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नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

( २४० )
पडिहदं क्खु एदं ।
प्रतिहतं खल्वेतत् ।
जीमूतकेतुः - (सास्रमात्मगतम् )-
विलुप्तशेषाङ्गतया प्रयातान् निराश्रयत्वादिव कण्ठदेशम् ।
प्राणांस्त्यजन्तं तनयं निरीक्ष्य कथं न पापः शतधा व्रजामि? ॥२३॥
मलयवती - हा अज्जउत्त ! अदिदुक्खरकारिणी क्खु अहं जा
हा आर्यपुत्र ! अतिदुष्करकारिणी खल्वहं या
ईदिसं अज्जउत्तं पेक्खंती अज्जवि जीविअं ण परिच्चआमि ।
ईदृशमार्यपुत्रं प्रेक्षमाणापि जीवितं न परित्यजामि
वृद्धा-(नायकस्याङ्गानि स्पृशन्ती गरुडमुद्दिश्य) णिसंस !
नृशंस !
कहं दाणिं तुए एदं आपूरिअमाणाणवरूवजोव्वणसोहं
कथमिदानीं त्वया एतदापूर्यमाणनवरूपयौवनशोभं
तं ज्जेव्व एदावत्थं पुत्तअस्स मे सरीरं किदम् ?
तदेवैतदवस्थं पुत्रकस्य मे शरीरं कृतम् ?
नायकः-अम्ब ! मा मैवम् । किमनेन कृतम् ? ननु पूर्वमप्ये-
तदीदृशमेव परमार्थतः । पश्य -
श्लोक नं०: २३, अन्वयः -
विलुप्त शेषाङ्गतया निराश्रयत्वात् इव कण्ठदेशं प्रयातान् प्राणान्
त्यजन्तं तन निरीक्ष्य (अहं) पापः कथं न शतधा व्रजामि ?

( २४१ )
अमंगल नष्ट हो ! !
जीमूतकेतु — (आंसुओं के साथ, मन ही मन) शेष सब अङ्गों के नष्ट
हो जाने के कारण मानों आश्रय हीन हो कर गले में आए हुए
प्राणों को छोड़ते हुए (अपने) पुत्र को देख कर मुझ पापी के
हज़ार टुकड़े क्यों नहीं हो जाते ?
मलयवती — हाय प्राणनाथ ! मैं बड़ी कठोर हृदया हूँ जो आप को
इस दशा में देखती हुई भी प्राण नहीं छोड़ती।
वृद्धा — (नायक के अङ्गों को छूती हुई, गरुड़ के प्रति) अरे निर्दय ! नए
रूप तथा यौवन से शोभायमान मेरे पुत्र के शरीर को तू ने
अब इस दशा में कैसे कर दिया ?
नायक — नहीं, माता जी ऐसा मत कहिए ! इसने क्या किया है ? यह
शरीर तो वस्तुतः पहिले भी ऐसा ही था। देखिए —

  1. त्यज्+शतृ+द्वितीय+एक वचन ।
  2. कठोर कार्य करने वाली; कठोर हृदया ।

( २४२ )!
मेदोऽस्थिमांसमज्जाऽसृक् सङ्घातेऽस्मिंस्त्वचावृते ।
शरीरे खलु का शोभा सदा बीभत्सदर्शने ? ॥२४॥
गरुडः— भो महात्मन् ! नरकानलज्वालावलीढमिवात्मानं
मन्यमानो दुःखं तिष्ठामि । तदुपदिश्यतां, येन
मुच्येऽहमस्मादेनसः³
नायकः— अनुजानातु मां तातः, यावदस्य पापस्य
प्रतिपत्तमुपदिशामि ।
जीमूतकेतुः— वत्स ! एवं क्रियताम् ।
नायकः— वैनतेय ! श्रूयताम् ।
गरुडः- (जानुभ्यां स्थित्वा कृताञ्जलिः) आज्ञापयतु भगवान् ,
नायकः—नित्यं प्राणाभिघातात् प्रतिविरम कुरु प्राक्कृते चानुतापं।
यत्नात् पुण्यप्रवाहं समुपचिनु दिशन् सर्वसत्त्वेष्वभीतिम् ।
मग्नं येनात्र नैनः फलति परिमित प्राणिहिंसात्तमेतद्
दुग्धापारावारेलवणपलमिव क्षिप्तमन्तर्ह्रदस्य ॥२५।
श्लोक न०: २४, अन्वयः — मेदोऽस्थिमांसमज्जाऽसृक्सङ्घाते त्वचावृते
सदा बीभत्सदर्शने अस्मिन् शरीरेः खलु का शोभा ?
श्लोक न०: २५, अन्वयः- नित्यं प्राणाभिघातात् प्रतिविरम, प्राक्कृते
चानुतापं कुरु । सर्वसत्त्वेष्वभीतिं दिशन् यत्नात् पुण्यप्रवाहं
समुपचिनु येन दुग्धापारावारेः ह्रदस्यान्तः क्षिप्तं लवणपलमिव
परिमितप्राणिहिंसात्तमेतद् एनः अत्र मग्नं न फलति ।

