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नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

पृष्ठ 133, कुल 309 में से

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पृष्ठ 133

( ६६ )
इन्हों ने मित्रावसु के द्वारा दी गई हुई भी मुझे स्वीकार नहीं
किया इस से उदास हो कर इस ने ऐसा निश्चय किया है।
नायक - (हर्ष पूर्वक, मन ही मन) क्या यही विश्वावसु की पुत्री
मलयवती है ? अथवा, सागर के बिना चन्द्रलेखा की उत्पत्ति
कहां हो सकती है ? आह, इस ने मुझे कैसा धोखा दिया है।
विदूषक - श्रीमती जी, यदि ऐसा है तब तो मेरा प्रिय मित्र अपराध-
रहित है। अथवा, यदि मेरा विश्वास नहीं करतीं तो आप स्वयं
जाकर शिलातल को देख सकती हैं।
नायिका-(हर्ष तथा लज्जा के साथ, नायक को देखती हुई, हाथ
खींचना चाहती है)- छोड़िए, मेरा हाथ छोड़ दीजिए।
नायक - (मुस्कराहट सहित) तब तक नहीं छोडूंगा जब तक शिला पर
चित्रित मेरी प्राणप्रिया को देख न लेगी।
(सब चन्दनलता गृह में प्रवेश करते हैं)
विदूषक - (केले के पत्ते को हटाकर) देवी, देखिए, यह हैं इस की
प्राणप्रिया।

  1. निर्वेदः = निराशा; उदासीनता; मन का उचाट होना; वैराग्य;
    शोक; अपमान;
  2. ऋते = बिना । इसके साथ पञ्चमी विभक्ति आती है।