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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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( ५३ )
सन्धि का न होना तथा दूसरे एक दूसरे की अनुवर्ती घटना में विच्छेद का
अभाव होना पाया जाता है । कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं :-
( १ ) पुण्ड्राक्षं पुण्ड्रनासञ्च असितं सितमेव च । ( ना० शा० १।३६ )
( २ ) ततश्च करमावृत्य ऊरुपृष्ठे निपातयेत् । ( ना० शा० ४।१६६ )
( ३ ) आङ्गिको वाचिकश्चैव आहार्यः सात्विकस्तथा । ( ना० शा० ६।२३ )
( ४ ) अंगुल्यो यस्य हस्तस्य अन्योन्यान्तरनिस्सृताः । ( ना० शा० ६।१३२ )
( ५ ) पर्यायतश्च क्रियते एलकाक्रीडिता तु सा । ( ना० शा० ११।२० )
( ६ ) अत्यायतपदत्वाच्च अङ्गहास्यो भवेत् स तु । ( ना० शा० १३।१४० )
अनुष्टुप् छन्द के ये उपर्युक्त नमूने स्पष्टतः ही वैदिक छन्दों की परम्परा
का अनुगमन है तथा रामायण एवं महाभारत में होने वाले आर्षप्रयोगों की
तरह भी हैं । इस सन्दर्भ में हम केवल ऋग्वेद से संकलित एक दो उदाहरण
प्रस्तुत करना चाहेंगे :-
( १ ) हिरण्ययेन सविता रथेना
देवो याति भुवनानि पश्यन् । ( ऋ० सं १।३५।२ )
( २ ) तिस्रो द्यावः सवितुर्द्वा उपस्थाँ
एका यमस्य भुवने विराषाट् ॥ ( ऋ० सं० १।३५।६ ।
यद्यपि संहितापाठ के दृष्टा ने उपर्युक्त ऋक् १ में आ में सन्धि रखी है
जो यति को हटाने के उद्देश्य से है । जब कि ऐसा कहीं-कहीं ही करने की
छूट रही तथा वह भी तब जब किसी यज्ञादि में वैदिक ऋक् का पाठ किया
जाता हो । क्योंकि इसमें एक अक्षर की कमी हो जाती है तथा छन्द भी
इससे न्यूनतादोष ग्रस्त हो जाता है । इस प्रकार उपर्युक्त विचार से
यह स्पष्ट हो जाता है कि नाट्यशास्त्र के पाठ में भी कुछ पद्यों में यति या
सन्धि का छेद होना या न करना इस बात की सूचना दे रहा है कि नाट्य-
शास्त्र की रचना अतिप्राचीन काल में तब हुई जब वैदिकच्छन्दों की नियमादि
परम्परा का पालन हो रहा था तथा यह स्थिति भी नाट्यशास्त्र के स्थिति-
काल को ईसा पूर्व ५०० वर्ष के समय में ही ले जाती है जो हमने प्रथमभाग
में निश्चित किया है ।
प्रक्षिप्त अंश—अब यदि नाट्यशास्त्र में आये हुए प्रक्षिप्त अंशों पर
विचार करें तो यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि इसके पन्द्रहवें तथा
सोलहवें अध्याय में जो पाठान्तर युक्त अंश अधिक रूप में प्राप्त हैं वे सभी
अंश निश्चित रूप से बाद में जोड़ दिये गये होंगे । यह जोड़ने की कल्पना भी