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नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

पृष्ठ 267, कुल 309 में से

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पृष्ठ 267

( २४३ )
चर्बी, हड्डी, मांस, मज्जा तथा रक्त के समूह, (ऊपर से)
चमड़े से ढके हुए, सदा वीभत्स (घृणा युक्त) दिखाई देने वाले
इस शरीर में भला कौन सी सुन्दरता है ?
गरुड़— हे महात्मन् ! नरक की आग की ज्वाला से अपने आप को
जला हुआ सा मानता हुआ मैं (बड़े) दुःख से ठहरा हूँ । अतः
ऐसा उपदेश दीजिए जिस से मैं इस पाप से छूट जाऊँ ।
नायक — पिता जी, मुझे आज्ञा दें ताकि मैं (इसे) इस पाप का
प्रतिकार (प्रायश्चित) बताऊँ ।
जीमूतकेतु — पुत्र, ऐसा (ही) करो ।
नायक—हे विनता के पुत्र (गरुड़) ! सुनो ।
गरुड — (घुटनों के बल बैठकर, हाथ जोड़ कर) आप आज्ञा करें ।
नायक — प्रतिदिन प्राणियों की हिंसा से रुको और पहिले किए (पाप)
का पश्चात्ताप करो। सब प्राणियों को अभय दान करके यत्न-
पूर्वक पुण्यप्रवाह का संग्रह करो जिस से अथाह तथा विस्तृत
सरोवर के बीच डाले गए नमक के टुकड़े के समान. (इन) थोड़े
से प्राणियों को मारने से उत्पन्न हुआ यह पाप इस में डूब कर
(बुरा) फल न दे ।

  1. असृक् = रक्त, खून ।
  2. सङ्घात = समूह
  3. एनसः = एनस् + ५ मी + एक वचन
  4. सम् + उप + चि + लोट् + मध्यम पु० + एक वचन ।
  5. आत्तम् = जातम् ।