कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
ब्राह्मण ५ ] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ५०९
ब्राह्मण ५ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५०९
भी निकाल बाहर करें; और गर्भ निकलनेके समय जो मास-
पेशी बाहर निकला करती है, वह भी निकल जाय।'
पश्चात् पुत्रका जन्म हो जानेपर अभिख्यापन करके पुत्र-
को गोदमें ले और आज्यस्थालीमें दही मिला हुआ घृत रख-
कर उसे थोड़ा-थोड़ा लेकर यह कहता हुआ बार-बार अग्निमें
होम करे कि 'इस अपने घरमें मैं पुत्ररूपसे बढ़कर सहस्रों मनुष्यों-
का पालन करूँ, मेरे इस पुत्रके वंशमें सन्तान लक्ष्मी तथा
पशु-सम्पत्ति लगातार बनी रहे; मुझमें (पितामे) जो प्राण
(इन्द्रियाँ) हैं, वे सभी मन-ही मन मैं तुम्हे (पुत्रको) दे
रहा हूँ; मेरे इस कर्ममें कोई न्यूनाधिकता हो गयी हो तो
विद्वान् एवं वाञ्छापूरक अग्नि उसे पूर्ण कर दें।'
तदनन्तर पिता बालकके दाहिने कानमें अपना मुख
लगाकर 'वाक्, वाक्, वाक्' इस प्रकार तीन बार जप करे ।
तदनन्तर दधि, मधु और घृत मिलाकर पास ही रक्खे हुए
सोनेके पात्रके द्वारा क्रमशः—
'भूस्ते दधामि', 'भुवस्ते दधामि', 'स्वस्ते दधामि',
'भूर्भुवः स्वः सर्वं त्वयि दधामि'
—यों कहकर चार बार उसे चटाये । फिर पिता उस
पुत्रका 'वेदोऽसि' बोलकर 'नामकरण' करे—'वेद' यह नाम
रक्खे । उसका यह नाम अत्यन्त गोपनीय होता है । इसे सर्व-
साधारणमें प्रकट नहीं करना चाहिये । इसके बाद गोदमें स्थित
उस शिशुको माताकी गोदमें रखकर तथा स्तन देकर इस
मन्त्रका पाठ करे—
'यस्ते स्तन शशयो यो मयोभूर्यो रत्नधा वसुविद्यः सुदत्रः ।
येन विश्वा पुष्यसि वीर्याणि सरस्वति तमिह धातवेकः।'
अर्थात् 'हे सरस्वति ! तुम्हारा जो स्तन दूधका अक्षय
भंडार तथा पोषणका आधार है, जो रत्नोंकी खान है तथा
सम्पूर्ण धन-राशिका ज्ञाता एव उदार दानी है, और जिसके
द्वारा तुम समस्त वरणीय पदार्थोंका पोषण करती हो, तुम इस
सत्पुत्रके जीवन धारणार्थ उस स्तनको मेरी भार्यामें प्रविष्ट
करा दो।'
तदनन्तर बालककी माताको इस प्रकार अभिमन्त्रित करे—
उसे सम्बोधन करके कहे, 'तुम ही स्तुतिके योग्य मैत्रा-
वरुणी (अरुन्धती) हो, हे वीरे ! तुमने वीर पुत्रको जन्म
देकर हमे वीरवान्—वीर पुत्रका पिता बनाया है, अतः तुम वीर-
वती होओ। इसे लोग कहें—तू सचमुच अपने पितासे भी आगे
बढ़ गया, तू निस्सन्देह अपने पितामहसे भी श्रेष्ठ निकला।'
इस प्रकारके विशिष्ट ज्ञानसम्पन्न ब्राह्मणके जो पुत्र होता
है, वह श्री, यश और ब्रह्मतेजके द्वारा सर्वोच्च स्थितिको प्राप्त
कर लेता है ॥ १-२८॥
पञ्चम ब्राह्मण
समस्त प्रवचनकी परम्पराका वर्णन
अब वंश (परम्परा) का वर्णन किया जाता है—पौतिमापी-
पुत्रने कात्यायनीपुत्रसे, कात्यायनीपुत्रने गौतमीपुत्रसे, गौतमी-
पुत्रने भारद्वाजीपुत्रसे, भारद्वाजीपुत्रने पाराशरीपुत्रसे, पाराशरी-
पुत्रने औपस्वस्तीपुत्रसे, औपस्वस्तीपुत्रने पाराशरीपुत्रसे,
पाराशरीपुत्रने कात्यायनीपुत्रसे, कात्यायनीपुत्रने कौशिकीपुत्रसे,
कौशिकीपुत्रने आलम्बीपुत्रसे और वैयाघ्रपदीपुत्रसे, वैयाघ्रपदी-
पुत्रने काण्वीपुत्रसे तथा कापीपुत्रसे, कापीपुत्रने आत्रेयीपुत्रसे,