( २४३ )
चर्बी, हड्डी, मांस, मज्जा तथा रक्त के समूह, (ऊपर से)
चमड़े से ढके हुए, सदा वीभत्स (घृणा युक्त) दिखाई देने वाले
इस शरीर में भला कौन सी सुन्दरता है ?
गरुड़— हे महात्मन् ! नरक की आग की ज्वाला से अपने आप को
जला हुआ सा मानता हुआ मैं (बड़े) दुःख से ठहरा हूँ । अतः
ऐसा उपदेश दीजिए जिस से मैं इस पाप से छूट जाऊँ ।
नायक — पिता जी, मुझे आज्ञा दें ताकि मैं (इसे) इस पाप का
प्रतिकार (प्रायश्चित) बताऊँ ।
जीमूतकेतु — पुत्र, ऐसा (ही) करो ।
नायक—हे विनता के पुत्र (गरुड़) ! सुनो ।
गरुड — (घुटनों के बल बैठकर, हाथ जोड़ कर) आप आज्ञा करें ।
नायक — प्रतिदिन प्राणियों की हिंसा से रुको और पहिले किए (पाप)
का पश्चात्ताप करो। सब प्राणियों को अभय दान करके यत्न-
पूर्वक पुण्यप्रवाह का संग्रह करो जिस से अथाह तथा विस्तृत
सरोवर के बीच डाले गए नमक के टुकड़े के समान. (इन) थोड़े
से प्राणियों को मारने से उत्पन्न हुआ यह पाप इस में डूब कर
(बुरा) फल न दे ।

  1. असृक् = रक्त, खून ।
  2. सङ्घात = समूह
  3. एनसः = एनस् + ५ मी + एक वचन
  4. सम् + उप + चि + लोट् + मध्यम पु० + एक वचन ।
  5. आत्तम् = जातम् ।

( २४४ )
गरुडः-- यदाज्ञापयति भगवान् —
अज्ञाननिद्राशयितो भवता प्रतिबोधितः ।
सर्वप्राणिवधदेष विरतोऽद्यप्रभृत्यहम् ॥२६॥
सम्प्रति हि—
क्वचिद् द्वीपाकारः पुलिनविपुलैर्भोगनिवहैः १
कृतावर्त्तभ्रान्तिर्वलयितशरीरः क्वचिदपि ।
व्रजन् कूलात्कूलं क्वचिदपि च सेतुप्रतिसमः
समाजो नागानां विहरतु महोदन्वति सुखम् ॥२७॥
अपि च,
स्रस्तानापादलम्बाँस्तिमिरचयनिभान्केशहस्तान् वहन्त्यः,
सिन्दूरेणेव दिग्धैः २ प्रथमरविकरस्पर्शताम्रैः कपोलैः ।
आयासेनालसाङ्ग्योऽप्यवगणितरुजः कानने चन्दनानाम्-
अस्मिन् गायन्तु रागादुरगयुवतयः कीर्तिमेतां तवैव ॥२८॥
श्लोक न०: २६, अन्वयः-अज्ञाननिद्राशयितो (ऽहं) भवता प्रतिबोधितः ।
एषः अद्य प्रभृत्यहं सर्वप्राणिवधाद् विरतः ।
श्लोक न०: २७, अन्वयः- क्वचित् पुलिनविपुलैर्भोगनिवहैः द्वीपाकारः,
क्वचिदपि वलयितशरीरः कृतावर्त्तभ्रान्तिः, क्वचिदपि च कूलात्कूलं
व्रजन् सेतुप्रतिसमः नागानां समाजः महोदन्वति सुखं विऽहरतु ।
श्लोक नं०: २८, अन्वयः—
स्रस्तानापादलम्बान् तिमिरचयनिभान् केशहस्तान् वहन्त्यः, प्रथम-
रविकरस्पर्शताम्रैः सिन्दूरेणेव दिग्धैः कपोलैः, आयासेनाल-
साङ्ग्योऽप्यवगणितरुजः, उरगयुवतयः चन्दनानामस्मिन् कानने
रागात् तवैव एतां कीर्तिं गायन्तु ।

