या? पीने वाला–अपेयों (न पानयोग्यों) का।
अथवा जो फिर फिर गिरता हुआ नीचे को ही गिरता है।
अथवा पतनार्थक 'पत' (यङन्त) धातुसे है। क्योंकि–वह बहुत
या फिर २ गिरता ही है॥
[निघ०-] तरुष्यति ॥६॥
[निरु०-] तरुष्यतिः अपि एवंकर्मा ।
“इन्द्रेण युजा तरुषेम वृत्रम्” (ऋ० सं० ५,
४, १५, २) इत्यपि निगमो भवति ।
अर्थः–'तरुष्यति' (६) पद भी 'हन्ति' के (हिंसा) अर्थ
में है।
“हम 'इन्द्रेण' इन्द्रके साथ 'युजा' युक्त हुये 'वृत्रम्' शत्रु
को 'तरुषेम' मारें” यह भी निगम है॥
[निघ०-] भन्दनाः ॥१०॥
१६

हिन्दी निरुक्त ( १२२ ) ५ अ० १ पा० २ खं०
[ निरु०- ] भन्दनाः, भन्दतेः स्तुतिकर्मणः।
"पुरुप्रियो भन्दते धामभिः कविः" (ऋ० सं० २,
८, २०, ४) इत्यपि निगमो भवति।
"सभन्दना उदियर्त्ति प्रजावतीः" (७, ३, २०, १)
इति च।
अर्थः—'भन्दन' शब्द स्तुति अर्थ वाले 'भन्द्' (भ्वां० प०)
धातु से है।
" 'पुरुप्रियः' बहुत कामनाओं वाला 'कविः' (क्रान्तद-
र्शनः) फैले हुए ज्ञान वाला स्तोता (अग्निम्) अग्निको 'धा-
मभिः' अनेक नामों से 'भन्दते' (स्तौति) स्तुति करता है"
यह भी निगम है।
क्यों कि-स्तुति करने वाला अनेक नामों से स्तुति के
अतिरिक्त क्या करेगा, इस लिये 'भन्दते' धातु का स्तुति ही
अर्थ निश्चय होता है।
" 'सः' वह यजमान, जो 'मेरे यहां यज्ञ कर्म हो, तो मैं
सोम को निचोडूं' ऐसी नित्य कामना रखता है, 'प्रजावतीः'
प्रजा के चिन्हों से युक्त (प्रजाओं को उचित) 'भन्दनाः' स्तु-
तियों को 'उदियर्त्ति' उदीरता या गाता है ॥" और यह
निगम है।
यहां 'भन्दनाओं को गाता है इस गाने के संबन्ध से
'भन्दना' शब्द स्तुति का वाचक ही हो सकता है। पहिला
उदाहरण आख्यात और दूसरा यह नाम (प्रातिपदिक) के
रूप में हुआ। दोनों ही प्रकार से प्रयोग आता है, इस से
दोनों दिखाए हैं॥

हिन्दी निरुक्त ( १२३ ) ५ अ० १ पा० ३ खं०
(निघ०-) आहनः ॥११॥
[निरु०] “अन्येन मदाहनो याहि तूयम्” ।
( ऋ० सं० ७, ६, ७, ३ ) ॥
अन्येन मत् आहनो गच्छ क्षिप्रम्, आहांसि इव
भाषमाण, इति असभ्यभाषणात् आहना इव भवति,
एतस्मात् आहनः स्यात् ।
‘आहनः’ यह पद सम्बोधन अनवगत है । क्यों कि-इसमें अर्थ की
प्रतीति नहीं होती । “आहांसि” यह अर्थ की प्रतीति है ।
“ न तिष्ठन्ति न निमिषन्त्येते देवानां स्पश
इहये चरन्ति । अन्येन मदाहनो याहि तूयं तेन
विवह रथ्येवंचक्रा ॥ ( ऋ० सं० ७, ६, ७, ३ )
यम और यमी का संवाद-सूक्त है, वहा यह यम का वाक्य है ।
वह मैथुन के लिये प्रार्थना करती हुई यमी को कहता है—
हे यमि ! तू मत समझ, इस समय एकान्त है, किन्तु
‘ न तिष्ठन्ति ’ [ छिद्र देखनेवाले जन क्षणमात्र भी ] नहीं
रुकते, और ‘न’ निमिषन्ति’ नहीं पलक झिंपाते, [ बराबर
