कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
(५४)
कबीरपंथी—
अमरी मूलसन्धि मिलाव । जापर रखो बाँयाँ पांव ॥ दहिना मध्यमें धरना । आसन अमर यों करना ॥ द्वादश पवन भर पीजे । शशिघर उलट चढ़लीजे ॥ तन मन वारना कीजे । उलट निज नामरस पीजे ॥ तन मन सहित राखो श्वास ॥ इस बिध करो बेहद बास ॥ दोनों नैन के कँर बान । भौरा उलटि कस कमान ॥ परबत छके दरिया जान । करले तिरकुटी अस्नान ॥ सहज परस पद निर्बान । तेरा मिटे आवाजान ॥ जा में गैव का बाजार । सरबर दोह दीसे पार ॥ जा बिच खड़ीकुदरत झार । शोभा कोटि अगम अपार ॥ लागे नौलख तारा फूल । करनी कोटि जरिया मूल ॥ ताको देखना मत भूल । रमता राम आप रमूल ॥ माया भरम की कांची । देखु दिल अन्दरकी सांची ॥ वरषे तूर बिन मोती । चन्दा सूर की जोती ॥ झलके झिलमिला नारी । ताबिच अरूप है कयारी मानो प्रेम की झारी । खुलगई अगम किंवारी ॥ बेडा भरम का खोया । दीपक नामका जोया ॥ जोगी जुगतसे जीवे । प्याला प्रेम का पीवे ॥ मौला पीव को दीजे । तनमनकुरखान करलीजे ॥ परी है प्रेम की फांसी । मनुवां गगनका बासी ॥ बाजे बिना तन्ती तूर । सहजे ऊगे पछिम सूर ॥ भौरा सुगंध का प्यासा । किया है कमलमें बासा ॥ रमता हंस है राजा । सहजे पलक आवाजा ॥ सुन्दर श्याम घन लाया । बादल गगनमें छाया ॥ अमृत बूंद झर लाया । देखि दोह नैन ललचाया ॥ अजब दीदार को पाया । दरिया सहजमें नहाया । दरिया उलट उमगे नीर । ता बिच चले चौसठ छोर ॥ हंसा आन बैठे तीर । सहज जुगे मुक्ता हीर ॥ मिला है प्रेम का प्यारा ॥ नहीं है नैन सों न्यारा ॥ जीवनमृत न व्यापेकाला । जो त्रिकुटीसे पलक न
शब्दावली
(५५)
टाला ॥ पल जब पीव से लाग। धोखा तब दिलों का भागा ॥
चेतावनी चित विलास । जबलग रहे पिंजर श्वास ॥ सोहंशब्द
अजपाजाप । साहब कवीरसो आपहिंआप ॥
साखी ।
चेतावनि चितलागि रहे, यह गति लखै न कोय । अगम
पन्थ के महल में, अनहद बानी होय ॥ नाम नैन में रमि रहा,
जाने बिरला कोय । जाको सतगुरु मीलिया, ताको मालुम
होय ॥ झण्डा रोपा गैब का, दोय परवत के सन्ध । साधु पहि-
चाने शब्द को, दृष्टि कमल कर बन्ध ॥ झलके जोती झिल-
मिला, बिन बाती विन तेल ॥ चहुँदिशि सूरज ऊगिया, ऐसा
अदभुत खेल ॥ जागृत रूपी रहत है, सतमत गहिर गंभीर ।
अजरनाम बिनसे नहीं, सोऽहं सत्य कवीर ॥
॥ इति चेतावनी ॥
ज्ञानगुदरी ।
अलखपुरुष जब किया बिचारा । लख चौरासीधागा डारा ॥
पांच पत्तव की गुदरी बीनी । तीन गुणनसे ठाढी कीनी ॥ ता में
जीव ब्रह्म औ माया । समरथ ऐसा खेल बनाया ॥ सीवन पांच
पचीसो लागे । काम क्रोध मोह मद पागे ॥ काया गुदरी का
बिस्तारा । देखो सन्तो अमर सिंगरा ॥ चांद सूर दोह पैवैंद
लागे । गुरु प्रताप से सोवत जागे ॥ शब्दकी सुई सुरतिकाडोरा ।
ज्ञानके टोभन सिरजनडोरा ॥ अबगुदरीकी करु हुशियारी । दाग
न लागे देखुबिचारी ॥ सुमतकी साबुन सिरजनधोई । कुमत
मैलको डारो खोई ॥ जिनगुदरीका कियाविचारा ॥ सोजन भेटे
सिरजन हारा ॥ धीरजधुनीध्यान धर आसन । सतकी कोपीनसहज
सिंगासन ॥ जुगतकमंडल कर गहि लीन्हा । प्रेम पावडी मुरशद
(५६)
कवीरपंथो-
चीन्हा ॥ सेलीशील बिबेककी माला । दयाकी टोपी तनधर्म-
शाला ॥ मिहर मंतंगा मन वैशाखी । मृगछाला मनहीको राखी॥
निहचे धोती पवन जनेउ । अजपा जपे सो जाने भेऊ ॥ रहे
निग्नतर सतगुरु दाया । साधु सँगतकर सबकछु पाया ॥ लौकी
लकुटी हिरदया झोरी । क्षमा खड़ाऊँ पहिर बहोरी ॥ मुक्ति
मेखला सुकृत सुमिरनी । प्रेम पियाला पीवे मौनी ॥ उदास
कूबरी कलह निवारी । ममता कुत्तीको ललकारी ॥ जुगतजंजी-
रवांथजब लीन्हा । अगम अगोचरखिरकी चीन्हा ॥ विराग-
त्याग बिज्ञान निधाना । तत्ततिलकदीन्होनिरबाना ॥ गुरुगम
चकमकमनसमतूला । ब्रह्म अगिनपरगटकरमूला ॥ संशय शोक
सकल भ्रम जारा । पांच पचीसो परगटमारा ॥ दिलका दरपन
दुबिधा खोई । सो बैरागी पक्का होई ॥ शून्य महल में फेरीदेई।
अमृतरसकी भिच्छा लेई ॥ दुखसुख मेला जगका भाऊ । तिर-