( २४५ )
गरुड - जो आप की आज्ञा ।
अज्ञान रूपी निद्रा में सोए हुए मुझे आप ने जगा दिया है।
यह (लो) आज से मैं सब प्राणियों को मारने से हट गया।
अब निश्चय ही—
कहीं रेतीले किनारे के समान विशाल शरीरों से द्वीप की तरह
दिखाई देता हुआ, कहीं शरीर को कुण्डलित करने से आवर्त्त
(भंवर) का भ्रम उत्पन्न करता हुआ, और कहीं एक किनारे से
दूसर किनारे तक जाता हुआ पुल के समान लगता हुआ नागों
का समूह (आज से इस) महासागर में सुखपूर्वक विहार करे ।
और भी,—
खुले हुए, पैरों तक लटकने वाले, अन्धकार के समूह के समान
(काले), लम्बे बालों को धारण करने वाली, पहिले पहिल
दिखाई देने वाली सूर्य की किरणों के स्पर्श से लाल वर्ण हुए
सिन्दूर से रंगे हुए से दीखने वाले कपोलों से (सुशोभित),
परिश्रम से अलसगात्र होने पर भी क्लेश को न गिनने वाली ये
नाग युवतियां इस चन्दन वन में प्रेम से तुम्हारी ही कीर्त्ति
गा* ।

  1. समूहों में पड़े हुए नाग द्वीपों की भान्ति दिखाई देते हैं और
    उनके श्वेत फण रेतीले किनारे के समान ।
  2. लिप्त, लेप लिए हुए, रंगे हुए।

( २४६ )
नायकः- साधु महासत्त्व ! साधु !! अनुमोदामहे । सर्वथा
दृढसमाधानो भव। (शङ्खचूडं निर्दिश्य)-शङ्खचूड !
त्वयापि स्वगृहमिदानीं गम्यताम् ।
[शङ्खचूडः निश्वस्य अधोमुखस्तिष्ठति]
नायकः- (निश्वस्य मातरं पश्यन् )-
उत्प्रेक्षमाणा त्वां तार्क्ष्यचञ्चुकोटिविपाटितम्।
त्वद्दुःखदुःखिता दुःखमास्ते सा जननी तव ॥२६॥
वृद्धा-(सास्रम् ) धण्णा क्खु सा जणणी जा गरुडमुहपडि-
धन्या खलु सा जननी, या गरुडमुखपति-
दस्स अक्खदसरोरस्स जेव्व पुत्तअस्स मुहं पेक्खस्सदि ।
तस्याक्षतशरीरस्यैव पुत्रकस्य मुखं प्रेक्षिष्यते ।
शङ्खचूडः- अम्ब ! सत्यमेवैतत् यदि कुमारः स्वस्थो भविष्यति
नायकः-(वेदनां नाटयन् ) अहह ! परार्थसम्पादनामृतरसा-
स्वादोध्दितत्वादेतावतीं वेलां मया न लक्षिताः; सम्प्रति
तु मां बाधितुमारब्धा मर्मच्छेदिन्यो वेदनाः ।
[मरणावस्थां नाटयति]
जीमूतकेतुः- (ससम्भ्रमम् )- हा वत्स ! किमेवं करोषि ?
श्लोक नं०: २६, अन्वयः-
त्वद् दुःखदुःखिता सा तव जननी त्वां तार्क्ष्यचञ्चुकोटिविपाटित-
मुत्प्रेक्षमाणा दुःखमास्ते ॥

