नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
( ८३ )
नायक—मित्र ठीक किया है (लेकर, शिला पर चित्र खींचते हुए,
रोमाञ्चित होकर) मित्र, देखो—
मेघादि से अनावृत्त मुख की शोभा को धारण करने वाले
तथा नेत्रों को आनन्दित करने वाले चन्द्रमा को पहिली बार
देखी गई रेखा के समान, पके हुए बिम्बफल की तरह
शोभायमान अधरोष्ठ वाले तथा नयनों को आनन्दित करने
वाले प्रियतमा के मुख की रेखा भी (चित्र में) पहिली बार
देखी गई (मुझे) सुख देती है। [ चित्र बनाता है ]
विदूषक—(उत्सुकता के साथ देखकर) हे मित्र, (प्रिया का) रूप सामने
न होने पर भी (उसका) (इतना पूर्ण तथा सुन्दर) चित्र बनाया
जा रहा है ? आह, बड़े आश्चर्य की बात है !
नायक—(मुस्कराते हुए) मित्र, मेरे सङ्कल्पों में सामने ठहरी हुई वह
प्रिया मानों समीप ही है। यदि उसे देख देख कर मैं (उसका)
चित्र बना रहा हूँ तो इसमें कौनसी आश्चर्य की बात है ?
नायिका—(आंसुओं के साथ) चतुरिके ! प्रसङ्ग का अन्त जान लिया।
तो आओ, मित्रावसु को देखें।
- इसके दो अर्थ हैं। चन्द्रमा के साथ—चन्द्रबिम्ब के मेघादि से
आच्छादित न होने के कारण शोभा धारण करने वाला।
दयितामुख के साथ—पके हुए बिम्बफल के समान शोभायमान
अधरोष्ठ वाले। - तथा 3. भी दोनो तरफ लगते हैं।
( ८४ )
चेटी-(सविषादमात्मगतम्)कहं जीवदणिरवेक्खो विअ से आला वो ।
कथं जीवितनिरपेक्ष¹ इवास्या आलापः ।
(प्रकाशम् )
भट्टिदारिए ! णं गदा एव्व तहिं मणोहरिआ; ता कदावि
भर्तृदारिके ! ननु गतैव तत्र मनोहरिका ; तत्कदापि
भट्टा मित्तावसू इध एव्व आअच्छदि
भर्ता मित्रावसुरिहैवागच्छति ।
[ततः प्रविशति मित्रावसुः]
मित्रावसुः- आज्ञापितोऽस्मि तातेन, यथा-'वत्स मित्रावसो !
कुमारजीमूतवाहनोऽस्माभिरिहासनवासात्सुपरीक्षितः ।
कुतोऽस्माद्योग्यो वरः ? तदस्मै वत्सा मलयवती
प्रतिपाद्यताम्²' इति । अहन्तु स्नेहपराधीनतयाऽन्य-
देव किमप्यवस्थान्तरमनुभवामि । कुतः ?
यद्विद्याधरराजवंशतिलकः³ प्राज्ञः सतां सम्मतो
रूपेणाप्रतिमः पराक्रमधरो विद्वान् विनीतो युवा ।
यच्चासूनपि संत्यजेत्करुणया सत्त्वार्थमभ्युद्यत⁴-
स्तेनास्मै ददतः स्वसारमतुला⁵ तुष्टिर्विषादश्च मे ॥१०॥
श्लोक न०: १० अन्वयः-
अस्मै स्वसारं ददतः मे, यत् विद्याधरराजवंश तिलकः,
प्राज्ञः, सतां सम्मतः रूपेण अप्रतिमः, पराक्रमधरः, विद्वान् युवा-
तेन अतुला तुष्टिः ; यत् च करुणया सत्त्वार्थम् अभ्युद्यतः
असून्अपि सन्त्यजेत्, (तेन) विषादश्च ॥
( ८५ )
चेटी—(दुःख के साथ, मन ही मन) इस की (यह) बात मानों जीवन से
कितनी अपेक्षा-रहित (अनादर-युक्त है)¹। (प्रकट) राजकुमारी,
वहां तो मनोहारिका गई है । तो शायद राजकुमारी मित्रावसु
यहीं आते हों ।
[ मित्रावसु का प्रवेश ]
मित्रावसु– पिता जी ने मुझे आज्ञा दी है कि “पुत्र, मित्रावसु, कुमार
जीमूतवाहन को हमने यहां समीप रहने के कारण अच्छी तरह
देख भाल लिया है । इस से बढ़कर योग्य वर कहां (मिलेगा) ?
