निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १३५ ) ५ अ० १ पा० ५ खं०
“पश्यन्हिरण्यचक्रानयोदंष्ट्रान्विधावतोवराहून्”
(ऋ०सं० १, ६, १४, ५) ॥४॥
अर्थः-और भी मध्यम लोक के देव-गण 'वराहु' कहे
जाते हैं।
“हे मरुत् देवगणों ! गोतम ऋषि तुम्हें 'हिरण्यचक्रान्'
सोने के चक्रवालों, 'अयोदंष्ट्रान्' लोहे के रथ वालों, 'विधा-
वतः' नाना प्रकार दौड़ते हुओं 'वराहू' वराहु नाम वालों
को 'पश्यन्' (स्तौति) स्तुति करता है” ॥ ४ ॥
(खं० ५)
(निघ०-) स्वसराणि ॥२२॥
(निरु०) स्वमराणि अहानि भवन्ति । स्वयं सा-
रीणि । अपिवा स्व-आदित्यो भवति, सः एनानि
सारयति ।
“उस्रा इव स्वसराणि” । (ऋ० सं० १, १, ६, २)
इत्यपि निगमो भवति ।
'स्वसराणि' (२२) यह अनवगत है । 'स्वयंशारीणि' यह अवगम है ।
'अहानि' (दिन) अर्थ कथन है ।
अर्थः-'स्वसर' अहन् (दिन) होते हैं। क्योंकि-वे स्वयम्
(आप) सरण (गमन) करते हैं, या आपसे आप चले जाते हैं ।
अथवा 'स्वर' आदित्य होता है, वह इन को सारण
करता (चलाता) है ।
“उस्रा इव स्वसराणि” अर्थात्-“'इव' जिस प्रकार
'उस्राः' रश्मियें 'स्वसराणि' (अहानि) दिनों के प्रति ( शीघ्र