नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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( ५ ) शार्दूलविक्रीडित, ( ६ ) आर्या, ( ७ ) अपरवक्त्र तथा
( ८ ) मात्रा समक (वैश्वदेवी) छन्द मिलते हैं। इन सभी छन्दों का
उल्लेख नाट्यशास्त्र में मिलता है ।
अब यदि इसी क्रम में हम भास तथा अश्वघोष कवि की रचनाओं को
(जो नाट्यशास्त्र की परवर्ती रचनाएँ हैं) देखें तो भास के नाटकों में
नाट्यशास्त्र में वर्णित इक्कीस छन्द तथा अश्वघोष के द्वारा नाट्यशास्त्र में
वर्णित बीस छन्दों का प्रयोग मिलता है।
उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि रामायण में विद्यमान छन्दों
में तथा महाभारत में प्राप्त छन्दों में ऐसा कोई छन्द नहीं जिसे कि नाट्य-
शास्त्र में परिभाषित न किया हो । अतः यह स्पष्ट है कि रामायण तथा
महाभारत की अपेक्षा नाट्यशास्त्र की उत्तरभाविता स्पष्ट है। परन्तु यदि
इसी प्रकाश में भास एवं अश्वघोष की रचनाओं में प्रयुक्त ऐसे छन्द को देखें
(जो क्रमशः २ तथा ५ होते हैं) तो यह स्पष्ट होगा कि भास तथा
अश्वघोष कवि भरत प्रणीत नाट्यशास्त्र के उत्तर भावी हैं यह स्पष्ट है।
इसी क्रम में पतञ्जलि प्रणीत सुप्रसिद्ध ग्रन्थ व्याकरण महाभाष्य में उद्धृत
छन्दों को भी परीक्षा हेतु रखा जाए तो स्पष्टतः उसमें इन छन्दों का प्रयोग
है:—( १ ) अनुष्टुप्, ( २ ) विद्युल्लेखा, ( ३ ) दोधक, ( ४ ) इन्द्रवज्रा,
( ५ ) उपेन्द्रवज्रा, ( ६ ) शालिनी, ( ७ ) तोटक, ( ८ ) वंशस्थ (वंशस्थ
विल—पिङ्गल), ( ९ ) प्रमिताक्षरा, ( १० ) प्रहर्षिणी, ( ११ ) वसन्त-
तिलका, ( १२ ) आर्या तथा ( १३ ) वक्त्र। इन सभी छन्दों का नाट्यशास्त्र
में स्वरूप प्राप्त होता है। [ पतञ्जलि ने महाभाष्य में जिन ३०० पद्यों को
उद्धृत किया है उनसे यह छन्दों का प्रयोग विवरण निकाला गया है] इससे
यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि पतञ्जलि मुनि ने जिन स्रोत ग्रन्थों से
इन पद्यमय उद्धरणों को चुना था उनमें छन्दों के प्रयोग उसी रूप में हुए हैं जो
नाट्यशास्त्र में वर्णित हैं। अतः स्पष्ट है कि पतञ्जलि के ये उद्धरण जिन स्रोतों
से संकलित हुए वे ग्रन्थ ईसा पूर्व २०० वर्ष से पूर्ववर्ती अवश्य थे। अतः नाट्य-
शास्त्र सहज रूप में ईसा पूर्व २०० से बाद में नहीं रखा जा सकता है। इस
प्रकार छन्दो-विवरण से भी नाट्यशास्त्र के प्रथमभाग में चर्चित स्थितिकाल में
ईसा पूर्व की स्थिति की पुष्टि ही होती है। इसके अतिरिक्त छन्दोगत तथ्यों
के आधार पर निष्कर्ष के लिये नाट्यशास्त्र के प्रयुक्त अनुष्टुप् छन्द के रूपों
का परीक्षण भी उपयोगी होगा। इनमें एक तो अन्तर्वर्ती यति के स्थान पर