नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
( ५२ )
( ५ ) शार्दूलविक्रीडित, ( ६ ) आर्या, ( ७ ) अपरवक्त्र तथा
( ८ ) मात्रा समक (वैश्वदेवी) छन्द मिलते हैं। इन सभी छन्दों का
उल्लेख नाट्यशास्त्र में मिलता है ।
अब यदि इसी क्रम में हम भास तथा अश्वघोष कवि की रचनाओं को
(जो नाट्यशास्त्र की परवर्ती रचनाएँ हैं) देखें तो भास के नाटकों में
नाट्यशास्त्र में वर्णित इक्कीस छन्द तथा अश्वघोष के द्वारा नाट्यशास्त्र में
वर्णित बीस छन्दों का प्रयोग मिलता है।
उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि रामायण में विद्यमान छन्दों
में तथा महाभारत में प्राप्त छन्दों में ऐसा कोई छन्द नहीं जिसे कि नाट्य-
शास्त्र में परिभाषित न किया हो । अतः यह स्पष्ट है कि रामायण तथा
महाभारत की अपेक्षा नाट्यशास्त्र की उत्तरभाविता स्पष्ट है। परन्तु यदि
इसी प्रकाश में भास एवं अश्वघोष की रचनाओं में प्रयुक्त ऐसे छन्द को देखें
(जो क्रमशः २ तथा ५ होते हैं) तो यह स्पष्ट होगा कि भास तथा
अश्वघोष कवि भरत प्रणीत नाट्यशास्त्र के उत्तर भावी हैं यह स्पष्ट है।
इसी क्रम में पतञ्जलि प्रणीत सुप्रसिद्ध ग्रन्थ व्याकरण महाभाष्य में उद्धृत
छन्दों को भी परीक्षा हेतु रखा जाए तो स्पष्टतः उसमें इन छन्दों का प्रयोग
है:—( १ ) अनुष्टुप्, ( २ ) विद्युल्लेखा, ( ३ ) दोधक, ( ४ ) इन्द्रवज्रा,
( ५ ) उपेन्द्रवज्रा, ( ६ ) शालिनी, ( ७ ) तोटक, ( ८ ) वंशस्थ (वंशस्थ
विल—पिङ्गल), ( ९ ) प्रमिताक्षरा, ( १० ) प्रहर्षिणी, ( ११ ) वसन्त-
तिलका, ( १२ ) आर्या तथा ( १३ ) वक्त्र। इन सभी छन्दों का नाट्यशास्त्र
में स्वरूप प्राप्त होता है। [ पतञ्जलि ने महाभाष्य में जिन ३०० पद्यों को
उद्धृत किया है उनसे यह छन्दों का प्रयोग विवरण निकाला गया है] इससे
यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि पतञ्जलि मुनि ने जिन स्रोत ग्रन्थों से
इन पद्यमय उद्धरणों को चुना था उनमें छन्दों के प्रयोग उसी रूप में हुए हैं जो
नाट्यशास्त्र में वर्णित हैं। अतः स्पष्ट है कि पतञ्जलि के ये उद्धरण जिन स्रोतों
से संकलित हुए वे ग्रन्थ ईसा पूर्व २०० वर्ष से पूर्ववर्ती अवश्य थे। अतः नाट्य-
शास्त्र सहज रूप में ईसा पूर्व २०० से बाद में नहीं रखा जा सकता है। इस
प्रकार छन्दो-विवरण से भी नाट्यशास्त्र के प्रथमभाग में चर्चित स्थितिकाल में
ईसा पूर्व की स्थिति की पुष्टि ही होती है। इसके अतिरिक्त छन्दोगत तथ्यों
के आधार पर निष्कर्ष के लिये नाट्यशास्त्र के प्रयुक्त अनुष्टुप् छन्द के रूपों
का परीक्षण भी उपयोगी होगा। इनमें एक तो अन्तर्वर्ती यति के स्थान पर
( ५३ )
सन्धि का न होना तथा दूसरे एक दूसरे की अनुवर्ती घटना में विच्छेद का
अभाव होना पाया जाता है । कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं :-
( १ ) पुण्ड्राक्षं पुण्ड्रनासञ्च असितं सितमेव च । ( ना० शा० १।३६ )
( २ ) ततश्च करमावृत्य ऊरुपृष्ठे निपातयेत् । ( ना० शा० ४।१६६ )
( ३ ) आङ्गिको वाचिकश्चैव आहार्यः सात्विकस्तथा । ( ना० शा० ६।२३ )
( ४ ) अंगुल्यो यस्य हस्तस्य अन्योन्यान्तरनिस्सृताः । ( ना० शा० ६।१३२ )
( ५ ) पर्यायतश्च क्रियते एलकाक्रीडिता तु सा । ( ना० शा० ११।२० )
( ६ ) अत्यायतपदत्वाच्च अङ्गहास्यो भवेत् स तु । ( ना० शा० १३।१४० )
अनुष्टुप् छन्द के ये उपर्युक्त नमूने स्पष्टतः ही वैदिक छन्दों की परम्परा
का अनुगमन है तथा रामायण एवं महाभारत में होने वाले आर्षप्रयोगों की
तरह भी हैं । इस सन्दर्भ में हम केवल ऋग्वेद से संकलित एक दो उदाहरण
प्रस्तुत करना चाहेंगे :-
( १ ) हिरण्ययेन सविता रथेना
देवो याति भुवनानि पश्यन् । ( ऋ० सं १।३५।२ )
( २ ) तिस्रो द्यावः सवितुर्द्वा उपस्थाँ
एका यमस्य भुवने विराषाट् ॥ ( ऋ० सं० १।३५।६ ।
यद्यपि संहितापाठ के दृष्टा ने उपर्युक्त ऋक् १ में आ में सन्धि रखी है
जो यति को हटाने के उद्देश्य से है । जब कि ऐसा कहीं-कहीं ही करने की
छूट रही तथा वह भी तब जब किसी यज्ञादि में वैदिक ऋक् का पाठ किया
जाता हो । क्योंकि इसमें एक अक्षर की कमी हो जाती है तथा छन्द भी
इससे न्यूनतादोष ग्रस्त हो जाता है । इस प्रकार उपर्युक्त विचार से
यह स्पष्ट हो जाता है कि नाट्यशास्त्र के पाठ में भी कुछ पद्यों में यति या
सन्धि का छेद होना या न करना इस बात की सूचना दे रहा है कि नाट्य-
शास्त्र की रचना अतिप्राचीन काल में तब हुई जब वैदिकच्छन्दों की नियमादि
परम्परा का पालन हो रहा था तथा यह स्थिति भी नाट्यशास्त्र के स्थिति-
काल को ईसा पूर्व ५०० वर्ष के समय में ही ले जाती है जो हमने प्रथमभाग
में निश्चित किया है ।
प्रक्षिप्त अंश—अब यदि नाट्यशास्त्र में आये हुए प्रक्षिप्त अंशों पर
विचार करें तो यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि इसके पन्द्रहवें तथा
सोलहवें अध्याय में जो पाठान्तर युक्त अंश अधिक रूप में प्राप्त हैं वे सभी
अंश निश्चित रूप से बाद में जोड़ दिये गये होंगे । यह जोड़ने की कल्पना भी
( २४ )
किन्हीं उत्तरभावी अध्येताओं आदि ने वैदुष्यपूर्ण संशोधन की भावना से
स्वबुद्धि से लगा दिये होंगे जो नाट्यशास्त्र के मूलपाठ की सुरक्षा में सब से
बड़ी बाधा हो गये । परन्तु इन्हें देखकर दूसरी ओर यह भी विचार आता है
कि प्रक्षेपकर्ता ने ऐसे अंशों को जोड़ने के द्वारा केवल अपने गणितशास्त्र के
ज्ञान की ही कवायद दर्शायी है जिसमें प्रायः साधारण विचार या दृष्टि ही
आ पायी है। उसे इसके लिये और अधिक कारण रखना चाहिए था परन्तु
बिना किसी विशेष प्राप्ति के ही उसने ऐसा कार्य कर डाला—यही प्रतीत
होता है । यह क्या बात होगी ? यदि हम इस प्रश्न को उठाएँ तो यहाँ हमें
एक ही विचार आता है । वह इस प्रकार कि प्रक्षेपकर्त्ता के समय ऐसे छन्द भी
प्रचलन में आ गये थे जिनका लक्षण नाट्यशास्त्र के मूल में नहीं मिलता था ।
तब उसने यहाँ उन छन्दों को भी अपने गणितीय ज्ञान के तथा प्रस्तारादि
