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नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

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पृष्ठ 269

( २४५ )
गरुड - जो आप की आज्ञा ।
अज्ञान रूपी निद्रा में सोए हुए मुझे आप ने जगा दिया है।
यह (लो) आज से मैं सब प्राणियों को मारने से हट गया।
अब निश्चय ही—
कहीं रेतीले किनारे के समान विशाल शरीरों से द्वीप की तरह
दिखाई देता हुआ, कहीं शरीर को कुण्डलित करने से आवर्त्त
(भंवर) का भ्रम उत्पन्न करता हुआ, और कहीं एक किनारे से
दूसर किनारे तक जाता हुआ पुल के समान लगता हुआ नागों
का समूह (आज से इस) महासागर में सुखपूर्वक विहार करे ।
और भी,—
खुले हुए, पैरों तक लटकने वाले, अन्धकार के समूह के समान
(काले), लम्बे बालों को धारण करने वाली, पहिले पहिल
दिखाई देने वाली सूर्य की किरणों के स्पर्श से लाल वर्ण हुए
सिन्दूर से रंगे हुए से दीखने वाले कपोलों से (सुशोभित),
परिश्रम से अलसगात्र होने पर भी क्लेश को न गिनने वाली ये
नाग युवतियां इस चन्दन वन में प्रेम से तुम्हारी ही कीर्त्ति
गा* ।

  1. समूहों में पड़े हुए नाग द्वीपों की भान्ति दिखाई देते हैं और
    उनके श्वेत फण रेतीले किनारे के समान ।
  2. लिप्त, लेप लिए हुए, रंगे हुए।