कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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टाला ॥ पल जब पीव से लाग। धोखा तब दिलों का भागा ॥
चेतावनी चित विलास । जबलग रहे पिंजर श्वास ॥ सोहंशब्द
अजपाजाप । साहब कवीरसो आपहिंआप ॥
साखी ।
चेतावनि चितलागि रहे, यह गति लखै न कोय । अगम
पन्थ के महल में, अनहद बानी होय ॥ नाम नैन में रमि रहा,
जाने बिरला कोय । जाको सतगुरु मीलिया, ताको मालुम
होय ॥ झण्डा रोपा गैब का, दोय परवत के सन्ध । साधु पहि-
चाने शब्द को, दृष्टि कमल कर बन्ध ॥ झलके जोती झिल-
मिला, बिन बाती विन तेल ॥ चहुँदिशि सूरज ऊगिया, ऐसा
अदभुत खेल ॥ जागृत रूपी रहत है, सतमत गहिर गंभीर ।
अजरनाम बिनसे नहीं, सोऽहं सत्य कवीर ॥
॥ इति चेतावनी ॥
ज्ञानगुदरी ।
अलखपुरुष जब किया बिचारा । लख चौरासीधागा डारा ॥
पांच पत्तव की गुदरी बीनी । तीन गुणनसे ठाढी कीनी ॥ ता में
जीव ब्रह्म औ माया । समरथ ऐसा खेल बनाया ॥ सीवन पांच
पचीसो लागे । काम क्रोध मोह मद पागे ॥ काया गुदरी का
बिस्तारा । देखो सन्तो अमर सिंगरा ॥ चांद सूर दोह पैवैंद
लागे । गुरु प्रताप से सोवत जागे ॥ शब्दकी सुई सुरतिकाडोरा ।
ज्ञानके टोभन सिरजनडोरा ॥ अबगुदरीकी करु हुशियारी । दाग
न लागे देखुबिचारी ॥ सुमतकी साबुन सिरजनधोई । कुमत
मैलको डारो खोई ॥ जिनगुदरीका कियाविचारा ॥ सोजन भेटे
सिरजन हारा ॥ धीरजधुनीध्यान धर आसन । सतकी कोपीनसहज
सिंगासन ॥ जुगतकमंडल कर गहि लीन्हा । प्रेम पावडी मुरशद