के साथ यहाँ जोड़ दिया जिसका उद्देश्य यही दिखलाना था कि सभी छन्दों
की पूर्णता के साथ उपलब्धि इस एक प्राचीन आकर ग्रन्थ में प्राप्य है। यह
प्रवृत्ति एक ही प्राचीन रचना से सभी की गतार्थता दर्शाना है जो प्रायः
प्राचीन ग्रन्थों के साथ ऐसे ही उत्तरभावी अज्ञात पण्डितों के द्वारा किया
जाता रहा है । इसके विषय में खोजबीन करना कल्पना से परे ही होगा कि
यह कार्य नाट्यशास्त्र के बाद कब से आरम्भ हुआ परन्तु ऐसा कार्य
झक्कीपन की तुष्टि से अधिक प्रक्षेपकर्त्ता के लिए कुछ भी महत्व नहीं लाता
न ही इससे मूल ग्रन्थ का महत्व बढ़ता ही है ।
नाट्यशास्त्र में जब यह छन्दोविधान निरूपित हुआ होगा वह नाट्यकला
के चरम विकास एवं गौरव का युग था, जिसका प्रभावी नाट्य, काव्य तथा
छन्दः शास्त्र के रचनाकारों पर अक्षुण्ण प्रभाव बना रहा । यद्यपि भरत
निरूपित छन्दों के पश्चात् इस शास्त्र का पर्याप्त विकास स्वतन्त्ररूप में
हुआ परन्तु इसका काव्य एवं नाट्य के क्षेत्र में जो महत्व धारावाहिक रूप
में आता रहा वह अविस्मरणीय है । इसी कारण पुनरुद्धार एवं चतुरस्र
पर्यालोचना के वर्तमान युग में भी नव छन्दों की सम्भावनाएँ गति पर आरूढ़
हैं और आशावाद के महान् संकल्प को संजोकर बढ़ती चली जा रही है ।
लक्षणादि विधान—नाट्यशास्त्र का "सत्रहवाँ अध्याय" काव्य-
लक्षणादि विधानाध्याय कहलाता है । इसमें काव्यरचना के अंग लक्षण,
अलङ्कार, दोष तथा गुण का लक्षणादि विधान है। इसमें सर्वप्रथम मुनि ने
छत्तीस लक्षणों को काव्य की सहज सुन्दरता के रूप में मान्य कर उनका
( ५५ )
स्वरूप दिया है। नाट्य एवं काव्य के महत्वपूर्ण अङ्गों के रूप में मुनि ने यहाँ
लक्षणों का विवेचन किया है क्योंकि 'लक्षण' काव्य के सर्वाधिक विधायक
तत्त्वों में होते हैं । लक्षणों के कारण ही रसात्मक काव्य की इतर काव्य से
भिन्नता संभव होती है। आचार्य अभिनवगुप्तपाद के अनुसार 'लक्षण की
लोकप्रचलित अर्थ में भी समानता देखी जा सकती है। जैसे किसी महापुरुष
के शरीर में अङ्कित पद्म आदि शुभ चिह्नों से उसके सौभाग्य का सङ्केत
मिलता है इसी प्रकार लक्षणों से काव्य का सहज सौन्दर्य ।
नाट्यशास्त्र के विभिन्न संस्करणों में लक्षण के दो पाठ उपलब्ध होते
हैं। इनमें काशी संस्करण में ( तथा घोष के संस्करण में भी ) दीर्घपाठ
परम्परा के अनुसार अनुष्टुप् वृत्त से लक्षण निरूपण आरम्भ होता है तो
काव्यमाला बम्बई तथा बडौदा संस्करण में उपजाति वृत्त से । इन दोनों में
पर्याप्त पार्थक्य है। दोनों पाठों के मिलान करने पर इनमें अठारह लक्षण
समान मिलते हैं तथा शेष भिन्न । आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने दोनों पाठों पर
व्याख्या की किन्तु अपने उपाध्याय भट्ट तोत की परम्परा में चलने वाले
नाट्यशास्त्र के उपजातिवृत्त वाले पाठ को प्राथमिकता दी । इसी पाठ
परम्परा का अनुगमन धनञ्जय, कीर्तिधर आदि आचार्यों के द्वारा भी हुआ
था । इसके विपरीत सिंहभूपाल तथा विश्वनाथ कविराज ( आदि ) ने दीर्घ-
पाठ परम्परा का अनुसरण किया था । वृत्तिकार भी अभिनवगुप्त की तोत
परम्परा के पाठों को ही लेता था परन्तु धाराधिप श्री भोजदेव ने दोनों
परम्परा के पाठों के अनुसार लक्षणों को लेकर तथा बारह नवीन भेद
सङ्कलित कर लक्षणों के चौसठ प्रभेदों का विवरण दिया । ऐसा प्रतीत होता
है कि लक्षणों की परम्परा में भिन्न पाठ का प्रवर्तन भरतपुत्र नाट्याचार्य
कोहल द्वारा आरम्भ हुआ होगा तथा इसी कारण इस पाठ की परम्परा-
धारा चलती रही । जयदेव ने अपने चन्द्रालोक में लक्षणों की संख्या केवल
ग्यारह ही मानी तथा दोनों पाठ-भेद परम्पराओं से लक्षणों की पाँच-पाँच
संख्या ले ली । शारदातनय तथा विश्वनाथ कविराज ने भी लक्षणों के भिन्न
स्वरूपादि माने जिनका उल्लेख आगे यथास्थान किया जा रहा है ।
नाट्यशास्त्र में वर्णित लक्षण तथा उनका क्रम—नाट्यशास्त्र के
पाठों में दीर्घपाठ परम्परा में लक्षणों का जो क्रम है वही इस संस्करण में भी
लिया गया है। तदनुसार क्रम इस प्रकार है :—(१) भूषण, (२) अक्षर-
, anyone looking at (२८)... (२६)... (३०)will instantly know the book has a typo/misprint(२६)for 29! Wait, in scholarly editing, when you transcribe a text verbatim, you transcribe the text as it appears. Wait, let's look at(३४) गुणकीर्तनin line 7: Wait, in line 7, look at(३४) गुणकीर्तन: (३१) मनोरथ, (३२) लेश, (३३) सङ्क्षेप, (३४) गुणकीर्तन,-> wait, look at 'गुणकीर्तन': Wait, is thatगुणकीर्तनorगुणकीर्तन,? Wait, look at the vowel on 'क': Is it गुणकीर्तनorगुणकीर्त्तन? In line 7: (३४) गुणकीर्तन,-> wait, look above 'त': there is a repha? Wait! In line 7:गुणकीर्तन-> look at the 'क': it has an 'ी' and... wait! Look at the top of 'क': there is an 'ी' and a repha? No, look atगुणकीर्तन: it has 'क', but under the matra, wait, is that गुणकीर्तनorगुणकीर्तन? Wait! Look closely at line 7: (३४) गुणकीर्तन
( ५७ )
इस प्रकार इन नामावलियों के पार्थक्य से लक्षणों के अनेक प्रभेद होना
इस काव्याङ्ग की व्यापकता का सङ्केत देता है। भरतमुनि ने लक्षणों की
छत्तीस संख्या की सूची में उन्हीं लक्षणों को लिया जिनका साहित्य में
सामान्यतः अधिक उपयोग हो सके किन्तु उन्हें इसके तथ्य के विषय में भी
स्पष्टतः विदित था कि लक्षण के प्रभेदों की सीमा स्थिर नहीं हो सकती है।
इतना अवश्य था कि तत्कालीन काव्याङ्गों में इन लक्षणों का महत्व भी
था। इसी कारण उत्तरभावी कोहल आदि आचार्यों के द्वारा लक्षणों के अन्य
स्वरूप भी उद्भावित किये गये तथा इसी कारण आगे भी भोजराज,
शारदातनय जैसे नाट्यविद्या के आचार्यों ने लक्षणों के जो प्रभेद दिखलाये
ये सभी लक्षणों की विशिष्टता को तथा महत्व को दिखलाने के लिये
पर्याप्त आधार रहे हैं।
भरतमुनि की परम्परा में लक्षणों के जो जो स्वरूप उद्भावित एवं
व्याख्यात हुए उनसे भी उपर्युक्त विचारों की ही पुष्टि होती है। इसी कारण
आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने लक्षणों के विषय में अनेक परम्परागत मत
मतान्तर दिखलाये तथा परम्परा प्राप्त दोनों पाठों की सोदाहरण व्याख्या
भी की। 'लक्षण' का स्वरूप बतलाते हुए आचार्य भरत ने उन्हें काव्य का
शरीर माना तथा कथाशरीर में लक्षणों से ही वैचित्र्य की उद्भावना को
मान्यता दी। काव्यगत अपृथक् सौन्दर्य का आधायक लक्षण होता है तथा
पृथक् सिद्ध सौन्दर्य का आधायक अलङ्कार कहलाता है। इस प्रकार लक्षण
तथा अलंकार दोनों निरपेक्ष तत्त्व है तथा सौन्दर्य के आधायक भी तथा इसी
कारण अलङ्कार का द्विविध व्यक्तित्व है। एक ओर वे नाटकीय इतिवृत्त के
सन्ध्यङ्ग जैसे अंश के रूप में हैं क्योंकि नाटकादि के इतिवृत्त से इनका सम्बन्ध
है, काव्यमात्र से नहीं। दूसरी ओर वे अलङ्कार के अनुगत धर्म भी थे। इस
प्रकार काव्यगत अपृथक् सिद्ध सौन्दर्य के आधायक तथा शोभा धायक अंग
के रूप में लक्षणों की पर्याप्त प्रतिष्ठा थी, यह स्पष्ट ही है।
यदि इसके स्वरूपगततत्त्व पर विचार किया जाए तो उपर्युक्त तथ्य
स्पष्ट हो जाएगा। लक्षण का पाठ उपजाति छन्द से आरम्भ होता है वे
नाटकीय सन्ध्यङ्गों के सर्वथा अनुरूप थे, यह बात उनके अभिनवभारती
व्याख्यान से स्पष्ट है जब कि दूसरा पाठ इस तथ्य का अनुगमन कम ही
करता है। इसके अतिरिक्त दूसरा तथ्य यह भी है कि अनेक लक्षण अलङ्कारों
के अनुगत है तथा इन्हीं का आगे चल कर परिवर्तन तथा परिष्कार होकर
अलङ्कारों के रूप में विकास ( भी ) हुआ था। इस तथ्य पर भी अभिनव-
( ५८ )
गुप्तपाद ने भट्ट तोत का मत उद्धृत करते हुए बतलाया कि—"लक्षणों के
सामर्थ्य से ही अलङ्कारों में वैचित्र्य है तथा अलंकारों के वैचित्र्य का मूल
लक्षण में ही विद्यमान है। जैसे गुणानुवाद नामक लक्षण से प्रशंसोपमा
अलङ्कार का, अतिशय से अतिशयोक्ति का, मनोरथ से अप्रस्तुतप्रशंसा का,
मिथ्याध्यवसाय से अपह्नुति का, सिद्धि से तुल्योगिता का उद्भावन किया जा
सकता है। इसी प्रकार लक्षणों के परस्पर मिश्रण से उद्भूत वैचित्र्य से भी
कुछ अलङ्कारों की उद्भावना हो सकती है। जैसे प्रतिषेध तथा मनोरथ के
मिश्रण से आक्षेप अलङ्कार की उद्भावना। इसके अतिरिक्त कुछ लक्षण उक्ति
वैचित्र्य रूप हैं जो अलङ्कारों के अनुग्राहक हो सकते हैं। इस प्रकार लक्षणों
का द्विविध व्यक्तित्व है, यह स्पष्ट है।
उपर्युक्त विवरण से लक्षणों का महत्व तथा उसकी काव्याङ्गों में अतिशय
मौलिकता को दिखलाया गया है। आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने तो—
'अलङ्कार तथा गुण की अपेक्षा न रखते हुए जिस निसर्ग सौन्दर्य की उत्पत्ति
काव्य (या नाट्य) में होती है उसका हेतुरूप धर्म लक्षण ही है''२ कहा भी।
इसका आशय यही है कि लक्षण गुण और अलङ्कारों के बिना भी अपने सहज
सौन्दर्य से प्रतिभासित हो सकता है तथा जैसे लक्षण रहित मनुष्य सुन्दर नहीं
कहलाता उसी प्रकार लक्षण रहित इतिवृत्त का शरीर भी काव्य (या
नाट्य) की अपेक्षित गरिमा को प्राप्त नहीं कर सकता। आचार्य अभिनव-
गुप्तपाद की उपर्युक्त लक्षण व्याख्या तथा उनके उपाध्याय भट्ट तोत के
समीक्षात्मक विवरण से यही तथ्य सामने आता है कि काव्याङ्गों में लक्षण
अपना विशेष महत्व रखते थे तथा कथा एवं काव्यशरीर के वे अपृथक् अङ्ग
तो थे ही, गुण तथा अलङ्कारों के आधार एवं उद्भावक भी थे। इसी कारण
काव्य एवं नाट्य के क्षेत्र में लक्षणों का व्यापक प्रभाव रहा भी।
इस प्रकार भरतमुनि के युग से लेकर अनेक शतकों तक लक्षणों का
१. उपाध्यायमतं तु—लक्षण-बलादलङ्काराणां वैचित्र्यमागच्छति।
तथाहि—गुणानुवादनाम्ना लक्षणेन योगात् प्रशंसोपमा, अतिशयनाम्नाऽति-
शयोक्तिः, मनोरथाख्येनाप्रस्तुतप्रशंसा, मिथ्याध्यवसायेनापह्नुतिः, सिद्ध्या
तुल्ययोगितेति। एवमन्यदुत्प्रेक्ष्यम्। लक्षणानाञ्च परस्परवैचित्र्यादनन्तो
विचित्रभावः। यथा प्रतिषेधमनोरथयोः सम्मेलनादाक्षेप" इति। (अभि०
भा० Vol. II पृ० ३२१ ।
२. "काव्येऽप्यस्ति यथा कश्चित् स्निग्धः शब्दोऽर्थशब्दयोः। य श्लेषादि
गुणव्यक्तिदक्षः स्याल्लक्षणस्थितः।।" इति (अभि० भा० Vol. II पृ० २६६)
यद्यपि काव्याङ्गों के रूप में महत्व बना रहा किन्तु आगे चलकर काव्यशास्त्र
के विकास में अलङ्कारों की परम्परा ने धीरे-धीरे अधिक प्रसार एवं महत्व
प्राप्त किया जिससे लक्षणों की आभा धूमिल पड़ती गयी तथा उनका क्षेत्र भी
कम पड़ने लग गया। जहाँ एक ओर महाराज भोज ने लक्षणों की संख्या वृद्धि
की तथा अन्य आचार्यों ने भी यथाशक्य इसी क्रम में कहीं लक्षणों के नाम तथा
कहीं उनके स्वरूप को भिन्न बतला कर लक्षणों के विवेचन-विवरण के विसर्जन
क्रम को बनाए रखा था तो दूसरी ओर विश्वनाथ कविराज तथा सागरनन्दी
आदि आचार्यों ने इन लक्षणों को नाट्य-लक्षण कहकर छत्तीस प्रभेद
दिखला कर इन्हीं के साथ साथ 'नाटचालङ्कारों' को भी प्रतिपादित किया।
ये नाटचालङ्कार या तो भोज आदि से नवीन उद्भावित 'लक्षण' थे या
नाट्यशास्त्र की पाठ भेद परम्परा से प्राप्त ऐसे 'लक्षण' थे जो छत्तीस लक्षणों
में समायोजित नहीं हो पाए थे अतः इनके सोदाहरण विवरण इन ग्रन्थों
में लगाये गये। इसके अतिरिक्त धनञ्जय आदि ने इन लक्षणों का अन्तर्भाव
अलङ्कार, गुण, सन्धि तथा भाव में हो जाने से काव्याङ्गों में उनके विवरण
को देना ही अनावश्यक मान लिया था। १ इसका परिणाम यह हुआ कि
नाट्य-लक्षणों या नाटचालङ्कारों का विवरण देना एक परम्परा-निर्वाह
मात्र हो गया तथा कालान्तर में यह लक्षण-विवेचन का क्रम मन्दतर होने
लगा। काव्यशास्त्र के उत्तरोत्तर विकास के साथ गतिमान् होकर ये लक्षण
नहीं चल पाये तथा उनकी ह्रासोन्मुखी स्थिति ने धीरे-धीरे न केवल उनकी
महत्वपूर्ण स्थिति ही रहने दी परन्तु उनकी अनुपयोगिता को भी बतलाना
आरम्भ कर दिया था जिसका सङ्केत धनञ्जय के इस विवरण से मिलता है।
परिणाम स्वरूप लक्षण पद्धति का स्थान साहित्यशास्त्र में 'अलङ्कारों ने ले
लिया जो नाट्यशास्त्र के रचनाकाल के समय अतिशय अल्पावस्था में