बेनीके घाट नहाऊँ ॥ तनमनशोधि भयाजेहि ज्ञाना । सोलखि
पावे पद निर्बाना ॥ अष्ट कमलदल चक्रर सोधे । जोगी आप
आपमें बोधे ॥ ईगला पिगलाके घर जाई । सुषमन नीर रहा
ठहराई ॥ वोह सोह तत्त्व बिचारा । बंकनालमें किया सँभारा ॥
मनको मार गगन चढिजाई । मानसरोवर पैठि नहाई ॥ अनह-
दनाद नामका पूजा । ब्रह्म बैराग देव नहि दूजा ॥ छुटगइ कश-
मल कर्मजलेखा । यहि नैनन साहबको देखा ॥ अहंकार
अभिमान बिडारा । घटका चौकाकर उजियारा ॥ चितकर
चंदन मनसा फूला । हितकर संपुट करले मूला ॥ शरधा चैवर
प्रीति कर धूपा । नौतम नाम साहबका रूपा ॥ गुदरी पहिरे
आप अलेखा । जिन यह प्रगट चलाई भेखा ॥ साहबकवीरब
स्निशजबदीन्हा । सुरनरमुनिसबगुदरी लीन्हा ॥ ज्ञानगूदरी पठे-
शब्दावली
(५७)
प्रभाता । जनम २ के पातक जाता ॥ ज्ञानगुदरी पढे मध्याना
सो लखि पावे पद निर्वाना ॥ संज्ञा सुमिरण जो नर करई । जरा
मरण भौसागर तरई ॥ कहैं कवीरा सुनो धर्मदासा । ज्ञानगुदरी
करचो प्रगासा ॥
साखी
माला टोपी सुमिरनी, सदगुरु दिया बखशीश । पल २ गुरु
को बंदगी, चरण नवाऊँ शीश ॥ भौ भंजन दुख परिहरन, अम्बर
करन शरीर । आदियुगादि आप हो, चारो युग कव्वीर ॥ बंदी-
छोर कहाइया, बलख शहर मंझार । छूटे बंद सब भेष के, धन
धन कहे संसार ॥
॥ इति श्रीज्ञानगुदरी सम्पूर्णम् ॥
रतनास्तुति
गुरुध्यानसार भजबारबार ।
सब तजबिकार सतनामसार सों कर यारी ॥ जय जय गुरु-
पीरं सत्यकबीरं, अमरशरीरं अधिकारी ॥ निर्गुण निज मूलं
धरि अस्थूलं, काटें शूलं भवभारी ॥ सूरति निज सोहं कलिमल-
खोहं, जन मनमोहं छबिभारी ॥ अम्बरपुरबासी सब सुखरासी,
सदा बिलासी बलिहारी ॥ पीरनके पीरा मतिके धीरा, अलख
फकीरा ब्रह्मचारी ॥ हंसन हितकारी जग पगुधारी, गरभप्रहारी
उपकारी ॥ काशी आये दास कहाये, हंस बचाये प्रणधारी ॥
रामानंदस्वामी अन्तर्यामी, हैं वड़नामी संसारी ॥ उनको गुरु-
कीन्हा मतबुधलीन्हा, उनहुन चीन्हा करतारी ॥ ब्राह्मणसन्यासी
कीन्हीहांसी, तब अविनाशी पगुधारी ॥ मगहर स्थाना किया
पयाना, दे परवाना जन तारी ॥ तहैं बलबीरा तजे शरीरा,
(५८)
कवीरपंथी-
काटन पीरा भव भारी ॥ बिरसिघदेवराजा, सुनबलगाजा सबदल
साजा संभारी ॥ उत्त पीर पठाना है बलवाना, लाय कमाना कर
डारी ॥ सनमुख नियराना छूटे बाना, भै घमसाना रण भारी ॥ तब
गुरुज्ञानी मनकी जानी, अधरहिं बानी उच्चारी ॥ खोलोपरदा है
नहिं सुरदा, जूझ अवस्था करडारी ॥ सुनिके यह बानी अचर
जमानी, देख निशानी सिरमारी ॥ रोये परवीना हम मतिहीना,
तुमहिं न चीन्हा करतारी ॥ मगहर तजि बासा किया प्रकाशा,
जहँ धर्मदासा ब्रतधारी ॥ तिनको शिष कीन्हा सर्वस दोन्हा,
दुख हरलीन्हा यमभारी ॥ सतपन्थ चलाये भ्रम मिटाये, शब्द
दिढाये संसारी ॥ रतनाजन तेरो करत निहेरो, हमतन हेरो
बलिहारी ॥
अष्टक ।
साहब गुरुज्ञानी समरथध्यानी, अचल स्थानीस्थीरं ॥ अवि-
गतवानी मुक्तिनिशानी, जगमें आनी कब्बीरं ॥ शीशबिराजे
तिलक अखण्डित, मुख सतसुकृत गम्भीरं ॥ ज्ञान प्रचण्डित
पाखंड खण्डित, समता मंडित कब्बीरं ॥ भेष रिसाला श्रवनी
माला, प्रेम उजाला किर्पा गहिरं ॥ दीनदयालं जन प्रतिपालं,
सदा कृपालं कब्बीरं ॥ संकट टारन कष्ट निवारन, शीश विदा-
रन यम थीरं ॥ हंस उबारन जिव निस्तारन, भर्म विदारन
कब्बीरं ॥ सतयुग, त्रेता, द्वापर बीता, रमता तीता पर पीरं ॥
कलयुग कीता सबसों जीता, परम पुनीत कब्बीरं ॥ काशी छोड़
उडीसा आये, आसा गाडे सिन्ध तीरं ॥ ठाकुर पंडो गर्ब बिहंडो,
पाखंड खंडो कब्बीरं ॥ पुरुष विदेही अविचल देही, नाम सनेही
मन थीरं ॥ जो जन जाने भेटे तेही, दर्शन दे गुरु कब्बीरं ॥
कवीरं अष्टक टारन कष्टक, भौजल नष्टक कर थीरं ॥ धर्मनि-
दासं नित अभ्यासं, प्राप्त तासं कब्बीरं ॥
शब्दावली
(५९)
स्मृति ।
गुरु दुखित तुम विन रटत द्वारे, प्रगट दर्शन दीजिये ॥
गुरुसामियांसुनु विनतिमोरी, बलिजाउँ बिलंब न कीजिये ॥ गुरु
