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नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

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पृष्ठ 281

( २५७ )
देवि, और अधिक क्यों रोती हो ? अतः उठो, चिता पर चढ़ें .
[सब उठते हैं]
मलयवती - (हाथ जोड़ कर, ऊपर देखती हुई) भगवती गौरी ! आप
ने आज्ञा की थी कि "विद्याधरों का चक्रवती राजा तेरा पति
होगा" १। तो क्या मुझ अभागिन के कारण आप भी झूठ
बोलने वाली हो गईं २ ?
[जल्दी से गौरी का प्रवेश]
गौरी- महाराज जीमूतकेतु ! ऐसा साहस मत कीजिए ।
जीमूतकेतु - अरे, क्या गौरी जी हैं जिन का दर्शन कभी निष्फल नहीं
गया ?
गौरी- (मलयवती से) पुत्री, मैं कैसे झूठ बोलने वाली हो सकती हूँ
(नायक के पास जा कर कमण्डलु के जल से छींटे देती हुई) -
हे पुत्र जीमूतवाहन ! अपना जीवन देकर संसार का उपकार
करने वाले तुम पर मैं प्रसन्न हूँ । जीते रहो ।
[नायक उठता है]
जीमूतकेतु - (हर्ष पूर्वक) देवि, बड़ी प्रसन्नता की बात है; तुम्हें बधाई
हो । (मेरा) बच्चा जी पड़ा ।

  1. प्रथम अङ्क में ।
  2. कृवे के योग में षष्ठी ।