आत्रेयीपुत्रने गौतमीपुत्रसे, गौतमीपुत्रने भारद्वाजीपुत्रसे,
भारद्वाजीपुत्रने पाराशरीपुत्रसे, पाराशरीपुत्रने वात्सीपुत्रसे, वात्सी-
पुत्रने पाराशरीपुत्रसे, पाराशरीपुत्रने वार्कारुणीपुत्रसे, वार्कारुणी-
पुत्रने वार्कारुणीपुत्रसे, वार्कारुणीपुत्रने आर्त्तभागीपुत्रसे,
आर्त्तभागीपुत्रने शौङ्गीपुत्रसे, शौङ्गीपुत्रने साङ्कतीपुत्रसे, साङ्कती-
पुत्रने आलम्बायनीपुत्रसे, आलम्बायनीपुत्रने आलम्बीपुत्रसे,
आलम्बीपुत्रने जायन्तीपुत्रसे, जायन्तीपुत्रने माण्डूकायनीपुत्रसे,
माण्डूकायनीपुत्रने माण्डूकीपुत्रसे, माण्डूकीपुत्रने शाण्डिलीपुत्रसे,
शाण्डिलीपुत्रने राथीतरीपुत्रसे, राथीतरीपुत्रने भालुकीपुत्रसे,
भालुकीपुत्रने दो कौञ्चिकीपुत्रोंसे, दोनों कौञ्चिकीपुत्रोंने वैदभृती-
पुत्रसे, वैदभृतीपुत्रने काशकेयीपुत्रसे, काशकेयीपुत्रने प्राचीन-
योगीपुत्रसे, प्राचीनयोगीपुत्रने साञ्जीवीपुत्रसे, साञ्जीवीपुत्रने
आसुरिवासी प्राश्नीपुत्रसे, प्राश्नीपुत्रने आसुरायणसे, आसुरायण-
ने आसुरिसे, आसुरिने याज्ञवल्क्यसे, याज्ञवल्क्यने उद्दालक-
से, उद्दालकने अरुणसे, अरुणने उपवेशिसे, उपवेशिने
कुश्रिसे, कुश्रिने वाजश्रवससे, वाजश्रवाने जिह्वावान् बाध्योगसे,
जिह्वावान् बाध्योगने असित वार्षगणसे, असित वार्षगणने हरित
कश्यपसे, हरित कश्यपने शिल्प कश्यपसे, शिल्प कश्यपने कश्यप
५१० * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ ६
नैध्रुविसे, कश्यप नैध्रुविने वाक्से, वाक्ने आम्भिणीसे, आम्भिणी- ने वामकक्षायणसे, वामकक्षायणने शाण्डिल्यसे, शाण्डिल्यने
ने आदित्यसे, आदित्यसे प्राप्त हुई ये शुक्लयजुः श्रुतियाँ वाजसनेय वात्स्यसे, वात्स्यने कुश्रिसे, कुश्रिने यज्ञवचा राजस्तम्बायनसे,
याज्ञवल्क्यद्वारा प्रसिद्ध की गयीं । साञ्जीवी पुत्रपर्यन्त यह यज्ञवचा राजस्तम्बायनने तुर कावषेयसे, तुर कावषेयने प्रजापति-
एक ही वंश है । साञ्जीवीपुत्रने माण्डूकायनिसे, माण्डूकायनि- से और प्रजापतिने ब्रह्मसे । ब्रह्म स्वयम्भू है, स्वयम्भू ब्रह्मको
ने माण्डव्यसे, माण्डव्यने कौत्ससे, कौत्सने माहित्थिस, माहित्थि- नमस्कार है ॥ १-४ ॥
॥ षष्ठ अध्याय समाप्त ॥ ६ ॥
॥ शुक्लयजुर्वेदीय बृहदारण्यकोपनिषद् समाप्त ॥
॥ ॐ तत्सत् ॥
शान्तिपाठ
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
इसका अर्थ ईशावास्योपनिषद्के प्रारम्भमें दिया जा चुका है ।
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
कौषी कि णोपनिषद्
शान्तिपाठ
ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि । वेदस्य म आणिस्थः
श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीतेनाहोरात्रान्सन्दधाम्यृतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु ।
तद्वक्तारमवतु । अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
इसका अर्थ ऐतरेयोपनिषद्के आरम्भमें छप चुका है ।
प्रथम अध्याय
पर्यङ्क-विद्या
गर्गके प्रपौत्र सुप्रसिद्ध महात्मा चित्र यज्ञ करानेवाले थे ।
इसके लिये उन्होंने अरुणके पुत्र उद्दालकको प्रधान ऋत्विक्के
रूपमें वरण किया । परंतु उन प्रसिद्ध उद्दालक मुनिने स्वयं
न पधारकर अपने पुत्र श्वेतकेतुको भेजा और कहा—'वत्स !