नैन भरभर रहत हेरो, निमिख नेह न छाडिये ॥ गुरु बाँह दीजे
बन्दछोर, सो अबकी बन्द छुड़ाइये ॥
विविध विधि तन भयेउ व्याकुल, विन देखे अब नारहों ॥ तपत
तनमन उठत ज्वाला, कठिन दुख कैसे सहों ॥ गुन औगुम अप-
राध छमाकरि, अब न पतित विसारिये ॥ यह विनती धर्मदास
जनकी, सतपुरुष अवमानिये ॥
विनय ।
दरस दीजै गुरु परम स्नेही । तुम विनु दुख पावे मोर देही ॥
अन्न न भावै नींद नहिं आवै । बारबार मोहि विरह सतावै ॥
घर आंगनमोहि कछु न सुहावै । वज्र भयो यहविरह नजावै ॥
नैनानीर बहे जलधारा । निसिदिन पंथ निहारुं तुम्हारा ॥ जैसे
निजधन जातहिराई । ऐसे तुम विनु कछु न सुहाई ॥ जैसे मनि
विनु फानि बेकरारा । ऐसे तुम विनु हाल हमारा ॥ हे कर्ता तुम
अपरम्पारा । केहि कारन गुरु मोहि विसारा ॥ जैसे मीन मरे
विनु नीरा । ऐसे तुम विनु दुखित शरीरा ॥ छन्द ॥ दुखित
तुम विनु रटत द्वार, प्रगट दर्शन दीजिये ॥ विनति सुनु स्वामिया
वलि जावैं विलंब न कीजिये ॥ विविध विधि हम भय हैं व्या-
कुल, विनदेखे जिव ना रहै ॥ तपत तन मन उठत ज्वाला, कठिन
दुख अब को सहे ॥ गुन औगुन अपराध छिमाकरि औगुन कछु
न विचारिये ॥ पतित पावन राखलाज, अब न पतित विसारिये ॥
वंदीछोर अब बाँह दीजे, अब की बन्द छुड़ाइये ॥ नैन भरि
भरि रहैं निरखत, निमिख नेह न तोरिये ॥ दासधर्मनि करत
(६०)
कवीरपंथी—
विन्ती महापुरुष गुरु मानिये ॥ दया कीजे दरस दीजे अपनो
कर जानिये ॥
स्तोत्र (विदेहं स्वरूप)
नमोशब्दरूपी सो है जत्तकरता । दयापालस्वामी सबैकष्ट
हरता ॥ विशालं कृपालं धनी अन्तर््यामी विदेहं स्वरूपं कवीरं
नमामी ॥ अखंडं अकर्म अनिच्छा अदेही । जपैशेषजाको लहै-
नाहि तेही ॥ लगी शंभुतारी गहो अर्धनामी । विदेहं सरूपं कवीरं-
नमामी ॥ तकोजीवशरनासो भवसिधुतरना । अघै खान टरना
गहो बेग चरना ॥ अभय रूपजाको महापरमधामी । विदेहं
स्वरूपं कवीरंनमामी जहां जिव पुकारे तहांको सिधारे । भये
दीन जेते सो तेते उबारे ॥ लखै कौन जाको अनामीसनामी ।
विदेहंसरूपं कवीरंननामी । परे सिधुभारे सो साहब पुकारे । करी
आय रक्षा सु ताको उबारे ॥ अभयमुक्तिदाता मिलेआय स्वामी ।
विदेहंसरूपं कवीरं नमामी ॥ तुही सृष्टिकरता तुही आप हरता ।
तुही सोखसिधू तुही फेर भरता ॥ तुहा सर्व कामी तुही है अकमी ।
विदेहं सरूपं कवीरं नमामी ॥ तुही बीनबीनानबीना बजावै ।
तुही आप रीझे तुही आप गावै । भये दीन डोलै मोहे ऐस कामी ।
विदेहं सरूपं कवीरं नमामी ॥ तुही रामरावन तुही कंसकृष्णा ।
तुही ब्रह्मरुद्रा तुही देव विष्णा । तुही शेष ब्रह्मा तुही भूमि थामी ।
विदेहं सरूपं कवीरं नमामी ॥ तुही सर्वजीवनके रक्षकारी । तुही
चारखानी सो बानी सुधारी ॥ तुही आप जीवन दे सत्यनामी ।
विदेहं सरूपं कवीरं नमामी ॥ तुही आप खैलै खेलावे अकेला ।
तुही आप स्वामी तुही आप चेला ॥ तुही खेत भागे लडे धार
सामी । विदेहं सरूपं कवीरं नमानी ॥ उभय मेषधारी धरै मेष
भारी । तुही भोग भोगी तुही ब्रह्म चारी ॥ कहे को कहाँलों
शब्दावली
(६१)
अपारं अनामी ॥ विदेहं सहरूपं कवीरं नमामी । दर्दं काल पीरा
जबै जिव सताये । लिये नाम लाहा जोलाहा हो आये ॥ लखोरे
लखोरे कृपासिंधु स्वामी । विदेहं सहरूपं कवीरं नमामी ॥ अघै-
खान जेते कियो हानि तेते । गहो सत्यपंथे उहै संत हेते ॥ बसो
देश जाको जहां है अरामी ॥ विदेहं सहरूपं कवीरं नमामी ॥ जपो
नाम नीको सदा ये कवीरं । मिले लोक बासा हरे काल पीरं ॥
अभीरं अपीरं सो है तासु नामी । विदेहं सहरूपं कवीरं नमामी ॥
हरे मत्त मंदा करै सो अनंदा ॥ उबारो उबारो महाकाल फंदा ॥
अभय बास जाको सो है अंतर््यामी । विदेहं सहरूपं कवीरं नमामी ॥
कवीर अष्टक जो पढै औ पढावै । महाप्रेमबानी सुनै औ सुनावै ॥
कहे दीनबंदा सो फंदा न आनी । विदेहं सहरूपं कवीरं नमामी ॥
स्तोत्र (जय जय कबीर) कवित्त
जय जय कबीर धीर, हरन सकल काल पीर, निर्गुण अवि-
नाशी, ब्रह्म शब्दरूप साई ॥ चर अचर भूत ब्याल, व्योम मृत्यु
