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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(७२)

कवीरपंथी—

विशाल मोहि अछो लग्यो ॥ यह कनक कामिनि नाल देखि
बैराग सब चित्तसे भग्यो ॥ नहिं काम हैं धन धाम सब बेकाम
सपनासो दिखे ॥ पर चित छाडत नाहिं आसा काह भये बहु
पढ लिखे ॥२॥ अब करत दास पुकार बारम्बार गुरु सुन लीजिये ॥
तुम सकल राग छुडाय हठ वैराग मोको दीजिये ॥ तुव नाम
पतित उधार मोते न पार कोइ दीन है ॥ अब बन्यो है जुग यार
तुव आधार ताते कीन्ह है ॥३॥ बाने की लाज तुम्हारी परख
विहारि सुख साहेब धनी ॥ मैं पतित हौं लाचार दास तुम्हार
गुरु साहेब गनी ॥ अब दास पूरण कीन्ह बिनती सुनहु दीन
उधारणा ॥ मैं परच्यो हौं जग जंजाल माहीं मोहिं साहब तारणा ॥४॥

अष्टक—

सुख साहेब सुखरूप सुखघन दुसह दुख निवारणं ॥ पारखके
प्रकाश कर्ता दीन जीव तारणं ॥ १ ॥ यह ब्रह्म जगको शोक
सकलो धोक धर्म बिडारणं ॥ महा मोह कराल नाशक सकल
भव भय हारणं ॥ २ ॥ यह वेद शास्त्र पुराण एक अनेक
जालहि खंडनं ॥ झाईं संधि औ काल भासिक दया धीरज
मंडनं ॥३॥ एक जीवको अनुमान सब तोफान जग तामें फँसो ॥
सोई गाँस फाँस छुडाय निज पद पाय पारख हठ ठसो ॥ ४ ॥
नहिं कल्पना अनुमान सो परमाण अब को कहि सके ॥ न प्रत्यक्ष
पारख छोड़िके यह वेद नाहक मरि बके ॥ ५ ॥ सुधि लेहु आप
कृपाल तब सब जाल जीवन छूटिहै ॥ निज दास होय हुलास
तबहीं भास सकलो टूटिहै ॥ ६ ॥ मैं चरण सेवक दीन तुम
परवीण दायी कीन्ह हो ॥ मैं हीन छीन मलीन प्रभुजी बाँह गहिकी
लीन्ह हो ॥ ७ ॥ बाँह गहेकी लाज पूरन शरन तुमको आज है ॥
नहिं औरसे कहु काज गुरुपद सकल सुखको साज है ॥ ८ ॥