अतः इस के साथ प्यारी मलयवती का विवाह कर देन
चाहिए । मैं तो स्नेह के वश में होने के कारण किसी और ही
अवस्था का अनुभव कर रहा हूँ । क्योंकि—
इस (जीमूतवाहन) को अपनी बहिन देते हुए मुझे इस विचार
से कि यह विद्याधरों के राजवंश का आभूषण है, बुद्धिमान् ,
सज्जनों में सम्मानित, रूप में अद्वितीय, पराक्रमी, विद्वान् ,
नम्र स्वभाव वाला युवक है— अत्यन्त हर्ष हो रहा है; परन्तु
दया से जीवों के उपकार के लिए उद्यत वह अपने प्राणों को
भी छोड़ सकता है, इस विचार से (मुझे) दुःख भी है ।
- जीवन से अपेक्षारहित, उपेक्षायुक्त; अर्थात् जीवन की परवाह नहीं
करती; अथवा जीना ही नहीं चाहती । मानों आत्महत्या करना
चाहती हो । - दी जानी चाहिए । (विवाह में)। अर्थात् उसका विवाह कर देना
चाहिए । - शिरोमणि, श्रेष्ठ, आभूषण । 4. उद्यत, तैयार ।
- अद्वितीय, अपूर्व, बहुत, अत्यन्त । यदि पाठ “अतुलां” हो तो
वह “स्वसारं” का विशेषण होगा ।
( ८६ )
श्रुतश्च मया - 'असौ जीमूतवाहनोऽत्रैव गौर्याश्रमसम्बद्धे
चन्दनलतागृहे वर्तते' इति । तदेतच्चन्दनलतागृहम् ।
यावत्प्रविशामि । [प्रविशति]
विदूषकः — (ससम्भ्रममवलोक्य) भो वअस्स ! पच्छादेहि
भो वयस्य ! प्रच्छादया-
इमिणा कअलिवत्तेण इमं चित्तगदं कण्णअं । एसो क्खु
ऽनेन कदलीपत्रेणेमां चित्रगतां कन्यकाम् । एष खलु
सिद्धजुवराओ मित्तावसू इध इव आअदो । कदावि (एसो)
सिद्धयुवराजो मित्रावसुरीहैवागतः । कदापि¹ (एष)
पेक्खिस्सदि ।
प्रेक्षिष्यते ।
नायकः— (कदलीपत्रेण प्रच्छादयति)
मित्रावसुः-(उपसृत्य) कुमार ! मित्रावसुः प्रणमति ।
नायकः-(दृष्ट्वा) मित्रावसो ! स्वागतम् । इहोपविश्यताम् ।
चेटी—भट्टिदारिए ! आअदो भट्टा मित्तावसू ।
भर्तृदारिके ! आगतो भर्त्ता मित्रावसुः ।
नायिका- हज्जे ! पिअं मे ।
हञ्जे ! प्रियं मे ।
नायकः — मित्रावसो ! अपि कुशली सिद्धराजो विश्वावसुः ?
मित्रावसुः-कुशली तातः। तदादेशेनैवास्मि त्वत्सकाशमागतः ।
नायकः — किमाह तत्रभवान् ?
( ८७ )
और मैं ने सुना है कि वह जीमूतवाहन यहीं गौरी के मन्दिर
के साथ लगे हुए चन्दनलतागृह में है । वह चन्दनलतागृह यही
है । तो (इसमें) प्रवेश करता हूं । [भीतर जाता है]
विदूषक — (घबराहट के साथ देखकर) — हे मित्र ! उस कन्या के इस
चित्र को इस केले के पत्ते से ढक दो । (क्योंकि) यह सिद्धों का
युवराज मित्रावसु इधर ही आ पहुंचा है । शायद (यह) देख
लेगा ।
नायक — (केले के पत्ते से ढक देता है)
मित्रावसु — (समीप जाकर) कुमार ! मित्रावसु (आपको) प्रणाम करता
है ।
नायक — (देखकर) मित्रावसु ! तुम्हारा स्वागत है । (आओ) यहां बैठो ।
चेटी — राजकुमारी ! स्वामी मित्रावसु आगए ।
नायिका — सखी, मुझे खुशी है ।
नायक — मित्रावसु ! क्या सिद्धराज विश्वावसु सकुशल हैं ?
