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सर्वकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 548, कुल 832 में से

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पृष्ठ 548

५१० * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ ६
नैध्रुविसे, कश्यप नैध्रुविने वाक्से, वाक्ने आम्भिणीसे, आम्भिणी- ने वामकक्षायणसे, वामकक्षायणने शाण्डिल्यसे, शाण्डिल्यने
ने आदित्यसे, आदित्यसे प्राप्त हुई ये शुक्लयजुः श्रुतियाँ वाजसनेय वात्स्यसे, वात्स्यने कुश्रिसे, कुश्रिने यज्ञवचा राजस्तम्बायनसे,
याज्ञवल्क्यद्वारा प्रसिद्ध की गयीं । साञ्जीवी पुत्रपर्यन्त यह यज्ञवचा राजस्तम्बायनने तुर कावषेयसे, तुर कावषेयने प्रजापति-
एक ही वंश है । साञ्जीवीपुत्रने माण्डूकायनिसे, माण्डूकायनि- से और प्रजापतिने ब्रह्मसे । ब्रह्म स्वयम्भू है, स्वयम्भू ब्रह्मको
ने माण्डव्यसे, माण्डव्यने कौत्ससे, कौत्सने माहित्थिस, माहित्थि- नमस्कार है ॥ १-४ ॥
॥ षष्ठ अध्याय समाप्त ॥ ६ ॥
॥ शुक्लयजुर्वेदीय बृहदारण्यकोपनिषद् समाप्त ॥
॥ ॐ तत्सत् ॥
शान्तिपाठ
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
इसका अर्थ ईशावास्योपनिषद्के प्रारम्भमें दिया जा चुका है ।