तुम जाकर चित्रका यज्ञ कराओ।' श्वेतकेतु यज्ञमें पधारकर
एक ऊँचे आसनपर विराजमान हुए । उन्हें आसनपर बैठे
देख चित्रने पूछा—'गौतम-कुमार ! इस लोकमें कोई ऐसा
आवृत्त (आवरणयुक्त) स्थान है, जिसमें मुझे ले जाकर
रक्खोगे ? अथवा कोई उससे भिन्न—सर्वथा विलक्षण आवरण-
शून्य पद है, जिसे जानकर तुम उसी लोकमें मुझे स्थापित
करोगे ?'
श्वेतकेतुने कहा—'मैं यह सब नहीं जानता । किंतु यह
प्रश्न सुनकर मुझे प्रसन्नता हुई है । मेरे पिता आचार्य हैं—
वे शास्त्रके गूढ अर्थका ज्ञान रखते, दूसरे लोगोंको शास्त्रीय
आचारमें लगाते और स्वय भी शास्त्रके अनुकूल ही आचरण
करते हैं; अतः उन्हींसे यह बात पूछूँगा।' यों कहकर वे
अपने पिता आरुणि (उद्दालक) के पास गये और प्रश्नको
सामने रखते हुए बोले—'पिताजी ! चित्रने इस इस प्रकारसे
मुझसे प्रश्न किया है । सो इसके सम्बन्धमें मैं किस प्रकार
उत्तर दूँ ?' उद्दालकने कहा—'वत्स ! मैं भी इस प्रश्नका
उत्तर नहीं जानता । अब हमलोग महाभाग चित्रकी
यज्ञशालामें ही इस तत्त्वका अध्ययन करके इस विद्याको प्राप्त
करेंगे । जब दूसरे लोग हमें विद्या और धन देते हैं तो
चित्र भी देंगे ही । इसलिये आओ, हम दोनों चित्रके
पास चलें।'
वे प्रसिद्ध आरुणि मुनि हाथमें समिधा ले जिज्ञासुके वेषमें
गर्गके प्रपौत्र चित्रके यहाँ गये । 'मैं विद्या ग्रहण करनेके
लिये तुम्हारे पास आया हूँ' इस भावनाको व्यक्त करते
हुए उन्होंने चित्रके समीप गमन किया । उन्हें इस प्रकार
आया देख चित्रने कहा—'गौतम ! तुम ब्राह्मणोंमें पूजनीय
एव ब्रह्मविद्याके अधिकारी हो; क्योंकि मेरे-जैसे लघु व्यक्तिके
पास आते समय तुम्हारे मनमें अपने बड़प्पनका अभिमान
नहीं हुआ है । इसलिये आओ, तुम्हें निश्चय ही इस पूछे हुए
विषयका स्पष्ट ज्ञान कराऊँगा' ॥ १ ॥
सुप्रसिद्ध यज्ञकर्ता चित्रने इस प्रकार उपदेश आरम्भ
किया—ब्रह्मन् ! जो कोई भी अग्निहोत्रादि सत्कर्मोंका
अनुष्ठान करनेवाले लोग हैं, वे सब के सब जब इस लोकसे
प्रयाण करते हैं तो (क्रमशः धूम, रात्रि, कृष्णपक्ष और
दक्षिणायन आदिके अभिमानी देवताओंके अधिकारमें होते
हुए अन्ततोगत्वा) चन्द्रलोक अर्थात् स्वर्गमें ही जाते हैं ।
उनके प्राणों (इन्द्रियों और प्राणों) से चन्द्रमा शुक्लपक्षमें
पुष्टिको प्राप्त होते हैं । वे (चन्द्रमा) कृष्णपक्षमें उन
स्वर्गवासी जीवोंकी तृप्ति नहीं कर पाते ।
निश्चय ही यह स्वर्गलोकका द्वार है, जो कि
चन्द्रमाके नामसे प्रसिद्ध है । जो अधिकारी ( दैवी-
सम्पत्तिसे युक्त होनेके कारण ) उस स्वर्गरूपी चन्द्रमाका
प्रत्याख्यान कर देता है अर्थात् जहाँसे पुनः नीचे गिरना
