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नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

पृष्ठ 277, कुल 309 में से

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पृष्ठ 277

( २५३ )
शङ्खचूड़—हाय कुमार ! प्राणों से भी प्यारे इन प्रियजनों को छोड़कर
कहां जा रहे हो ? शङ्खचूड तो अवश्य ही तुम्हारे पीछे (ही)
आएगा।
गरुड़—(दुःखपूर्वक) हाय कष्ट ! यह महात्मा मर गया। तो अब क्या
करूं ?
वृद्धा—(आंसुओं के साथ, ऊपर देख कर) हे भगवान लोकपालो।
कैसे भी अमृत से सींच कर मेरे बच्चे को जीवित कर दो।
गरुड—(हर्षपूर्वक, मन ही मन) अहा, अमृत के नाम से खूब याद
आया। मेरा विचार है (अब मेरा) अपयश मिट गया ! अतः
इन्द्र से प्रार्थना कर के उन से छोड़ी गई अमृत की वर्षा से न
केवल जीमूतवाहन को ही अपितु इन पहिले से खाए गए
अस्थिमात्रावशेष साँपों को भी फिर से जिला दूंगा। यदि वह
नहीं देगा, तो मैं—
पंखों से वरुण को दूर, फेंक कर, बड़े ज़ोर की हवा से पवन देवता
को भी (तिनके की तरह) हटा कर, अपने नेत्रों की ज्वाला से
जलाने से मूर्च्छित तथा व्याकुल अग्नि के साथ बारहौं सूर्यों को
(भी) अपने २ स्थानों से गिरा कर, इन्द्र के वज्र को, कुबेर की
गदा को तथा यमराज के दण्ड को अपनी चोंच से चूर २ कर
के, अमृत के बीच क्षण भर अपने पंखों को डुबा कर मैं अमृत
की वर्षा कर दूँगा।

  1. अनु + इ + लट् + प्रथम पुरुष + एक वचन !
  2. उप + रम् + क्त + प्रथमा एक वचन।
  3. प्लोषः = जलाना।
  4. सम् + चूर्ण् + ल्यप्