मित्रावसु — (जी हां) पिता जी कुशलपूर्वक हैं । उन्हीं की आज्ञा से मैं
आप के पास आया हूँ ।
नायक — श्रीमान् ने क्या कहा है ?
- कभी, कहीं, शायद ।
( ८८ )
नायिका-- सुणिस्सं दाव, किं तादेण संदिट्ठं त्ति ।
श्रोष्यामि तावत्, किं तातेन सन्दिष्टमिति ।
मित्रावसुः-इदमाह तातः-अस्ति मे मलयवती नाम कन्या
जीवितमिवास्य सर्वस्यैव सिद्धराजान्वयस्य । सा मया
तुभ्यं प्रतिपाद्यते । प्रतिगृह्यताम्'' इति ।
चेटी- (विहस्य) - भट्टिदारिए ! किं ण कुप्पसि दाणीं ?
भर्तृदारिके ! किं न कुप्यसीदानीम् ?
नायिका - (सस्मितं सलज्जं चाधोमुखी स्थित्वा) हज्जे !
हञ्जे !
मा हस । किं विसुमरिदं दे एदस्स अण्णहिअअत्तणं ?
मा हस । किं विस्मृतं त एतस्यान्यहृदयत्वम् ?
नायकः- (अपवार्य) वयस्य सङ्कटे पतिताः स्मः ।
विदूषकः- (अपवार्य) भो वअस्स ! जाणामि ण तं वज्जिअ
भो वयस्य ! जानामि न तां वर्जयित्वा-
अण्णहिं चित्तं दे अहिरमदि, ता जधा तथा जं किम्पि
ऽन्यत्र, चित्तं तेऽभिरमते । तयथा तथा यत्किमपि
भणिअ विसज्जीअदु एसो ।
भणित्वा विसृज्यतामेषः ।
नायिका- (सरोपमात्मगतम्) हदास ! को वो एदं न जाणादि ?
हताश¹ ! को चैतन्न जानाति ?
( ८६ )
नायिका— मैं भी सुनना चाहती हूँ कि पिता जी ने क्या सन्देश भेजा
है ।
मित्रावसु — पिता जी ने यह कहा है कि "मलयवती नाम की मेरी
कन्या है जो सम्पूर्ण सिद्धराज वंश की मानों जान है । उसे मैं
तुम्हें (विवाह में) देता हूं । (उसे) स्वीकार कीजिए ।”
चेटी— (हंसकर) राजकुमारी ! अब क्रोध क्यों नहीं करती ?
नायिका—(मुस्कराहट तथा लज्जा के साथ नीचे मुख करके) सखी, मत
हँस । क्या तू भूल गई कि इनका मन किसी और (स्त्री) में है ?
नायक— (अलग) मित्र, (बड़े) संकट में पड़ गए ।
विदूषक— (अलग) हे मित्र, मैं जानता हूँ कि उसे छोड़ कर आपका
मन और कहीं नहीं लग सकता । अतः जैसे तैसे जो कुछ भी
कह कर इसे विदा करो ।
नायिका—(क्रोध के साथ, मन ही मन) दुष्ट ! यह कौन नहीं जानता ?
- जिसकी आस टूट चुकी हो ; जिसने आस तोड़ दी हो ; निर्दय;
अभागा; दुष्ट ।
( ६० )
[ना]यकः--मित्रावसो ! क इह नेच्छेद भवद्भिः सह श्लाघ्य-
मीदृशं सम्बन्धम् ? किन्तु न शक्यते चित्तमन्यतः
प्रवृत्तमन्यतो प्रवर्त्तयितुम् । अतो नाहमेनां प्रतिग्रही-
तुमुत्सहे ।
नायिका - (मूर्च्छां नाटयति)
चेटी - समस्ससदु समस्ससदु भट्टिदारिआ !
समाश्वसितु समाश्वसितु भर्तृदारिका !