फिरते और देखते रहते हैं । ] कौन ? ‘एते’ ये ‘देवानां स्पशः’
देवताओंके गुप्तचर, ‘ये’ जो ‘इह’ इस संसारमें ‘चरन्ति’ विच-
रते हैं । इससे कहता हूं—हे ‘आहनः ! ’ असभ्य भाषण से
हनन करने वाली ! ‘मत्’ मुझसे ‘अन्येन’ दूसरे कुलमें उत्पन्न
हुए पुरुष के साथ तू ‘तूयम्’ शीघ्र ‘याहि’ मैथुन को प्राप्त हो
मैं तेरे इस असभ्य वचन को सुन भी नहीं सकता, करना तो
दूर रहा । अतः तू दूसरे ही पुरुष के साथ मैथुन ( रति ) के

हिन्दी निरुक्त ( १२४ ) ५ अ० १ पा० २ खं०
लिये विचर । ‘तेन’ उसी से ‘विवह’ विवाह कर । ‘रथ्या
इव चक्रा’ जैसे एक रथमें दो चक्र (पहिये) जुड़े हुए होते हैं,
उसी प्रकार एक मनकर, उसी प्रयोजन में तेरे साथ वह कामी
और तू उसके साथ, दोनों जुड़ जाओ । किन्तु इस प्रयोजन
से तू मुझे कम्पित नहीं कर सकती, यह अभिप्राय है ॥
गरुड़पुराण के देव दूतों की बात को अवैदिक समझने
वाले तथा बहिन भाईके योनि संबन्धको वैदिक बनाने वाले
इस मन्त्र की ओर घूरकर देखें !
निरुक्तार्थ-हे आहनः ! मुझसे दूसरे के संग शीघ्र जा ।
‘आहनः’ क्यों ? मारती हुई जैसो है, बोलती हुई अर्थात्-
असभ्य (गन्दे) भाषण (बोल चाल) से आहना (मारने
वाली) जैसी होती है । पुरुष भी इसी से ‘आहन’ हो सकता
है । [क्योंकि-जिसके समीप ऐसा असभ्य वचन होता है,
उसका भी आहनन होता है ] ॥
इस मन्त्र में मैथुन-समाचार अनिष्ट होने से ‘आहनः’
यह यमीके- लिये सम्बोधन है, ऐसा निश्चय हो जाता है ॥
[निघ०] नदः ॥१२॥
[निरु०] ऋषिर्नदो भवति, नदतेःस्तुतिकर्मणः ॥
“नदस्य मारुधतः काम आगन् ॥” [ऋ०सं०
२, ४, २२, ४ ] ॥
नदनस्य मा रुधतः काम आगमत् । संरुद्ध-
प्रजननस्य ब्रह्मचारिणः,-इति ऋषिपुत्र्या विलापितं
वेदयन्ते ॥ २ ॥

हिन्दी निरुक्त ( १२५ ) ५ अ० १ पा० २ खं०
अर्थः— 'नद्' ( १२ ) क्या ? ऋषि होता है , स्तुति
अर्थ में 'नद्' ( भ्वा० प० ) धातु से है । अर्थात्-जब ऋषि
देवताओं की स्तुति करता है,तब ऐसा प्रतीत होता है,मानों
यह संसार के विषयोंको तिरस्कार करता हुआ नाद (गर्जना)
करता है, इसी से वह 'नद्' कहा जाता है। लोक में भी जब
कोई किसी का बल पूर्वक तिरस्कार करता है, उस समय उसे
नाद करता है, धाड़ता है, गर्जता है, इत्यादि कहते हैं ।
प्रयोजन यह है कि-'नदः' ऐसा कहने से व्याख्येय शब्द
का ज्ञान होता है, कि-इसका व्याख्यान होगा । फिर 'ऋषि
र्भवति' (ऋषि है ) ऐसा पर्याय देने से ज्ञान होता है कि-
अन्तमें ठीक इसी वस्तु ( अर्थ ) पर इस शब्द को रहना है ।
फिर 'नदतेः स्तुतिकर्मणः' (स्तुत्यर्थक 'नद्' धातु से है । ) इस
से व्युत्पत्ति या उस शब्द के संस्कार ( प्रकृति-प्रत्यय ) का
ज्ञान होता है-कैसे बना ? क्या व्याकरण से विरुद्ध नहीं ?
