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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(५६)

कवीरपंथो-

चीन्हा ॥ सेलीशील बिबेककी माला । दयाकी टोपी तनधर्म-
शाला ॥ मिहर मंतंगा मन वैशाखी । मृगछाला मनहीको राखी॥
निहचे धोती पवन जनेउ । अजपा जपे सो जाने भेऊ ॥ रहे
निग्नतर सतगुरु दाया । साधु सँगतकर सबकछु पाया ॥ लौकी
लकुटी हिरदया झोरी । क्षमा खड़ाऊँ पहिर बहोरी ॥ मुक्ति
मेखला सुकृत सुमिरनी । प्रेम पियाला पीवे मौनी ॥ उदास
कूबरी कलह निवारी । ममता कुत्तीको ललकारी ॥ जुगतजंजी-
रवांथजब लीन्हा । अगम अगोचरखिरकी चीन्हा ॥ विराग-
त्याग बिज्ञान निधाना । तत्ततिलकदीन्होनिरबाना ॥ गुरुगम
चकमकमनसमतूला । ब्रह्म अगिनपरगटकरमूला ॥ संशय शोक
सकल भ्रम जारा । पांच पचीसो परगटमारा ॥ दिलका दरपन
दुबिधा खोई । सो बैरागी पक्का होई ॥ शून्य महल में फेरीदेई।
अमृतरसकी भिच्छा लेई ॥ दुखसुख मेला जगका भाऊ । तिर-
बेनीके घाट नहाऊँ ॥ तनमनशोधि भयाजेहि ज्ञाना । सोलखि
पावे पद निर्बाना ॥ अष्ट कमलदल चक्रर सोधे । जोगी आप
आपमें बोधे ॥ ईगला पिगलाके घर जाई । सुषमन नीर रहा
ठहराई ॥ वोह सोह तत्त्व बिचारा । बंकनालमें किया सँभारा ॥
मनको मार गगन चढिजाई । मानसरोवर पैठि नहाई ॥ अनह-
दनाद नामका पूजा । ब्रह्म बैराग देव नहि दूजा ॥ छुटगइ कश-
मल कर्मजलेखा । यहि नैनन साहबको देखा ॥ अहंकार
अभिमान बिडारा । घटका चौकाकर उजियारा ॥ चितकर
चंदन मनसा फूला । हितकर संपुट करले मूला ॥ शरधा चैवर
प्रीति कर धूपा । नौतम नाम साहबका रूपा ॥ गुदरी पहिरे
आप अलेखा । जिन यह प्रगट चलाई भेखा ॥ साहबकवीरब
स्निशजबदीन्हा । सुरनरमुनिसबगुदरी लीन्हा ॥ ज्ञानगूदरी पठे-