निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त (१५१) ५ अ० २ पा० ४ खं०
आज (मैं) 'ते' तेरे 'नाम' नामको 'प्रशंसामि' प्रशंसा करता
हूं, अर्थात् मैं उसे प्रशंसा योग्य अर्थ वाला ही समझता हूं,
जिसे और लोग बुरे अर्थवाला समझते हैं । ( क्योंकि- ) 'वयु-
नानि' तुम्हारे विषय के विज्ञानों को 'विद्वान्' जानने वाला
हूं । और 'अर्यः' (अहमस्मि) मैं अर्य हूं-(ईश्वरः स्तोमानाम्)
अर्थात् मैं स्तुतियों के गाने में समर्थ हूं—तुम्हारे गुणों का
जानकार हूं, इससे मैं प्रशंसा करता हूं । अथवा 'अर्यः' (त्वम्-
असि) तू मेरे ऊपर अनुग्रह करने के लिये समर्थ है, इससे
प्रशंसा करता हूं । [ यहां मन्त्र में 'तत् ते नाम' 'वह तेरा
नाम' ऐसी उक्ति नाम को प्रसिद्ध प्रशंसा योग्य होने की
सूचना के लिये है । ] 'तम्' उस सर्वगुणसम्पन्न ईश्वर 'तवसम्'
(महान्तम्) बड़े 'अस्य' इस 'रजसः' अन्तरिक्ष लोक के 'पराके'
(पराक्रान्ते) दूरसे दूर स्थान में 'क्षयन्तम्' (निवसन्तम्) निवास
करते हुये 'त्वा' तुझको 'अतव्यान्' लघु (छाटा सा) मैं 'गृणा-
मि' स्तुति करता हूं ।
इस मन्त्र में 'शिपिविष्ट' नाम से विष्णु का संबोधन
करके उसके नाम की प्रशंसा की है, किन्तु प्रशंसनीय नाम को
न बताकर उसे ' तत् ' परोक्ष वाचक पदके द्वारा देवता को
स्मरण कराता है, स्यात् वह शिपिविष्ट ही हो । ऐसी प्रशंसासे
देवता अधिक संतुष्ट होतेहैं । क्योंकि—“ परोक्षप्रियाइवहि
देवाः ” ‘देवता परोक्ष-प्रिय जैसे होते हैं’ यह श्रुति है।
निरुक्तार्थः-हे शिपिविष्ट ! आज उस तेरे नाम की मैं
अर्य प्रशंसा करता हूं । मैं अर्य नाम ईश्वर या स्तोमों के
उच्चारण में समर्थ हूं । अथवा तू स्तोमों ( मन्त्रों ) का अर्य
नाम ईश्वर ( स्वामी ) है । उस तुझ महान् को मैं छोटा सा