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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(५८)

कवीरपंथी-

काटन पीरा भव भारी ॥ बिरसिघदेवराजा, सुनबलगाजा सबदल
साजा संभारी ॥ उत्त पीर पठाना है बलवाना, लाय कमाना कर
डारी ॥ सनमुख नियराना छूटे बाना, भै घमसाना रण भारी ॥ तब
गुरुज्ञानी मनकी जानी, अधरहिं बानी उच्चारी ॥ खोलोपरदा है
नहिं सुरदा, जूझ अवस्था करडारी ॥ सुनिके यह बानी अचर
जमानी, देख निशानी सिरमारी ॥ रोये परवीना हम मतिहीना,
तुमहिं न चीन्हा करतारी ॥ मगहर तजि बासा किया प्रकाशा,
जहँ धर्मदासा ब्रतधारी ॥ तिनको शिष कीन्हा सर्वस दोन्हा,
दुख हरलीन्हा यमभारी ॥ सतपन्थ चलाये भ्रम मिटाये, शब्द
दिढाये संसारी ॥ रतनाजन तेरो करत निहेरो, हमतन हेरो
बलिहारी ॥

अष्टक ।

साहब गुरुज्ञानी समरथध्यानी, अचल स्थानीस्थीरं ॥ अवि-
गतवानी मुक्तिनिशानी, जगमें आनी कब्बीरं ॥ शीशबिराजे
तिलक अखण्डित, मुख सतसुकृत गम्भीरं ॥ ज्ञान प्रचण्डित
पाखंड खण्डित, समता मंडित कब्बीरं ॥ भेष रिसाला श्रवनी
माला, प्रेम उजाला किर्पा गहिरं ॥ दीनदयालं जन प्रतिपालं,
सदा कृपालं कब्बीरं ॥ संकट टारन कष्ट निवारन, शीश विदा-
रन यम थीरं ॥ हंस उबारन जिव निस्तारन, भर्म विदारन
कब्बीरं ॥ सतयुग, त्रेता, द्वापर बीता, रमता तीता पर पीरं ॥
कलयुग कीता सबसों जीता, परम पुनीत कब्बीरं ॥ काशी छोड़
उडीसा आये, आसा गाडे सिन्ध तीरं ॥ ठाकुर पंडो गर्ब बिहंडो,
पाखंड खंडो कब्बीरं ॥ पुरुष विदेही अविचल देही, नाम सनेही
मन थीरं ॥ जो जन जाने भेटे तेही, दर्शन दे गुरु कब्बीरं ॥
कवीरं अष्टक टारन कष्टक, भौजल नष्टक कर थीरं ॥ धर्मनि-
दासं नित अभ्यासं, प्राप्त तासं कब्बीरं ॥