पड़ता है, ऐसा स्वर्गलोक मुझे नहीं चाहिये—इस प्रकार दृढ़
निश्चय करके जो निष्काम धर्मका अनुष्ठान करते हुए
चन्द्रलोकको त्याग देता है, उस पुरुषको उसका वह शुभ
संकल्प चन्द्रलोकसे भी ऊपर नित्य ब्रह्मलोकमे पहुँचा देता है ।
परंतु जो स्वर्गीय सुखके प्रति ही आसक्त होनेके कारण उस
चन्द्रलोकको अस्वीकार नहीं करता, उस सकामकर्मी स्वर्गवासी-
को, उसके पुण्य भोगकी समाप्ति होनेपर, देववर्ग वृष्टिके रूपमें
परिणत करके इस लोकमें ही पुनः बरसा देता है।
वह वर्षाके रूपमें यहाँ आया हुआ अनुशयी जीव अपनी
पूर्व-वासनाके अनुसार कीट अथवा पतङ्ग या पक्षी, अथवा
व्याघ्र या सिंह अथवा मछली, या साँप-बिच्छू अथवा मनुष्य या
दूसरा कोई जीव होकर इनके अनुकूल शरीरोंमें अपने कर्म
और विद्या—उपासनाके अनुसार जहाँ-कहाँ उत्पन्न होता है।
( इस प्रकार संसारकी स्वर्ग-नरकरूपा दुर्गतिको समझ-
कर जो उससे विरक्त हो चुका है और ज्ञानोपदेशके लिये
गुरुदेवकी शरणमें आया है ) उस अपने समीप आये हुए
शिष्यसे दयालु एवं तत्त्वज्ञ गुरु इस प्रकार पूछे—'वत्स ! तुम
कौन हो ?' गुरुके इस प्रकार प्रश्न करनेपर शिष्य ( अपनेको
देहादि-सङ्घातरूप मानकर ) यों उत्तर दे—'हे देवगण ! जो
पञ्चदशकलात्मक—शुक्ल और कृष्णपक्षके हेतुभूत, श्रद्धाद्वारा
प्रकट, पितृलोकरूप स्वरूप एवं नाना प्रकारके भोग प्रदान करनेमें
समर्थ है, उन चन्द्रमाके निकटसे प्रादुर्भूत होकर पुरुषरूप
अग्निमें स्थापित हुआ जो श्रद्धा, सोम, वृष्टि और अन्नका परिणाम-
भूत वीर्य है, उस वीर्यके ही रूपमें स्थित हुए मुझ अनुशयी
जीवको तुमने वीर्याधान करनेवाले पुरुषमें प्रेरित किया ।
तत्पश्चात् गर्भाधान करनेवाले पुरुष (पिता) के द्वारा तुमने मुझे
माताके गर्भमें भी स्थापित करवाया । कुछ सम्वत्सरोंतक जीवन
धारण करनेवाले पिताके साथ मैं एकताको प्राप्त हुआ था । मैं
स्वयं भी कुछ सम्वत्सरोंतक ही जीवन धारण करनेवाला होकर
ब्रह्मज्ञान अथवा उसके विपरीत मिथ्याज्ञानके निमित्त योनिविशेष-
में शरीर धारण करके स्थित हूँ। इसलिये अब मुझे अमृतत्वकी
प्राप्तिके साधनभूत ब्रह्मज्ञानके लिये अनेक ऋतुओं ( वर्षों ) तक
अक्षय रहनेवाली दीर्घ आयु प्रदान करें—ब्रह्मसाक्षात्कार-
पर्यन्त मेरे दीर्घजीवनके लिये चिरस्थायिनी आयुकी पुष्टि करें।
क्योंकि यह जानकर मैं देवताओंसे प्रार्थना करता हूँ, अतः
उसी सत्यसे, उसी तपस्यासे, जिनका मैं अभी उल्लेख कर
आया हूँ, मैं ऋतु हूँ—संवत्सरादिरूप मरणधर्मा मनुष्य हूँ ।
आर्तव हूँ—ऋतु अर्थात् रज-वीर्यसे उत्पन्न देह हूँ। यदि
ऐसी बात नहीं है तो आप ही कृपापूर्वक बतायें, मैं कौन हूँ ?