विदूषकः-भो ! पराधीणो क्खु एसो, किं एदिणा अब्भत्थिदेण ?
भो ! पराधीनः खल्वेषः , किमनेनाभ्यर्थितेन ?
ता गुरुअणं से गदुअ अब्भड्ढेहि ।
तद्गुरुजनमस्य गत्वाभ्यर्थय ।
मित्रावसुः - (आत्मगतम् ) साधूक्तं, नायं गुरुजनवचन-
मतिक्रामति । अस्य गुरुरप्यस्मिन्नेव गौर्याश्रमे प्रति-
वसति । तद्यावद्गत्वाऽस्य पित्रा मलयवतीं प्रति-
ग्राहयामि ।
नायिका - (समाश्वसिति)
मित्रावसुः - (प्रकाशम् ) एवं निवेदितात्मनोऽस्मान् प्रत्या-
चक्षाणः कुमार एव बहुतरं जानाति ।
नायिका - (सरोषं विहस्य)
कहं पच्चाक्खाणलहू मित्तावसू पुणो वि मन्तेदि ?
कथं ^1प्रत्याख्यानलघुर्मित्रावसुः पुनरपि मन्त्रयते ?
( ६१ )
नायक — मित्रावसु ! आप लोगों के साथ ऐसा प्रशंसनीय सम्बन्ध कौन
नहीं चाहेगा ? परन्तु कहीं और लगे हुए मन को अन्यत्र नहीं
लगाया जा सकता । अतः मैं उसे स्वीकार नहीं कर सकता ।
नायिका— (मूर्च्छित हो जाती है)
चेटी—धीरज धरो, राजकुमारी, धीरज धरो ।
विदूषक—अजी, यह पराधीन है। इस से प्रार्थना करने से क्या लाभ ?
अतः इसके माता पिता के पास जाकर प्रार्थना कीजिए ।
मित्रावसु–(मन ही मन) इसने ठीक कहा है । यह अपने माता पिता के
कहने का उल्लंघन नहीं करेगा । इस के पिता जी भी इसी
गौरी आश्रम में ही रहते हैं अतः जाकर इनके पिता से
मलयवती को स्वीकार करने को कहता हूँ ।
नायिका— (होश में आती है)
मित्रावसु—(प्रकट) इस प्रकार अपनी बात कहने पर हमें ‘न’ में उत्तर
देने वाले कुमार स्वयं अधिक जानते हैं ।
नायिका—(क्रोध के साथ, हँसकर) क्या अस्वीकृति से अपमानित
मित्रावसु फिर भी बातें कर रहा है ?
- इनकार से जो हलका अथवा तिरस्कृत हुआ है ।
( ६२ )
[मित्रावसुः निष्क्रान्तः]
नायिका—(सास्रमात्मानं पश्यन्ती, आत्मगतम् )
किं मम एदिणा दोब्भग्गकलङ्कमइलेण अच्चंतदुक्खभाइणा
किं ममैतेन दौर्भाग्यकलङ्कमलिनेन अत्यन्तदुःखभागिनाऽ
अज्जवि सरीरेण धारिदेण ? त इध ज्जेव असोअ-
द्यापि शरीरेण धारितेन ? तदिहैवाऽशोक-
पाअव्वे इमाए अदिमुत्तलदाए उव्वंधिअ अत्ताणं वावादिस्सं।
पादपेऽनयाऽतिमुक्तलतयोद्बध्यात्मानं व्यापायिष्यामि ।
ता एव्वं दाव। (प्रकाशं विलक्षस्मितेन) हज्जे ! पेक्ख
तदेवं तावत् । हञ्जे ! प्रेक्षस्व
दाव मित्तावसु दूरं गदो ण वेत्ति जेण अहम्पि इदो
तावत् , मित्रावसुर्दूरं गतो न वेति, येनाहमपि इतो
गमिस्सं ।
गमिष्यामि ।
चेटी—(कतिचित्पदानि गत्वा, अवलोक्यात्मगतम् )
अण्णारिसं से हिअअं पेक्खामि, ता ण गमिस्सं । २५
अन्यादृशमस्या हृदयं प्रेक्षे। तन्न गमिष्यामि।