औ पताल, सुर नर मुनि यक्ष गंधर्व, सकल में समाई ॥ अम-
रलोक के निवास, पुढूप दीप को सुवास, शब्द कोट अति
हुलास, विविधविध बनाई ॥ जहां हंसन को निवास, षोडश
रविको प्रकास, अमृतफल चुगे सुपास, सर्व श्रुथा जाई ॥ जग
मगात हंस अंग, शब्द को भयो प्रसंग, अकह वृक्ष साई संग,
सुराजत समुदाई ॥ बंदीछोर प्रभु दयाल, भंजन भवसिंधु जाल,
सतगुरु साहब कृपाल, सुमिरत अघ जाई ॥ जहां सदगुरुको
निवास, कोटिन शाश्विको प्रकास, छाड़ लोक हंस पास, भौजल
में आई ॥ कठिन काल को संहार, लीन्हो हंसन उबार, कीन्हो
भवसिंधु पार, सकल भ्रम मिटाई ॥ माया मद मोह हरन, काम
क्रोध गर्भ दलन, चिन्तामणि हंस रमन, संतन सुखदाई ॥ जे
(६२)
कवीरपंथी—
नर भये भक्तिहीन, सो भये यम के अधीन, अटके भवसिंध तिन,
नहीं पार पाई ॥ जो नरगुरुशरण आय, लीन्हो तिनको बचाय,
कालजाल सों छुडाय, अमर घर पठाई ॥ निरंजन निरकार,
ब्रह्मा विष्णु शिव विचार, आदिशक्ति मायाजार, नहीं पार पाई॥
निगम वेद कर पुकार, तेहू नहीं पाये पार, गुरु कवीर शरन
अपार, सुमिरत अघ जाई ॥
अथ नामाजीकृत छ'प्यय ॥
अनन्त कोट निज भक्त हैं, तामें एक करोर बिचारी । ताहू
में ते चुनलिये, लाखलख नेजा धारी ॥ तामें समरथ एक सहस
सहस में सौ अधिकारी ॥ पचास भक्त प्रसिद्ध, पचीस परम
उजागर । द्वादश भक्त प्रधान, षट रस गुन के आगर ॥ चतुर
नाम गोविन्द वपु, उभय भक्त तारन तरन । तामें मुख्य कवीर
हैं, ता पद रज नाभा शरन ॥१॥ गिरा गंग अनुहार, चाल
सनकादिक जैसे । ज्ञान मुनि शुक्रदेव, ध्यान शिव शंकर तैसे॥
जती ज्यों गोख सती, हरिचन्द बखानो । प्रतिज्ञा प्रह्लाद,
सांख्यमें कपिले जानो ॥ हेम जेम शीतल सदा, परकाशी
दिवाकर मानो । कवीर सदा गंभीर हैं, निज अविनाशी जानो॥
कर कलजुग ऊपर कट करी सो संत फौज नींकाचढ़ी ।
नाम महानिज मंत्र नामहि सेवा पूजा । जपतप तीरथ नाम
नाम विनु और न दूजा ॥ नाम प्रीति नाम बैर नाम कहि नामी
बोले ॥ नाम अजामिल साख नाम बन्धनते खोले ॥ नाम
अधिक रघुनाथ ते, रामनिकट हनुमत कह्यो । कवीर कृपाते
१ यद्यपि आजकलके छपे हुवे जितने नामाजीकृत मन्त्रमाल हैं उनमें “कवीर कानि राखी नहीं
वरण क,अम षट दर्शनी” के सिवाय इस प्रकार बाणी नहीं मिलती है तथापि कवीरपंथियोंके यहां इसी
रूपमें बहुत दिनोंसे प्रचलित है, और प्रायः कवीरपंथी इसे नित्य पाठमें गाया करते हैं । इस लिये यहां दिया
गया है ।
‘श्रीयुगलानन्द बिहारी’
शब्दावली
(६३)
परमतत्त्व पदुमनाभ, परिचय लह्यो ॥ ३ ॥ नौ करोर प्रह्लाद
अष्टध्रुव लक्षमन हनुमाना । मोरध्वज हरिचन्द, सातले संत-
स्याना ॥ रुक्मांगद अम्बरीष पंच, निज पहुँचे दासा । दौय
अर्जुन गंगदेव, दौय वृजमंडल वासा ॥ तैतीस कोट तिहु जुगमें
हरि सेवत निरभय भयो । कलियुग नाम कवीर हैं, अनन्त
कोट जिवले निस्तन्यो ॥ ४ ॥
छप्पय (भक्तमालका)
कबीर कानि राखी नहीं, वरन आश्रम षट दर्शनी ॥ भक्ति
विखुरख जो धर्म सब, अधर्म करि गायो । जोग जग्य व्रतदान,
भजन विनु तुच्छ दिखायो ॥ हिंदू तुरुक प्रमान, रमैनी शब्दे
साखी । पक्षपात नहीं करी, सबनके हितकी भाखी ॥ आरुठ
दशा होय जगतमें, मुख देखी नाहि न भनी । कबीरकानराखी
नहीं, वरन आश्रम षट दर्शनी ॥५॥ राखी नहीं जगतकी, भाखी
सत्य कबीर । देदे शब्द निराटका, तोरे भ्रम जंजीर ॥ बानी
अरबो खरब है, ग्रन्थां कोटि हजार । करता पुरुष कबीर है,
नाभा किया विचार ॥ ६ ॥
इति छप्पय
(सूचना—यहांतक तो नाभाजीके नामसे है जिसमेंसे केवल
एक छप्पय “कबीर कानि राखी नहीं” वाला शुद्धभी है और
भक्तमालमें पाया भी जाता है । शेष छन्दोभंग आदि अशुद्धि-
योंसे ऐसा पूर्ण है कि, इसे इस रूपमें नाभाजीकी कविता कहना
महा अन्याय होगा । यह तो यह इन्हीं छप्पयोंके आगे एक
दोहा है—
जनक विदेही नानका, ऊधो स्याम शरीर । वालमीक तुलसी
भये, शुक्रदेव भये कवीर ॥
नोट—३२ पेजमें, नाभाजीकृत छप्पय में ‘अधिकारी’ के आगे एक चरण ग्रन्थ पात है.