तथा उसके तत्वके कुछ समीप पहुंचता है । फिर 'नदति-इव'
( नाद जैसा करता है ) इससे उस अर्थ की प्रतीति होती है,
जो उसमें घटता हो अर्थात्-व्युत्पत्ति 'नदति' (नाद करता है)
है, किन्तु विद्वान् ऋषि नाद ( अव्यक्त वाणी ) नहीं करता,
वह व्यक्त वाणी बोलता है अतः अर्थ की प्रतीति अपेक्षित
होती है-'नदति इव' ( नाद जैसा करता है ) अर्थात्-नाद
नहीं करता, नाद जैसा करता है । जब संसार के विषय उसके
साम्हने आते हैं, उन्हे' वेदार्थ-विज्ञान के बलसे बलपूर्वक
तिरस्कार करता है। लोक में भी जो बलपूर्वक किसी का
प्रत्याख्यान करता है, उसे ' गर्जता है , गर्जन करता है,
इत्यादि कहते हैं यह प्रकार शब्द के अर्थ को घटाने बढ़ाने

में उपयुक्त होता है, निर्वचन में इस की बड़ी आवश्यकता है
“नदस्य मा रुधतः काम आगन्नित आजातो
अमुतः कुतश्चित् । लोपामुद्रावृषणं नीरिणाति
धीरमधीरा धयति श्वसन्तम् ॥” (ऋ० सं० २, ४,
२२, ४) ॥
अगस्त्य ब्रह्मचारी और लोपामुद्रा ऋषिपत्नी के संवाद सूक्त में यह
लोपामुद्रा का वचन है । वह अगस्त्य को भर्त्ता समझ कर बोली—
‘नदस्य’ (नदनस्य) देवताओं की स्तुति करने वाले इस
अगस्त्य को ‘रुधतः’ इन्द्रियों को रोके हुए होने से ‘मा’ मुझे
‘कामः’ काम ‘आगन्’ आया, जिससे मैं अब पीड़ित हो रही
हूं । सो मैं नहीं जानती कि-वह ‘इतः’ ( एव मच्छरीरात् )
इस मेरे ही शरीर से ‘आजातः’ आया, अथवा ‘अमुतः’ उस
अगस्त्य के शरीर से, क्योंकि-पुरुष के गुणों को स्मरण करनेसे
स्त्री को काम हो जाता है (प्रकट होता है) और पुरुष को
स्त्री के स्मरण से । इसी से काम को ‘स्मर’ कहा जाता है ।
इस से यह उपपन्न होता है,-इस मेरे शरीर से या उस नद्
के शरीर से आया । अथवा ‘कुतश्चित्’ कहीं से आया, यह
भी वस्तुतः नहीं जानती । ‘लोपामुद्रा’ इस प्रकार विलाप
करती हुई लोपामुद्रा ‘वृषणम्’ वीर्य के बरसाने वाले अगस्त्य
को ‘नीरिणाति’ निश्चय अधिकता से या काम दोष से प्राप्त
होती है ‘रिणाति’ धातु गत्यर्थों में पढ़ा है । अथवा ‘निरि-
णाति’ (चेतसा उपगच्छति) मनसे उसे प्राप्त होती है । क्यों-
कि-वाञ्छित पुरुष का अनुचिन्तन करना स्त्री का स्वभाव ही
होता है । इससे ऐसा सिद्ध होता है । ‘धीरम्’ ब्रह्मचर्य में

हिन्दी निरुक्त ( १२७ ) ५ अ० १ पा० ३ खं०