( २४७ )
नायक - खूब, महात्मन्, खूब (कहा) हम (नागों को अभयदान देने
का) अनुमोदन करते हैं। सब प्रकार से इस प्रतिज्ञा पर दृढ़
रहना। (शङ्खचूड़ से) शङ्खचूड़ ! तुम भी अब अपने घर
जाओ।
[शङ्खचूड़ (लम्बी) सांस लेकर नीचे मुख किए ठहरा रहता है]
नायक - (गहरी सांस लेकर, माता को देखते हुए) - तुम्हारे दुःख से
दुःखित होने वाली तुम्हारी वह माता तुम्हें गरुड की चोंच से
फाड़ा गया समझती हुई दुःखी है (होगी !)
वृद्धा - (आँसुओं के साथ) निश्चय ही वह माता धन्य है जो गरुड के
मुख में पड़े हुए (होने पर भी) स्वस्थ शरीर (राज़ी ख़ुशी)
अपने पुत्र का मुख देखेगी।
शङ्खचूड़ - माता जी, यह (तभी) सत्य है यदि कुमार ठीक हो
जाएँगे।
नायक - (पीड़ा का अभिनय करते हुए) परोपकार साधन से उत्पन्न
अमृत समान रस के पान में मग्न रहने के कारण इतना समय
मैं ने पीड़ाओं का अनुभव नहीं किया था परन्तु अब ये मर्म
छेदिनी पीड़ाएँ मुझे तंग कर रही हैं।
[मरने की दशा का अभिनय करता है]
जीमूतकेतु - (घबराहट के साथ) हाय पुत्र ! ऐसा क्यों करते हो ?

  1. सोचती हुई; शङ्का करती हुई ।

( २४८ )
वृद्धा— हा ! किं णु क्खु एत्थं वत्तदि ? (सोरस्ताडम्)
हा ! किं नु खल्वेवं वर्त्तते ?
परित्ताअह परित्ताअह । एसो क्खु मे पुत्तओ विवज्जइ ।
परित्रायध्वं परित्रायध्वम् । एष खलु मे पुत्रको विपद्यते ।
मलयवती—हा अज्जउत्त ! परिच्चइडुकामो विअ लक्खीअसि ।
हा आर्यपुत्र ! परित्यक्तुकाम इव लक्ष्यसे ।
नायकः— (अञ्जलिं कर्तुमिच्छन्) शङ्खचूड ! समानय
मे हस्तौ ।
शङ्खचूडः— (कुर्वन्) कष्टम् !! अनाथीकृतं जगत् ।
नायकः— (अर्द्धोन्मीलितचक्षुः पितरौ पश्यन्) तात ! अम्ब !
अयं मे पश्चिमः प्रणामः । यतः—
गात्राण्यमूनि न वहन्ति सचेतनत्वं
श्रोत्रं स्फुटाक्षरपदां न गिरः शृणोति ।
कष्टं निमीलितमिदं सहसैव चक्षु-
र्हा तात ! यान्ति विवशस्य ममासवोऽमि ॥३०॥
¹ अथवा किमनेन प्रलपितेन ।
[“संरक्षता पन्नगमद्य पुण्यम्”—इत्यादि पूर्वोक्तं श्लोकंपठित्वा पतति]
श्लोक नं०: ३०, अन्वयः—
(मम) अमूनि गात्राणि सचेतनत्वं न वहन्ति । श्रोत्रं स्फुटाक्षर-
पदां गिरः न शृणोति । कष्टम्, इदं चक्षुः सहसैव निमीलितम् ।
हा तात [......] असवः यान्ति ॥

( २४६ )
वृद्धा- हाय, यह ऐसा क्या हो रहा है ? (छाती पीटती हुई) बचाओ
बचाओ !. यह मेरा बच्चा मर रहा है।
मलयवती - हाय प्राणनाथ ! (हमें) छोड़ने की इच्छा वाले से दीखते
हो।
नायक- (हाथ जोड़ने की इच्छा करता हुआ) शङ्खचूड ! मेरे हाथों
को (एक दूसरे के) समीप कर दो ।
शङ्खचूड- (वैसा ही करते हुए) हाय, संसार अनाथ कर दिया गया
है।
नायक- (आधी खुली आंखों से माता पिता को देखते हुए) हे तात !
हे माता जी !! यह मेरा अन्तिम प्रणाम है। क्योंकि-
ये अंग चेतनाहीन हो गए हैं। कान साफ़ अक्षर तथा शब्दों
वाली वाणी (भी) नहीं सुनता। दुःख की बात है कि यह
आँख भी सहसा ही बन्द हो रहा है। हे तात ! बेबस हुए हुए
मेरे ये प्राण जा रहे हैं॥
अथवा इस प्रलाप से क्या लाभ?
["संरक्षता पन्नगमेव पुण्यम्" इत्यादि पहिले कहे श्लोक
(अंक ४) को पढ़कर गिर पड़ता है]