( ६४ )
कवीरपंथी-
विचार-पाठक ! इन छप्पयोंसे देखिये जिनमें कवीर साहब-को किन किनकी ऊपमा दी गयी है । अस्तु उन्हें रहने दीजिये वे तो उपमा मात्र हैं, अंतिम साखी को देखिये-इसमें कवीर साहबको शुक्रदेवका अवतार बतलाया गया है, अब विचारिये कवीर साहबका यह वचन—"अमर लोकसे हम चलि आये, आये जगत मझौराहो" कहाँ-यह बात । तिसपरभी ऐसीही बातोंसे भरी पुस्तकको लोगोंने "सद्गुरु कवीर साहब कृत" छापकर पब्लिकको धोकामें डाला है और कवीर साहबके नाम पर धब्बा लगाया है । इस विषयमें विशेष किसीको जानना हो तो वह, कवीर चन्द्रोदयमें छपे "निष्कलंकमें कलंक" नामक लेखको पढकर खातरी कर सकते हैं ! यहाँ विशेष लिखनेका अवकाश नहीं हैं । और मैंने इसमें इन वाणियोंको कवीरपंथियों-को सचेत करनेके लिये रक्खा है ॥ ]
॥ स्तोत्र अष्टक ॥
( मंगल रूप अनूपम् पूरण )
मंगल रूप अनूपम् पूरण, नाम कवीर सो आप उदारा । मो पर दृष्टिदया करि हेरहु, हौ अति बालक दास तुम्हारा ॥ काम अपार महा बल भारत, देखतही मम चित्त डरावे । कीजे कृपा उर अन्तर्यामिसु, संकटसे बहु जीव दुखावे ॥ १ ॥ लोभ महा मद क्रोध उपावत, होत अधीर बहु चितमेरो । मोह गया ममता रजनीवत, बारम्बार रहे नित घेरो ॥ एक उपाय यही बचवे अब, होहु दयाल दया करि हेरो । कहा कहौं कछु आपछिपेन्हि, हौ प्रभुनाथ अनाथन केरो ॥ २ ॥ मो कहैं तात तुही पितु मातु सु, और उपाय नहीं कछु मोहीं । जो सुत मातु पिता ढिगआवत,
शब्दावली
( ६५ )
तौ वहि मातुलु दृष्टिन जोई । तौपुनि लोटत पोटत अंग में, तब
लेत उठाय दया करि ओही । हे गुरु देव कवीर कृपाल त्यों,
है इक आश शरनागत तोही ॥ ३ ॥ दासको संकट देखि दया-
निधि, हो करुणा करि आतुर धायो । इन्दुमती जब टेरे कियो
प्रभु, जाय तहाँ वहि पीर भिटायो । बांधत सेत सहाय कियो
प्रभु, रामहु केर उपाय बनायो । कौन सु संकट मोहि गरीबको,
जो तुमसे नहिं जात छुडायो ॥ ४ ॥ जाय पुरी पुरुषोत्तम के
प्रभु, देकर दण्ड ससुद्र हटायो । विघ्नको अभिमान महाप्रभु,
तोडनको बहुरूप दिखायो । अभय दीन पडचो चरणों जब,
चारिउ जात सो एक मिलायो । दास जहाँ जहाँ कोऊ टेरत,
ताकहँ होहु तुम वेगि सहायो ॥ ५ ॥ मो कह काहि विभारत
समर्थ, दीन दयाल कवीर उदारा । आनन्द आप अजीत
गुसाईं सु, मोहमया सबते प्रभु पारा ॥ साक्षि सरूप अन्नपम
शोभित, पारवरूप अकार तुम्हारा । मैं अति दीन अधीन दुखी
बहु, मेटहु मोर अघोर अंधारा ॥ ६ ॥ यह वर मांगहुँ देहु दया
करि, अन्तर्यामीसु ज्ञान परकासा । बोध सरूप सदा निरनय
गुरु, मममें तुम होहु उजासा ॥ वेद कुरान पुरान जु गावहिं,
पार न पावहिं होहिं उदासा । जापर मौज करौ तुम साहब, सो
पुनि हंस मिले तुम पासा ॥ ७ ॥ ये गुरु अष्टक पाठ करे नर,
आप सुने अरु ध्यान धरेंगे । होय शरधा अति प्रेमउ पावत,
मारग चाल सुचाल चलेंगे ॥ ते नर पावहिं सुक्ति पदार्थ,
पाखंड रूप विकार तजैंगे । होहिं सुखी लहि आनन्दको पद,
सो भवसागर पार तरैंगे ॥ ८ ॥
कविता--
अजर अखण्ड रूप मरम परकाशी देखों, सुरसे उजासी देखों
कवीरपंथी शब्दावली ३
(६६)
कबीरपंथी—
अतिहीं सुहायो है । ब्रह्म जगत भरम मेंटे, झाई सन्धि काल नाशे, संशय सब चूर करि धूरसे उड़ायो है ॥ वेदहु प्रमाण और वाणीहुके मत जेते, औरहु सिद्धान्त सो तो सर्वहुँ दिखायो है । सर्वहुको जाने सो तो सर्वहुसे न्यारे रहे, सोई गुरु “रूप निज” पारख लखायो है ॥ ९ ॥
साखी—