स्थिर बुद्धि अगस्त्यकी 'अधीरा' चञ्चल इन्द्रियों वाली 'धयति'
मनसे पी जैसे रही है अथवा नेत्रों से देखती है। 'श्वसन्तम्'
चित्त से उससे हटते हुए को भी (धयत्येव) पान कर ही रही
है। “श्वसति, नदति” ऐसा गत्यर्थों में पढ़ा है। इस
प्रकार लोपामुद्रा के वाक्य में “नदस्य रुधतो माम्
आगमत् कामः” इस प्रकरण से 'नद' शब्द से ऋषि कहा
जाता है, यह सिद्ध होता है “संरुद्ध प्रजननस्य ब्रह्म-
चारिणः” अर्थात्-“रोक दिया है, गर्भ का आधान जिस ने
ऐसे ब्रह्मचारी के,” ये पद ऋषि पुत्री के विलाप को जना
रहे हैं॥ २॥ ( खं० ३ )
[निघ०-] सोमोअक्षाः ॥ १३ ॥
(निरु०) “न यस्य द्यावा पृथिवी न धन्व ना-
न्तरिक्षं नाद्रयः सोमोअक्षाः।” (ऋ०सं० ८,४,१५,१)
अश्नोतेः इत्येवम्-एके।
अनूपे गोमान् गोभिरक्षाः सोमो दुग्धाभिरक्षाः।
( ७, ५, १३, ४ )
“लोपाशः सिंहं प्रत्यञ्चमत्साः ।”
क्षियति निगमः पूर्वः, क्षरति निगमःउत्तरः इत्येके।
'अनूपे गोमान् गोभिर्यदा क्षियति, अथ सोमो दु-
ग्धाभ्यः क्षरति।
सर्वे क्षियतिनिगमाः इति शाकपूणिः॥

हिन्दी निरुक्त (१२८) ५ अ० १ पा० ३ खं०
“सोमो अक्षः” (१३) ये दो पद है। इन में “अक्षः” यह पद अनव-
गत है। और पक्ष में अनेकार्थ भी है। अर्थात् कुछ आचार्य ‘अश्नोति’ (व्याप्ति)
अर्थ, और कुछ आचार्य ‘क्षियति’ (गति) और ‘क्षरति’ (झरना) अर्थ मानते
हैं। किन्तु शाकपूर्णि सब स्थानों में क्षियति (गति) अर्थ ही मानते हैं। यही
पक्ष में अनेकार्यता है। यहां पर ‘सोम’ शब्द ‘अक्ष’ शब्द के साथ इस लिये
दिया है, कि—इस का उदाहरण “न यस्य द्यावा पृथिवी” यही मन्त्र बने ।
क्योंकि उस मन्त्र में “सोमो अक्षा” ऐसा ही विशिष्ट पाठ है। समाम्नाय के
आचार्यों के ध्यान में ‘अक्ष’ शब्द ‘अश्नोति’ का ही होना अच्छा है और वह
उक्त मन्त्र में भली प्रकार संगत होता है।
‘यस्य’ जिस इन्द्रकी महिमा को ‘द्यावा पृथिवी’ द्युलोक
और पृथिवी लोक ‘न’ नहीं ‘अक्षाः’ (अश्नुवाते) व्यापन करते
या पाते हैं। ‘न-धन्व’ न जल, ‘न-अन्तरिक्षम्’ न अन्तरिक्ष,
और ‘न-अद्रयः’ न पर्वत पाते हैं। किन्तु ‘सोमः-अक्षाः’ सोम
ही उसकी महिमा को व्यापन करता है। इस प्रकार कोई
‘अश्नोति’ पद का ‘अक्षाः’ शब्द मानते हैं।
“अनूपे गोमान्०” जब कोई ‘गोमान्’ गोओं वाला
‘गोभिः’ गोओं सहित ‘अनूपे’ सजल देशमें ‘अक्षा’ (क्षियति =