  1. क्या लाभ ? इस अर्थ में इस के साथ पञ्चमी आती है ।

( २५० )
वृद्धा— हा पुत्त ! हा वच्छ ! हा गुरुअणवच्छल ! कहिं सि ?
हा पुत्र ! हा वत्स ! हा-गुरुजनवत्सल ! क्वासि ?
देहि मे पडिवअणं ।
देहि मे प्रतिवचनम्।
जीमूतकेतुः— हा वत्स जीमूतवाहन ! हा प्रणयिजनवल्लभ !
हा सर्वगुणनिधे ! क्वासि ? देहि मे प्रतिवचनम्।
[हस्तमुत्क्षिप्य]। कष्टं भोः कष्टम् ।
निराधारं धैर्यं, कमिव शरणं यातु विनयः ?
क्षमः क्षान्तिः वोढुं क इह ? विरता दानपरता ?
हतं सत्यं सत्यं, व्रजतु कृपणा क्वाद्य करुणा ?
जगज्जातं शून्यं त्वयि तनय ! लोकान्तरगते । ३१॥
मलयवती — हा अज्जउत्त ! कहं मं परिच्चइअ गदोसि ?
हा आर्यपुत्र ! कथं मां परित्यज्य गतोऽसि ?
अदिणिग्घणे मलअवदी ! किं तुए पेक्खिदव्वं ? जा
अतिनिर्घृणे मलयवती ! किं त्वया प्रेक्षितव्यम् ? या
एत्तिअं वेलं जीविआसि !
एतावतीं वेलां जीवितासि !
श्लोक नं०: ३१, अन्वयः—
तनय, त्वयि लोकान्तरगते धैर्यं निराधारं (जातम्), विनयः
कमिव शरणं यातु ? इह क्षान्तिं वोढुं कः क्षमः ? दानपरता
विरता । सत्यं सत्यं हतम् । कृपणा करुणा अद्य क्व व्रजतु ? जगत्
शून्यं जातम् ॥

( २४१ )
वृद्धा—हाय बेटा ! हा प्यारे ! गुरुजनों के प्रिय ! तुम कहां हो ? मुझे
जवाब दो !
जीमूतकेतु—हाय पुत्र जीमूतवाहन ! हा प्रेमीजनों के प्यारे ! हा सब
गुणों के खजाने ! तुम कहां हो ? मुझे उत्तर दो। (हाथों को
ऊपर फेंक कर) हाय रे बड़ा कष्ट है !! हे पुत्र तुम्हारे परलोक
सिधार जाने पर धैर्य निराश्रय हो गया है। विनय किस की
शरण ले ? यहां शान्ति को धारण करने में कौन समर्थ है ?
दानशीलता समाप्त हो गई। सच्चाई सचमुच नष्ट हो गई।
बेचारी करुणा आज कहां जाए । (तुम्हारे बिना) सारा संसार
ही सूना हो गया है।
मलयवती—हाय प्राणनाथ ! मुझे छोड़ कर चले गए हो ? अत्यन्त
निर्दय मलयवती ! (और) तुझे क्या देखना है जो इस समय
तक जी रही है ?

  1. सति सप्तमी ।

( २५२ )
शङ्खचूडः— हा कुमार ! क्वेमं प्राणेभ्योऽपि वल्लभं जनं
^1 परित्यज्य गम्यते ? तदवश्यमन्वेति त्वां शङ्खचूडः ।
गरुडः— (सोद्वेगम् ) कष्टम् ! ^2 उपरतोऽयं महात्मा । तत्
किमिदानीं करोमि ?
वृद्धा — (सास्रमूर्ध्वमवलोक्य) भगवंतो लोअपाला ! कहं पि
भगवन्तो लोकपालाः ! कथमप्य-
अमिदेण सिंचिअ पुत्तअं मे जीवावेहि ।
मृतेन सिक्त्वा पुत्रकं मे जीवयत ।
गरुडः— (सहर्षमात्मगतम्) अये ! अमृतसङ्कीर्त्तनात् साधु
स्मृतम् । मन्ये प्रमृष्टमयशः । तद्यावत् त्रिदशपतिम-
भ्यर्थ्य तद्विसृष्टेनामृतवर्षेण न केवलं जीमूतवाहनम् ,
एतानपि पूर्वभक्षितानस्थिशेषानाशीविषान् प्रत्युज्जीवयामि ।
यदि न ददात्यसौ, तदाहम्—
पक्षोत्क्षिप्ताम्बुनाथः, पटुजवपवनप्रेर्यमाणे समीरे—
नेत्राचिः ^3 प्लोषमूर्च्छाविधुरविनिपतत्सानलद्वादशार्कः ।
^4 चञ्च्वा सञ्चूर्ण्य शक्राशनिधनदगदाप्रेतलोकेशदण्डा
नन्तः संमग्नपक्षः क्षणममृतमयीं वृष्टिमभ्युत्सृजामि ॥३२॥
श्लोक नं०: ३२, अन्वयः—
पक्षोत्क्षिप्ताम्बुनाथः, पटुजवपवनप्रेर्यमाणे समीरे, नेत्राचिंप्लोष-
मूर्च्छाविधुरविनिपतन्त्सानलद्वादशार्कः, शक्राशनिधनदगदाप्रेतलोके-
शदण्डान् चञ्च्वा सञ्चूर्ण्य अन्तः क्षणं संमग्नपक्षः अमृतमयीं
वृष्टिमभ्युत्सृजामि ।

