निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त (१३७) ५ अ० १ पा० ६ खं०
अर्को मन्त्रो भवति यद्-अनेन अर्चन्ति ।
अर्कम्-अन्नं भवति, अर्चति भूतानि ।
अर्को वृक्षो भवति संवृतः कटुकिम्ना ॥५ (४) ॥
‘अर्क’ (२४) यह शब्द अनेकार्थ है ।
अर्थ-‘अर्क’ देव होता है । क्योंकि-इसे सब पूजते हैं ।
‘अर्क’ मन्त्र होता है । क्योंकि-इस से अर्चन ( पूजन )
करते हैं ।
‘अर्क’ अन्न होता है । क्योंकि-वह भूतों ( प्राणियों )
को अर्चता ( पूजता ) है ।
‘अर्क’ वृक्ष ( आक ) होता है, क्योंकि-वह कडुवे पन से
व्याप्त होता है ॥ ५ ( ४ ) ॥
( खं० ६ )
[निरु०] “गायन्ति त्वा गायत्रिणोऽर्चन्त्यर्कमर्किणः,
ब्रह्माणस्त्वा शतक्रत उद्वंशमिव येमिरे ॥” ( ऋ०
सं० १, १, १९, १, ) गायन्ति त्वा गायत्रिणः,
प्रार्चन्ति ते अर्कम्-अर्किणो ब्राह्मणाः । त्वा शत-
क्रतो ! उद्येमिरे वंशमिव ।
वंशः, वनशयोभवति। वननात् श्रूयते इतिवा ॥
‘अर्क’ शब्द के देव और मन्त्र अर्थ में निगम—
अर्थ- “गायन्ति त्वा०” अर्थात्-हे भगवन् ! इन्द्र !
‘गायत्रिणः’ ( सामगाः ) साम-गान करने वाले स्तुतियों द्वारा
‘गायन्ति’ गाते हैं । ‘अर्किणः’ ( मन्त्रिणो होतारः ) मन्त्रों
वाले होता लोग ‘अर्कम्’ तुझ अर्चनीय को ‘अर्चन्ति’ प्रार्चन्ति
ऋचाओं द्वारा पूजते हैं । ‘ ब्रह्माणः ’ ( ब्राह्मणाः ) ये सब
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