ज्जेव ओवारिदा पेक्खामि किं एसा पडिवज्जदि त्ति ।
इहैवाऽपवारिता प्रेक्षे किमेषा प्रतिपद्यत इति।
[इति स्थिता]
नायिका-[दिशोऽवलोक्य पाशं गृहीत्वा सास्रम् ]
भअवदि गोरि ! इध तुए ण किदो पसादो,
भगवति गौरि ! इह त्वया न कृतः प्रसादः ;
( ६३ )
[ मित्रावसु का प्रस्थान ]
नायिका—(आंसुओं के साथ, अपने आप को देखती हुई मन ही मन):
दुर्भाग्य रूपी कलङ्क से मलिन, अत्यन्त दुःख के भागी इस
शरीर को धारण करने से अब क्या लाभ ? अतः इसी अशोक-
वृक्ष के नीचे इस अतिमुक्त लता से गले में फांसी डाल कर
मैं अपने आप को मार डालूंगी । तो ऐसा ही सहो । (प्रकट,
विचित्र हंसी के साथ) सखी, देखो तो मित्रावसु दूर चले गए
कि नहीं, जिससे मै भी यहाँ से चलूँ ।
चेटी—(कुछ कदम चलकर, देखकर, मन ही मन) इस का मन कुछ
और प्रकार का देख रही हूँ । अतः मैं नहीं जाऊँगी । यहीं
छिपकर देखूँ यह क्या करती है । (यह कह कर ठहर जाती
है)
नायिका- (चारों ओर देखकर, फन्दा लेकर, आंसुओं के साथ)
हे भगवती गौरी ? यहां (इस जन्म में) तो आप ने कृपा नहीं
- उद्बध्य = फांसी लेकर ।
( ६४ )
'ता जम्मन्तरे जहा ण ईरिसी दुक्खभाइणी होमि, तथा करेसि
तज्जन्मान्तरे यथा नेदृशी दुःखभागिनी भवामि तथा करिष्यसि।
(कण्ठेपाश मपर्यति)
चेटी — (दृष्ट्वा ससम्भ्रममुपेत्य) पलित्ताअदु पलित्ताअदु
परित्रायतां परित्रायताम् ।
एसा भट्टिदारिआ उव्वन्धित्र अत्ताणं वावादेदि ।
एषा भर्तृदारिकोद्वध्य आत्मानं व्यापादयति ।
नायकः — (ससम्भ्रममुपसृत्य) क्वासौ ? क्वासौ ?
चेटी — अअं असोअपादवे ।
इयमशोकपादपे ।
नायकः — (सहर्षमवलोक्य) कथं सैवेयमस्मन्मनोरथभूमिः¹ ?
(नायिकां पाणौ गृहीत्वा लतापाशमाक्षिपन्)—
न खलु न खलु मुग्धे² ! साहसं कार्यमीदृक्
व्यपनय करमेतं पल्लवाभं लतायाः ।
कुसुममपि विचेतुं यो न मन्ये समर्थः
कलयति³ स कथं ते पाशमुद्वन्धनाय ॥ ११ ॥
नायिका — (ससाध्वसम्)हज्जे ! को उण एसो ?
हञ्जे ! कः पुनरेषः ?
श्लोक नं०: ११, अन्वयः—
मुग्धे ! न खलु न खलु ईदृक् साहसं कार्य्यम् ।
पल्लवाभम् एतं करं लतायाः व्यपनय । मन्ये,
य ते (करः) कुसुमम् अपि विचेतुं न समर्थः
स उद्वन्धनाय पाशं कथं कलयति ?
( ६५ )
की। अतः दूसरे जन्म में ऐसा करना कि इस प्रकार
दुःखभागिनी न होऊँ।
[ गले में फन्दा डालती है ]
चेटी (देख कर, घबराहट के साथ पास जाकर) बचाओ ! बचाओ ! !
यह राजकुमारी गले में फांसी लगाकर अपने प्राण दे रही है।
नायक - (घबराहट के साथ पास जाकर) कहां है ? वह कहां हैं ?
