नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
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चेटी—(दुःख के साथ, मन ही मन) इस की (यह) बात मानों जीवन से
कितनी अपेक्षा-रहित (अनादर-युक्त है)¹। (प्रकट) राजकुमारी,
वहां तो मनोहारिका गई है । तो शायद राजकुमारी मित्रावसु
यहीं आते हों ।
[ मित्रावसु का प्रवेश ]
मित्रावसु– पिता जी ने मुझे आज्ञा दी है कि “पुत्र, मित्रावसु, कुमार
जीमूतवाहन को हमने यहां समीप रहने के कारण अच्छी तरह
देख भाल लिया है । इस से बढ़कर योग्य वर कहां (मिलेगा) ?
अतः इस के साथ प्यारी मलयवती का विवाह कर देन
चाहिए । मैं तो स्नेह के वश में होने के कारण किसी और ही
अवस्था का अनुभव कर रहा हूँ । क्योंकि—
इस (जीमूतवाहन) को अपनी बहिन देते हुए मुझे इस विचार
से कि यह विद्याधरों के राजवंश का आभूषण है, बुद्धिमान् ,
सज्जनों में सम्मानित, रूप में अद्वितीय, पराक्रमी, विद्वान् ,
नम्र स्वभाव वाला युवक है— अत्यन्त हर्ष हो रहा है; परन्तु
दया से जीवों के उपकार के लिए उद्यत वह अपने प्राणों को
भी छोड़ सकता है, इस विचार से (मुझे) दुःख भी है ।
- जीवन से अपेक्षारहित, उपेक्षायुक्त; अर्थात् जीवन की परवाह नहीं
करती; अथवा जीना ही नहीं चाहती । मानों आत्महत्या करना
चाहती हो । - दी जानी चाहिए । (विवाह में)। अर्थात् उसका विवाह कर देना
चाहिए । - शिरोमणि, श्रेष्ठ, आभूषण । 4. उद्यत, तैयार ।
- अद्वितीय, अपूर्व, बहुत, अत्यन्त । यदि पाठ “अतुलां” हो तो
वह “स्वसारं” का विशेषण होगा ।