अवस्थित थे।
अलङ्कार—नाट्यशास्त्र में लक्षणों के विवरण के पश्चात् अलङ्कारों का
विवेचन दिया गया है। इसमें जहाँ लक्षणों की संख्या छत्तीस थी वहाँ
अलङ्कारों की संख्या चार ( ही ) है तथा नाट्यशास्त्र के इस भाग पर कोई
भिन्न पाठ तथा प्रक्षिप्त अंश भी उपलब्ध नहीं है। इससे स्पष्ट है कि नाट्य-
शास्त्र के लेखन के समय से लेकर अनेक शताब्दियों बाद तक अलंकार-पद्धति
अपनी स्थिति आरम्भक-बिन्दुओं से अधिक विस्तीर्ण नहीं बना सकी थी।
१. “लक्षणसन्ध्यङ्गकाव्यानि सालङ्कारेषु तेषु हर्षोत्साहेषु अन्तर्भावान्न-
कीर्तिता” ।—दश० रू० ४ ।
( ६० )
भरत के उत्तरभावी साहित्य के आचार्यों ने इसी अलङ्कारपद्धति को धीरे-धीरे
विकसित, व्यवस्थित एवं व्यापक बनाकर उसे शास्त्रीय गौरव की इतनी
ऊँचाई तक पहुँचा दिया कि फिर उनके सम्मुख 'लक्षण' नीची स्थिति में
दिखाई देने लगे तथा इसी कारण उनकी स्थिति गौण बनती चली गयी ।
इतना होने पर भी काव्यशास्त्र के (तथा काव्य के) अङ्ग के रूप में अलङ्कार
के निरूपक आचार्यों में भरत ही सर्वप्रथम आचार्य रहे थे । अतः यह
ऐतिहासिक गौरव भी केवल भरतमुनि को ही प्राप्त है, यह निर्विवाद है ।
लक्षण तथा अलङ्कारगत विभेद—भरत प्रतिपादित लक्षणों तथा
अलङ्कारों के सन्दर्भ में विचार की स्थिति में सर्वप्रथम इनके विभेद पर भी
ध्यान जाता है। भरतमुनि ने लक्षणों तथा अलङ्कारों के जो विवरण दिये
उनके अनुशीलन से यह स्पष्ट हो जाएगा कि लक्षण की महिमा से ही
अलङ्कारों के द्वारा काव्य में शोभा का आधान होता है। आचार्य अभिनव-
गुप्तपाद ने अलङ्कारों के इस आधारभूत तथ्य को काव्यरचना की प्रासाद-
रचना से तुलना करते हुए समझाया कि लक्षण तो काव्यरचना में भित्ति
स्थानीय होते है तथा उन पर चित्ररचना के कार्य के समान अलङ्कारों का
प्रयोग माना गया है । काव्य में अलङ्कार उस रत्नमाला के समान है जो
अलङ्कार्य या शरीर से भिन्न हो जब कि लक्षण शारीरिक ( एवं ) सहज
सौन्दर्य है जो बिना अङ्कारों के भी सुन्दर होता है ।१
नाट्यशास्त्र में निरूपित अलङ्कार—काव्य के प्रसंग में भरतमुनि ने
केवल चार अलङ्कारों का निरूपण किया है जिनमें उपमा, रूपक तथा दीपक
अलङ्कारों को उत्तरभावी आचार्यों ने अर्थालङ्कार तथा यमक को शब्दालङ्कार
माना । अलङ्कारों के सन्दर्भ में उनका शब्द तथा अर्थगत विभेद भरत के
समय तक उद्भावित नहीं हुआ था जिससे एक परम्परा प्रवर्तित हो, परन्तु
भरतमुनि अलङ्कारों के व्यापक सामर्थ्य से परिचित प्रतीत होते हैं, यह उनके
ग्रन्थ के अनुशीलन से समझा जा सकता है । इसी कारण उनके ग्रन्थ में
बीजरूप में अलङ्कारों का ( काव्य के उपकरणों के सन्दर्भ में ) निरूपण करने
के पश्चात् अन्त में यह भी कहा गया कि अर्थक्रियापेक्षी लक्षणों तथा अलङ्कारों
के द्वारा काव्य की रचना की जाए । यहाँ अर्थक्रिया से उनका आशय यही
है कि काव्य में रस की अपेक्षा अवश्य रहनी चाहिए, क्योंकि सौन्दर्याधायक
तत्व—चाहे वे फिर एतादृश अलङ्कार ही क्यों न हों—समवाय सम्बन्ध से
रस के उपकारक होंगे । उसी प्रकार जैसे कटक केयूर शरीर के शोभाधायक
१. द्रष्ट०—अभिनवभारती Vol. II पृ० २६२-२६७ ।
( ६१ )
बन कर उसकी आत्मा के भी उपकारक बन जाते हैं। वे केवल बहिरंग के
प्रसाधक मात्र नहीं रहते । भरतमुनि का यह संकेत मानवीय वृत्तियों एवं
संवेदनाओं की उद्भावक ऐसी ही काव्यरचनाओं को करता है जो रससम्पृक्त
हों । कालान्तर में अलङ्कार-पद्धति का विकास रस से स्वतन्त्र होकर
चमत्कार की उद्भावक एवं असाधारण उक्ति वैचित्र्य को प्रश्रय देने वाली
प्रवृत्तियों की बहुलता को लेकर हुआ, जिसने कविता को सर्वजनसंवेद्य एवं
सहजवेद्य ( तथा सरस ) रूप से हटाकर अनेक रत्नादि के हार तथा
विभूषणादि से मण्डित रमणी के सौन्दर्य को दिखलाने की प्रवृत्ति में अधिक
रुचि ली । यह शोभा के प्रसार की न्यूनाधिक मात्रा को अलङ्कारादि से
सम्पादित करने वाली विभेदकशक्ति थी जिसे इसी रुचि की पूर्ति में पूर्णतः
जुटा दिया गया था । अतः यहाँ अब हम क्रमशः नाट्यशास्त्र में चर्चित
अलङ्कारों का थोड़ा विवरण देते हैं ।
उपमा—गुण तथा आकृति की समानता के आधार पर दो भिन्न
वस्तुओं का उपमित होना 'उपमा' है । विषय की दृष्टि से नाट्यशास्त्र में
उपमा के प्रभेद भी पाँच रूप में दिखलाये गये हैं । प्रशंसा में प्रशंसोपमा,
निन्दा में निन्दितोपमा, कल्पना में कल्पितोपमा, सादृश्य में सादृश्योपमा तथा
किञ्चित् सादृश्य में किञ्चित् सदृशोपमा । यद्यपि उपमा के रूप प्राचीन वैदिक
मन्त्रों में प्राप्त थे तथा यास्क के निरुक्त में इसकी चर्चा भी है किन्तु इसकी
सर्वप्रथम शास्त्रीय परिभाषा देकर प्रभेद विनिश्चय प्रथमतः भरतमुनि ने ही
किया जिसके आधार पर बाद में आगे चलकर अनेक उपमामूलक नवीन
अलङ्कारों की उद्भावना हुई । भारतीय कविता की सौन्दर्यसृष्टि में उपमा
का योगदान महत्वपूर्ण तथा ऐतिहासिक भी है । अनन्वय, उपमेयोपमा,
प्रतिवस्तूपमा, अपह्नुति, सन्देह, भ्रान्तिमान्, अतिशयोक्ति जैसे सादृश्यमूलक
अलङ्कार उपमा के विस्तार,या विकास ही हैं। इसी कारण उत्तरभावी
अलङ्कार शास्त्र के प्रसिद्ध विद्वान् अप्पयदीक्षित ने उपमा को ऐसी नटी
निरूपित किया जो काव्य के रङ्गमञ्च पर विभिन्न भूमिकाओं में अवतरित
होकर सहृदयों के चित्त का अनुरञ्जन करती हो ।¹
दीपक—एक अर्थ के द्वारा अनेक अर्थों का दीपक की भाँति प्रकाशक
“दीपक” है। भरतमुनि ने उपमा की तरह दीपक के अनेक प्रभेद नहीं
किये । अभिनवगुप्तपाद ने भरत के लक्षण के आधार पर इसी के स्वरूप
१. “उपमैका शैलूषी सम्प्राप्ता चित्रभूमिकाभेदात् ।
रञ्जयति काव्यरङ्गे नृत्यन्ती तद्विदां चेतः ॥”—कुव०
( ६२ )
को—'एक अवान्तर से असंयुक्त रहकर जो क्रिया, गुण, जाति आदि की
आकाङ्क्षा की सम्यक् पूर्ति करता हो तो उसे दीपक की प्रकृति के कारण
‘दीपक’ समझना चाहिए’ कहकर विशेष स्पष्ट किया जिसकी भरतमुनि के
द्वारा दिये गये उदाहरण से पुष्टि होती है ।