चेटी—यह अशोक वृक्ष के नीचे।
नायक (हर्ष के साथ देखकर) हैं ! यह तो वही हमारी अभीष्ट
प्रिया है ! (नायिका को हाथ से पकड़ कर लता के फन्दे को
छुड़ाते हुए) हे सुन्दरी ! निश्चय ही ऐसा साहस नहीं करना
चाहिए। पल्लव के समान कोमल इस हाथ को लता से हटा
ले। मेरा विश्वास है कि जो तेरा हाथ फूल चुनने में (भी) समर्थ
नहीं, वह फाँसी लगाने के लिए फन्दा कैसे पकड़ सकता है।
नायिका- (घबराहट के साथ) सखी ! यह कौन है ? (अच्छी तरह देख
- सा + एव + इयम् + अस्मद् + मनोरथभूमिः । हमारी इच्छा का
पात्र । अभीष्ट प्रिया । जिसे हम चाहते हैं । - मोहित करने वाली, सुन्दर, भोली-भाली, पगली, मूर्ख ।
- पकड़ता है ।
( ६६ )
(निरूध्य सरोषं हस्तमाक्षेप्तुमिच्छति)—
मुञ्च मुञ्च मे अग्गहत्थं, को तुमं णिवारेदुं ? मरणे वि किं
मुञ्च मुञ्च मे ऽग्रहस्तम् । कस्त्वं निवारयितुम् ? मरणेऽपि किं
तुमं जेव्व-अब्भट्ठणीओ ।
त्वमेवाभ्यर्थनीयः ?
नायकः — नाहं मुञ्चामि ।
कण्ठे ¹हारलतायोग्ये येन पाशस्त्वयाऽर्पितः ।
गृहीतः सापराधोऽयं, स कथं मुच्यते करः ? ॥ १२ ॥
विदूषकः-भोदि ! किं उण से इमस्स मरणव्ववसायस्स कारणं ?
भवति ! किं पुनरस्या अस्य मरणव्यवसायस्य² कारणम् ?
चेटी- (साकूतं³) णं एसो एव्व दे पिअवअस्सो ।
नन्वेष एव ते प्रियवयस्यः ।
नायकः-कथमहमेवास्या मरणकारणम् ? न खल्ववगच्छामि ।
विदूषकः- भोदि ! कहं वित्र ।
भवति ! कथमिव ।
चेटी - (साकूतम्) जा सा पिअवअस्सेण दे कावि हिअववल्लहा
या सा प्रियवयस्येन ते काऽपि हृदयवल्लभा
सिलाअले आलिहिदा ताए पक्खवादिणा एदेण
शिलातले आलिखिता तस्याः ⁴पक्षपातिनैतेन
श्लोक नंः १२, अन्वयः —
येन (करेण) त्वया हारलतायोग्ये कण्ठे पाशः अर्पितः
स सापराधः करः अयं गृहीतः, (स) कथं मुच्यते ?
( ६७ )
कर, क्रोध के साथ हाथ छुड़ाना चाहती है)—छोड़ो, मेरा
हाथ छोड़ दो ! तुम रोकने वाले कौन हो ? क्या मरने के लिए
भी आप से ही प्रार्थना करनी पड़ेगी ?
नायक-- मैं नहीं छोड़ता :—
जिस हाथ से तुमने हार के योग्य गले में फन्दा डाला है, वह
अपराधी हाथ यह पकड़ा गया है। वह कैसे छोड़ा जा सकता है?
विदूषक–श्रीमती, इसके इस मरने के निश्चय का क्या कारण है ?
चेटी— (अभिप्राय के साथ) यही तुम्हारे प्रिय मित्र ।
नायक—मैं ही इस के मरने का कारण कैसे हूँ ? यह मैं नहीं समझ
सका ।
विदूषक— आर्ये ! वह कैसे ?
चेटी—(अभिप्राय के साथ) जिस प्राणप्यारी को आपके प्रिय मित्र ने
शिलातल पर चित्रित किया था उसी में आसक्ति के कारण
- हारलता = लता के समान हलका सा हार ।
- व्यवसाय = कोशिश; निश्चय; काम, क्रिया ।
- आकूतं = अर्थ, अभिप्राय, भाव, आवेग, उत्कण्ठा, इच्छा ।
- पक्षपात = किसी के पक्ष में होना; किसी को पसन्द करना,
चाहना, प्रेम करना; लगाव, आसक्ति ।
( ६८ )
पडिवादअंतस्सवि मित्तावसुणो णाहं पडिच्छिदेत्ति
प्रतिपादयतोऽपि मित्रावसोर्नाहं प्रतीष्टेति
जादणिव्वेदाए इमाए एव्वं व्ववसिदं ।
¹जातनिर्वेदाऽनयैवं व्यवसितम् ।
नायकः-(सहर्षमात्मगतम्)-कथमियमेवासौ विश्वावसोर्दुहिता
मलयवती ! अथवा रत्नाकरादृते ²कुतश्चन्द्रलेखायाः
प्रसूतिः ? हा ! कथं वञ्चितोऽस्म्यनया ?
