कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 547, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ५ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५०९
भी निकाल बाहर करें; और गर्भ निकलनेके समय जो मास-
पेशी बाहर निकला करती है, वह भी निकल जाय।'
पश्चात् पुत्रका जन्म हो जानेपर अभिख्यापन करके पुत्र-
को गोदमें ले और आज्यस्थालीमें दही मिला हुआ घृत रख-
कर उसे थोड़ा-थोड़ा लेकर यह कहता हुआ बार-बार अग्निमें
होम करे कि 'इस अपने घरमें मैं पुत्ररूपसे बढ़कर सहस्रों मनुष्यों-
का पालन करूँ, मेरे इस पुत्रके वंशमें सन्तान लक्ष्मी तथा
पशु-सम्पत्ति लगातार बनी रहे; मुझमें (पितामे) जो प्राण
(इन्द्रियाँ) हैं, वे सभी मन-ही मन मैं तुम्हे (पुत्रको) दे
रहा हूँ; मेरे इस कर्ममें कोई न्यूनाधिकता हो गयी हो तो
विद्वान् एवं वाञ्छापूरक अग्नि उसे पूर्ण कर दें।'
तदनन्तर पिता बालकके दाहिने कानमें अपना मुख
लगाकर 'वाक्, वाक्, वाक्' इस प्रकार तीन बार जप करे ।
तदनन्तर दधि, मधु और घृत मिलाकर पास ही रक्खे हुए
सोनेके पात्रके द्वारा क्रमशः—
'भूस्ते दधामि', 'भुवस्ते दधामि', 'स्वस्ते दधामि',
'भूर्भुवः स्वः सर्वं त्वयि दधामि'
—यों कहकर चार बार उसे चटाये । फिर पिता उस
पुत्रका 'वेदोऽसि' बोलकर 'नामकरण' करे—'वेद' यह नाम
रक्खे । उसका यह नाम अत्यन्त गोपनीय होता है । इसे सर्व-
साधारणमें प्रकट नहीं करना चाहिये । इसके बाद गोदमें स्थित
उस शिशुको माताकी गोदमें रखकर तथा स्तन देकर इस
मन्त्रका पाठ करे—
'यस्ते स्तन शशयो यो मयोभूर्यो रत्नधा वसुविद्यः सुदत्रः ।
येन विश्वा पुष्यसि वीर्याणि सरस्वति तमिह धातवेकः।'
अर्थात् 'हे सरस्वति ! तुम्हारा जो स्तन दूधका अक्षय
भंडार तथा पोषणका आधार है, जो रत्नोंकी खान है तथा
सम्पूर्ण धन-राशिका ज्ञाता एव उदार दानी है, और जिसके
द्वारा तुम समस्त वरणीय पदार्थोंका पोषण करती हो, तुम इस
सत्पुत्रके जीवन धारणार्थ उस स्तनको मेरी भार्यामें प्रविष्ट
करा दो।'
तदनन्तर बालककी माताको इस प्रकार अभिमन्त्रित करे—
उसे सम्बोधन करके कहे, 'तुम ही स्तुतिके योग्य मैत्रा-
वरुणी (अरुन्धती) हो, हे वीरे ! तुमने वीर पुत्रको जन्म
देकर हमे वीरवान्—वीर पुत्रका पिता बनाया है, अतः तुम वीर-
वती होओ। इसे लोग कहें—तू सचमुच अपने पितासे भी आगे
बढ़ गया, तू निस्सन्देह अपने पितामहसे भी श्रेष्ठ निकला।'
इस प्रकारके विशिष्ट ज्ञानसम्पन्न ब्राह्मणके जो पुत्र होता
है, वह श्री, यश और ब्रह्मतेजके द्वारा सर्वोच्च स्थितिको प्राप्त
कर लेता है ॥ १-२८॥
पञ्चम ब्राह्मण
समस्त प्रवचनकी परम्पराका वर्णन
अब वंश (परम्परा) का वर्णन किया जाता है—पौतिमापी-
पुत्रने कात्यायनीपुत्रसे, कात्यायनीपुत्रने गौतमीपुत्रसे, गौतमी-
पुत्रने भारद्वाजीपुत्रसे, भारद्वाजीपुत्रने पाराशरीपुत्रसे, पाराशरी-
पुत्रने औपस्वस्तीपुत्रसे, औपस्वस्तीपुत्रने पाराशरीपुत्रसे,
पाराशरीपुत्रने कात्यायनीपुत्रसे, कात्यायनीपुत्रने कौशिकीपुत्रसे,
कौशिकीपुत्रने आलम्बीपुत्रसे और वैयाघ्रपदीपुत्रसे, वैयाघ्रपदी-
पुत्रने काण्वीपुत्रसे तथा कापीपुत्रसे, कापीपुत्रने आत्रेयीपुत्रसे,
आत्रेयीपुत्रने गौतमीपुत्रसे, गौतमीपुत्रने भारद्वाजीपुत्रसे,
भारद्वाजीपुत्रने पाराशरीपुत्रसे, पाराशरीपुत्रने वात्सीपुत्रसे, वात्सी-
पुत्रने पाराशरीपुत्रसे, पाराशरीपुत्रने वार्कारुणीपुत्रसे, वार्कारुणी-
पुत्रने वार्कारुणीपुत्रसे, वार्कारुणीपुत्रने आर्त्तभागीपुत्रसे,
आर्त्तभागीपुत्रने शौङ्गीपुत्रसे, शौङ्गीपुत्रने साङ्कतीपुत्रसे, साङ्कती-
पुत्रने आलम्बायनीपुत्रसे, आलम्बायनीपुत्रने आलम्बीपुत्रसे,
आलम्बीपुत्रने जायन्तीपुत्रसे, जायन्तीपुत्रने माण्डूकायनीपुत्रसे,
माण्डूकायनीपुत्रने माण्डूकीपुत्रसे, माण्डूकीपुत्रने शाण्डिलीपुत्रसे,
शाण्डिलीपुत्रने राथीतरीपुत्रसे, राथीतरीपुत्रने भालुकीपुत्रसे,
भालुकीपुत्रने दो कौञ्चिकीपुत्रोंसे, दोनों कौञ्चिकीपुत्रोंने वैदभृती-
पुत्रसे, वैदभृतीपुत्रने काशकेयीपुत्रसे, काशकेयीपुत्रने प्राचीन-
योगीपुत्रसे, प्राचीनयोगीपुत्रने साञ्जीवीपुत्रसे, साञ्जीवीपुत्रने
आसुरिवासी प्राश्नीपुत्रसे, प्राश्नीपुत्रने आसुरायणसे, आसुरायण-
ने आसुरिसे, आसुरिने याज्ञवल्क्यसे, याज्ञवल्क्यने उद्दालक-
से, उद्दालकने अरुणसे, अरुणने उपवेशिसे, उपवेशिने
कुश्रिसे, कुश्रिने वाजश्रवससे, वाजश्रवाने जिह्वावान् बाध्योगसे,
जिह्वावान् बाध्योगने असित वार्षगणसे, असित वार्षगणने हरित
कश्यपसे, हरित कश्यपने शिल्प कश्यपसे, शिल्प कश्यपने कश्यप