रूपक—इस अलङ्कार में किञ्चित् सादृश्य तथा तुल्यावयवत्व की स्थिति
होती है । इसके भी मुनि ने प्रभेद नहीं किये किन्तु उनके विवरण से रूपक के
साङ्ग या एकदेशविवर्ति होने के संकेत अवश्य मिल जाते हैं । यहाँ पाठभेद में
रूपक का अन्य एक लक्षण भी मिलता है । ( जिसकी व्याख्या यथास्थान
देखनी चाहिए ) ।
यमक—भरतमुनि ने यमक अलङ्कार के लक्षण तथा उसके प्रभेदों के
सोदाहरण विवरण से शब्दालङ्कारों को आधार प्रदान किया यह स्पष्ट ही
प्रतीत होता है । यहाँ भरतमुनि ने वर्गीकरण के उद्देश्य से यमक के प्रभेद
नहीं किये केवल वर्णन ही उनका लक्ष्य था । इसी कारण उन्होंने शब्दाभ्यास
को ही यमक का लक्षण बतला कर उसके दस प्रभेद कर डाले थे । यहाँ
इस प्रकार किसी क्रम की स्थापना प्रतीत नहीं होती है । आगे चलकर ये
प्रभेद इस प्रकार बन जाते हैं—(१) पादान्त-यमक, (२) काञ्ची-यमक,
(३) समुद्ग-यमक, (४) विक्रान्त-यमक, (५) चक्रवात-यमक, (६) सन्दष्ट-
यमक, (७) पादादि-यमक, (८) आम्रेडित-यमक ( या पादान्ताम्रेडित-
यमक ), (६) चतुर्व्यवसित-यमक तथा (१०) माला-यमक ।
नाट्यशास्त्र में इन प्रभेदों के लक्षण तथा उदाहरण देकर विषय को
हृदयंगम करवाया गया है । इसमें मालायमक में एक व्यञ्जन की समस्त
पद्य में आवृत्ति रहने से इसे परवर्ती आचार्यों ने एक विशिष्ट अलङ्कार के
अनुप्रास नाम को देकर इसके प्रभेद दिखलाये । भरत प्रतिपादित इन प्रभेदों
ने आगे चल कर यमक के अनेक प्रभेदों को आधार प्रदान किया जिसे
अग्निपुराण, दण्डी के काव्यादर्श, भामह के काव्यालङ्कार तथा भट्टिकाव्य में
देखा जा सकता है । यहाँ हम विस्तारभय से तथा अप्रासङ्गिक रहने से
इसकी चर्चा नहीं करेंगे । क्योंकि यमकों के प्रभेद उस समय वर्गीकरण की
स्थिति में नहीं थे अतः इनके उदाहरणों की स्थिति से भी अन्वेषक विद्वानों
को अधिक सन्तोष नहीं हुआ१ । आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने यमक के प्रभेदों
के उदाहरणों की यथाशक्य संगति बैठाने का अवश्य उद्योग किया था ।
१. विस्तार के लिए द्रष्टव्य—डॉ० रुद्रदेव त्रिपाठी—'संस्कृत साहित्य में
शब्दालङ्कार, पृष्ठ—११६-१२० का विवरण ।
( ६३ )
अलङ्कारशास्त्र को नाट्यशास्त्र का आधार—यद्यपि नाट्यशास्त्र में
शब्द तथा अर्थ के आधार पर शब्दालङ्कार तथा अर्थालंकारों की परिकल्पना
तथा चर्चा नहीं हुई और नहीं विभाजन ही हुआ किन्तु इन अलङ्कारों के
विवेचन में परवर्ती अलंकारों की शब्द तथा अर्थगत स्थिति के प्रभेदों की
सम्भावनाएँ विद्यमान थीं। भरतमुनि ने नाट्यलक्षणों के अतिरिक्त चार पृथक्
अलंकारों का विवरण दिया था जब कि अलङ्कारों की संख्या अप्पयदीक्षित के
समय ( १७ वीं शती ) तक एक सौ चौबीस हो चुकी थी ( और वह भी
केवल अर्थालङ्कारों की ) जिनमें अलंकारों के अवान्तर भेदों का पृथक् (ही)
विस्तार है। इस प्रसंग में एक स्वाभाविक प्रश्न उपस्थित होता है कि क्या
भरतमुनि को केवल चार अलङ्कारों का निरूपण ही अभीष्ट था तथा उन्होंने
अपने समय तक प्रचलित सभी साहित्यिक तथ्यों के सभी पक्षों पर समान रूप
में तथा न्यायपूर्ण चिन्तन किया था। अब इस प्रश्न के सन्दर्भ में साहित्य तथा
उसके ऐतिहासिक क्रम पर दृष्टि डाली जाए तो यह स्पष्ट हो जायगा कि
नाट्यशास्त्र को गम्भीरता से देखने पर उपर्युक्त आशंका के लिये स्थान ही
कम रह जायगा।
भरतमुनि ने लक्षणों एवं अलङ्कारों का निरूपण किया था तथा उनमें विभेद
भी दर्शाया था जैसा पिछले विवरण से स्पष्ट है। इसमें जहाँ लक्षणों की संख्या
छत्तीस है वहीं पाठान्तरगत लक्षणों के भेद से यह संख्या और भी अधिक हो
गयी है। अलङ्कारशास्त्र के उत्तरभावी आचार्यों ने अलङ्कार तथा लक्षणों के
इन प्रभेदों की ओर गम्भीरता से अवधान न देकर अनेक लक्षणों को अलङ्कार
प्रभेद के रूप में प्रतिपादित करने की प्रवृत्ति ही दर्शायी जो कुछ शाब्दिक
परिभाषाओं के एवं उदाहरणों के नवीनीकरण को लिये हुए रहा भी था।
अतएव अलङ्कारशास्त्र के आचार्यों ने अनेक नये ऐसे अलङ्कारों की उद्भावना कर
डाली जिनसे भरतमुनि अनभिज्ञ नहीं थे। परन्तु इतना सही है कि भरतमुनि
लक्षणों का आधार लेकर ही अपने अलङ्कार तथा उनके प्रभेदों के आविष्कार
या निर्माण में समर्थ हो पाए थे। इस कारण सभी उत्तरभावी आलङ्कारिक
आचार्य किसी प्रकार अपने उपजीव्य ग्रन्थ नाट्यशास्त्र के आभारी हैं ही।
भरतमुनि ने मूलभूत अलङ्कारों तथा लक्षण, गुण, दोष आदि के द्वारा जिस
काव्यमार्ग का आरम्भ किया था उसे ही उत्तरभावी भामह, दण्डी आदि
आचार्यों ने अपनी मौलिक प्रतिभा के योग से विकसित एवं व्यवस्थित किया
था यह स्पष्टतः प्रतीत होता है।
दोषविधान—वाचिक अभिनय के इस क्रम में काव्यदोषों का भी भरत-
( ६४ )
मुनि ने विवरण दिया है। ऐसा प्रतीत होता है कि दोषपद्धति को प्राचीन
शास्त्र परम्परा के आधार पर—विशेषतः गौतम के न्यायसूत्र या महाभारत
आदि के आधार पर पल्लवित किया गया था। इनमें सामान्यतः जिन दोषों
को बतलाया गया था उन्हींके अनुसरण या आदर्श पर काव्यदोषों का भी
निरूपण हुआ जिसका उद्देश्य था काव्य में पूर्णता की स्थिति बनाए रखना ।
काव्यदोषों के निरूपण का विवरण सर्व प्रथम नाट्यशास्त्र में ही मिलता है ।
अतः इसके प्रवर्तक भी भरतमुनि ही थे यह स्पष्ट है। उत्तरभावी आचार्यों ने
दोष के स्वरूप का विवेचन तथा विस्तार लोकव्यवहार एवं विविधशास्त्रों के
परिशीलन के प्रकाश में ही किया है। भरतमुनि की पूर्ववर्ती जो काव्य-
शास्त्रीयपद्धति दोष आदि के लिये चल रही होगी उसका भी भरतमुनि ने
अपनी रचना में निवेश किया था तथा समकालीन मान्यताओं को ध्यान में
रखकर नाट्यशास्त्र में 'दोषविधान' निरूपित किया था जो उनके ग्रन्थ के
परिशीलन से स्पष्ट ही देखा जा सकता है।
दोष तथा उनके प्रभेद—भरत मुनि ने गुणों की संख्या दस मानी
है जिसे हम आगे दिखलाएँगे तथा गुणों को दोषों का विपर्यय मानने के
आधार पर दोषों की भी संख्या दस ही की है। निश्चित ही काव्य के क्षेत्र
में दोष पहिले उपस्थित थे क्योंकि काव्य भाषा के क्षेत्र की वस्तु मानी