वारों तनमन धन सबै, पद परखावनहार । जुग अनन्त जो पचिमरै, विन गुरु नहि निस्तार ॥ १ ॥ बन्दनीय गुरु परखको, बारबार कर जोरि । दया करन संशय हरन, संतरूप प्रभु तोरि ॥ २ ॥ बन्दीछोर दयाल प्रभु, विघ्न विनाशक नाम । अशरण शरण बन्दों चरण, सब विधि मंगलधाम ॥३॥ साहब दीन दयाल गुरु, तुम पर और न कोय । शरण आय जमसो बचे, आवा गमन न होय ॥४॥ विनय करौं कर जोरिकै, सुनु गुरु कृपानिधान । सन्तनका सुख दीजिये, दया गरीबीदान ॥५॥ दया गरीबी बन्दगी, जो गुण होय शरीर । अंग व्याधि व्यापे नहीं, सतगुरु मिलहिँ कवीर ॥ ६ ॥ कविर मिले धर्मदासको, लिखि परवाना दीन । आदि अन्तकी वार्ता, शब्दहिँ मैं कहि लीन्ह ॥ ७ ॥ शब्दे मारे गिरपडे, शब्दे छाडे राज । जिन जिन शब्द विवेकिया, तिनका सरिया काज ॥ ८ ॥ शब्द विना सुरति आंधरी, कहो कहो कहाँको जाय । द्वार न पावे शब्दका, फिरि फिरि भटका खाय ॥ ९ ॥
छन्द—
धर्मदास विनय करि, विहंसि गुरु पद कंज गहे । हो प्रभु होहु दयाल, दास चित अतिहिँ दहे ॥ आदिनाम सरूप शोभा, प्रगट भाष सुनाइये । काल दारुण अति भयंकर, कीट भुंग बनाइये ॥ १ ॥ आदि नाम निअच्छर, अखिलपति कारनू ।
शब्दावली
(६७)
सो प्रगटे गुरु रूप, सो हंस उबारन् ॥ सतगुरु चरण सरोज,
जे जन मन ध्यावहीं । जरा मरण दुख नाशि, अचल चर
पावहीं ॥ २ ॥
दया श्रुको ।
अथ संज्ञापाठ ।
गुरुस्तुति (बुद्धान पुत्री)
दोहा-नमो नमो गुरु देवजु, साधु स्वरूपी देव । आदि अंत
गुण कालके, जाननहारे भेव ॥ १ ॥
सोरठा-मेटेउ कालको जाल, ताते गुरु तुव नाम यह । बन्दी-
छोर दयाल, अशरण शरण उदार अति ॥ २ ॥
गुरुशतक सार नाम ॥ बोपाई ।
दीनबंधु करुणामयसागर । हंस उधारण तारण आगर ॥ दीना-
नाथ शरण सुख दाई । अभय तासु पद गुरुसम राई ॥ बन्दीछोर
बिरद अति तासु । हंसरूप परगट जगजासु ॥ अधमउधारण-
तारणस्वामी । परवरदिगार मालिक अनुगामी ॥ काल जालके
मेटनहारे । बिरद लाज राखन पति प्यारे ॥ धीरज दया तत्व
संयुक्ता । राम भूमिका बासक युक्ता ॥ चिंता रहित अर्चित
गोसाई । परमरूप परकाशक साई ॥ अखिल ब्रह्मांडके जानन-
हारे । कर्ता नाम प्रगट विस्तारे ॥ निष्कामी माया परचंडा ।
ताको नासक पूरण ब्रह्मांडा ॥ मंगल रूप गोसाई आपू । जगत
विदित पूरण परितापू ॥ साहेब निर्भय पद दातारा । कर्ता पुरुष
सबनके पारा ॥ महा मोह दलनाशक स्वामी । हंसन नाह अपार
अगामी ॥ आनंद सिंधु अहंतातीता । रामरूपमें परम पुनीता ॥
सत्य यथार्थ अतिप्रिय साधू । मन मायाको मेटेउ व्याधू ॥
पूजनीय अनुमान विनासिक । सत्यसुकृत प्रकाश प्रकाशिक ॥
(६८)
कवीरपंथी—
नाम सुनिंद्र सबन सुखदाई । बारम्बार कहों गोहराई ॥ सत्य-
सिंधुप्रभुदीनदयाला । नाशक अनुमय सहज कृपाला ॥ आपु
जीविनिःकर्मनिधाना । शब्दीअजर अकाल समजाना ॥ साधुरूप
पूर्ण परमाना । गरीब निवाज गहहु गुरुज्ञाना ॥ झाई शब्द
परखावनहारे । तारण तरण बिगत सम्भारे ॥ मन अनुमान
गुमान विनाशक । मोद प्रत्यक्ष दाननिजदासक ॥ वेदकुरान
बुझाय यथारथ । मन क्रम वचन साधुमें स्वारथ । इतिसतनाम-
गुरुगनिआई । सबवृत्तांतगुरुमुखजो बुझाई ॥ साधुगुरु कवीर
गोसाई । बन्दीछोर नाम जपु गाई ॥ ३ ॥
बोहा—
गुरुके अमृत वचन सुनि, शिष्य श्रवण मन देह ॥ झाईसंधि
औ काल गुण, तुरित मिटे नहिं लेह ॥ ४ ॥
छन्द—
तुम होहु जाहि दयाल सकलोजाल ताकर नासि हो ॥ तुम
बिना न मिटि है काल सुकृतपालपरखप्रकाशि हो ॥ का करो मैं
अस्तुतिआजसतगुरु कियो बहुत उपकार हो ॥ तुम बन्दीछोर
कवीर साहेब मेटिया भव भार हो ॥ सब करों निछावर तो परम
