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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(५९)

स्मृति ।

गुरु दुखित तुम विन रटत द्वारे, प्रगट दर्शन दीजिये ॥
गुरुसामियांसुनु विनतिमोरी, बलिजाउँ बिलंब न कीजिये ॥ गुरु
नैन भरभर रहत हेरो, निमिख नेह न छाडिये ॥ गुरु बाँह दीजे
बन्दछोर, सो अबकी बन्द छुड़ाइये ॥
विविध विधि तन भयेउ व्याकुल, विन देखे अब नारहों ॥ तपत
तनमन उठत ज्वाला, कठिन दुख कैसे सहों ॥ गुन औगुम अप-
राध छमाकरि, अब न पतित विसारिये ॥ यह विनती धर्मदास
जनकी, सतपुरुष अवमानिये ॥

विनय ।

दरस दीजै गुरु परम स्नेही । तुम विनु दुख पावे मोर देही ॥
अन्न न भावै नींद नहिं आवै । बारबार मोहि विरह सतावै ॥
घर आंगनमोहि कछु न सुहावै । वज्र भयो यहविरह नजावै ॥
नैनानीर बहे जलधारा । निसिदिन पंथ निहारुं तुम्हारा ॥ जैसे
निजधन जातहिराई । ऐसे तुम विनु कछु न सुहाई ॥ जैसे मनि
विनु फानि बेकरारा । ऐसे तुम विनु हाल हमारा ॥ हे कर्ता तुम
अपरम्पारा । केहि कारन गुरु मोहि विसारा ॥ जैसे मीन मरे
विनु नीरा । ऐसे तुम विनु दुखित शरीरा ॥ छन्द ॥ दुखित
तुम विनु रटत द्वार, प्रगट दर्शन दीजिये ॥ विनति सुनु स्वामिया
वलि जावैं विलंब न कीजिये ॥ विविध विधि हम भय हैं व्या-
कुल, विनदेखे जिव ना रहै ॥ तपत तन मन उठत ज्वाला, कठिन
दुख अब को सहे ॥ गुन औगुन अपराध छिमाकरि औगुन कछु
न विचारिये ॥ पतित पावन राखलाज, अब न पतित विसारिये ॥
वंदीछोर अब बाँह दीजे, अब की बन्द छुड़ाइये ॥ नैन भरि
भरि रहैं निरखत, निमिख नेह न तोरिये ॥ दासधर्मनि करत