( २५३ )
शङ्खचूड़—हाय कुमार ! प्राणों से भी प्यारे इन प्रियजनों को छोड़कर
कहां जा रहे हो ? शङ्खचूड तो अवश्य ही तुम्हारे पीछे (ही)
आएगा।
गरुड़—(दुःखपूर्वक) हाय कष्ट ! यह महात्मा मर गया। तो अब क्या
करूं ?
वृद्धा—(आंसुओं के साथ, ऊपर देख कर) हे भगवान लोकपालो।
कैसे भी अमृत से सींच कर मेरे बच्चे को जीवित कर दो।
गरुड—(हर्षपूर्वक, मन ही मन) अहा, अमृत के नाम से खूब याद
आया। मेरा विचार है (अब मेरा) अपयश मिट गया ! अतः
इन्द्र से प्रार्थना कर के उन से छोड़ी गई अमृत की वर्षा से न
केवल जीमूतवाहन को ही अपितु इन पहिले से खाए गए
अस्थिमात्रावशेष साँपों को भी फिर से जिला दूंगा। यदि वह
नहीं देगा, तो मैं—
पंखों से वरुण को दूर, फेंक कर, बड़े ज़ोर की हवा से पवन देवता
को भी (तिनके की तरह) हटा कर, अपने नेत्रों की ज्वाला से
जलाने से मूर्च्छित तथा व्याकुल अग्नि के साथ बारहौं सूर्यों को
(भी) अपने २ स्थानों से गिरा कर, इन्द्र के वज्र को, कुबेर की
गदा को तथा यमराज के दण्ड को अपनी चोंच से चूर २ कर
के, अमृत के बीच क्षण भर अपने पंखों को डुबा कर मैं अमृत
की वर्षा कर दूँगा।

  1. अनु + इ + लट् + प्रथम पुरुष + एक वचन !
  2. उप + रम् + क्त + प्रथमा एक वचन।
  3. प्लोषः = जलाना।
  4. सम् + चूर्ण् + ल्यप्

( २४४ )
॰तदयं गतोऽस्मि ।
[इति साटोपं परिक्रम्य निष्क्रान्तः]
जीमूतकेतुः-वत्स शङ्खचूड ! किमद्यापि स्थीयते¹ ? समाहृत्य²
दारूणि पुत्रस्य मे विरचय चितां येन वयमप्यनेन सहैव
गच्छामः ।
वृद्धा—पुत्त संखचूडः ! लहु सजेहि । दुक्खं अम्हेहि विणा
पुत्र शङ्खचूड ! लघु सञ्जय । दुःखमस्माभिर्विना³
भादुओ दे चिट्ठदि ।
भ्राता ते तिष्ठति ।
शङ्खचूडः- (सास्रम् ) यदाज्ञापयन्ति गुरवः । नन्वग्रग एवाहं
युष्माकम् [उत्थाय चितारचनां कृत्वा] तात ! अम्ब !
सज्जीकृतेयं चिता ।
जीमूतवाहनः-कष्टं भोः कष्टं !
उष्णीषः स्फुट एष मूर्धनि विभात्यूर्णेयमन्तर्भ्रुवो-
श्चक्षुस्तामरसानुकारि, हरिणा वक्षःस्थलं स्पर्धते ।⁴
चक्राङ्कौ चरणौ, तथापि हि कथं हा वत्स ! मद्दुष्कृतै-
स्त्वं विद्याधरचक्रवर्तिपदवीमप्राप्य विश्राम्यसि ॥३३॥
श्लोक नं०: ३३, अन्वयः- (तव) मूर्धनि एष उष्णीषः स्फुटः विभाति,
भ्रुवोः अन्तः इयम् ऊर्णा; चक्षुः तामरसानुकारि; वक्षःस्थलं
हरिणा स्पर्धते; चरणौ चक्राङ्कौ; तथापि हि हा वत्स ! कथं
मद्दुष्कृतैः त्वं विद्याधर चक्रवर्तिपदवीमप्राप्य विश्राम्यसि ?