निवसति) निवास करता है ‘अथ’ तो उस देशके सुन्दर तृण
(घास युक्त होने से ‘दुग्धाभिः’ (पुनःपुनः ‘दुग्धाभ्यः’ अपि
गोभ्यः) बारबार दोही हुई भी गोओंसे ‘सोमः’ सोम ‘अक्षाः’
(‘क्षरति’ एव) झरता ही है। जिस वनमें ‘मत्साः’ मदयुक्त
‘लोपाशः’ छेदन-समर्थ गोएँ ‘सिंह’ सिंह के ‘प्रत्यञ्च’ (प्रति
अञ्चन्ति) साम्हने जाती हैं। [ऐसी गोओंकी महिमा जो
सुनते रहे, उसे आज इस मन्त्र में भी देखते हैं।]
मन्त्र में पहिला ‘अक्षाः’ पद ‘क्षियति’ (निवास) का

निगम है, और दूसरा 'अक्षाः' पद 'क्षरति' (भरने) का
निगम है। यह कोई आचार्य मानते हैं।
शाकपूणि आचार्य कहते हैं कि ये पूर्वोक्त सब निगम
'क्षियति' (निवास) अर्थ के ही हैं। प्रथम उदाहरण में जिस
इन्द्र का द्यावापृथिवी निवास नहीं, न जल और न अन्तरिक्ष,
अपितु सोम ही इन्द्र का निवास है। "अनूपे" मन्त्रमें जब
गोमान् अनूप (सजल) देश में निवास करता है. तब दोही
हुई गोत्रों में भी सोम निवास करता ही है किन्तु वे दूध के
रूप में सोम से खाली नहीं होतीं इस प्रकार तीनों ही स्थानों
में निवास अर्थ घट जाता है। यही शाकपूणि का मत है।
[निघ०-] श्वात्रम् ॥१४॥
[निरु०] 'श्वात्रम्' (१४) इति क्षिप्रनाम। आशु
अतनं भवति । "स पतत्रीत्वरं स्था जगद्यच्छ्वा-
त्रमग्निरकरोज्जातवेदाः ।" (ऋ० सं० ८,४,१०,४)
स. पतत्रि च इत्वरं स्थावरं जङ्गमं च यत्, तत्
क्षिप्रम् अग्निरकरोज्जातवेदाः ॥
अर्थ-'श्वात्र' यह शीघ्र का नाम है। क्यों ? वह 'आशु
अतन' (जलदी जलदी चलता) है।
'सः' उस 'जातवेदाः' कार्य मात्रके जानने वाले अग्निने 'यत्' जो
'पतत्रि' इधर उधर उड़ने वाले 'इत्वरम्' पक्षी आदि, 'स्थाः'
(स्थावरम्) और स्थावर वृक्ष आदि 'जगत्' (जङ्गमं च)
और जङ्गम गो आदि (तत्) उस सब को प्रलय काल में
'श्वात्रम्' (क्षिप्रम्) शीघ्र 'अकरोत्' अपने में कर लिया था।
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हिन्दी निरुक्त (१३०) ५ अ० १ पा० ३ खं०
इस प्रकार इस मन्त्र में 'रवात्रम्' यह शीघ्र का नाम है । क्यों
कि स्थावर जङ्गलों को झट पट जलानेके अतिरिक्त अग्नि क्या
करता ? इस से शीघ्र अर्थ का नाम निश्चित होता है । (इस
मन्त्र में पौराणिक प्रलय कालीन अग्निलीला का वर्णन है )
[निघ०-] ऊतिः ॥१५॥
[निरु०] ऊतिः (१५) अवनात् ।