विदूषकः-भोदि ! जइ एवं ता अणवराद्धो दाणी पियवयस्सो।
भवति, यद्येवं तदनपराध इदानीं प्रियवयस्यः ।
अहवा जइ मम ण पत्तिआअदि, तदा सअं ज्जेव्व
अथवा यदि मम न प्रत्येति, तदा स्वयमेव
गदुअ सिलाअलं पेक्खदु भोदि ।
गत्वा शिलातलं प्रेक्षतां भवती ।
नायिका-(सहर्षं सलज्जञ्च नायकं पश्यन्ती हस्तमाक्षेप्तुमिच्छति)
मुञ्च मुञ्च मे अग्गहत्थं ।
मुञ्च मुञ्च मेऽग्रहस्तम् ।
नायकः-(सस्मितं) न तावन्मुञ्चामि यावन्मम हृदयवल्लभां
शिलायामालिखितां न पश्यसि ।
[ सर्वे चन्दनलतागृहं प्रविशन्ति ]
विदूषकः— (कदलीपत्रमपनीय)
भोदि ! पेक्ख एदं से हिअवल्लहं जणं ।
भवति ! प्रेक्षस्व, एतमस्य हृदयवल्लभं जनम् ।
( ६६ )
इन्हों ने मित्रावसु के द्वारा दी गई हुई भी मुझे स्वीकार नहीं
किया इस से उदास हो कर इस ने ऐसा निश्चय किया है।
नायक - (हर्ष पूर्वक, मन ही मन) क्या यही विश्वावसु की पुत्री
मलयवती है ? अथवा, सागर के बिना चन्द्रलेखा की उत्पत्ति
कहां हो सकती है ? आह, इस ने मुझे कैसा धोखा दिया है।
विदूषक - श्रीमती जी, यदि ऐसा है तब तो मेरा प्रिय मित्र अपराध-
रहित है। अथवा, यदि मेरा विश्वास नहीं करतीं तो आप स्वयं
जाकर शिलातल को देख सकती हैं।
नायिका-(हर्ष तथा लज्जा के साथ, नायक को देखती हुई, हाथ
खींचना चाहती है)- छोड़िए, मेरा हाथ छोड़ दीजिए।
नायक - (मुस्कराहट सहित) तब तक नहीं छोडूंगा जब तक शिला पर
चित्रित मेरी प्राणप्रिया को देख न लेगी।
(सब चन्दनलता गृह में प्रवेश करते हैं)
विदूषक - (केले के पत्ते को हटाकर) देवी, देखिए, यह हैं इस की
प्राणप्रिया।
- निर्वेदः = निराशा; उदासीनता; मन का उचाट होना; वैराग्य;
शोक; अपमान; - ऋते = बिना । इसके साथ पञ्चमी विभक्ति आती है।
( १०० )
नायिका-(निरूप्यापवार्य सस्मितं) चदुरिए ! अहं वित्र आलिहिदा!
चतुरिके ! अहमिवालिखिता !