( २४५ )
तो यह मैं चला। [यह कहकर गर्व के साथ घूम कर चला जाता है]
जीमूतकेतु—बेटा शङ्खचूड ! अब क्यों ठहरे हो ? लकड़ियां लाकर मेरे
पुत्र की चिता तैयार करो जिस से हम भी इसी के साथ ही
(मर) जाएँ।
वृद्धा—पुत्र शङ्खचूड ! शीघ्र तैयार करो । हमारे बिना तुम्हारा भाई
दुःखी होगा।
शङ्खचूड—(आंसुओं के साथ) जो गुरुजनों की आज्ञा। मैं भी आप के
आगे ही जाने वाला हूँ। (उठकर, चिता बना कर) हे तात !
माता जी !! यह चिता तैयार है।
जीमूतवाहन— हाय रे, बड़ा कष्ट हो रहा है !
(तेरे) मस्तक पर यह उष्णीष (मुकुटबन्ध) का चिन्ह स्पष्ट रूप
से शोभित है, भौहों के बीच में ऊर्णा (भौरी, आवर्त, रोम
समूह) है, आंख लाल कमल के समान है, छाती हरि (शेर
अथवा विष्णु) की बराबरी करती है. दोनों पैरों में चक्र का
निशान हैं। फिर भी, (चक्रवर्ती राजा के इन सब चिन्हों से
विभूषित होने पर भी), हे पुत्र, कैसे मेरे बुरे कर्मों के कारण तुम
विद्याधरों के चक्रवर्ती का पद पाँए बिना ही विश्राम कर रहे हो

  1. स्था+कर्मवाच्य+लट्+प्रथम पुरुष+एक वचन ।
  2. सम्+आ+हृ+ल्यप् ।
  3. विना के योग में तृतीया ।
  4. दुष्कृत = पाप; बुरे कर्म।

( २४६ )
देवि, किमपरं रुद्यते ? तदुत्तिष्ठ चितायामारोहामः ।
[सर्वे उत्तिष्ठन्ति]
मलयवती-(बद्धाञ्जलिरूर्ध्वं पश्यन्ति)-भअवदि गौरि !
भगवति गौरि !
तुए आणत्तं जहा 'विज्जाहरचक्कवट्टी भट्ठा दे भविस्सदि' त्ति
त्वयाज्ञप्तं¹, यथा—विद्याधरचक्रवर्त्ती भर्त्ता ते भविष्यतीति ।
ता कहं मम मन्दसग्गाए किदे तुमं पि अलीअवादिणी संवुत्ता ?
तत्कथं मम मन्दभाग्यायाः ²कृते त्वमप्यलीकवादिनी संवृत्ता ?.
[ततः प्रविशति ससम्भ्रमा गौरी]
गौरी-महाराज जीमूतकेतो ! न खलु न खलु साहसम्-
नुष्ठातव्यम् ।
जीमूतकेतु :-अये कथममोघदर्शना गौरी ?
गौरी-(मलयवतीमुद्दिश्य)-वत्से कथमहमलीकवादिनी भवेयम् ?
(नायकमपसृत्य कमण्डलुजलेनाभ्युक्षन्ती)-
निजेन जीवितेनापि जगतामुपकारिणः ।
परितुष्टास्मि ते वत्स ! जीव जीमूतवाहन ॥३४॥
[नायकः उत्तिष्ठति]
जीमूतकेतु:-(सहर्षं) देवि दिष्ट्या वर्धसे ! प्रत्युज्जीवितो वत्सः।
श्लोक नं०: ३४, अन्वयः- हे वत्स जीमूतवाहन ! निजेन जीवितेनापि
जगतामुपकारिणः ते परितुष्टास्मि । जीव ।