जाती है तथा इसी कारण गुण ही दोषों के विपर्यय होंगे यह बात उपयुक्त
ही है। इन दोनों का क्रम इस प्रकार दिया गया है :—
( १ ) गूढ़ार्थ, ( २ ) अर्थान्तर, ( ३ ) अर्थहीन, ( ४ ) भिन्नार्थ,
(५) एकार्थ; ( ६ ) अभिप्लुतार्थ, ( ७ ) न्यायादपेत, ( ८ ) विषम,
( ६ ) विसन्धि तथा ( १० ) शब्द ( पद ) च्युत। क्रमशः इनका विवरण
इस प्रकार है।
गूढ़ार्थ—शब्दों के गूढ़ार्थ को पर्याय शब्द से बतलाना 'गूढ़ार्थ दोष' है।
नाट्य एवं काव्य के प्रयोग में गूढ़ार्थता अर्थबोध में बाधक होती है। जैसे
( टिप्पणी में भी ) 'दशरथ' पद के लिये 'अधिकनवविमान' का प्रयोग ।
यहाँ ऐसे यदृच्छा शब्द को पर्याय द्वारा संकेतित किया गया जो दुर्बोधताग्रस्त
है। मम्मट ने इसे ही 'निहतार्थ' दोष कहा है ।
अर्थान्तर—अवर्ण्य का वर्णन करना 'अर्थान्तर नामक दोष' है। इसी कारण
वर्ण्य वस्तु का औचित्य दब जाता है तथा प्रतिपाद्य विषय या रस की उपेक्षा
होने लगती है। इसे मम्मटादि ने अवाच्यवचन या अमतपरार्थता जैसे दोषों में
परिगणित कर व्यापक विचार किया ।
( ६५ )
**अर्थहीन—**अर्थ की असम्बद्धता या अपूर्ण अर्थ की बहुलता से यह दोष
होता है। इसे मम्मटादि सम्मत न्यूनपद या निरर्थक के रूप में समझा जा
सकता है।
**भिन्नार्थ—**अविवक्षित अर्थ को कहने या ग्राम्यशब्दों के प्रयोग करने पर
यह दोष होता है। इसके दूसरे लक्षण से अनपेक्षित अर्थ में अभिहित अर्थ का
परिणत होना भी इसी दोष का स्वरूप हो जाएगा। इसे मम्मटादि सम्मत
प्रकाशितविरुद्धता या विरुद्धमतिकृत् के समान समझा जा सकता है।
**एकार्थ—**एक ही वर्ण्य के लिये अनेक पदों का प्रयोग करना जो
पुनरुक्तता सा लगे तो 'एकार्थ' दोष कहलाता है।
**अभिप्लुतार्थ—**पद्य के प्रत्येक पाद में अर्थ का समाप्त हो जाना, जो
कि एक दूसरे से निरपेक्ष हों तो 'अभिप्लुतार्थ' दोष होता है अथवा लम्बे
समास का एक पूरे पद्य के पाद में प्रयोग के द्वारा अर्थ को दुर्बोध बनाना।
इसे मम्मटादि सम्मत क्लिष्टत्व के समान माना जा सकता है।
**न्यायादपेत—**लोकपरम्परा के विरोध होने या देश, काल, कला,
न्याय या आगम के विरुद्ध किसी उपयुक्त तर्क के न देने पर यह दोष होता
है। इसमें प्रतिज्ञा या दृष्टान्त का विरोध या अभाव रहता है। यह मम्मटादि
सम्मत विद्याविरुद्धता या प्रसिद्धिविरुद्धता जैसे दोषों के समान समझा जा
सकता है।
**विषम—**छन्द या वृत्तों के अनुचित प्रयोग करने पर यह छन्दोशैथिल्य
के कारण दोष होता है। यह विवक्षित अर्थ या रस के प्रतिकूल होता है।
मम्मटादि सम्मत हतवृत्तता के समान इसे समझा जा सकता है।
**विसन्धि—**जब पदों को सन्धि के नियमानुसार न रख कर सन्धिहीन
स्थिति में प्रयुक्त किया जाता है तो यह दोष होता है।
**शब्दच्युत—**उचित शब्दों के यथासमय प्रयोग न करने से यह दोष
होता है। इस दोष का क्षेत्र विस्तीर्ण है जिसमें विवक्षित भाव का प्रकाशन
न होना इस दोष की स्थिति निर्माण करता है। क्योंकि ऐसे अपशब्दों के
प्रयोग से विवक्षित अर्थ के बोध में बाधा उत्पन्न हो जाती है। इसे सम्मटादि
सम्मत अवाचकत्व, असमर्थत्व तथा च्युतसंस्कृति जैसा समझा जा सकता है।
यह व्याकरण से भी एक ओर सम्बन्ध रखता है तथा अर्थ से भी।
इस प्रकार इस दोषनिरूपण के विवरण से स्पष्ट है कि शब्द के साधु
प्रयोग, वर्ण्य या अर्थ के उपयुक्त काव्यरचना करना तथा रसानुवर्ती छन्द
५ ना० द्वि० भू०
( ६६ )
का विधान होने से काव्य उत्तम या निर्दोष होता है। यद्यपि भरतमुनि के
समय शब्द और अर्थ में विभाजन होकर दोष विचार आरम्भ नहीं हो पाया
था परन्तु ऐसे विभाजन की सम्भावनाओं के आधार अवश्य निर्मित हो
चुके थे। भरत के दोषनिरूपण ने उत्तरभावी आचार्यों को दोषों के सूक्ष्म
विवेचन (तथा दोषों की अनित्यता तथा अनौचित्य जैसे बिन्दुओं पर विचार)
करने की प्रेरणा (अवश्य) दी। नाट्यशास्त्र में अलङ्कारों की संख्या
अतिन्यून तथा सीमित रहने से अलङ्कार में आनेवाले दोषों की चर्चा नहीं
हो पायी यद्यपि दोष के आधार का तत्व भरतमुनि ने ही संकेतित किया
है। भरतमुनि ने निर्दोषता को उत्तम काव्यरचना का सौन्दर्य मानकर
काव्य में अदोषत्व का विचार मुख्य बिन्दुरूप में स्थापित किया जो काव्यशास्त्र
के इतिहास में विशेषतः उल्लेखनीय तथा महत्वपूर्ण भी है।
गुणविधान—काव्यगत गुणों का विवरण भी इसी क्रम में आता है।
भरतमुनि ने दस गुणों के विवरण के प्रसङ्ग में दोषों के अभाव या विपर्यय के
रूप में 'गुण' को प्रतिपादित किया था। इस काव्यगुण के विवेचन ने शब्दार्थ
तथा रसाश्रित गुणविवेचन को आधार प्रदान किया। वाचिक-अभिनय में
नाट्य-प्रयोग की दृष्टि से किया गया यह गुणनिरूपण रीतिवादी एवं रसवादी
प्रवृत्तियों का मूल विचारबिन्दु बन कर उन्हें प्रभावित करने में आगे
चल कर समर्थ हो सका जिसके प्रवर्तन का श्रेय भी भरतमुनि को ही है।
गुणस्वरूप—भरत ने दोषों की तरह गुणों के भी दस प्रभेद कर
उनका विवरण दिया है। ये हैं—( १ ) श्लेष, ( २ ) प्रसाद, ( ३ ) समता,
( ४ ) समाधि, ( ५ ) माधुर्य, ( ६ ) ओज, ( ७ ) सौकुमार्य, ( ८ ) अर्थ-
व्यक्ति, ( ६ ) उदारता तथा ( १० ) कान्ति। क्रमशः संक्षेप में इनके
स्वरूप इस प्रकार हैं—
श्लेष—जहाँ पदों की श्लिष्टता अभिलषित अर्थपरम्परा या समुदाय
से सम्बद्ध रहती हो अथवा जहाँ पद में गहन विचार की अर्थधारा स्वभावतः
स्फुट होती हो तो वहाँ श्लेष गुण होता है। अभिनवगुप्तपाद ने इसके लक्षण-
गत दोनों पाठों को शब्द तथा अर्थश्लेष अलङ्कार का उद्भव स्रोत निदर्शित
किया है।
प्रसाद—शब्दार्थ के आह्लादक संयोग से अर्थ के स्वच्छ स्फटिक की
तरह प्रतिभासित होने पर 'प्रसाद' गुण होता है। अपनी अर्थ विमलता
के कारण यह अर्थगुण हो जाता है—यह अभिनवगुप्तपाद आचार्य
( ६७ )
ने माना है। तीन गुणों को ही काव्य में मान्य करने वाले मम्मटादि ने भी
इसे एक गुण ही स्वीकृत किया है ।
समता—जिसमें न अधिक असमस्त पद तथा न व्यर्थाभिधायी या
दुर्बोध पद हों तो 'समता' गुण होता है। अन्य पाठ के अनुसार गुण तथा