क्या जो आप हैं, वही मैं भी हूँ ?' उसके इस प्रकार कहनेपर
संसार-भयसे डरे हुए उस शिष्यको गुरु ब्रह्मविद्याके उपदेश-
द्वारा भवसागरसे पार करके बन्धनमुक्त कर देता है ॥ २ ॥
वह परब्रह्मका उपासक पूर्वोक्त देवयान-मार्गपर पहुँचकर
पहले अग्निलोकमें आता है, फिर वायुलोकमें आता है; वहाँसे
वह सूर्यलोकमें आता है, तदनन्तर वरुणलोकमें आता है;
तत्पश्चात् वह इन्द्रलोकमें आता है, इन्द्रलोकसे प्रजापति-
लोकमें आता है तथा प्रजापतिलोकसे ब्रह्मलोकमें आता है।
इस प्रसिद्ध ब्रह्मलोकके प्रवेश-पथपर पहले 'आर' नामसे प्रसिद्ध
एक महान् जलाशय है। (यह उस मार्गका विघ्न है, काम-
क्रोधादि अरियों—शत्रुओं द्वारा निर्मित होनेसे ही उसका नाम
'आर' पड़ा है ।) उस जलाशयसे आगे मुहूर्ताभिमानी*
देवता हैं, जो काम-क्रोध आदिकी प्रवृत्ति उत्पन्न करके ब्रह्म-
लोक-प्राप्तिके अनुकूल की हुई उपासना और यज्ञ-यागादिके
पुण्यको नष्ट करनेके कारण 'येष्टिहा' कहलाते हैं। उससे आगे
विजरा नदी है, जिसके दर्शनमात्रसे जराव्यवस्था दूर हो जाती
है। (यह नदी उपासनारूपा ही है ।) उससे आगे 'इल्य'
नामक वृक्ष है। 'इला' पृथिवीका नाम है, उसका ही स्वरूप
होनेसे उसका नाम 'इल्य' है। उससे आगे अनेक देवताओं-
द्वारा सेव्यमान उद्यान, बावली, कुएँ, तालाब और नदी
आदि भाँति-भाँतिके जलाशयोंसे युक्त एक नगर है, जिसके
एक ओर तो विरजा नदी है और दूसरी ओर प्रत्यञ्चाके
आकारका ( अर्द्धचन्द्राकार ) एक परकोटा है। उसके आगे
ब्रह्माजीका निवासभूत विशाल मन्दिर है, जो 'अपराजित'
नामसे प्रसिद्ध है। सूर्यके समान तेजोमय होनेके कारण वह
कभी किसीके द्वारा पराजित नहीं होता । मेघ और यज्ञरूपसे
उपलक्षित वायु और आकाशरूप इन्द्र और प्रजापति उस
ब्रह्म-मन्दिरके द्वाररक्षक हैं।
वहाँ 'विभुप्रमित' नामक सभामण्डप है ( जो अहङ्कार-
स्वरूप है )। उसके मध्यभागमें जो वेदी ( चबूतरा ) है, वह
'विचक्षणा' नामसे प्रसिद्ध है। (बुद्धि और महत्तत्त्व आदि
- दो घड़ी ( ४८ मिनट) के कालको मुहूर्त कहते हैं।
† य ईष्टं घ्नन्ति ( जो इष्ट वस्तुकी प्राप्तिमें बाधा पहुँचाते हैं।