( २५७ )
देवि, और अधिक क्यों रोती हो ? अतः उठो, चिता पर चढ़ें .
[सब उठते हैं]
मलयवती - (हाथ जोड़ कर, ऊपर देखती हुई) भगवती गौरी ! आप
ने आज्ञा की थी कि "विद्याधरों का चक्रवती राजा तेरा पति
होगा" १। तो क्या मुझ अभागिन के कारण आप भी झूठ
बोलने वाली हो गईं २ ?
[जल्दी से गौरी का प्रवेश]
गौरी- महाराज जीमूतकेतु ! ऐसा साहस मत कीजिए ।
जीमूतकेतु - अरे, क्या गौरी जी हैं जिन का दर्शन कभी निष्फल नहीं
गया ?
गौरी- (मलयवती से) पुत्री, मैं कैसे झूठ बोलने वाली हो सकती हूँ
(नायक के पास जा कर कमण्डलु के जल से छींटे देती हुई) -
हे पुत्र जीमूतवाहन ! अपना जीवन देकर संसार का उपकार
करने वाले तुम पर मैं प्रसन्न हूँ । जीते रहो ।
[नायक उठता है]
जीमूतकेतु - (हर्ष पूर्वक) देवि, बड़ी प्रसन्नता की बात है; तुम्हें बधाई
हो । (मेरा) बच्चा जी पड़ा ।

  1. प्रथम अङ्क में ।
  2. कृवे के योग में षष्ठी ।

( २३८ )

वृद्धा-भअवदीए पसादेण ।
[¹ भगवत्याः प्रसादेन । [उभौ गौर्याः पादयोः पतित्वा नायकमालिङ्गतः]
मलयवती-(सहर्षं)-दिट्ठिआ पच्चुज्जीविदो अज्जउत्तो ।
दिष्ट्या प्रत्युज्जीवित आर्यपुत्रः ।
[गौर्याः पादयोः पतति]
नायकः-(गौरीं दृष्ट्वा बद्धाञ्जलिः) भगवति !
अभिलाषिताधिकवरदे¹ ! प्रणिपतितजनार्त्तिहारिणि² ! शरण्ये !
चरणौ नमाम्यहं ते विद्याधर देवते ! गौरि ! ॥३५॥
[इति गौर्याः पादयोः पतति]
[सर्वे ऊर्ध्वं पश्यन्ति] ।
जीमूतकेतुः-अये ! कथममश्रा. वृष्टिः ! भगवति किमेतत् ?
गौरी-राजन् जीमूतकेतो ! जीमूतवाहनं प्रत्युज्जीवयितुमेतां-
श्वास्थिशेषानुरगपतीन् समुपजातपश्चात्तापेन पक्षिपतिना
देवलोकादियममृतवृष्टिः पातिता³। (अङ्गुल्या निर्दिश्य)-
किं न पश्यति भवान्⁴ ?—
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श्लोक नं०, ३५, अन्वयः— अभिलषिताधिकवरदे ! प्रणिपतितजनार्त्ति-
हारिणि ! शरण्ये ! विद्याधरदेवते ! गौरि ! अहं चरणौ ते
नमामि ।

( २४६ )
वृद्धा- भगवती की कृपा से। [दोनों गौरी के चरणों पर गिर कर
नायक को छाती से लगाते हैं]
मलयवती - (हर्ष पूर्वक) बड़ी खुशी की बात है। प्राणनाथ जी उठे ।
[गौरी के चरणों पर गिरती है]
नायक - (गौरी को देख कर, हाथ जोड़ कर) भगवती !
इच्छा से भी अधिक वर देने वाली, भक्तजनों के कष्टों को दूर
करने वाली, शरण देने वाली, विद्याधरों की कुलदेवी, हे गौरी
मैं आप के चरणों में प्रणाम करता हूँ।
[यह कह कर गौरी के चरणों पर गिरता है]
[सब ऊपर देखते हैं]
जीमूतकेतु - अरे, यह बिना बादल के वर्षा कैसे ? भगवती, यह क्या
(बात) है ?
गौरी - हे राजन् जीमूतकेतु ! जीमूतवाहन और इन अस्थिशेष
नागराजाओं को पुनर्जीवित करने के लिए पश्चात्ताप करने वाले
गरुड़ के द्वारा स्वर्ग से यह अमृतवर्षा की गई है। (उङ्गली से
इशारा करके) क्या आप देख नहीं रहे ? -

  1. जो आगे गिरते हैं; जो प्रणाम करते हैं; जो झुकते हैं; भक्त ।
  2. शरण देने वाली; रक्षा करने वाली; जिस की शरण ली जाए।
  3. पत् + णिच् + क्त + स्त्री लिङ्ग + प्रथमा एक वचन ।
  4. भवान् का प्रयोग प्रथम पुरुष में होता है।