गुरु तन मन धन सबसेह हो ॥ मम सुरति राखो चरणमें यह
नाशमान है देह हो ॥ परख पदको पाय साहेब मेटि गयोसब भास
हो ॥ ब्रह्मजगत अनेक बानी रही न काहूकी आस हो ॥ ५ ॥
सोरठा—
शरण ! शरण ! गुरुराय, बहुत सुखी मोको कियो ॥ पूरन
बंदत पाय, सब अपराध छिमा करो ॥ ६ ॥
बोहा—
मैं नालायक प्रश्न कियो, तुम समुझायउ मोहि ॥ मोसे
बोलत ना बन्यो, छिमा करो प्रभु सोहि ॥ ७ ॥
शब्दावली
(६९)
छन्द-समुद्भि देखु चित त्यागि, नास्ति सुखजो अनित्य पाग,
गुरु चरणन करु संगति, संत साधुकी ॥ हो मिस्कीन, राखु
निश्चय याकीन, तू तो जमापद बाकी खर्च काहे आबादकी ॥
मनमनसा दोऊ लौडि निकारिडारो, मारो हंकारतृष्णाकुबुद्धि
कुबादकी ॥ रूप हंस धार, ठहरि कीजिये विचार, यार बफादार
दीनानाथ, दीनबंधु गुरु साधुकी ॥ ८ ॥
॥ शब्द अष्टपदी ॥
प्रभुजी तुम विन कौन छुडावे ॥
महा कठिन यमजाल फाँस है तासों कौन बचावे ॥ १ ॥ नाना
फाँस फँसाय जीवको, अपने रूप छिपावे ॥ पंच कोश है परगट
ग्रासे, तेहिको कौन लखावे ॥ २ ॥ आपुहि एक अनेक कहावे,
त्रिविधि रूप बनावे ॥ सन्निपात होय दुष्ट नष्ट सो, परलय अंत
दिखावे ॥ ३ ॥ विषय विकार जगत अरुझावे, जहाँ तहाँ भटकावे ॥
योग ध्यान विगुर्चन भारी, ताहि सुरति अटकावे ॥ ४ ॥
आस नाम नौका बैठावे, भवकी धार बहावे ॥ तत्त्वमसी कहि
ताहि डुबावे, अंत कोइ नहीं पावे ॥ ५ ॥ चारि मुक्ति जोइन
चौरासी, तेहि मिलि हेतु बढावे ॥ नेम धर्म पूजा औ संजम,
बहुविधि लागि लगावे ॥ ६ ॥ भेष अलेख करे को पावे, जीवहिं
चैन न आवे ॥ चार वेद षट अष्टदशों लों, शून्यहि शून्य
समावे ॥ ७ ॥ काल चक्र बसि उत्पत्ति परलय, जीव दुसह दुख
पावे ॥ साहेब दया कीन्ह परखाये, रामरहस गुण गावे ॥ ८ ॥ ९ ॥
दोहा ।
सुख साहेब सुखरूप जो, हरन कालके पीर ॥ जो जन आवे शरणमें;
परखि लगायउ तीर ॥ १० ॥ करुणार्णव कृपाल गुरु, सुखनिधान
दुखभूर ॥ बन्दीछोर अशरण शरण, परख प्रकाश निजमूर ॥ ११ ॥
जीवनके दुख मेटिया, परखाये सब जाल ॥ ताते गुरु तुव नाम
(७०)
कबीरपंथी—
यह, बन्दीछोर दयाल ॥ १२ ॥ अशरण शरण नाम तुव,
बरणत हैं सब संत ॥ ताते गुरु न विसारिये, परखायो जीव
आंत ॥ १३ ॥ जो गुरु बसे बनारसी, शिष्य समुन्दर तीर ॥
बिसराये बिसरै नहीं, जो गुण होय शरीर ॥ १४ ॥ गुरु उपमा
क्या दीजिये, पटतर नहीं कोय ॥ पलक पलक कई बंदगी,
छिन छिन निरखों सोय ॥ १५ ॥ जो तू चाहे मुझको, छोड़
सकलकी आस ॥ मुझही ऐसा है रहो, सब सुख तेरे पास ॥ १६ ॥
साहेब दीनदयाल गुरु, सो पर और न कोय ॥ शरण आय
यमसे बचे, आवा-गवन न होय ॥ १७ ॥ दयाकरन अवगुण हरण,
तारण तरण उदार ॥ अशरण शरण बन्दों चरण, तुम विन नहीं
निस्तार ॥ १८ ॥ देखि अधमता आपनी, परवश यमके हाथ ॥
त्रसित गहेऊँ साहेब शरण, भवभय हारि सनाथ ॥ १९ ॥ प्रभु
सब लायक पारखी, हौं भौंमक अज्ञान ॥ लोह कनक पारस करे,
साहेब शरण समान ॥ २० ॥ बन्दों चरण सब दुख हरण,
प्रभु प्रसाद दुख धूरि ॥ दयाकरी सब दुख हरी, संसृति झूल भौ
दूरि ॥ २१ ॥ बहे बहाये जात थे, भव सागरके माहिं ॥
दयाकरी परखाय सब, झरणाये गहिं बाहिं ॥ २२ ॥
संतत अभय गुरुकी शरण, सदा परख परकास ॥ शमन सबै
भव जाल तम, रामरहस सुखबास ॥ २३ ॥ सर्वोपरि गुरुके चरण,
जो हारी भव खेद ॥ परम उदार सागर दया, थाह न पावे
वेद ॥ २४ ॥ चारि वेद जग विदित हैं, ब्रह्मा कीन्ह प्रकास ॥
चारि रूपसो जानिये, चारि अवस्था भास ॥ २५ ॥ भास मिटावे
जीवको, काटे यमके फंद ॥ साहेब दीनदयाल गुरु, संशय खंडे
द्वंद ॥ २६ ॥
शब्दावली
(७१)
छन्द.
