नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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स्वरूप दिया है। नाट्य एवं काव्य के महत्वपूर्ण अङ्गों के रूप में मुनि ने यहाँ
लक्षणों का विवेचन किया है क्योंकि 'लक्षण' काव्य के सर्वाधिक विधायक
तत्त्वों में होते हैं । लक्षणों के कारण ही रसात्मक काव्य की इतर काव्य से
भिन्नता संभव होती है। आचार्य अभिनवगुप्तपाद के अनुसार 'लक्षण की
लोकप्रचलित अर्थ में भी समानता देखी जा सकती है। जैसे किसी महापुरुष
के शरीर में अङ्कित पद्म आदि शुभ चिह्नों से उसके सौभाग्य का सङ्केत
मिलता है इसी प्रकार लक्षणों से काव्य का सहज सौन्दर्य ।
नाट्यशास्त्र के विभिन्न संस्करणों में लक्षण के दो पाठ उपलब्ध होते
हैं। इनमें काशी संस्करण में ( तथा घोष के संस्करण में भी ) दीर्घपाठ
परम्परा के अनुसार अनुष्टुप् वृत्त से लक्षण निरूपण आरम्भ होता है तो
काव्यमाला बम्बई तथा बडौदा संस्करण में उपजाति वृत्त से । इन दोनों में
पर्याप्त पार्थक्य है। दोनों पाठों के मिलान करने पर इनमें अठारह लक्षण
समान मिलते हैं तथा शेष भिन्न । आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने दोनों पाठों पर
व्याख्या की किन्तु अपने उपाध्याय भट्ट तोत की परम्परा में चलने वाले
नाट्यशास्त्र के उपजातिवृत्त वाले पाठ को प्राथमिकता दी । इसी पाठ
परम्परा का अनुगमन धनञ्जय, कीर्तिधर आदि आचार्यों के द्वारा भी हुआ
था । इसके विपरीत सिंहभूपाल तथा विश्वनाथ कविराज ( आदि ) ने दीर्घ-
पाठ परम्परा का अनुसरण किया था । वृत्तिकार भी अभिनवगुप्त की तोत
परम्परा के पाठों को ही लेता था परन्तु धाराधिप श्री भोजदेव ने दोनों
परम्परा के पाठों के अनुसार लक्षणों को लेकर तथा बारह नवीन भेद
सङ्कलित कर लक्षणों के चौसठ प्रभेदों का विवरण दिया । ऐसा प्रतीत होता
है कि लक्षणों की परम्परा में भिन्न पाठ का प्रवर्तन भरतपुत्र नाट्याचार्य
कोहल द्वारा आरम्भ हुआ होगा तथा इसी कारण इस पाठ की परम्परा-
धारा चलती रही । जयदेव ने अपने चन्द्रालोक में लक्षणों की संख्या केवल
ग्यारह ही मानी तथा दोनों पाठ-भेद परम्पराओं से लक्षणों की पाँच-पाँच
संख्या ले ली । शारदातनय तथा विश्वनाथ कविराज ने भी लक्षणों के भिन्न
स्वरूपादि माने जिनका उल्लेख आगे यथास्थान किया जा रहा है ।
नाट्यशास्त्र में वर्णित लक्षण तथा उनका क्रम—नाट्यशास्त्र के
पाठों में दीर्घपाठ परम्परा में लक्षणों का जो क्रम है वही इस संस्करण में भी
लिया गया है। तदनुसार क्रम इस प्रकार है :—(१) भूषण, (२) अक्षर-