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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 70, कुल 668 में से

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यद्यपि काव्याङ्गों के रूप में महत्व बना रहा किन्तु आगे चलकर काव्यशास्त्र
के विकास में अलङ्कारों की परम्परा ने धीरे-धीरे अधिक प्रसार एवं महत्व
प्राप्त किया जिससे लक्षणों की आभा धूमिल पड़ती गयी तथा उनका क्षेत्र भी
कम पड़ने लग गया। जहाँ एक ओर महाराज भोज ने लक्षणों की संख्या वृद्धि
की तथा अन्य आचार्यों ने भी यथाशक्य इसी क्रम में कहीं लक्षणों के नाम तथा
कहीं उनके स्वरूप को भिन्न बतला कर लक्षणों के विवेचन-विवरण के विसर्जन
क्रम को बनाए रखा था तो दूसरी ओर विश्वनाथ कविराज तथा सागरनन्दी
आदि आचार्यों ने इन लक्षणों को नाट्य-लक्षण कहकर छत्तीस प्रभेद
दिखला कर इन्हीं के साथ साथ 'नाटचालङ्कारों' को भी प्रतिपादित किया।
ये नाटचालङ्कार या तो भोज आदि से नवीन उद्भावित 'लक्षण' थे या
नाट्यशास्त्र की पाठ भेद परम्परा से प्राप्त ऐसे 'लक्षण' थे जो छत्तीस लक्षणों
में समायोजित नहीं हो पाए थे अतः इनके सोदाहरण विवरण इन ग्रन्थों
में लगाये गये। इसके अतिरिक्त धनञ्जय आदि ने इन लक्षणों का अन्तर्भाव
अलङ्कार, गुण, सन्धि तथा भाव में हो जाने से काव्याङ्गों में उनके विवरण
को देना ही अनावश्यक मान लिया था। १ इसका परिणाम यह हुआ कि
नाट्य-लक्षणों या नाटचालङ्कारों का विवरण देना एक परम्परा-निर्वाह
मात्र हो गया तथा कालान्तर में यह लक्षण-विवेचन का क्रम मन्दतर होने
लगा। काव्यशास्त्र के उत्तरोत्तर विकास के साथ गतिमान् होकर ये लक्षण
नहीं चल पाये तथा उनकी ह्रासोन्मुखी स्थिति ने धीरे-धीरे न केवल उनकी
महत्वपूर्ण स्थिति ही रहने दी परन्तु उनकी अनुपयोगिता को भी बतलाना
आरम्भ कर दिया था जिसका सङ्केत धनञ्जय के इस विवरण से मिलता है।
परिणाम स्वरूप लक्षण पद्धति का स्थान साहित्यशास्त्र में 'अलङ्कारों ने ले
लिया जो नाट्यशास्त्र के रचनाकाल के समय अतिशय अल्पावस्था में
अवस्थित थे।
अलङ्कार—नाट्यशास्त्र में लक्षणों के विवरण के पश्चात् अलङ्कारों का
विवेचन दिया गया है। इसमें जहाँ लक्षणों की संख्या छत्तीस थी वहाँ
अलङ्कारों की संख्या चार ( ही ) है तथा नाट्यशास्त्र के इस भाग पर कोई
भिन्न पाठ तथा प्रक्षिप्त अंश भी उपलब्ध नहीं है। इससे स्पष्ट है कि नाट्य-
शास्त्र के लेखन के समय से लेकर अनेक शताब्दियों बाद तक अलंकार-पद्धति
अपनी स्थिति आरम्भक-बिन्दुओं से अधिक विस्तीर्ण नहीं बना सकी थी।
१. “लक्षणसन्ध्यङ्गकाव्यानि सालङ्कारेषु तेषु हर्षोत्साहेषु अन्तर्भावान्न-
कीर्तिता” ।—दश० रू० ४ ।