साहेव स्वतः प्रकाश पारख, त्रास नहीं यम दंडके ॥ वास
शरण बिलास तजि, सब आस पिंड ब्रह्मांडके ॥ गांस फांस मिटाय
दास, हुलास ज्ञान अखंडके ॥ नहीं नाश ते इतिहास सुनि,
सो आदि अंत प्रचंडके ॥ यम हंत एक अनंत, तेहिके फांस
बहु वर्णतके ॥ बहु जंत गाई हरंत, कूप पंतत बहुते गनंतके ॥
सब दास होई रहंत, दुष्ट पंत चीन्ह न कंतके ॥ आदि अंत जे
मुनहि संत, नहीं धावहि सो बेअंतके ॥ जीव हाल कीन्ह बेहाल,
काल कराल सुनि अवजालके ॥ उरसाल अनेकन्हि भाल, सो
बाचाल कवितन गालके ॥ तेहि टाल डाल प्रचंड होहु, निहाल
नाल कृपालके ॥ लहू परख माला माल भेटि, भव जाल शरण
दयालके ॥ यह बुदबुदा जो शरीर, नीर न थीर झूठाहीरके ॥
परपंच बहु ततबीर, तेहिके बीर उबरे हीरके ॥ तजु ललनि कीर
फकीर, जेहि डर नहीं वजीर अमीरके ॥ गुरु पीर हरे भवभीर,
अभय गंभीर शरण कबीरके ॥ नारदादि शुकादि लै, ब्रह्मादि
सब जेहि गावहीं ॥ गाइ धाइ हेराइ, बारम्बार मन पछतावहीं ॥
जस जस जतन छूटन करहीं, भव बूड़े थाह न पावहीं ॥ सोई
धार कठिन अंधार, ते गहि पार पारख लावहीं ॥ २७ ॥
दोहा —
संतत सुख है परखमें, साधन जतन बिनास ।
भूलि भटकि मति जाहु जिय, विविध कर्मके फांस ॥
अर्जनामा अष्टक -
हौं सेवक अज्ञान मोपर दया दृष्टि निहारिये ॥ बाल जानि
कृपालु मोको सुरतिमें नहीं टारिये ॥ हौं निपट बुद्धि मलीन
जगत आधीन मै ताते भयो ॥ जो होय तुव पद लीन सोई
विपिन मन काहे न रह्यो ॥ १ ॥ यह जगत जाल कराल मोह
(७२)
कवीरपंथी—
विशाल मोहि अछो लग्यो ॥ यह कनक कामिनि नाल देखि
बैराग सब चित्तसे भग्यो ॥ नहिं काम हैं धन धाम सब बेकाम
सपनासो दिखे ॥ पर चित छाडत नाहिं आसा काह भये बहु
पढ लिखे ॥२॥ अब करत दास पुकार बारम्बार गुरु सुन लीजिये ॥
तुम सकल राग छुडाय हठ वैराग मोको दीजिये ॥ तुव नाम
पतित उधार मोते न पार कोइ दीन है ॥ अब बन्यो है जुग यार
तुव आधार ताते कीन्ह है ॥३॥ बाने की लाज तुम्हारी परख
विहारि सुख साहेब धनी ॥ मैं पतित हौं लाचार दास तुम्हार
गुरु साहेब गनी ॥ अब दास पूरण कीन्ह बिनती सुनहु दीन
उधारणा ॥ मैं परच्यो हौं जग जंजाल माहीं मोहिं साहब तारणा ॥४॥
अष्टक—
सुख साहेब सुखरूप सुखघन दुसह दुख निवारणं ॥ पारखके
प्रकाश कर्ता दीन जीव तारणं ॥ १ ॥ यह ब्रह्म जगको शोक
सकलो धोक धर्म बिडारणं ॥ महा मोह कराल नाशक सकल
भव भय हारणं ॥ २ ॥ यह वेद शास्त्र पुराण एक अनेक
जालहि खंडनं ॥ झाईं संधि औ काल भासिक दया धीरज
मंडनं ॥३॥ एक जीवको अनुमान सब तोफान जग तामें फँसो ॥
सोई गाँस फाँस छुडाय निज पद पाय पारख हठ ठसो ॥ ४ ॥
नहिं कल्पना अनुमान सो परमाण अब को कहि सके ॥ न प्रत्यक्ष
पारख छोड़िके यह वेद नाहक मरि बके ॥ ५ ॥ सुधि लेहु आप
कृपाल तब सब जाल जीवन छूटिहै ॥ निज दास होय हुलास
तबहीं भास सकलो टूटिहै ॥ ६ ॥ मैं चरण सेवक दीन तुम
परवीण दायी कीन्ह हो ॥ मैं हीन छीन मलीन प्रभुजी बाँह गहिकी
लीन्ह हो ॥ ७ ॥ बाँह गहेकी लाज पूरन शरन तुमको आज है ॥
नहिं औरसे कहु काज गुरुपद सकल सुखको साज है ॥ ८ ॥
शब्दावली
(७३)
अष्टक-भो दयाल जगत पाल कालजाल खंडनं ॥ पाप ताप
दहनहार दिव्य ज्ञान मंडनं ॥ भवअपार कर्णधार पाकनाम
अंकजं ॥ चरण शरण देहि मेनमामि पाद पंकजं ॥ १ ॥ सत्प्रकाश
चिदाभास नाम रूप अक्षकं ॥ जगत ब्रह्म आत्म सर्व साक्षी आदि
लक्षकं ॥ दयाधीर युक्तयोग विशुद्ध नाम अंकजं ॥ चरण शरण
हि मे नमामि पाद पंकजं ॥ २ ॥ हंसभूप परमरूप भुक्ति मुक्ति
दायकं ॥ दक्ष मक्ष रक्ष प्रभु सर्व संत नायकं ॥ परीक्ष अक्ष निर्मलं
विशुद्ध नाम अंकजं ॥ चरण शरण देहि मे नमामि पाद पंकजं ॥ ३ ॥
बिरह कलोल ब्रह्म गोल तत्त्वमसि छेदिकं ॥ वेद विद्यातीत त्वं
चतुर स्थान भेदिकं ॥ त्वयंअक्षि साधु पक्षि शुद्धनाम अंकजं ॥
चरण शरण देहि मे नमामि पाद पंकजं ॥ ४ ॥ परख भान संत
ध्यान षड पुटी विनाशिकं ॥ आदि अंत मध्य नाना नेति भास
भासिकं ॥ कृपासिधु शील इन्दु विशुद्ध नाम अंकजं ॥ चरण
शरण देहि मे नमामि पाद पंकजं ॥ ५ ॥ विश्व चित्र तासु मित्र
तत्पवित्र शासनं ॥ शुचि पवित्र त्वं विचित्र सार शब्द भाषनं ॥
करुणामय कवीर औ विशुद्धनाम अंकजं ॥ चरण शरण देहि मे
नमामि पाद पंकजं ॥ ६ ॥ जोगजीत भौ अजीत न्याय नीति
कारणं ॥ ऋद्धि सिद्धि निद्धि दाता बिरद हस्त धारणं ॥ सुखाधि
दीनपालकं विशुद्धनाम अंकजं ॥ चरण शरण देहि मे नमामि
पाद पंकजं ॥ ७ ॥ बुद्धि अंध ज्ञान मंद हीन छंद स्वष्टकं ॥
पूरन दास भाषिते सु पाकनाम अष्टकं ॥ त्वंप्रसादसुगमसर्व विशुद्ध
नाम अंकजम् ॥ चरण शरण देहि मे नमामि पाद पंकजं ॥ ८ ॥
अष्टक-
मंगलरूप अनुपमपूरन नाम कवीर सो आप उदारा ॥ मोपर
हृष्टि दयाकरि हरेहु हौ अति बालक दास तुम्हारा ॥ काम अपार
महाबल भारथ देखतके मम चित्त डेरावे ॥ कीजे कृपा उर