“आ त्वा रथं यथोतये” (ऋ० सं० ६, ५,
१, १,) इत्यपि निगमोभवति ।
अर्थ-‘ऊति’ (१५) अवन (रक्षा) से है ।
हे इन्द्र ! ‘त्वा’ (त्वाम्) तुझे (‘आवर्तयामसि’ (आ-
वर्तयामहे स्तुतिभिः) स्तुतियों द्वारा आवृत्ति (बार बार याद)
करते हैं ।) किस लिये ? ‘ऊतये’ अपनी रक्षा के लिये । किस
प्रकार ? ‘यथा-रथम्’ जैसे कोई समर्थ पुरुष रथ को बार बार
घुमाता है । इस प्रकार आवृत्ति के संबन्ध से ‘ऊति’ शब्द
रक्षा अर्थ में है ॥
[निघ०-] हासमाने ॥ १६ ॥
[निरु०] 'हासमाने' (१६) इति उपरिष्टाद्व्याख्या-
स्यामः ॥ ४ ॥
अर्थ-‘हासमाने' (१६) यह पद आगे “प्रपर्वतानामु-
शती उपस्थात्” पर व्याख्यान करेंगे ।
[निघ०] पद्धभिः ॥१७॥
[निरु०] “वम्रीकः पद्धभिरुपसर्पदिन्द्रम्” ॥

हिन्दी निरुक्त ( १३१ ) ५ अ० १ पा० ३ खं०

पानैः-इतिवा । स्पाशनैः-इतिवा । (स्पशनैः
इतिवा ।)
पद्भिः (१७) यह अनवगत है । “पानैः” “स्पाशनै” ये शब्दसमाधि हैं ।
वम्र नाम वैखानस ऋषि बोले कि—
हे इन्द्र ! ‘वम्रः’ पूर्व कल्प के वम्र ने ‘पद्भिः’ सोम
पानो ( की भेट ) से (इन्द्रम्’ पूर्व कल्पके इन्द्र को ‘उपसर्पत्’
शरण किया ( इन्द्र की शरण ली ) यहां शब्द की समानता
और प्रकरण से ‘पद्भिः’ यह पान का नाम है ॥
[निघ०] ससम् ॥१८॥
(निरु०) “ससं न पक्वमविदच्छुचन्तम् ।” (ऋ०
सं० ८, ३, १४, ३) स्वपनमेतत् माध्यमिकं ज्योतिः
अनित्यदर्शनं तदिव अविदद् जाज्वल्यमानम् ॥
‘ससम्’ ( १८ ) यह अनवगत पद है । ‘स्वपनम्’ यह अव-
गम ( अर्थ बोधक पद ) है ।
अर्थः—‘ससम्’ (स्वपनम् एतत् माध्यमिकं ज्योतिः अनि-
त्यदर्शनम् तद् ) स्वपन ( सोने वाला ) यह मध्यम (अन्तरिक्ष)
लोक का ज्योति ( बिजली ) जो अनित्यदर्शन अर्थात् आठ
(८) मास तक दिखाई नहीं देता, किन्तु वर्षा ऋतु में ही
दिखाई देता है, तथा ‘पक्वम्’ आकाश देशमें प्रकट होने
वाला है, उसके ‘न’ (इव) समान किसी ऋषिने या और ने
भूमिके सजल तृणयुक्त देशमें ‘शुचन्तम्’ (जाज्वल्यमानं) चमकते
हुये इस अग्नि को ‘अविदत् पाया या जाना ।
• यहां शब्द की समानता और अर्थ की योग्यता से ‘ससं’

शब्दसे स्वपन (सोनेवाले) का ग्रहण होता है, तथा वह मध्यम
लोक की ज्योति बिजली ही है, उसी की उपमा मन्त्र में
अग्नि को दीगई है ॥
(निघ०) द्विता ॥१६॥
(निरु०-) “द्विताच सत्ता स्वधयाच शम्भुः ।”