चेटी-(चित्राकृतिं नायिकाञ्च निर्वर्ण्य) भट्टिदारिए किं भणसि-
भर्तृदारिके ! किं भणसि-
अहंवित्र आलिहिदेत्ति । ईरिसं से सारिच्छं जेण णा
अहमिवालिखितेति । ईदृशमस्य सादृश्यं येन न
जाणीअदि किं दाव इध ज्जेव्व सिलाअले भट्टिदारिआए
ज्ञायते किं तावदिहैव शिलातले भर्तृदारिकायाः
पडिबिम्वं संकंतं, उद तुमं आलिहिदेत्ति ।
प्रतिबिम्बं सङ्क्रान्तम्, उत त्वमालिखितेति ।
नायिका — (विहस्य) हज्जे दुज्जणीकिदम्हि इमिणा मं
हञ्जे ¹दुर्जनीकृतास्म्यनेने मां
चित्तगदं दंसअंतेण ।
चित्रगतां दर्शयता ।
विदूषकः— भो ! णिव्वुत्तो दाणीं दे गन्धव्वो विवाहो ।
भो ! निर्वृत्त² इदानीं ते • गन्धर्वविवाहः ।
ता मुञ्च दाव से अग्गहत्थं । एसा क्खु कावि
तन्मुञ्च तावदस्या अग्रहस्तम् । एषा खलु कापि
तुरिदतुरिदा इध ज्जेव्व आअच्छदि ।
त्वरितत्वरिता इहैवागच्छति ।
नायकः— (मुञ्चति)
[ ततः प्रविशति चेटी ]
( १०१ )
नायिका—(देखकर, मुस्कराहट के साथ, अलग) चतुरिके ! यह तो
मानो मेरा ही चित्र है! (मानों मैं ही चित्रित की गई हूँ)
चेटी—(चित्र की आकृति और नायिका को देखकर) राजकुमारी, क्या
कहती है “मानों मैं ही चित्रित हूं”। इस की तो (आप के
साथ) इतनी सदृशता है कि यह मालूम ही नहीं होता कि
यहां शिलातल पर राजकुमारी का प्रतिबिम्ब पड़ रहा है अथवा
आप का चित्र बना है।
नायिका—(हँस कर) सखी ! चित्र में मुझे ही चित्रित हुई दिखाकर
इन्हों ने मुझे (ही) अपराधिनी बना दिया है।
विदूषक—अजी आपका गन्धर्व विवाह हो गया। अतः इसका हाथ
छोड़ दो। यह कोई स्त्री जल्दी जल्दी यहां ही आ रही है।
नायक—(छोड़ देता है)।
[चेटी का प्रवेश]
- मेरा ही चित्र दिखा कर इन्हों ने यह सिद्ध कर दिया है कि मैं
ही 'दुर्जन' (दुष्ट) हूँ। - सम्पूर्ण। हो चुका।
( १०२ )
चेटी—(उपसृत्य, सहर्षम्) भट्टिदारिए ! दिट्ठिआ वड्ढसि ।
भर्तृदारिके ! दिष्ट्या वर्धसे ।
पडिच्छिदा क्खु तुमं भट्टिणो जीमूदवाहणस्स गुरुहिं ।
प्रतीष्टा¹ खलु त्वं भर्तुर्जीमूतवाहनस्य गुरुभिः।
विदूषकः— (नृत्यन्) ही ही भो! सम्पुण्णा मणोरहा
ही ही भोः ! सम्पूर्णा मनोरथाः
पिअवअस्स । अहवा णहि णहि, भोदीए मलयवदीए ।
प्रियवयस्य । अथवा नहि नहि , भवत्या मलयवत्याः ।
अहवा ण एदाणं। (भोजनमभिनयन् ) मम ज्जेव एक्कस्स बह्मणस्स ।
अथवा न एतयोः ! ममैव एकस्य ब्राह्मणस्य ।
चेटी—(नायिकामुद्दिश्य) आणत्तम्हि जुवराअमित्तावसुणा
आज्ञप्तास्मि युवराजमित्रावसुना
जहा—अज्ज ज्जेव मलयवदीए विवाहो । ता लहुं तं
यथा—अद्यैव मलयवत्याः विवाहः। तल्लघु तां
गेण्हिअ आगच्छ त्ति । ता एहि गच्छुम्ह ।
गृहीत्वागच्छ' इति । तदेहि गच्छावः ।
विदूषकः—आः गदा क्खु तुमं दासीए धीए ! एदं गेण्हिअ ।
आः गता खलु त्वं, ²दास्याःपुत्रि ! इमां गृहीत्वा ।
पिअवअस्सेण किं इध ज्जेव अवत्थिदव्वं ?
प्रियवयस्येन किमिहैवावस्थातव्यम् ?
चेटी—हदास ! मा तुवर । तुम्हाणं पि ण्हवणाअं आगदं जेव ।
हताश³ ! मा त्वरस्व। युष्माकमपि ⁴स्नपनकमागतमेव ।