कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 63, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्दावली
(५७)
प्रभाता । जनम २ के पातक जाता ॥ ज्ञानगुदरी पढे मध्याना
सो लखि पावे पद निर्वाना ॥ संज्ञा सुमिरण जो नर करई । जरा
मरण भौसागर तरई ॥ कहैं कवीरा सुनो धर्मदासा । ज्ञानगुदरी
करचो प्रगासा ॥
साखी
माला टोपी सुमिरनी, सदगुरु दिया बखशीश । पल २ गुरु
को बंदगी, चरण नवाऊँ शीश ॥ भौ भंजन दुख परिहरन, अम्बर
करन शरीर । आदियुगादि आप हो, चारो युग कव्वीर ॥ बंदी-
छोर कहाइया, बलख शहर मंझार । छूटे बंद सब भेष के, धन
धन कहे संसार ॥
॥ इति श्रीज्ञानगुदरी सम्पूर्णम् ॥
रतनास्तुति
गुरुध्यानसार भजबारबार ।
सब तजबिकार सतनामसार सों कर यारी ॥ जय जय गुरु-
पीरं सत्यकबीरं, अमरशरीरं अधिकारी ॥ निर्गुण निज मूलं
धरि अस्थूलं, काटें शूलं भवभारी ॥ सूरति निज सोहं कलिमल-
खोहं, जन मनमोहं छबिभारी ॥ अम्बरपुरबासी सब सुखरासी,
सदा बिलासी बलिहारी ॥ पीरनके पीरा मतिके धीरा, अलख
फकीरा ब्रह्मचारी ॥ हंसन हितकारी जग पगुधारी, गरभप्रहारी
उपकारी ॥ काशी आये दास कहाये, हंस बचाये प्रणधारी ॥
रामानंदस्वामी अन्तर्यामी, हैं वड़नामी संसारी ॥ उनको गुरु-
कीन्हा मतबुधलीन्हा, उनहुन चीन्हा करतारी ॥ ब्राह्मणसन्यासी
कीन्हीहांसी, तब अविनाशी पगुधारी ॥ मगहर स्थाना किया
पयाना, दे परवाना जन तारी ॥ तहैं बलबीरा तजे शरीरा,