( ऋ० सं० ३, १, १७, ५) । द्वैधं सत्ता मध्यमे च
स्थाने उत्तमे च । शम्भुः सुखभूः ॥
‘द्विता’ (१६) यह अनवगत है । 'द्वैधम्' (दो प्रकार से ) यह अवगम है ।
अर्थ-हे अग्ने ! तुझ से पूर्व होता वायु की 'द्विता'
(द्वैधंसत्ता ) दो प्रकार की विद्यमानता है। अर्थात्- (मध्यमे
च स्थाने उत्तमे च ।) मध्यम स्थान में विद्युत् (बिजली) के
रूपमें और उत्तम स्थान द्युलोक में सूर्य के रूपमें है । 'स्वधया
च' और वह अन्न के द्वारा सब प्राणियों को 'शम्भु' (सुख-
भूः) सुख देनेवाला है। यहां शब्द की समानता और अर्थ
की योग्यता से 'द्विता' शब्द 'द्वैध' के अर्थ में है ॥
(निघ०) व्राः ॥ २० ॥
(निरु०-) “मृगं न व्रा मृगयन्ते ॥” [ऋ०सं०५,
७, १८, १] मृगमिवव्रात्याः प्रैषाः ॥३॥
'व्राः' (२०) यह अनवगत है । 'व्रात्याः' यह अवगम है ॥
अर्थ-हे भगवन् ! इन्द्र ! 'व्राः' (व्रात्याः-प्रैषाः ) हमारे
प्रैष मन्त्र ( 'व्राः' = व्रात्याः = व्याधाः) व्याध 'मृगं-न'
(इव) ' मृगको जैसे, तुझे 'मृगयन्ते' ढूंढते हैं ॥ यहां पर मृग
के सम्बन्ध से 'व्रा' शब्द व्रात्य या लुब्धक (व्याध) का
नाम है ॥ ३ ॥

हिन्दी निरुक्त ( १३३ ) ५ अ० १ पा० ४ खं०
( खं० ४ )
(निघ०-) वराहः ॥२१॥
(निरु०-) वराहो मेघो भवति । वराहारः ।
“वरमाहारमाहार्षीः” इति च ब्राह्मणम् ।
“विध्यद्वराहं तिरो अद्रिमस्ता” (ऋ०सं० १, ४,
२८, २) इत्यपि निगमो भवति ।
अयमपि इतरो वराहः एतस्मादेव । बृहति
मूलानि । वरं वरं मूलं बृहति इति वा ॥
“वराह मिन्द्र एमुषम्” (ऋ० सं० ६, ५, ३०,
४) इत्यपि निगमो भवति ॥
‘वराह’ (२१) यह अनवगत और अनेकार्थ है ।
अर्थः—‘वराह’ मेघ होता है । क्योंकि-उसका वर (जल)
आहार (भोजन) है । और “वर (जल) आहारको आहार
[ भोजन ) किया । या हे पर्जन्य ! तैने श्रेष्ठ (जलरूप) आहार
को (हमारे लिये) आहरण (आनयन) किया। यह ब्राह्मण है
“वराहम्” (मेघम्) मेघको ‘विध्यत्’ ताडन करता हुआ
‘तिरः’ दूर ही अवस्थित (ठहरा हुआ हुआ) ‘अद्रिम्’ (वज्रम्)
वज्र को ‘अस्ता’ फेंकने वाला इन्द्र ।” यह भी निगम है ।
यह भी दूसरा ‘वराह’ (शूकर) इसी से है । क्योंकि-यह
भी वर (मूल) को आहार करता ही है । [ व्युत्पत्ति ]
‘बृहति मूलानि’ काटता है मूलों को । अथवा ‘वरंवरं मूलं
बृहति’ वर वर ( अच्छे अच्छे ) मूल को बर्हण करता
(काटता) है ॥