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नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

पृष्ठ 127, कुल 309 में से

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पृष्ठ 127

( ६३ )
[ मित्रावसु का प्रस्थान ]
नायिका—(आंसुओं के साथ, अपने आप को देखती हुई मन ही मन):
दुर्भाग्य रूपी कलङ्क से मलिन, अत्यन्त दुःख के भागी इस
शरीर को धारण करने से अब क्या लाभ ? अतः इसी अशोक-
वृक्ष के नीचे इस अतिमुक्त लता से गले में फांसी डाल कर
मैं अपने आप को मार डालूंगी । तो ऐसा ही सहो । (प्रकट,
विचित्र हंसी के साथ) सखी, देखो तो मित्रावसु दूर चले गए
कि नहीं, जिससे मै भी यहाँ से चलूँ ।
चेटी—(कुछ कदम चलकर, देखकर, मन ही मन) इस का मन कुछ
और प्रकार का देख रही हूँ । अतः मैं नहीं जाऊँगी । यहीं
छिपकर देखूँ यह क्या करती है । (यह कह कर ठहर जाती
है)
नायिका- (चारों ओर देखकर, फन्दा लेकर, आंसुओं के साथ)
हे भगवती गौरी ? यहां (इस जन्म में) तो आप ने कृपा नहीं

  1. उद्बध्य = फांसी लेकर ।