अलङ्कारों का समुचित योग होना 'समता' है। आचार्य हेमचन्द्र ने अन्य पाठ
को मान्य कर बतलाया कि भिन्न अधिकरण में अवस्थित गुण तथा अलङ्कार
परस्पर विभूषित नहीं करते। सर्वेश्वर ने भी (अपने साहित्यसार ग्रन्थ में)
यही पाठ स्वीकार किया। वामन ने समता को वृत्ति में अन्तर्भुक्त किया
तथा अन्य कुछ आचार्य मार्ग की भिन्नता के कारण समता को दोष मानने
लगे थे ।
समाधि—इष्टार्थ की अभिव्यक्ति के लिये उपमा को ग्रहण करना या
कविप्रतिभा द्वारा प्रयुक्त पद या वाक्य से विशिष्ट अर्थान्तर की प्रतीति होना
'समाधि' है। आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने इसे शब्द का गुण निरूपित कर
विस्तृत विवरण दिया है ।
माधुर्य—वाक्य की बार-बार आवृत्ति होने पर भी उद्वेग रहित मधुरता
का बना रहना 'माधुर्य' हैं। इस गुण को मम्मटादि ने त्रिगुण में मान्यता दी
है तथा अभिनवगुप्त इसे अर्थगुण बतलाते हैं ।
ओज—जिसमें समासबहुल रचना हो तथा जो अनेक विचित्र, उदार
तथा परस्पर अपेक्षित अर्थों से अनुमत रहे तो 'ओज' गुण होता है। अन्य
पाठ के अनुसार शब्दार्थ की समृद्धि से उदात्त अर्थ का प्रतिभासित होना
'ओज' है। आचार्य हेमचन्द्र ने ओज के इसी लक्षण को मान्य करते हुए
इसे प्रकृत कवि कर्म निरूपित किया । आचार्य अभिनवगुप्त पाद ने ओज को
अर्थगुण माना तथा मम्मटादि ने इसे त्रिगुण में एक गुण के रूप में मान्य
किया। डॉ० वी० राघवन्¹ ने इसके पाठ में 'सानुरागैः' के सानु शब्द के
स्थान पर काकुशब्द सुझाया तथा तदनुसार अर्थसङ्गति को बैठाने का आग्रह
किया। परन्तु ऐसे पाठ को मानने का आधार (किन्हीं नाट्यशास्त्र की
प्राचीन प्रति या हस्तलेखों में प्राप्त नहीं होने) स्पष्टतः प्राप्त नहीं होता ।
दूसरे अभिनवगुप्तपाद ने इसके दोनों पाठों की भी परम्परा के अनुगत व्याख्या
दी है तथा इसी कारण विषय के अनुगत स्वतन्त्र कल्पना को अधिक बढ़ावा
मिलने के सभी अवसर क्षीण हो गये हैं ।
१. द्रष्ट-डॉ० राघवन्-भोज का शृङ्गारप्रकाश-पृष्ठ २६८ ।
( ६८ )
सौकुमार्य—सुखपूर्वक उच्चारण या प्रयोग के उपयुक्त तथा सुश्लिष्ट
सन्धि एवं कोमल अर्थ से अनुप्राणित रचना ‘सौकुमार्य’ कहलाती है। आचार्य
अभिनवगुप्तपाद ने इसे शब्द तथा अर्थ गुण मानकर बतलाया है कि ‘सुकुमारता’
दोनों में होती है। दण्डी तथा हेमचन्द्राचार्य ने इसे शब्दगुण माना है।
अर्थव्यक्ति—नाट्य या काव्य व्यापार में सुप्रसिद्ध तथा लोकप्रसिद्ध
पदार्थ या क्रिया का अभिधान होने से अर्थ का सुस्पष्ट अवबोध होना
‘अर्थव्यक्ति’ है। अन्य पाठ के अनुसार पात्र के द्वारा अपने मनोबल के योग
द्वारा प्रेक्षक के हृदय में अवस्थित भाव या वस्तु का अभिनय द्वारा प्रस्तुती-
करण ‘अर्थव्यक्ति’ होता है। आचार्य हेमचन्द्र ने इसी अन्य पाठ को लिया है।
आचार्य वामन इसे अर्थगुण तथा दण्डी एवं अन्य आचार्य इसे जाति या
स्वाभावोक्ति अलङ्कार के निकटवर्ती मानते हैं। विश्वनाथ कविराज तथा
मम्मट भट्ट आदि ने इसे प्रसाद गुण स्वीकार नहीं किया ।
उदारत्व ( उदात्तता, उदारता )—विविध दिव्यभावों से विभूषित
तथा शृङ्गार एवं अद्भुत रसों से समायोजित ‘उदारत्व’ गुण है। अन्य पाठ
के अनुसार अनेक विशिष्ट या सूक्ष्म अर्थों तथा सौष्ठव से पूर्ण रचना ‘उदात्त’
कहलाती है। इस अन्य पाठ को हेमचन्द्र, वामन तथा भोज ने लिया है।
उदारत्व काव्य का प्राणभूत तत्व माना जाता है। आचार्य वामन ने उदारता
को ग्राम्यत्व दोष का अभाव बतलाया तथा ओज में अन्तर्भाव माना क्योंकि
दोषाभाव स्वतन्त्र गुण नहीं हो सकता । श्री मम्मट तथा विश्वनाथ कविराज
आदि ने भी वामन का अनुसरण किया परन्तु आचार्य अभिनवगुप्त इसे
शब्द गुण मान कर व्याख्या करते हैं।
कान्ति—चन्द्र के समान मन तथा श्रोत्र को आह्लादित करने वाली,
लीला आदि चेष्टालङ्कारों से रमणीय शब्दबन्ध या रचना ‘कान्ति’ कहलाती
है। वामन ने इसे ‘दीप्तरस’ कहा तथा दण्डी इसमें लोकसीमा का अतिक्रमण
मानते हैं। आचार्य अभिनवगुप्तपाद इसे शब्दगुण मानते हैं, परन्तु कान्ति में
अर्थगुण का भी समन्वय दिखलाई पडता है।
गुण-स्वरूप तथा स्थिति-मीमांसा—नाट्यशास्त्र में निर्देशित गुण
निरूपण से स्पष्ट है कि ये शब्द तथा अर्थ दोनों को ही ध्यान में रखकर
भरतमुनि ने निरूपित किये थे तथा इनकी विभाजक रेखा भी इन गुणलक्षणों
में देखी जा सकती है, किन्तु यह तथ्य केवल परिभाषित स्वरूप के परिशीलन
से प्राप्त होता है। इस परिशीलन से बाद में दो मत प्रधानतः उभरते हैं
जिनमें प्रथम मत में भी दो वर्ग हैं। इनमें भरतमुनि, वामन तथा अभिनव-
( ६६ )
गुप्तपाद के अनुसार ये गुण शब्द तथा अर्थ दोनों से सम्बद्ध हैं। द्वितीय
वर्ग के आचार्य दण्डी का मत है कि श्लेष जैसे कुछ गुण शब्दों से, प्रसाद
जैसे कुछ गुण अर्थों से तथा सौकुमार्य जैसे कुछ गुण दोनों से सम्बद्ध हैं।
आचार्य वामन के मत में भरत निरूपित दस गुण शब्दों के तथा दस
अर्थगुण होते हैं। इस प्रकार कुल मिलाकर गुण बीस हैं। भोजराज
ने वामन का अनुसरण करते हुए चौबीस गुणों का प्रतिपादन किया। इनके
मत में गुणयोग नित्य हैं तथा अलंकृत होने पर भी गुण-रहित काव्य प्रीतिकर
नहीं होता। काव्य में गुण-आदान नियमतः या नित्य होता है तथा अलङ्कार
का विधान कामचार है। उद्भट के काव्यालङ्कारसूत्र के व्याख्याकार
प्रतीहारेन्दुराज के अनुसार गुण काव्य का नित्य धर्म होता है। जयदेव ने
चन्द्रालोक में वामन के अनुसार ही गुणों का विवरण दिया है।
इन गुणों की संख्या के विषय में भी दो भिन्न-भिन्न मत साहित्य में
विकसित हुए। सर्वप्राचीन आचार्य तथा गुणों के प्रवर्तक भरतमुनि के मत में
गुणों की संख्या दस है। इस मत का अनुसरण वामन, दण्डी तथा अभिनव-
गुप्तपादाचार्य करते हैं। द्वितीयमत के अनुसार गुणों की संख्या मात्र तीन हैं।
इस मत के प्रवर्तक आचार्य भामह हैं जो काव्य के लिये तीन गुणों—माधुर्य,
ओज तथा प्रसाद—का ही उल्लेख करते हैं। भामह का आधार भरत तथा
दण्डी से भिन्न है तथा वे दस गुणों की प्रामाणिकता स्वीकार नहीं करते।
आगे इस मत का अनुसरण किया आनन्दवर्धनाचार्य तथा उनके अनुयायी
मम्मटादि ने भी गुणों की संख्या तीन मान कर। ये भी कुछ गुणों को
स्वतन्त्रगुण न मान कर उन्हें दोषाभाव तथा कुछ गुणों को अलङ्कारों के
अन्तर्गत स्वीकार करते हैं।
इस प्रकार काव्यगुणों के विषय में दो परस्पर स्वतन्त्र या निरपेक्ष मत
विकसित हुए थे। इनमें एक का भरतमुनि ने तथा अन्य का प्रवर्तन आचार्य
भामह ने किया था। यह भी इस सन्दर्भ में ध्यातव्य है कि जहाँ आचार्य
भरत नाट्यविद्या के सम्प्रदाय के प्रमुख थे वहीं आचार्य भामह काव्यशास्त्र के
प्रमुख रहे। दोनों में इस विषय में भिन्नता है कि काव्यरचना के साधनवर्ग
में कौन अधिक अपेक्षित है। इस क्रम में भरतमुनि के मत में नाट्यरचना के
लिये गुणों की अधिक आवश्यकता होगी, अलङ्कारों की नहीं। इसी कारण
काव्यरचना के साधनों में नाट्यशास्त्रीय आचार्य भरत ने अपने साधनों की
सूची में काव्यगुणों तथा लक्षणों की संख्या अधिक रखी तथा अलङ्कारों की
( ७० )
कम । दूसरे पक्ष के आचार्यों में—जिनमें भामह प्रमुख थे—काव्यरचना के
साधनों की सूची में अलङ्कारों पर प्रधानरूप से ध्यान देते हुए अलङ्कारों को
अधिक संख्या में रख कर अन्य ऐसे तत्वों को भी काव्यरचना के साधनों में
सम्मिलित कर लिया गया जिन्हें नाट्यशास्त्र में काव्यगुणों की सूची में रखा
गया था ।
**गुणों का सम्बन्ध—**इसके अतिरिक्त आचार्यों में गुणों के सम्बन्ध
में भी मतैक्य नहीं है। काव्यलक्षणवादी आचार्य भामह के अनुसार काव्य
गुणों का शब्द तथा अर्थ के साथ विशेषणविशेष्यभाव सम्बन्ध है। इनके
अनुसार माधुर्य आदि गुण इसी प्रकार शब्द एवं अर्थ के गुण हैं जैसे सामान्य
व्यवहार में दूध का गुण सहज मधुर होता है। परन्तु अन्यपक्ष में इस विषय
में भी भिन्न मत हैं। काव्यगुणों का रस के साथ रसानुभवात्मा समवाय
सम्बन्ध रहता है, क्योंकि काव्य की मधुरता अनुभवस्वरूप होती है। अतएव
इसमें शब्द तथा अर्थ की सत्ता मात्र अवस्थित नहीं होती। यह केवल दृष्टि-
भेद मात्र था परमार्थतः दोनों की विवेचना ने वास्तविकता का ही प्रतिपादन
किया पर भिन्न दृष्टि अपेक्षाभेद से रहती ही है ऐसा समझना चाहिए।
इस प्रकार स्पष्ट है कि आचार्य आनन्दवर्द्धन, अभिनवगुप्तपाद, मम्मट,
हेमचन्द्राचार्य, जयदेव तथा विश्वनाथ कविराज के विचारों का स्रोत भरत-
मुनि के नाट्यशास्त्र में विद्यमान है। इन आचार्यों ने गुण, अलङ्कार तथा
लक्षण जैसे काव्याङ्गों का विवेचन रस के सन्दर्भ में ही किया तथा भरत की
रसवादी दृष्टि को इनकी समीक्षापद्धतियों ने आत्मसात् कर लिया। भरत के
अनुसार कोई काव्यार्थ रस के बिना प्रवृत्त ही नहीं हो सकता था।
ध्वनिकार आनन्दवर्धन ने काव्य एवं नाट्य के प्राण के रूप में उसे साहित्य
के साधनों में शीर्ष स्थान प्रदान किया। इनके मत में रस रूप आत्मा के
गुण नित्य धर्म हैं तथा ये समान अङ्गों के माध्यम से आत्मरूप रस के
उपकारक होते हैं। आनन्दवर्धनाचार्य की इस नव्यसमीक्षा ने साहित्य के
क्षेत्र में मौलिक उद्भावना की तथा भरत के रससिद्धान्त को पुनरुज्जीवित
करते हुए ध्वनिसिद्धान्त की स्थापना की जो काव्यशास्त्रीय समीक्षा के इतिहास
में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
**भाषाविधान—**नाट्यशास्त्र के अष्टादश अध्याय में वाचिक अभिनय के
अन्तर्गत काव्यशरीर के अङ्गों के रूप में छन्द, लक्षण, अलङ्कार, गुण आदि के
विवेचन क्रम में भाषा का भी विचार किया गया कि यह काव्य या नाट्य का
( ७१ )
शरीर है तथा सर्वस्व भी । भाषा के अन्तर्गत नाट्यशास्त्र में विभिन्न
भाषाओं, सम्बोधनादि विधियों, पात्रों के नामकरण तथा पाठ्यविधि जैसे
नाट्योपयोगी विषयों को लेकर उनका तात्विक विवेचन हुआ है । जिनमें से
इस अध्याय में भाषा का विशेषरूप में विवरण दिया गया है ।
भाषाएँ—नाट्यशास्त्र में भाषाविषयक विवरण संक्षेप में हैं, जो
संस्कृत तथा प्राकृत के है। इस अष्टादशअध्याय के अतिरिक्त ध्रुवाध्याय
( अध्याय ३२ ) में भी प्राकृतभाषा के अनेक उदाहरण प्राप्य हैं, जो इस
भाषा की ऐतिहासिक स्थिति के अध्ययन में बड़ा मूल्य रखते हैं। इसके विषय
में नाट्यशास्त्र के चतुर्थभाग में विशिष्ट रूप में विचार किया जा रहा है ।
यहाँ ( इसके अतिरिक्त ) सामान्य तथ्य यह है कि रङ्गमञ्च पर व्यवहार में
आने वाली भाषाओं में नाटकादि की ( प्राचीन काल में ) प्रयुज्यमान भाषायें
संस्कृत तथा प्राकृत रही हैं। भाषा के इसी तथ्य को भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र
में अपनी ही पद्धति में इस प्रकार रखा भी है—
भाषा चतुर्विधा ज्ञेया दशरूपप्रयोगतः ।
संस्कृतं प्राकृतञ्चैव यत्र पाठ्यं प्रयुज्यते ॥
अतिभाषार्यभाषा च जातिभाषा तथैव च ।
तथा योन्यन्तरी चैव भाषा नाट्ये प्रतिष्ठिता ॥
( नाट्यशास्त्र १८ । २५-२६ )
इस प्रकार स्पष्ट है कि भरतमुनि ने रूपकों में प्रयुक्त की जाने वाली
भाषा के ये चार प्रभेद किये—( १ ) अतिभाषा, ( २ ) आर्यभाषा,
( ३ ) जातिभाषा तथा ( ४ ) योन्यन्तरी भाषा । इनमें अतिभाषा वैदिक
शब्दबहुल भाषा है । आर्यभाषा श्रेष्ठजन की भाषा होती है तथा योन्यन्तरी
भाषा मनुष्येतर या पशुपक्षियों की भाषा मानी जाती है ।
जातिभाषा के प्रधानतः दो भेद होते हैं—(१) संस्कृत तथा (२) प्राकृत
जिनका रूपकादि में प्रयोग होता है । इनमें जो संस्कार गुण से सम्पन्न भाषा
है वही संस्कृत भाषा है, जिसमें देशादि भेद से स्वरूप में अन्तर नहीं पड़ता ।
जनभाषा है प्राकृत जिसमें संस्कारगुण सम्पन्नता नहीं होती तथा इसी कारण
जिसमें देशादि भेद के कारण प्रकृति में भिन्नता आ जाती है । इनमें संस्कृत
तथा प्राकृत भाषा के व्यवहार रूपकों में सम्भाषणप्रथा के अनुगत रखे
जाते थे । यह सम्भाषणप्रथा भाषा के प्रयोग का विचार करने पर किस
विशिष्ट पात्र को किस विधि से सम्भाषण करना है—इस प्रश्न पर आकर
विस्तीर्ण रूप धारण करती है तथा थोड़ी उलझन भी उत्पन्न करती है ।